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शनिवार, 30 नवंबर 2013

बादलों की मेहरबानी

बर्फ पिघली और दरिया की रवानी हो गयी।
तुम मिले तो जिन्दगानी, जिन्दगानी हो गयी।।
ढीठ झोके ने हवा से छू लिया उसका बदन।
शर्म से इक शोख नदिया पानी-पानी हो गयी।।
खाक करने पर तुली थी धूप फसलों को मगर।
वे तो कहिये बादलों की मेहरबानी हो गयी।।
दिल की बस्ती में तो जख्मों का बसेरा हो गया।
आंख मेरी आंसुओं की राजधानी हो गयी।।
कल सियासत कह रही थी दल न बदलेंगे कभी।
ये तवायफ कब से आखिर स्वाभिमानी हो गयी।।

आखिर क्यों ?बा -मुश्किल ही छू पाती हैं कामशिखर को औरतें जानिये इस श्रृंखला के तहत माहिरों की राय (पहली क़िस्त )


आखिर क्यों ?बा -मुश्किल ही छू पाती हैं कामशिखर को औरतें 

जानिये इस श्रृंखला के तहत माहिरों की राय (पहली क़िस्त )


रविकर  

क्रीड़ा-हित आतुर दिखे, दिखे परस्पर नेह |

पहल पुरुष के हाथ में, सम्पूरक दो देह |

सम्पूरक दो देह, मगर संदेह हमेशा |
होय तृप्त इत देह, व्यग्र उत रेशा रेशा |

भाग चला रणछोड़, बड़ी देकर के पीड़ा |
बनता कच्छप-यौन, करे न छप छप क्रीड़ा || 


गोरी *गोही आदतन, द्रोही हरदम मर्द |


गर्मी पल में सिर चढ़े, पल दो पल में सर्द |


पल दो पल में सर्द, दर्द देकर था जाता |


करता था बेपर्द, रहा हर वक्त सताता |


बदली सबला रूप, खींच कर रखती डोरी |


होय श्रमिक या भूप, नचा सकती है गोरी ||

माहिरों की राय :


आसान नहीं रहता है औरतों का कामानन्द को  प्राप्त होना 

आखिर क्यों ?

अमूमन पुरुष यौन -दक्ष नहीं होते हैं। काम -कला से पूरी तरह वाकिफ ही नहीं होते हैं। अलावा इसके मनो -सामजिक वजहें भी आड़े आती हैं औरत न दिल की कह पाती है न मर्द समझ पाता है। काम -शिखर पर पहुंचना और उसका अभिनय करना दो अलग अलग बातें हैं। औरत कई मरतबा अपने मर्द की हिफाज़त के लिए भी यह स्वांग भरती है .ताकि उसकी मर्दानगी उसका हम आहत न हो।बचाव करते करते खुद हीन  भावना से ग्रस्त हो जाती है खुद को ही कुसूरवार मान बैठती है।अपना नसीब भी।  

कुदरत के नियमों के अनुसार दोनों के शरीर परस्पर एक दूसरे  के सम्पूरक हैं एक दूजे के लिए बने भी हैं। यौन -शिखर तक दोनों को सहज रूप पहुंचना चाहिए। 

अक्सर पहल पुरुष के हाथ में ही रहती है उसका लैंगिक उत्तेजन भी स्पष्ट  सीधा सपाट होता है। काम शिखर को छूना और वापसी भी लेकिन औरतों के मामले में ऐसे कोई स्पष्ट   संकेत नहीं मिलते न ही  कोई ऐसे बायो -मार्कर्स ही हैं ,जो हैं भी वह गोपन बने रहते हैं मर्द उनसे वाकिफ ही नहीं होता। vaginal contractions  ऐसा ही एक मार्कर है। 

अराउज़ल टाइम (यौन रूप से उत्तेजित  होने दिखने की अवधि ,कामक्रीड़ा के लिए आतुरता )औरत का लंबा रहता है। यहीं पर यौन प्रोद्योगिकी ,उत्तेजन प्रदान करने की वैयक्तिक तरकीबों का अपना महत्व रहता है। 

तमाम बाहरी कारक (external factors )अपना असर रखते हैं।किसी को ईअर लोब्स (कर्ण लोलक )पर हल्का दन्त दवाब उत्तेजन प्रदान करता है। किसी को कांख पर। अन -अन्वेषित रह जाते हैं काम उत्तेजन केंद्र अक्सर लव हेंडिल्स में ही अटकके रह जाता है मर्द। 

पुराना रिश्ता है मर्द का प्राथमिक आहार के इन स्रोतों (स्तनों ,वक्ष स्थल से ) लेकिन कामोत्तेजना के एकाधिक स्थल गुह्य ही रह जाते हैं ऐसे में multiple orgasm की कौन कहे यौन शिखर तक एक बार पहुंचना भी बा -मुश्किल से किसी किसी को नसीब होता है। 

दुनिया में ऐसा कहाँ सबका नसीब है ,

कोई कोई अपने पीया के करीब है। 

दूर ही रहते हैं यौन किनारे ,

इनको न कोई मांझी पार लगाए। 

तू है तो ज़िंदगी को ज़िंदगी क़ुबूल है। 

पुरुष का ध्यान अपने यौन परितोष पर रहता है। काम खत्म पैसा हज़म। लेकिन औरत अब मन मसोस कर पहले की तरह बैठी नहीं रह सकती। बेहतर हो मर्द अपने यौन खोल से बाहर आये। यौन कच्छप न बने। कुरुक्षेत्र के मैदान में टिके रहना उसे सीखना चाहिए। यौन शिखर से जुड़ी  है प्रेम की डोर। दूसरे को प्रेम करना सीखिए। 

http://www.askmen.com/dating/love_tip/32_love_tip.html

http://ezinearticles.com/?Female-Erogenous-Zones---9-Erogenous-Zones-That-Can-Drive-Your-Partner-Wild!&id=161492

सन्दर्भ -सामिग्री :High and O/Why is a female orgasm hard to come by ?Experts fill you in /MumbaiMirror ,Nov29 ,2013 /p18-19

Expert :DR RUPIN SHAH ,CONSULTANT ANDROLOGIST ,LILAVATI AND BHATIA HOSPITAL ,MUMBAI 

(ज़ारी )

शुक्रवार, 29 नवंबर 2013

(२)भुट्टा lutein से भरा हुआ रहता है। नेत्रों को स्वस्थ रखता है। धमनियों की दीवारों को अंदर से कठोर और खुरदरी पड़ने से बचाता है।

सेहतनामा 

(१)दिन भर की थकान और दैनिकी के मानसिक दवाब के बाद एक ग्लास गर्म दूध (मुमकिन हो तो छुआरे के साथ देर तक लोहे की कढ़ाई में उबाला हुआ )दिन भर की थकान ,नस नस के तनाव को दूर भगा देता है। पेशियों को आराम पहुंचाता है तन और मन दोनों को ऊर्जा से भर देता है। 

(२)भुट्टा lutein से भरा हुआ रहता है। नेत्रों को स्वस्थ  रखता है।  धमनियों की दीवारों को अंदर से कठोर और खुरदरी पड़ने से बचाता है। 

http://altmedicine.about.com/od/completeazindex/a/lutein.htm

lutein:

Often used in treatment or prevention of eye diseases, lutein supplements contain a natural substance classified as a carotenoid (a group of plant pigments with antioxidant effects). Sometimes referred to as xanthophyll, lutein is naturally found in a number of fruits and vegetables (especially those with deep green, orange, and yellow coloring). Lutein supplements provide a more concentrated supply of this antioxidant.

Lutein supplements are typically used to treat or prevent eye diseases, such as cataracts andmacular degeneration. Known to build up in the retina and lens of the eye, lutein is thought to protect the eye from injury induced by free radicals (chemical byproducts shown to damage cells and contribute to the development of certain diseases).

Some proponents claim that lutein supplements can also help prevent colon cancerbreast cancer,diabetes, and heart disease.

other health benefits of lutein  supplements 

To date, most of the studies on lutein's health benefits have focused on dietary intake of lutein. Those studies suggest that dietary intake of lutein may help protect against atherosclerosis, age-related macular degeneration, and cataracts. While few studies have examined the health effects of lutein supplements, there's some evidence that lutein supplements may improve eye health. Here's a look at two study findings:

Good nutrition is important to keep your eyes healthy and functioning their best throughout your lifetime. Two very important eye nutrients that may reduce your risk for macular degeneration and cataracts have names you may not be familiar with: lutein (LOO-teen) and zeaxanthin (zee-ah-ZAN-thin).

Lutein and zeaxanthin are compounds called xanthophylls (ZAN-thuh-fills), which are yellow pigments that occur naturally in many plants and vegetables. Xanthophylls belong to a class of organic compounds called carotenoids, which also includes orange and red plant pigments. Though lutein is considered a yellow pigment, in high concentrations it appears orange-red.

In nature, lutein and zeaxanthin appear to absorb excess light energy to prevent damage to plants from too much sunlight, especially from high-energy light rays called blue light.

In addition to being found in many green leafy plants and colorful fruits and vegetables, lutein and zeaxanthin are found in high concentrations in the macula of the human eye, giving the macula its yellowish color. In fact, the macula also is called the "macula lutea" (from the Latin macula, meaning "spot," and lutea, meaning "yellow").

Recent research has discovered a third xanthophyll in the macula. Called meso-zeaxanthin, this carotenoid is not found in food sources and appears to be created in the retina from ingested lutein.

Lutein and zeaxanthin appear to have important antioxidant functions in the body. Along with other natural antioxidants, including vitamin Cbeta carotene and vitamin E, these xanthophylls guard the body from damaging effects of free radicals, which are unstable molecules that can destroy cells and play a role in many diseases.

In addition to important eye and vision benefits, lutein may help protect against atherosclerosis( धमनी काठिन्य ,धमनी की दीवारों का अंदर से खुरदरी होना ,कठोर पड़  जाना,चिकनाई से अवरुद्ध हो जाना  )(buildup of fatty deposits in arteries), the disease that leads to most heart attacks.

Cooked spinach is one of the best natural food sources of lutein and zeaxanthin.

एहसास



बैठा था इंतज़ार में
पागलों कि तरह
चुप चाप
तुम्हारी राहों में;
सोचा था
एक झलक मिल जायेगी
पर
दूर -दूर तक
तुम नजर नहीं आई
न तुम्हारी परछांई.
मेरे लिए
तुमसे होकर,
गुजरने वाली हवा ही
काफी थी;
पर
हवा ने भी मुझसे बेरुखी कर ली,
अनजान से ख्यालों में
खुद को खोता गया,
पर लोगों ने तो
मुझे
एक और नाम दे दिया
”पागल”
क्या करूँ?
किस से कहूँ
कि
ये पागलपन
भी
खुदा कि नेअमत
है,
तुमसे ,
न रब से,
कोई शिकायत
नहीं;
जाने क्यों
टुकड़ों का प्यार
मुझे रास नहीं आता;
और
अधूरे कि आदत नहीं है.
तुम्हारी बेरुखी
भी
तुम्हारी अदा लगती है,
और मेरी जिंदगी
भी
मुझे सजा लगती है.
मेरे जज्बात
तो बस मेरे हैं,
वो मुझे रुलाएं
या तड़पायें,
फर्क पड़ता क्या है?
मेरा क्या?
मझे अब
दर्द भी अपना लगता है,
खुशियां तो
तुम्हारे साथ
कब कि जा चुकी हैं,
अब है तो बस तन्हाई,
हर पल – हर लम्हा.
मेरे गम
और मेरी तन्हाई
हाँ बस यही है
मेरी जिंदगी.
आज एक अर्से के बाद
सुकून मिला
जब किसी ने मुझसे कहा
कि
पत्थरों कि दुनिया में
रहते रहते
इंसान भी पत्थर
हो गए हैं

गुरुवार, 28 नवंबर 2013

उद्घोष सुनना होगा ........................अन्नपूर्णा बाजपेई


नवयुवा तुम्हें जागना होगा
उद्घोष फिर सुनना होगा
नींद न ऐसी सोना तुम
कर्म न ऐसे करना तुम
जिससे मान भंग हो
तिरंगे की शान कम हो
सूर्य सम चमकना होगा
नवयुवा ...............

देश की पुकार सुनो
माँ की गुहार सुनो
समय की ललकार सुनो
बुराई का प्रतिकार करो
कंधों को मजबूत बनाना होगा
उद्घोष फिर सुनना होगा
नवयूवा ..................







बुधवार, 27 नवंबर 2013

लंगी मारिए आगे बढ़िए

वक्त केसाथ लोगों की जीवनशैली बदली है. लोगों का सोच बदला है. ठीक उसी तरह से अपने को किसी पेशे में स्थापित करने, सफलता का पैमाना भी बदला है. इस तरीके से सिद्ध पुरुषों को लंगीमार कहते हैं. इन दिनों लंगीमार साधक हर क्षेत्र में सक्रिय हैं. लंगीमार साधक के बारे में जानने से पहले हम जान लें कि आखिर लंगीमार साधक की पहचान कैसे होगी. गुरु गोविंद दोनों खड़े, काके लागंपांव, जैसी कोई दुविधा नहीं है. मामला बिल्कुल सरल है. व्यक्ति कितना बड़ा लंगीमार साधक है, इसकी परख के लिए छोटा-सा टेस्ट है. मसलन वह काम करता है या केवल काम की चर्चा करता है. वह काम की चर्चा ही करता है या केवल काम की फिक्र करता है. अगर बंदा केवल काम की चर्चा कर रहा है, तो समझिए अभी लंगीमारक  पंथ का एप्रेटिंस है. अगर वह काम की फिक्र कर रहा है, तो वह इस पंथ का मास्टर हो चुका है.  लंगीमार साधक आपको कभी भी, कहीं भी मिल जायेंगे. आइए अब मैं आपको लंगीमार साधक के गुण-दोष से अवगत कराता हूं. कैसे और कब लंगी का उपयोग करना है ताकि अगला केवल पटकनी ही नहीं गुलाटी खाने लगे. इनका सबसे खास गुण होता है. रेखा अगर लंबी खिंच गयी है, तो उसे छोटी करने  के लिए इनके पास बहुत ही आसान फामरूला है. रेखा को कांट-छांट दो. मतलब अपनी रेखा को खींचना इनका लक्ष्य नहीं होता है बल्कि दूसरों की रेखा को छोटा कर खुद को स्थापित करने का विशेष हुनर इनमें होता है. इस तरह के साधकों की डिमांड भी इन दिनों काफी बढ़ गयी है. अब देखिए न, हर बात पर दुखी रहने वाले दुखन भाई का लंगीमार साधक के तौर पर यश फैल रहा है और कीर्ति पताका फहरा रही है. मैं अपने दुखन भाई के दुख के कारण और लंगी मारने की विशेषता से आपको रू -ब-रू कराता हूं. एक पांव क्रब में पहुंचने के बावजूद भाई ने अपनी प्रवृत्ति नहीं बदली है. आपने लंगी मार हुनर  सिखाने की बाकायदा  ट्रेनिंग भी देनी शुरू कर दी है. ट्रेनिंग सेंटर के सीइओ ये खुद हैं, तो अपने दिलअजीज को योग्यता के आधार पर पद सृजित कर नियुक्त भी कर लिया है. हां, खास बात इस ट्रेनिंग सेंटर की यह है कि यह किसी कमरे या विशाल भवन में स्थापित नहीं है. यह नियत समय पर चुनचुन चायवाले की दुकान पर चलता है. इस ट्रेनिंग की समयावधि काफी कम होती है, लेकिन कम समय में भी देश-दुनिया से लेकर समाज के हर पहलू पर बात की जाती है. हर क्षेत्र का तापमान नापा/परखा जाता है. ट्रेनिंग में प्रत्येक दिन सत्र के अंत में  निंदा प्रस्ताव पारित किया जाता है. लंगीमार ट्रेनिंग सेंटर के सीइओ दुखन भाई के साथ सभी साथी इस प्रस्ताव को ध्वनिमत से पारित करते हैं. फिर एसएमएस, फेसबुक, मेल के जरिये निंदा प्रस्ताव की पटकथा को समाज में फैलाया जाता है. दुखन भाई इस ट्रेनिंग सेंटर को मॉडल ट्रेनिंग सेंटर के रूप में स्थापित करने की फिराक में हैं. जय हो.

श्याम स्मृति ..... प्रेम व्यक्ति के वश में नहीं, प्रेम में भावुकता एवं प्रेम विवाह .....डा श्याम गुप्त....



                                                     श्याम स्मृति 

              प्रेम  व्यक्ति के वश में नहीं , प्रेम में भावुकता  एवं प्रेम विवाह .....
  
                 प्रेम होना या करना एक अलग बात है वह व्यक्ति के वश में नहीं है    परिस्थितियाँ ही नियति बनकर व्यक्ति को भवितव्य की ओर धकेलती हैं तथा भविष्य तय करती हैं।  हाँ, व्यक्ति की स्वयं की दृड़ता जो आदर्शों, विचारों, कुल समाज की स्थिति से बनती है इसमें बहुत प्रभाव डालती है अपने प्यार को प्राप्त कर लेनाप्रेमी से प्रेम-विवाह  एक सौभाग्य की बात है    परन्तु एक अन्य पक्ष यह भी है कि प्रेम को भौतिक रूप में पा लेना या प्रेम विवाह कोई  इतना महत्वपूर्ण आवश्यक भी नहीं है कि उसके लिए संसार में सब कुछ त्यागा जाय    यह इतनी बड़ी उपलब्धि भी नहीं है कि प्राण त्यागने को भी प्रस्तुत रहा जाय, जो ईश्वरीय देन है   क्योंकि-  ' आत्म एव यह जगत हैवस्तुतः हम प्रत्येक कार्य सिर्फ स्वयं के लिए ही करते हैं   परमार्थ में भी आत्म-सुख का भाव छुपा रहता है   सभी बंधन, सहयोग भी आत्मार्थ से ही जुड़े रहते हैं।  हम देंगे तभी मिलेगा भी  आत्मार्थ भाव ही है   अतः सिर्फ प्रेम-विवाह की जिद में सारा केरियर, सांसारिक सम्बन्ध यहाँ तक कि जीवन भी खोना पड़ता है तो शायद यह बहुत अधिक मूल्य है   संसार में ऐसी कौन सी प्रेम-कथा है जो इस तरह के सम्बन्ध में परिणत होकर उन्नत शिखर पर पहुँची होया जो सुखान्त हो  एवं  जिससे देश समाज या व्यक्ति स्वयं उन्नत हुआ हो
 
              प्रायः कहा जाता है कि महिलायें भावुक होती हैं   परन्तु यह सर्वदा सत्य नहीं है वैदिक विज्ञान के अनुसार . पराशक्ति -पुरुष सिर्फ भाव रूप में शरीर या किसी पदार्थ में प्रविष्ट होता है जबकि अपरा-शक्ति नारी, प्रकृति, माया, शक्ति या ऊर्जा रूप है जो पदार्थों   शरीर  के भौतिक रूप का निर्माण करती है अतः पुरुष भाव-रूप होने से अधिक भावुक होते हैं, स्त्रियाँ इसका लाभ उठा पाती हैं