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मंगलवार, 30 दिसंबर 2014

नववर्ष ........



एक और साल हाथ से फिसलता जाता है
बीते साल में अच्छा तो होता ही है
अफ़सोस दुनियाँ में दुखद भी घटित हो जाता है
नया साल फिर एक नयी
उम्मीद जगाता है
इसीलिए हर कोई
इस वार्षिक मीली पत्थर को
जोरशोर से मनाता है
किसी को जल्दी होती है
कि साल जल्दी जल्दी बढ़ते क्यों नहीं
तो किसी को फिक्र होती है
कि साल जल्दी जल्दी बढ़ते क्यों हैं
मगर नया साल फिर से नया जोश जगाता है
कुछ नया करने का... कुछ पाने का...
इसीलिए हर कोई
इस वार्षिक मीली पत्थर को
जोरशोर से बिदाई दे
नये साल के स्वागत में जुट जाता है
अपने लिये तो हम कुछ मांगते ही हैं 
चलो इस साल 
किसी और के लिये 
अपने कर्म का पौदा लगायें 
किसी के जीवन को अच्छा करने का 
एक नया प्रयास चलाएँ...

मंगलकामनाएँ नववर्ष के लिये
                                            ........इंतज़ार

रविवार, 28 दिसंबर 2014

प्यार करिओ ना........एक गीत


प्यार करिओ ना
किसी पे तु मरिओ ना

चकोरी गा गा  
चाँद रिझावे
चाँद ज़मी पे ना आवे
चकोरी गा गा
कंठ सुकावे
चाँद तरस ना खावे
मोर झूठा नाच दिखा के
मोरनी को उकसावे
कामदेव का पाठ पढ़ा के
दूर कहीं उड़ जावे

प्यार करिओ ना
किसी पे तु मरिओ ना

कविराज भी लीप पोत के
मधुर गीत सुनावेंगे
सतरंगी असमानों पे उड़ने के
झूठे सपने दिखलावेंगे
खुद तो गहरी चोट खा के
कवि शायर बन जावेंगे
औरों को फिर आग लगाके
प्यार की आंधी चलवावेंगे

प्यार करिओ ना
किसी पे तु मरिओ ना

दुनियाँ भर की बात बनाके
तुझे ये बांवरा बनावेंगे
भवरों और फूलों के किस्से सुनाके
तेरे अरमानों को भड़कावेंगे
कैद परिंदों को पिंजरों में कर के
सातवें असमान पे उड़वावेंगे
इनकी बातें सुन सुन के
कई दिल पिघल भी जावेंगे

मगर तु प्यार करिओ ना
किसी पे तु मरिओ ना

भ्रांती की ये बातों तु सुनिओ ना
तु पहली सीड़ी चढ़िओ ना
तु प्यार किसी से करिओ ना
जब दुःख के बदलाँ  घिर आवेंगे
तुझ को अपने जैसा कवी बनावेंगे
तेरे हाथ फिर दे कलम दवात
असफ़ल प्यार के सफल गीत लिखवावेंगे

तु प्यार करिओ ना
किसी पे तु मरिओ ना...
                                    ........इंतज़ार


शुक्रवार, 26 दिसंबर 2014

रंग-ए-जिंदगानी: नारी का सशक्तीकरण

रंग-ए-जिंदगानी: नारी का सशक्तीकरण: सुप्रीम कोर्ट ने शरई अदालतों की वैधता को भले ही नक़ार दिया हो,लेकिन एक दौर में इन अदालतों के फैसले पूरे देश में माने जाते थे।नाफ़रमानी ...

फ़रेब .....

हर किसी को यहाँ मिलते हैं
झूठे प्यार जिन्दगी के
कुछ धोखे हैं
कुछ मतलब हैं
यहाँ सच्चे प्यार
कहाँ मिलते हैं
कुछ दिनों के
हैं ये धोखे
असली यार कहाँ
मिलते हैं
जितना मिलता है
जी लो उसको
ना जाने
कब रिश्ते बदलते हैं
ना मैं मैं हूँ ना तू तू है
मुखोटों में रहते हैं
सब यहाँ जिन्दगी में
कितने जाल हैं
कितनी चाल हैं
कौन जाने
क्यों ये हाल हैं
क्यों किसी को नहीं मिलता
सच्चा प्यार यहाँ जिन्दगी में
                                        ........इंतज़ार


मंगलवार, 23 दिसंबर 2014

शबनमी रात .......


शबनमी बहार में
फूल नहाते रहे
चमन में रात भर
प्यार की बौछार से

रात की याद में
फूलों ने भी
उन मोतिओं को
दामन में
सजो रखा

सुबह होते होते
फूलों को जब तूने तोड़ा
आँसू बन बह गईं
वो प्यार की बूंदें

कहाँ देखा तूने
दिल के दर्द को
जिसने प्यार में
गवाईं थी रात की नींदें

फिर उन उदास फोलों को
तूने अर्पित रब को करा
बेचारा रब भी उदास हुआ
जब प्यार का ये मन्ज़र देखा
फूलों के दिल में
वो चुभा खंज़र देखा
                      ......इंतज़ार

शनिवार, 20 दिसंबर 2014

छपवाना एक हिन्दी पुस्तक का.....[आखिरी क़िस्त-2] व्यंग्य



[ गतांक से आगे--- पिछले अंक में आप ने पढ़ा कि किस तरह गब्बरनुमा प्रकाशक से या प्रकाशकनुमा गब्बर से मेरा साबका हुआ कि वहाँ से जो भागा तो घर आकर ही दम लिया जान बची लाखों पाये...लौट के बुद्धू घर को आये ..लड़ने का माद्दा छोड़ कर आये । अब आगे पढ़िए.............]

लगता है पुस्तक प्रकाशन मेरे बस का नहीं।जिन प्रकाशकों को पत्र लिखा ,सबने विनम्रता से जवाब दिया -’...आप की रचना सर्वश्रेष्ठ है ,आशा है कि आप की ये रचना हिन्दी साहित्य को समृद्ध करेगी...आप से हिन्दी जगत को बहुत संभावनायें हैं... हमें खेद है कि आप की इस पुस्तक का प्रकाशन हम अभी नहीं कर सकते कारण कि हम अभी अन्य श्रेष्ठ रचनायें यथा-डब्बे में ख़ून...ख़ूनी खंज़र..नंगी लाश..जैसी कालजयी रचनायें और कृतियों के प्रकाशन में व्यस्त हैं आप अन्यथा न लेंगे-सखेद सधन्यवाद।
मैने पाण्डुलिपि तो भेजी नहीं थी ।मात्र शीर्षक देख कर ही रचना की श्रेष्ठता समझ लेने वाले प्रकाशक धन्यवाद के पात्र ही नहीं ,महापात्र होते हैं।कुछ-कुछ पाठक तो पुस्तक कवर पर प्रकाशित मनभावन लुभावन चित्र देख कर ही रचना की उष्णता का आकलन कर लेते हैं। ऐसे पाठक और प्रकाशक दोनो ही दुर्लभ प्राणी होते हैं
आशा बलवती राजन !सोचा एक बार पुन: प्रयास करना चाहिए।अगर भगवान ने मुझे बनाया है तो कहीं न कहीं मेरे प्रकाशक को भी बनाया होगा।आवश्यकता है तो मात्र ढूँढने की।पुन: अपनी पाण्डुलिपि लेकर निकल पड़ा।अपना व्यंग्य संग्रह लेकर एक प्रकाशक के पास गया। सर्वप्रथम तो उन्होने मुझे ऊपर से लेकर नीचे तक आद्योपान्त इस तरह देखा जैसे मैं कोई लेखक नहीं तिहाड़ जेल से छूट कर आया हूँ। फिर पूछा-"नाम?"
"अच्छा तो आप ही हैं जिसने "चलते चलते .." व्यंग्य में हम प्रकाशकों की खिल्ली उड़ाई थी? माफ़ करना बाबा ,हम चालू-चलन्त.लेखकों की कृतियाँ नहीं छापते।
 । उन्होने "चलन्त" शब्द का प्रयोग ऐसे किया जैसे मैं किसी नगर पालिका का "चलन्त" कूड़ादान लिए फिर रहा हूँ । उनके चलन्त शब्द में मुझे "घुमन्त" प्रकाशन का ’अन्त’ शब्द का बोध हुआ। हे भगवान ! इस प्रकाशक को थोड़ी से सदबुद्धि भी दे ।मैं बाहर निकल आया
किसी साहब ने बज़ा फ़र्माया है
मैं इसे शोहरत कहूँ या अपनी रुस्वाई कहूँ
मुझ से पहले उस गली में मेरे अफ़साने गए

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मैं अपनी औक़ात समझ गया ।नवोदित लेखकों को ये सम्पादक एवं प्रकाशक औकात ही बताते हैं। परन्तु यह धरा अभी प्रकाशकों से विहीन नहीं हुई है ।सभी तो ’गब्बर’ खानदान से ताल्लुक नहीं रखते होंगे ? एक प्रकाशक महोदय मिल ही गए।दुकान खोल कर बैठे ही थे।स्पष्ट नहीं हो पा रहा था कि वह पुस्तक विक्रेता हैं कि प्रकाशक।शकल से दोनो ही का भाव का बोध हो रहा था। मेरी ही तरह खद्दर का कुर्ता व पायजाम पहने ,ऊपर से जवाहर जैकेट के ऊपर कंधे पर एक उत्तरीय। शकल से किसी नगरपालिका स्कूल के मास्टर ज़्यादा और प्रकाशक कम लग रहे थे॥ जब से सुना है कि कुछ घाघ प्रकाशक लेखकों की टोपियाँ उछाल देते हैं ,तब से मैने टोपी पहनना छोड़ दिया। न रहेगी टोपी- न उछलेगी पगड़ी।
मैने अपना परिचय दिया ।अपना दर्द समझाया। अपनी विवशता बताई। जब मैने ’गब्बर सिंह’ वाली घटना बताई तो द्रवित हो गए।आँखों में आँसू भर लिए। हृदय में वात्सल्य भाव उमड़
आया। बोले-" होता है बेटा ! होता है ऐसा।कुछ कुछ प्रकाशक होते हैं ऐसे । वे सरकारी प्रकाशक होते हैं ठेकेदार प्रकाशक होते हैं। उनको हिन्दी के उत्थान पतन विकास से कुछ नहीं लेना देना। वो हमारे जैसे नहीं होते कि हिन्दी और हिन्दी के उत्थान के लिए सारा जीवन होम कर दिया ,अर्पित कर दिया।अपनी जमा-पूँजी प्रेस में लगा दी और जवानी भी।हमें हिन्दी की सेवा करनी थी एक सच्चे सेवक की तरह...। चिन्ता नहीं करो बेटा ! देर से आये हो मगर दुरुस्त आये सही जगह आए ।समझो कि तुम्हारी तलाश खत्म ...तुम्हारी चिन्ता अब मेरी चिन्ता हो गई...नो लुक बियान्ड फ़र्दर।एक काम करो...।अपनी पाणडुलिपि छोड़ जाओ..पढ़ लूंगा...।एक सप्ताह बाद आ जाना ...बता दूँगा।

मैं उनके इस वात्सल्य प्रेम से अभिभूत हो गया ।मन श्रद्धा से भाव विभोर हो उठा\ सोचने लगा -कितना भला प्रकाशक है \विचारों से यह ’भारतेन्दु’ काल का लग रहा है । ऐसे ही प्रकाशकों के दम से तो यह हिन्दी अभी टिकी हुई है वरना ’कार्पोरेट प्रकाशक तो कब का.....

मैं  धन्यवाद कह  बाहर निकल आया।
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एक सप्ताह बाद
"आओ बेटा ! आओ ! बैठो।मैने पाण्डुलिपि पढ़ी।तुम अपने हो।तुम्हारा कष्ट देखा नहीं जा रहा है। बुरा न मानना।  व्यंग्य श्यंग लिखना छोड़ दो।इस में कुछ नहीं रखा है।अमूमन व्यंग्य-श्य़ंग्य तो कोई पढ़ता नहीं ।व्यंग्य से ज़माने को नहीं बदल पाओगे।आईना दिखाने से ज़माना नहीं बदलता ,सिर्फ़ हँसता है। पिछली बार छपवाया था तो क्या हुआ? बिकी? एक भी बिकी? गोदामों में सड़ रही है।धूप दिखाने का खर्चा सो अलग।अरे भइया ,मेरी मानो तो "लालू-चालीसा’ लिखो.."मोदी महात्म" लिखो.."राहुल सप्तसती"- लिखो...कुंजी लिखो..गेस पेपर लिखो श्योर शाट पेपर लिखो..परीक्षा पास करने के 101 तरीके लिखो...अच्छे अंक कैसे प्राप्त करे लिखो...अभिनन्दन पत्र लिखो..स्वागत गान लिखो..बड़ी माँग है इनकी आजकल । लिखने वाला मालामाल ्छापने वाला मालपानी..गंगा बह रही है हाथ धो लो..वरना व्यंग्य लिखते रहोगे तो लँगोटी भी उतर जायेगी..। भई .अगर तुम हमारे प्रकाशन के लिए लिखो तो कुछ हम भी माल-टाल बना लें। 50%-50% / वरना तो यह व्यंग्य-श्य़ंग्य तो निठ्ठलों के चोचले होते है --न लीपने के काम का..न पाथने के काम का।बेटा ! तू जानता नहीं ,’--लिखने से ज़्यादा छाप कर बेंचने में पापड़ बेलने पड़ते हैं..सरकारी कार्यालयों के ’सुविधा-शुल्क’ लाइब्रेरी में ठेलने का खर्च अलग ,कागज-स्याही का भी खर्चा नहीं निकलता..फिर पुस्तक मेले में खोमचे लगा लगा कर बेचना पड़ता है।
-" तो क्या व्यंग्य पेड़ पर उगते हैं? आप क्या जानो कि व्यंग्य लिखने में कितना ’रिस्क’ होता है कितने पापड़ बेलने पड़ते है कि बेचारा लेखक अन्त मे अचार-पापड़ बेचने लग जाता है"-मैने अपना दिव्य-ज्ञान बघारा ।
स्पष्ट था मैने अपनी पाण्डुलिपि उठाई और बाहर आ गया।

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मन विद्रोह कर उठा।जो भी हो-अब तो यह संग्रह छपवा कर ही रहना है ।यही संघर्ष है ,यही साधना है यही तपस्या है। यही हिन्दी सेवा है।
एक प्रकाशक के कार्यालय गया ।बड़ा नाम सुना था।ऊँची दुकान थी पकवान देखा नहीं था। सोचा पकवान भी देख लूं।अभी उनके कक्ष में घुसा ही था कि अपने चश्मे के ऊपर से घूरते हुए देखा और कहा-"अरे बाबा ! तू फिर इधर आ गया। पिछ्ली बार बोला न तेरे कू .बोला न, इधर कू जास्ती आने का नी। तू ही  ’चलते चलते ....’ लिखा था न ? तो फिर रुक क्यूँ गया? आगे चलो न बाबा। हम तुम को बोला न ,हम व्यंग्य-श्यंग्य नही ्छापता । तू जास्ती इधर को आयेगा तो पुलिस वाला भी इधर कू आयेगा...माफ़ कर न मेरे बाप....।
बाद मेम ज्ञात हुआ कि उक्त प्रकाशक महोदय सचित्र रंगीन कहानियाँ , रंगीली जवानी..रंगीन रातें वयस्कों के लिए छापते हैं ।मुद्रक प्रकाशक का पता नहीं छापते ,गुप्त रखते हैं। हिन्दी की गुप्त सेवा करते हैं। इनकी छपी किताबें शहर की हर गली-खोली -नुक्कड़ पर गुप्त रूप से मिलती हैं जिसे शहर के लौण्डे छुप छुपा कर पढ़ते हैं । बड़े बड़े साहब लोग रात को बेडरूम में अकेले पढ़ते हैं। पैसे वाले प्रकाशक है बस पुलिस से डरते हैं।
 मन भिन्ना गया।
थक हार कर एक मा‘ल में घुस गया।किसी प्रकाशक का था। प्रवेश हाल में एक सुन्दर से रिशेप्स्निस्ट ।चेहरे पर सदाबहारी प्लास्टिक मुस्कान.एक ही जुमला-व्हाट आइ कैन हेल्प यू ,सर !? भीतर एक बड़ा सा चमकता हुआ आफ़िस ।मार्ब॒ल की फ़्लोर। वातानुकूलित कक्ष ।कक्ष में एक बड़ा टेबुल ,बगल में एक बड़ा सोफ़ा।सोफ़ा के बगल में एक साइड टेबुल ..और उस पर कुछ पत्र-पत्रिकाये। टेबुल के उस तरफ़ एक घूर्णनदार कुर्सी। कुर्सी पर बैठा एक नवयुवक । सूट पहने टाई लगाये।आँखो पर एक बड़ा सा काला गागल्स चढ़ाए।किसी बड़ी कम्पनी का मैनेज़र लग रहा था । मैं संकोच में पड़ गया ,लगता है ग़लत जगह आ गया हूँ\यह सेन्ट्रल माल या स्पेन्सरमार्ट तो नही? यहाँ किताबें कहाँ छपती होंगी? बाहर निकलने वाला ही था कि मैनेज़र ने पूछ लिया
-" यस ! प्लीज़ ! मै आप की क्या सेवा कर सकता हूँ?"
-’ नहीं नहीं कुछ नहीं बस यूँ ही...."
-"प्लीज़ ! आप बैठें’-मैंउसके आग्रह पर सोफ़े पर बैठ गया । इसी बीच एक सुन्दर से कन्या बड़े ही करीने से एक ट्रे में कुछ पेय पदार्थ ले आई। एक हल्की सी मुस्कान बिखेरते हुए बोली-"प्लीज़"।
 बिहारी होते तो एक दोहा लिख देते मैं था तो मैं संकोच में पड़ गया।अब उठ कर भाग भी नहीं सकता। पेय पीने के बाद कुछ तनाव कम हुआ।
-" जी बतायें ! मैं आप की क्या सेवा कर सकता हूँ "- उक्त व्यक्ति ने पुन: पूछा
मैने अपनी सारी बात बताई । अपनी व्यथा समझाई ।कथा सुनाई। मैनेज़र ने कहा -" नो प्रोब्लेम" काम हो जायेगा ।आप की किताब छप जायेगी। बस आप पैकेज़ सलेक्ट कर लें । मिनी ! सर को वह बुकलेट दे दो"
मैने ’पैकेज़’ को ’पैकेट’ समझा । हिन्दी का लेखक हूँ सम्भवत: ’रायल्टी’ का पैकेट होगा !मिनी बिटिया मुझे ’बुकलेट’ थमा गई
पढ़ा तो ’लेट’[स्वर्गीय] होते होते बचा।वह ्पैकेज़-बुकलेट’ ्क्या था ..समझिए कि ’पाकेट-कर" [पाकेट मार नहीं] था। सुधी पाठकों की ज्ञान वर्धनार्थ संक्षेप में प्रकाश डाल रहा हूँ। मैं तो नसानी तुम ना नसैहों।
सिल्वर पैक योजना : यानी मात्र पुस्तक छापने के 20,000/- रूपये।इस पैकेज़ में मात्र 500 प्रतियाँ ही छापी जायेंगी। 11-लेखकीय प्रतियाँ मुफ़्त।पुस्तक यदि ’हार्ड बाऊण्ड’ में छपवानी है तो 2000 रुपये अतिरिक्त प्रभार लिया जायेगा । सभी टैक्स सहित। दो पुस्तके एक साथ छपवाने में तीसरी पुस्तक में 50% की छूट ।यह पैकेज़ उक्त पैकेज का विस्तार स्वरूप है ।फ़िक्स्ड रेट। रेट निगोशियेबुल नहीं। भुगतान चेक के माध्यम से स्वीकार्य।पैन कार्ड की कापी लगाना अनिवार्य।

सिल्वर पैक + योजना :-वस्तुत यह योजना सिल्वर पैक योजना का विस्तार रूप है। इसमे मनमाफ़िक समीक्षा कराने का अतिरिक्त शुल्क।स्थानीय  दो पत्रों में समीक्षा लिखवाने का शुल्क अलग। राज्यस्तरीय अखबारों में समीक्षा प्रकाशित करवाने का शुल्क अलग।टटपुँजिए समीक्षकों से समीक्षा करवाने पर शुल्क में छूट देने पर विचार किया जा सकता है।कृपया मोल तोल कर इस संस्था को शर्मिन्दा न करें।

विशेष योजना : पुस्तक को विवाद में लाने हेतु अतिरिक्त चार्ज़ लगेगा। प्रतियाँ जलवाने हेतु पेट्रोल किरासन का खर्च 500/- अतिरिक्त। पुस्तक की प्रतियां आप के मद में जायेंगी।भीड़ जुटाने का खर्च अलग प्रति व्यक्ति 100/- के हिसाब से चार्ज़ किया जायेगा ।इस में नाश्ता-पानी का खर्च शामिल नहीं है । यह योजना नवोदित लेखकों के लिए विशेष लाभकारी व शुभकारी है

गोल्डेन पैक योजना :-इस योजना में लेखक यदि सम्मान भी करवाना चाहता है तो उसका भी खर्च शामिल है।ढाबे में सम्मान कराने का दर अलग।यह पैकेज़ ग्रामीण और कस्बई लेखकों के लिए उचित है।मान सम्मान में धन नहीं देखते।सम्मान है तो धन है नहीं तो टन-टना-टन है।प्रतिष्ठित लेखकों के लिए अन्य योजना। पाँच सितारा होटल में 5-लाख रुपये। लेखक के 11-अतिथि मुफ़्त।

डायमंड पैक योजना :- लेखकगण कृपया इसे डायमंड बुक्स वालों की योजना न समझें ।यह हमारे प्रकाशन की विशेष योजना है जो विशेष रुप से अनिवासी भारतीय [N R I ]  लेखकों के लिए बनाई गई है। कृपया देसी और विशेषत: कस्बई लेखक इस योजना के पढ़ने में अपना समय व्यर्थ न करें।इस योजना में प्रकाशन का भुगतान नगद और "डालर" में लिया जायेगा।अनिवासी भारतीय लेखक प्रकाशनोपरान्त कब भारत छोड़ वापस लौट जाय अत: सुरक्षा हेतु ’अग्रिम-भुगतान’ ही लिया जायेगा
इस योजना के अन्तर्गत पुस्तक का प्रकाशन ,पंच सितारा होटल में किसी विशिष्ट व्यक्ति के कर कमलों से विमोचन एवं लेखक के 11-अतिथियों की सेवा मुफ़्त।इस योजना में अतिथियों के आने जाने और ठहरने का खर्च शामिल नहीं है -लेखक को स्वयं वहन करना पड़ेगा। इस योजना का मूल्य मात्र 10,000 डालर......

प्रकाशन खर्च पढ़ कर मैं मूर्छित  हो गया ।वह तो भला हो उस सुन्दर कन्या का जिसने मेरे मुंह पर पानी के छींटे डाल कर किसी तरह मुझे चेतनावस्था में ले आई ।फिर पूछा-
"क्या हुआ अंकल !"
"कुछ नहीं बेटी! रात नींद ठीक से नहीं आई थी"
’यस सर ! मैं आप की क्या सेवा कर सकते हैं व्हाट आई कैन हेल्प यू सर! आप चाहें तो 10,000 डालर का भुगतान ’आप अपने क्रेडिट कार्ड से भी कर सकते हैं।" -मैनेज़रनुमा प्रकाशक ने समझाया
"आप के पास ’क्रेडिट कार्ड’ है अंकल ?" -कन्या ने पूछा-" किस बैंक का है?"
"नहीं बेटा ! मेरे ऊपर ’क्रेडिट’[उधार] तो है, कार्ड नहीं है"-मैने विशुद्ध हिन्दी लेखक की तरह अपनी दयनीयता प्रगट की
"आप ने ’रायल्टी’ के बारे में कुछ नहीं लिखा है= मैने मैनेज़र से जिज्ञासावश पूछ लिया
"सर ! हम रायल्टी नहीं देते । बस किताब छाप कर लेखकों का उत्साहवर्धन करते रहते हैं। हिन्दी की सेवा करते रहते हैं"
"ठीक ही कहा । पिछली बार भी एक प्रकाशक ने मेरी पुस्तक छाप तो दी मगर रायल्टी नहीं दी"
"देता कहाँ से? बिकती तो देता न......"--पीछे से एक आवाज़ आई। एक बूढ़ा आदमी ऐनक चढ़ाए -मुनीम- रज़िस्टर में कुछ हिसाब किताब कर रहा था -" तुम्हारे जैसे लेखकों की किताब छाप छाप कर इस हालत में पहुँचा हूँ कि मुनीमगीरी कर रहा हूं...."

मैने उस व्यक्ति को पहचानने की एक समर्थ कोशिश की--" अरे! श्रीमान आप? आप यहां?...
वह मेरे पहले प्रकाशक थे।
स्पष्ट है ,मैने अपनी पाण्डुलिपि उठा ली और वापस चला आया ।
अस्तु।

-आनन्द.पाठक-
09413395592


बुधवार, 17 दिसंबर 2014

शर्म आती है ......

शर्म आती है उन कायरों पर
भोले निर्दोष बच्चों पर
जो गोली दागते जाते हैं
और इसे अपना प्रतिशोध बताते हैं

शर्म आती है उनपर जो
कार बम्ब चलाकर
निर्दोष इंसानों के
टुकड़े टुकड़े फैलाते हैं
और इसे अपना धर्म बताते हैं

शर्म आती है उन दोगुलों पर
जो ऊपर से सहानुभूति
की चर्चा तो कर जाते हैं
अन्दर अन्दर मुस्काते हैं
और इसे धर्म का मामला बताते हैं

शर्म आती है उन ठेकेदारों पर
इंसानियत का रस्ता छोड़
जो अपने व्यापर चलाते हैं
इंसानियत का खून बहाते हैं
और इसे धर्म का आह्वान कह फुसलाते हैं
                                                           ......इंतज़ार


मंगलवार, 16 दिसंबर 2014

छपाना एक एक हिन्दी पुस्तक का....[क़िस्त 1] व्यंग्य

छ्पाना एक हिन्दी पुस्तक का....

कहते हैं प्रकाशन एक विधा है जैसे लेखन एक विधा है।मैं कहता हूँ प्रकाशन एक कर्म काण्ड है।पाण्डुलिपि का प्रकाशन कराते कराते अपना ही पिण्डदान बाक़ी रह जाता है।नवोदित व्यंग्यकार यह रहस्य समझते होंगे।लेखन आसान है-लेखनी ली ,अल्लम-गल्लम लिखा,दस बीस पन्ने रंग दिए पाण्डुलिपि तैयार। परन्तु प्रकाशन -ना बाबा ना।10-20 प्रकाशकों को टोपी पहनाते हैं तो कोई एक टोपी पहनता है बमुश्किल।[पाठकों को सूचनार्थ- सिर्फ़ मेरे प्रकाशक को छोड़ कर जो लेखक को ही टोपी पहनाता है] हिन्दी के व्यंग्य लेखक को 2-ही चिन्तायें सताती रहती हैं ।एक-बड़ी होती हुई बेटी ’रचना’ और दूसरी तैयार होती हुई पाण्डुलिपि ’रचना’।अगर दोनो प्रकाशित न हुई तो आजीवन कुँवारी रह जायेंगी और जग हँसाई ऊपर से।

वही हुआ ,जिसका भय था ।  रचना तैयार हो गई।अब एक सुयोग्य प्रकाशक ’वर’ की खोज करनी थी।सोचा समाचार पत्र के माध्यम से वैवाहिक कालम में एक विज्ञापन दे दूँ -"प्रकाशक चाहिए अपनी रचना के प्रकाशन के लिए ।पन्ने 200 ,वज़न आधा किलो,डिमाई साईज ,हार्ड बैक। इच्छुक प्रकाशक अपना ’बायोडाटा’ भर कर प्रकाशित सूची के साथ अपना फोटो भेंजे। ISBN पंजीकृत प्रकाशको को प्राथमिकता दी जायेगी।विचारधारा ’नो-बार’।वामपंथी .दक्षिणपंथी ,नरमपंथी ,गरमपंथी प्रकाशको पर विचार किया जा सकता है। कुंजी ,गेस पेपर ,श्योर शाट सक्सेस पेपर प्रम्पलेट पेपर ,मस्त जवानी गरम हसीना छापने वाले प्रकाशक कृपया क्षमा करेंगे।"--मगर जनाब अगर विज्ञापन से ही प्रकाशक मिल जाते तो हम इसे ’कर्मकाण्ड ’क्यों कहते।

ये प्रकाशक भी कुछ विशेष प्रकार के प्राणी होते हैं। पिछले व्यंग्य संग्रह "शरणम श्रीमती जी" -में इन प्राणियों पर कुछ प्रकाश डाला था। लिखा था कि किस प्रकार आंख के अन्धे-गांठ के पूरे ...एक प्रकाशक ने उक्त ्व्यंग्य संग्रह छापने का जोखिम उठाया था कि आज तक न उबर  सके।यह अलग बात है कि उक्त प्रकाशक महोदय ने न अपनी गांठ खोली न गठरी।यही क्या कम है कि बिना रायल्टी के छाप दिया।उनकी मान्यता है कि हिन्दी के सच्चे सेवक को न गाँठ देखनी चाहिए न गठरी। हिन्दी का लेखक तो साधु-सन्त होता है।गाँठ गठरी देखने का काम अंग्रेजी लेखकों का है। उनके इस गुरू-ज्ञान से मैं सहम गया ।कहीं उनकी दृष्टि मेरी गठरी पर तो नहीं है ?

। हालाँकि कुछ लेखक बड़े घाँघ होते हैं। दिन के उजाले में कहते हैं -"अरे मैं ! मेरी पुस्तक के लिए तो प्रकाशक मेरे दरवाजे पर लाईन लगाये खड़े रहते है कि पाण्डुलिपि तो बस आप मुझे ही दे दीजियेगा फिर देखिए कि कैसी आप की सेवा करता हूँ। अपना पैसा लगा कर पुस्तक छपवाना । राम राम राम कैसा कलियुग आ गया।" मगर रात के अधेरे में वही लेखक प्रकाशक के दरवाजे दरवाजे हाज़िरी देते हैं।खैर जनाब, मैं स्वयं ही एक सुयोग्य प्रकाशक की तलाश में निकल पड़ा-अपनी ’रचना’ के लिए।यह काम तो करना ही था ।खद्दर का कुर्ता सिलवाया ,पायजामा बनवाया।बाल बढ़ाये ,कुछ दाढ़ी बढ़ाई । कंधे पर झोला लटकाया ,आंखों पर मोटा ऐनक चढ़ाया ....।बम्बईया फ़िल्मवालोंने यही वेश भूषा ्निर्धारित की है बेचारे हिन्दी लेखक की॥इसी ’गेट अप" में फ़िल्म चुपके चुपके में हीरो पर्दे पर आताहै और शुद्ध हिन्दी बोलता है तो हास्य पैदा होता है-तालियाँ बजती हैं। यानी हिन्दी के मज़ाक से भी कुछ न कुछ कमाया जा सकता है।इस वेशभूषा में प्रकाशक के द्वार जायेंगे तो अभीष्ट प्रभाव पड़ेगा।अन्यथा क्या समझेगा कि कैसे कैसे लोग आ गये है आजकल हिन्दी व्यंग्य लेखन में।अन्तर मात्र इतना है कि एक नवोदित प्रकाशक किसी स्थापित लेखक के द्वार पर खड़ा रहता है और एक नवोदित लेखक प्रकाशक के द्वार पर।इसी लिए कहते हैं कि लेखक और प्रकाशक का चोली-दामन का साथ होता है । अब यह न पूछियेगा कि ’चोली’ कौन है?

पाण्डुलिपि बगल मे दबाये निकल पड़ा।चलते चलते एक प्रकाशक नुमा व्यक्ति दिखाई पड़े। सज्जन दुकान खोल कर अभी बैठे ही थे ,सोचा इन्ही से पूछते हैं।प्रश्नवाचक चिह्न की तरह मैं खड़ा हो गया । मेरे कुछ बोलने के पूर्व ही वह सज्जन बोल उठे--" आगे बढ़ो न बाबा ! अभी धन्धे का टैम है"
" मैं भिखारी नहीं ,लेखक हूं"- मैने अपना परिचय दिया
"हिन्दी में लिखते हो ? व्यंग्य लिखते हो-तो एक ही बात है"
मेरा भी स्वाभिमान जगा। लेखक का तिरस्कार सह सकता हूँ व्यंग्य का अपमान सह सकता हूँ मगर हिन्दी का नहीं\हिन्दी का सेवक जो हूं
"आप जैसे प्रकाशक ही हिन्दी का बंटाधार किए बैठे हैं-नवोदित लेखकों को प्रोत्साहन नहीं देते।-मैने कहा
जाने क्या सोच कर वह उठ खड़े हुए । मुझसे भी उच्च स्वर आवृति में कहा-" गुस्सा करने को नी\ जास्ती मचमच करने को नी। देखता नहीं प्रकाशन से ही ’माल’ खड़ा किया है । मालदार प्रकाशक हूँ -मालपानी। अब मैने ’चिल्लर’ देना बन्द कर दिया है । अरे ! आगे बढ़ो नी बाबा"
"आप को कला की पहचान नहीं ,कलाकार की पहचान नहीं।मात्र ’माल’ की पहचान है । नाम है -मालपानी ,आंखो में पानी नहीं।अरे हम लेखक लिखते हैं आत्मा से..."-मैने भी गर्जना की
"आत्माराम एन्ड सन्स" अगली गली में रहते हैं--वहीं जाओ न बाबा !वहीं आईना दिखाओ ...म्हारो माथा खाओ नी..."-अरे रामू ! ज़रा इन भाई साहब को ....!’
इस से पहले कि रामू मुझे बाहर का रास्ता दिखाता मैने स्वयं ही वहाँ से चला जाना उचित समझा। हिन्दी का लेखक जो हूँ।

मैं आगे बढ़ा।देखा कि एक किताब की दुकान में एक हृष्ट पुष्ट सज्जन अपने 4-5 हट्टे कट्टे बलिष्ठ साथियों से घिरे हुए हैं।साहित्य पर चर्चा चल रही है ।हास-परिहास हो रहा है। हिन्दी लेखकों की टाँग खिंचाई हो रही है। हिन्दी साहित्य पर चिन्तन-मनन हो रहा है।इनका अपना दरबार है इनके अपने लेखक हैं इनका अपना गुट है इनके अपने आलोचक हैं इनके अपने समीक्षक हैं इनके अपने लठैत है ..वक़्त ज़रूरत हिन्दी सेवकों की सेवा भी कर सकते है जो इनके गुट में नहीं हैं  इनके अपने प्रकाशक हैं --कहने का मतलब यह कि इनका अपना खेमा है और अपनी खेमाबन्दी । हिन्दी वाले इसे ’विचार धारा के स्कूल’ कहते है ,हमें तो गिरोह लगता है बोतल तो कोका कोला-पेप्सी की लग रही है भीतर क्या भरा है कहा नहीं जा सकता। शरीर संरचना से तो समर्थ प्रकाशक लगता है। मैने अपनी पाण्डुलिपि दिखाई ,परिचय दिया...संग्रह की संक्षिप्त रूप-रेखा बताई ....
अचानक...
हा! हा!  हा! अठ्ठहास करते हुए उक्त सज्जन ने कहा-"अकेले आये हो? अयं। तेरा जोड़ीदार किधर है रे ?"
इस अचानक अठ्ठहास से मैं घबरा गया । अभी तो यह आदमी कुछ प्रकाशकनुमा दिख रहा था अब इसमें ’गब्बर सिंह’ कहां से आ गया?मैं समझ गया मेरा जोड़ीदार ’मिसरा जी’ की बात कर रहा है ।मेरे पिछले व्यंग्य संग्रह में मिश्रा जी ने प्रकाशन-विपणन-समीक्षा करवाने में नि:शुल्क व नि:स्वार्थ मदद की थी ।[पाठकगण कृपया ’शरणम श्रीमती जी -व्यंग्य संग्रह के व्यंग्य चलते चलते का सन्दर्भ लें]
" बड़ी जान है रे तेरी कलम में ..किस पेन से लिखता है अयं?"- खैनी ठोकते हुए उक्त सज्जन ने कहा -" पिछली बार प्रकाशकों पर व्यंग्य तुमने ही लिखा था? क्या सोच कर लिखा था कि सरदार [प्रकाशको का] बड़ा खुश होगा ---सरदार तुम्हें रायल्टी देगा...आ थू ! अरे वो कालिया ! कितना किताब छापते हैं रे एक साल में हम...?
"सरदार 100-200"
"बरोबर ! और यह 100-200 किताब हम यूँ ही नही छापते । सरकारी ठेका लेते है । जब ’गब्बर प्रकाशन" किताब छापता है तो दूर दूर तक प्रकाशक माथा पकड़ लेता है ....गब्बर का नाम सुन कर...आ थू"
मै थर थर काँपने लगा। कहाँ आ कर फँस गये पुस्तक छपाने के चक्कर में ।जान बची तो बहुत प्रकाशक मिलेंगे।जान नहीं तो लेखन क्या -प्रकाशन क्या?
"सरदार ! मैं चलता हूँ"-मैने पान्डुलिपि उठा ली।
"हा! हा! हा! -जो डर गया सो मर गया।हम तुम्हारा इन्साफ़ करेगा।तुम को साफ करेगा। बरोबर करेगा। अरे ! ओ साम्भा ! ज़रा उठा तो कलम और लगा तो निशाना...."- उसने आवाज़ दी...और पिच्च से मुँह की खैनी थूक दी [मेरे ऊपर नहीं] लगता है सबको एक ही छत के नीचे  बैठा रखा है ---लेखक---समीक्षक---आलोचक--प्रकाशक--पुस्तक विक्रेता...। सरकारी शब्दावली में इसे "एकल-खिड़की"-सुविधा कहते हैं

वहां से जो भागा तो सीधे घर आकर ही दम लिया ...जान बची लाखों पाये...लौट के बुद्धू घर को आये ..लड़ने का माद्दा छोड़ कर आये ...

[----जारी है]
आनन्द पाठक
09413395592

सोमवार, 15 दिसंबर 2014

मैं और मोर तोर ,तह माया , जेहि बस कीन्हें ,जीव निकाया



मैं और मोर तोर ,तह माया ,

जेहि बस कीन्हें ,जीव निकाया। 

 I and Mine is Maya .

ये मैं हूँ। ये मेरा है। ये तू है ये तेरा है ,बस ये ही माया है जिसने पूरे जीव संसार 

को 

अपने वश  में कर रखा है। 

ममत्व और अहंकार उस मार्ग की बाधाएं हैं जो भगवान की ओर जाता 

हैऔर उस परम तत्व परब्रह्म (स्वयं अपने सच्चिदानंद स्वरूप का )बोध कराता 

है। 


माया से ही पैदा होता है अहंकार और ममत्व। ममत्व यानी मन का ,मेरा ,ये मेरा  

है का भाव ,माया की  ही संतान है।  



This feeling of I is the main obstacle in our spiritual path .The 

limited sense of I and the concept that something belongs to me is 

all illusion and is only Maya .

It is like in a dream I say ,I am the king ,this is my kingdom .But 

when I wake up the king is not there ,the kingdom is not there .It 

was all the projection of my mind .So is this world ,which rises as a 

thought in my mind and merges back into my mind .This world 

appears and disappears like my thoughts .This is all Maya .It is 

there ,and it is not there .

Whatever belongs to me today belonged to somebody else in the 

past and will belong to somebody else in the future .

I and mine ,it is all an illusion and play .Even today whatever I say 

is mine somebody else is enjoying it .

सब माया का कुनबा है।

The reality is this :

I am the Vibhuti (विभूति )of God tells Bhagvan to Arjuna .I is being 

used here for Arjuna .Arjuna you are also a part of that Vibhuti 

.This whole world is my Vibhuti (विस्तार ),my own expression .

Like me ,you are:

 सत्यम ज्ञानम् अनन्तं। 

But you consider yourself as limited ,this body mind sense complex 

,that is Maya ,ignorance .

रविवार, 14 दिसंबर 2014

हे राम !



हे राम !

बुरे दिन आते हैं तो इकठ्ठे आते हैं। कुछ ऐसा ही कांग्रेस  के साथ घट रहा है।हैरानी की बात तो यह है कि वास्तविक संकट हो तो उसका तो निदान कर लिया जाए पर कांग्रेस की बची खुची जमात में अब ऐसे लोग ज्यादा बचे हैं जो अपने क्रिया कलापों से हंसी का पात्र बनते हैं। अब जैसे साक्षी महाराज (सांसद ,भाजपा )ने  यह कह दिया कि महात्मा गांधी को मारने वाले नाथू राम गोडसे देशद्रोही नहीं थे। ये दोनों बातें परस्पर विरोधी नहीं हैं। अपने वैचारिक आवेश के कारण नाथू राम गोडसे ने यह गलत काम किया और हिंसा का सहारा लेकर देवपुरुष सरीखे महात्मा गांधी की ह्त्या कर दी। पर इस कृत्य का सम्बन्ध देशभक्ति और देशद्रोह दोनों पक्षों से नहीं है। पर कांग्रेसियों को कौन समझाए। वे फटी बांस में अपना पैर फंसाने के आदि है। महात्मा गांधी की समाधि पे जाकर प्रदर्शन की मुद्रा में हे राम !हे राम !करने लगे। 

जो श्री राम के नाम की ऐतिहासिकता को ही नहीं मानते उन्हें नाम के नाम उच्चारण में साम्प्रदायिकता नज़र आती है। ऐसे कांग्रेसियों के सेकुलर मुखों से महात्मा गांधी का अनुकरण करते हुए मृत्यु वेला में उनके मुख से निकले हे राम !शब्द के उच्चारण करने के अनुकरण की क्या  ज़रुरत आन पड़ी  थी। 

अब लोगों की जुबां कौन बंद कर सकता है। अब वे कहते हैं कि ये कांग्रेसी अपनी अवसान वेला को देखकर हे राम ! करने लगे हैं। कमसे कम कांग्रेसी करोड़ों लोगों की आस्था के प्रतीक राम नाम का ऐसा प्रसंगहीन उच्चारण तो न करें कि मूल विषय ओझल हो जाए और लोग उनके क्रियाकलापों पर हंसने लगें। अब तो लोग भी कांग्रेस की स्थिति को देखकर यही कह रहे हैं कि हे राम !हे राम !हे राम ! 

शनिवार, 13 दिसंबर 2014

चन्द माहिया :क़िस्त 11



;1:

उल्फ़त की राहों से
कौन नहीं गुज़रा
मासूम गुनाहों से

:2:
आँसू न कहो इसको
एक हिकायत है
चुपके से पढ़ो इसको

:3:
कुछ वस्ल की बातों में
उम्र कटी मेरी
कुछ हिज्र की रातों में

:4:
ये किसकी निगहबानी
हुस्न है बेपरवाह
और इश्क़ में नादानी

:5:
तेरी चाल शराबी है
क्यूँ न बहक जाऊँ
मौसम भी गुलाबी है


-आनन्द पाठक
09413395592

डेढ़ किलो के भेजे ने ....



डेढ़ किलो के भेजे ने
पूरे ब्रहमाण्ड को हिला रखा है
एहसासों की बीन बजा
हर किसी को
प्यार में पागल बना रखा है

सिर्फ़ डेढ़ किलो के भेजे में
ज्ञान का सागर समा रखा है
चाँद मंगल और ना जाने कहाँ कहाँ
यान पहुंचा रखा है

डेढ़ किलो का भेजा अब
इन्सान के अंगों का
थ्री डाईमेंनशनल प्रिंट बना
शरीर में फिट करा सकता है
वक़्त अब दूर नहीं
जब ये इन्सान बना सकता है

विज्ञान ने सिद्ध कर दिया है
की ब्रहमाण्ड की उत्पत्ति
बिग बैंग से हुई थी
तो क्या डेढ़ किलो के भेजे ने ही
भगवान बना रखा है

                               .........

गुरुवार, 11 दिसंबर 2014

जीवन और मृत्यु दो दरवाज़े हैं आपने सामने

जीवन और मृत्यु दो दरवाज़े हैं आपने सामने


जीवन और मृत्यु दो दरवाज़े हैं आपने सामने। जीव आत्मा (जीवा )एक से दुसरे में जाता रहता है इस अस्थाई काया को छोड़ कर जो हमें अपने माँ बाप से मिलती है। हमारा सूक्ष्म शरीर (मन बुद्धि ,चित्त और अहंकार )तथा कारण शरीर (टोटल वासना जन्म जन्मांतरों की )हमारे साथ जाती हैं। 

कोई रहस्य नहीं है मृत्यु हम पूरब के रहने वालों के लिए। हम पूर्व देशीय लोगों के लिए मृत्यु कोई अजूबा नहीं रही है। जीवन की निरंतरता है मृत्यु। मृत्यु उपरान्त भी जीवन है केवल उसकी अभिव्यक्ति ही  दूसरा रूपाकार NAME AND FORM लेती है। 


मृत्यु बस एक और अनुभव है जीवन की ही तरह.हम एक सनातन चेतना हैं व्यक्ति (व्यष्टि )के स्तर पर इसे आप आत्मा और समष्टि (totality )के स्तर पर सुप्रीम रियलिटी परमात्मा कह सकते हैं। गड़बड़ ये है हम अपने को देह मानते हैं जो हमें माँ बाप से मिली है। देह का कायांतरण होता रहता है पहले नवजात की देह फिर, फिर किशोर देह ,फिर युवा प्रौढ़ और आखिर में ज़रा (बुढ़ापा )और फिर शरीर में वास करने वाली चेतना जो इस शरीर से काम लेती है ये शरीर इसके मतलब का नहीं रह जाता है छीज़तें छीज़तें साथ छोड़ जाता है चेतना का। मृत्यु देह की होती है। चेतना (consciousness )को फिर एक नै देह मिल जाती है। अनादि काल से ये होता आया है कोई नै बात नहीं है। 
जो लोग आत्म ह्त्या करते हैं assisted suicide का सहारा लेते हैं ,उन्हें मालूम हो :देह नष्ट होती है ह्त्या से मन ,बुद्धि ,चित्त और अहंकार (मैं का भान ,फीलिंग आफ आई )यानी सूक्ष्म शरीर और तमाम वासनाएं (total desires )यानी कारण शरीर (causal body )नष्ट नहीं होती है आगे के सफर में साथ जाती है आत्मा के।
पुनर्जन्म की अवधारणा 

बाइबिल के पुराने संकरण (OLD TESTAMANT )तक बरकरार रही है। इतर धर्मों में भी इसका ज़िक्र है। इस्लाम के कई पैरोकार कुरआन की गलत व्याख्या करते हुए कहते हैं :जहाँ कहीं तुम्हें काफ़िर(जो इस्लाम को एक खुदा को नहीं मानता ) दिखाई दें उनका सर कलम कर दो तुम्हें जन्नत मिलेगी। 

पूछा जाना चाहिए किसे  जन्नत मिलेगी ?कहाँ जन्नत मिलेगी ?मृत्यु के बाद ?
There is only one and one consciousness in all living entities and no second .This notion that there is one soul per body is wrong .There is only one consciousness ,at the individual level we call it soul ,at the level of totality supreme soul .

Our body transforms continuously from newly born body to that of a child through that of an adolescent through adult to old age and ultimately decays permanently .But we the self remain constant and unaltered .We are not the body .The body belongs to me 

,I THE SELF IS THE MASTER OF THE BODY .THIS BODY IS MY EQUIPMENT .I AM THE OPERATOR .

Death is just another experience .

I THE SELF IS ETERNAL EXISTENCE ALL KNOWLEDGE AND 

INFINITE 


.I PERVADE THE WHOLE SPACE .

BHAGVAD GEETA EXPLAINS EVERY BIT OF IT .

एक प्रतिक्रिया ब्लॉग पोस्ट :

इच्छा मृत्यु बनाम संभावित मृत्यु की जानकारी


http://dehatrkj.blogspot.in/2014/12/blog-post.html?showComment=1418127931096#c4834964700635124984


हाल के वर्षों में इच्छा मृत्यु संबंधी विवादों को काफी हवा मिली है और संबंधित व्यक्ति इस मांग को लेकर कानून में संशोधन की मांग को लेकर सर्वोच्च न्यायालय तक गए हैं.पक्ष एवं विपक्ष के सम्बन्ध में अनेक तर्क दिए जाते रहे हैं और पीड़ित पक्ष की व्यथा को भी नजरंदाज नहीं किया जा सकता.

मृत्यु जीवन का एक ऐसा कटु सत्य है जो सृष्टि के आरंभ से अभी तक रहस्य बना है.विभिन्न समय एवं देशों में बहुत से लोगों ने प्रयत्न किया परंतु गुत्थी सुलझी नहीं.मृत्यु की सच्चाई ने मनुष्यों को भौतिक संसार से विमुख कर ईश्वर की ओर अग्रसर किया तो बहुत से लोगों को भौतिक सुख को ही अंतिम सत्य मानने की प्रेरणा प्रदान की.

मृत्यु केवल मरने वाले कही जीवन नहीं हरती,वह मृतक के परिवार पर भी अमिट प्रभाव छोड़ जाती है.मनुष्य ने धर्म और दर्शन के जरिये मृत्यु को समझने की चेष्टा की परंतु मृत्यु की भयावहता कम न हो सकी.वैज्ञानिकों ने मृत्यु पर विजय पाने के लिए हाथ-पैर मारे,वे भी असफल रहे.

कहीं-कहीं मृत्यु का आघात इतना गहरा होता है कि व्यक्ति का जीवन असामाजिक बन जाता है.इस आघात का प्रभाव कम करने के लिए एवं मृत्यु की सच्चाई को सामान्य एवं सहज रूप से स्वीकार करने के लिए पाश्चात्य मनोवैज्ञानिकों ने बहुत से प्रयत्न किये हैं.अब तो इस विषय की एक नयी शाखा ही बन गई है जिसे ‘थैनेटोलॉजी’ या ‘मृत्यु का अध्ययन’ कहा जाता है.

थैनेटोलॉजी का मुख्य उद्देश्य है,रोगी एवं रोगी के पारिवारिक सदस्यों के लिए मृत्यु की भयावहता कम करना.अमेरिका के डॉ. कुबलर ने इस विषय पर काफी काम किया है और अनेक लेख लिखे हैं तथा कई स्कूलों,अस्पतालों,धार्मिक संस्थाओं में व्याख्यान भी दिये हैं.उनकी प्रसिद्ध पुस्तक ‘ऑन डेथ एंड डाईंग’ इस विषय की प्रमुख पुस्तक है.इस विषय पर अध्ययन सत्रों,व्याख्यानों से लोगों को काफी लाभ हुआ है.

मनोवैज्ञानिकों का कहना है की परिवार में हुई मृत्यु का प्रभाव कम करने का एक तरीका यह है कि परिवार के सभी सदस्य इस विषय पर ईमानदारी बरतें.कहने का आशय यह है कि रोगी को उसकी बीमारी की गंभीरता के विषय में जानकारी दी जाय और दूसरे सदस्यों को भी इस बारे में अपनी भावनाएं खुलकर व्यक्त करने का अवसर मिले.रोगी की बीमारी की गंभीरता के विषय में बता देने से रोगी मृत्यु के सबसे बड़े दुःख ‘भयानक-अकेलेपन’ की भयानकता कम महसूस करेगा.

मनोवैज्ञानिकों के अनुसार सबसे आदर्श स्थिति तो यह है कि रोगी ही वह पहला व्यक्ति हो जिसे मालूम हो कि उसकी मृत्यु निकट है.रोगी को उसकी भावी मृत्यु के सम्बन्ध में बता देने से वह दूसरों से सहायता मांगने या उसकी सेवा-सुश्रुषा स्वीकार करने में अपराधी-भावना महसूस नहीं करेगा और साथ ही,अपनी भावनाएं एवं दुःख रो कर या अन्य माध्यम से खुल कर व्यक्त कर सकेगा.

लेकिन प्रश्न यह है कि रोगी को उसकी भावी मृत्यु का संदेश कैसे दिया जाय? इस सम्बन्ध में यह जरूरी है कि रोगी को उसकी बीमारी की गंभीरता के विषय में बताने से पूर्व चिकित्सक से उसकी स्थिति के विषय में निर्णयात्मक रूप से पूछ लिया जाना चाहिए.दूसरा ध्यान यह रखा जाय कि रोगी को उसकी निकट मृत्यु के विषय में धीरे-धीरे एवं बहुत ही मनोवैज्ञानिक ढंग से से बताना चाहिए क्योंकि जीवन से निराशा की स्थिति में कभी-कभी रोगी आत्महत्या करने पर उतारू हो जाता है.यह भी ध्यान देने की बात है कि रोगी को अपनी सही स्थिति जानने की उत्सुकता है या नहीं?

मनोवैज्ञानिको का एक दूसरा वर्ग इसे उपयुक्त नहीं मानता,क्योंकि आसन्न मृत्यु की जानकारी देने से रोगी जीने की आशा छोड़ सकता है.रोगी को जीवन के अंतिम क्षण तक बीमारी से ठीक होने की आशा रहती है.ऐसी स्थिति में व्यर्थ की आशा नहीं तोड़नी चाहिए.रोगी स्वयं प्रश्न करे तो सारी स्थिति सही-सही बता देनी चाहिए.

अमेरिका की मानसिक स्वास्थ्य के मशहूर मनोवैज्ञानिक डॉ. गोल्डस्टीन का कहना है कि पारिवारिक सदस्यों को मृत्यु के निकट पहुँच रहे रोगी के सामने कभी झूठी हंसी या ख़ुशी व्यक्त नहीं करनी चाहिए,क्योंकि इससे रोगी का डर और चिंता बढ़ जाती है.पारिवारिक सदस्यों को ऐसे रोगी जिसे मालूम हो कि वह बचेगा नहीं,इच्छाएं पूरी करनी चाहिए.

मनोविश्लेषक प्रायः इस विषय पर एक मत हैं कि यदि रोगी माता-पिता घातक बीमारी से पीड़ित हैं तो बच्चों को बीमारी के विषय में जितना संभव हो और जितना वे समझ सकें,बता देना चाहिए.इससे मृत्यु का आघात उनके लिए आकस्मिक तुषारापात नहीं होगा.सभी देशों में लोग प्रायः यही चाहते हैं कि बच्चों को माँ-बाप की मृत्यु की भनक न पड़ने पाये क्योंकि वे इतने छोटे हैं कि माँ-बाप की मृत्यु का दर्द नहीं सह सकेंगे.जबकि कुछ विख्यात मनोवैज्ञानिको के अनुसार,बच्चों को दाह-संस्कार में भी शामिल करना चाहिए जिससे मृत्यु उनके लिए भीषण रहस्य न बनी रहे और वे भी सबके दुःख में अपना दुःख बंटा सकें.बच्चे कभी-कभी बड़ों से ज्यादा समझ से काम लेते है.

आशय यही है कि मृत्यु अवश्यंभावी है और देर-सबेर सभी को एक न एक दिन जाना है तो क्यों न प्रारंभ से ही ऐसे प्रयत्न हो कि कोई व्यक्ति ज्यादा विचलित न हों.मृत्यु जीवन का एक धर्म है और हर व्यक्ति शिशु,युवा,वृद्ध में मृत्यु और मृत्यु के परिणामों को समझने एवं सह सकने की पूर्ण क्षमता होनी चाहिए.मृतक की याद में घुलते रहने से परिवार के सदस्य न केवल स्वयं का जीवन नष्ट करते हैं बल्कि परिवार पर भी बुरा असर पड़ता है.मृत्यु को सामान्य एवं सहज रूप से समझने का प्रयास हो.

विशेष :इच्छा मृत्यु एक आध्यात्मिक जगत की अवधारणा हैं। इस 

भौतिक  जगत से और conditioned souls से उसका कुछ लेना 

देना नहीं है।  

Wednesday, December 10, 2014


Wales National Assembly rejects assisted suicide.


By Alex Schadenberg
International Chair - Euthanasia Prevention Coalition

Dr Kevin Fitzpatrick speaking
at the European parliament.
Congratulations to Dr. Kevin Fitzpatrick and Not Dead Yet - UK for their part in defeating the assisted suicide vote today.


A vote on whether to propose a bill to legalize assisted suicide was defeated in the Wales National Assembly today by a vote of 21 to 12.

Dr Fitzpatrick, who has lived most of his professional life in Wales, communicated with members of the National Assembly.

Dr Fitzpatrick is the Director of EPC - International and the spokesperson for the disability rights group, Not Dead Yet - UK.

बुधवार, 10 दिसंबर 2014

क्यूँ.....


इतने सवाल क्यूँ हैं
सोच सोचती क्यूँ है
जीवन क्यूँ है
क्यूँ
क्यूँ
क्यूँ
क्यूँ
क्यूँ
क्यूँ
क्यूँ
क्यूँ  क्यूँ.......
         
अब आप कहेंगे ये तो कविता न हुई
परिभाषा में सिमट के रहूँ ...क्यूँ....
दुनियाँ में कुछ लोग राम और कुछ लोग रहीम
और कुछ ईसामसीह का जाप करते हैं
मगर ये 'क्यूँ' शब्द हर मनुष्य जन्म से मृत्यु तक
दोहराता रहता है मुख से या दिल में
यही जिज्ञासा है यहीं से ज्ञान की उत्पत्ति होती है
इसी से बुद्धिमत्ता का प्रारंभ है
इसी से विज्ञान है
तो ये काव्य क्यों नहीं ?
                                                        ......इंतज़ार      

आप के विचारों की प्रतिशा रहेगी ! टिप्पणी दें ....क्यूँ ?.....
  

सोमवार, 8 दिसंबर 2014

एक बात और : भाषा का अपना फलागम होता है


Sadhvi-Niranjan-Jyoti

According to the 

opposition parties, 

Niranjan 

Jyoti's attempt to 

divide society into 

"Ramzadas" 

and "Haramzadas" 

was meant to 

promote enmity 

between 

communities, 

which 

is an ingredient of 

Section 153A.

Sadhvi Niranjan Jyoti, sworn in last month as minister of state, had used an expletive at a public meeting as she said, "People of Delhi have to decide if they want a government of Ramzaadon (followers of Ram) or a government of those who are illegitimate."

She later said her statement was "for those who don't believe in Ram and in unified India." The minister said, "In this country, whether it is Christians or Muslims, all are sons of Ram. Those who don't accept it don't believe in the country."

Opposition parties said an apology is not enough. They demanded that Mr Modi remove his minister and that criminal charges be framed against her. "We have made it absolutely clear. We cannot accept the situation where the minister lowers the dignity of the government," said the Congress' Anand Sharma.

CPM leader Sitaram Yechury accused Ms Jyoti of breaking the law by "committed offence under Section 153 of the Indian Penal Code which is creating communal divide amongst different groups." He also said, "She has committed an offence...and till an investigation is over, she can't remain a minister. Her apology is an admission of her crime."

In the Rajya Sabha, Mr Yechury sparred with Finance Minister and leader of house Arun Jaitley, who said, "The comments are improper and unacceptable," but also added that the minister had withdrawn her words and the matter must end in the house.

Talking to reporters, Ms Sadhvi said her comments must not be assigned communal overtones. She also emphasised that she had apologised in both Houses of Parliament and asked, "what else can I do?"

Mr Yechury and other opposition leaders have indicated that they will continue to disrupt proceedings over their demand for action against the minister. After repeated adjournments, Rajya Sabha was adjournmed for the day around 2 pm.

Ms Jyoti's apology in Parliament came not long after a sharp warning from PM Modi. "Don't address the nation. There will be no compromise on this," he cautioned party MPs in the morning, without taking names.

The 47-year-old saffron-robed Niranjan Jyoti is the junior minister for food processing. Known for her religious discourses, the Sadhvi is a first-time MP from Uttar Pradesh and among the six BJP MPs drafted into the party's campaign for the Delhi polls due early next year.



Which law did 

Sadhvi Niranjan 

Jyoti break?

NEW DELHI: The criminal action demanded by opposition ranks against minister of state Sadhvi Niranjan Jyoti relates to the hate speech provision, Section 153A of the Indian Penal Code, which prescribes a maximum sentence of three years of imprisonment. 

Nobody can however be charged under this section without the government's sanction. Since hate speech is widely recognized as an exception to the freedom of speech, Section 153A holds to account anybody "promoting enmity between different groups on grounds of religion ... and doing acts prejudicial to maintenance of harmony". 


Despite the impunity for hate speech in India, this provision often figures in political discourse, especially in the run-up to elections, as it did in the Sadhvi's case in Delhi. The most prominent hate speech cases in the recent past have been against Akbaruddin Owaisi, Raj Thackeray and Varun Gandhi. 


What we are to say ?


The truth is one ,with respect to the conditioning it appears to be many .With the conditioning of the

Panch Koshas (Pran ,Apan ,Udan ,Vyan ,Saman )and three bodies (The Gross body ,the subtle body

and the causal body ),it is called Jeeva .

With the potentiality of Maya the same truth is called the Supreme reality (Ishwara ,Parmeshvar

,Yishu ,Yahova ,Allah ,ॐ एकहू ओंकार ,Ram ,Rahim ,etc ).

The same reality ,the same truth wrt the Names and Forms is called  as the World (Jagat ,The

Universe ).

Remove the names and forms the world will disappear .

Masses are controlled by religion .In religion there is no God .In philosophy there is no wisdom

.Where God and  wisdom co-exist is Spirituality .

Religion is a belief system .There are as many religions in the world as are there beliefs .

When marriage solemnize Panditji /Maulvi/Priest declares to the spouce now you are one .

Post marriage they ask which "one ".

All religions say God is one .But which one ,your God or mine ?

The same question is asked by the so called religious preachers .They create fear and guilt in the

minds of the masses which acts as two switches to control the masses .With guilt in your mind you

will always be leading a fearful life .

Sadhvi says leave the country if you do not follow Ram .


एक बात और :

भाषा का अपना फलागम  होता है। जैसे  हम कहते हैं रोटी -वोटी ,चाय -पानी ,चाय -वाय (चाय -चूय ).शब्द की अपनी अर्थच्छटाएं होतीं हैं। भाषा का अपरूप (अशिष्ट भाषा ,गँवारू बोली ,slang )भी होता है। हमारा मानना है हरामज़ादे /हरामजादों का पर्यायवाची न तो कांग्रेसी शब्द है न विपक्ष। यदि है तो यह टिप्पणीकार संसद से माफ़ी मांग लेगा वरना संसद को चलने दिया जाए। 

कदली सीप भुजंग मुख ,स्वाति एक गुण तीन , जैसी संगति बैठिये ,तैसो ही फल दीन



भावार्थ :दिक् - काल और जीव चेतना जब ये तीनों एकत्र होते हैं तो घटना घटती है। प्रस्तुत नीति परक दोहे में बूँद का गिरना घटना है। स्वाति नक्षत्र काल है। स्वाति नक्षत्र में घटित हुई है घटना। कदली (केला ),सीप और भुजंग तीनों के दिक् (परिवास ,हैबिटैट )अलग अलग है। सीप जल में रहती है केला स्थल पर भुजंग बाम्बी में तीनों की  अपनी चल अचल स्थिति अलग अलग  हैं।

बूँदधारण करने वाले के गुणधर्म लेती है। कदली (कच्चे केले )पे गिर के कपूर बनती है.स्वाति नक्षत्र की बूँद सीप में गिरे तो सच्चा मोती बन जाती है और विषधर (कोबरा )के मुख में गिरने पर विषैला जहर ही बनती है।

संगति और कुसंगति दोनों अपना रंग छोड़तीं हैं। अन्यत्र कहा भी गया है :

एक घड़ी  आधी घड़ी ,आधी की पुनि आध ,

तुलसी संगति साधु  की, काटे कोटि अपराध।

यहां बूँद का विशेष पदार्थों में गिरना दिक् से सम्बंधित है। कहने का भाव यह है दिक् और काल दोनों अपना प्रभाव छोड़ते हैं।

काल कारक है। प्रत्येक क्रिया काल में ही घटित होती है। क्रिया का कारक काल है। स्वाति नक्षत्र में बूँद का गिरना काल है। ऊपर से नीचे की ओर बूँद का गिरना क्रिया है। "घटना" दोनों का ,"समय" और "स्थान" का जोड़ है।

Space and Time taken together describe an event .

एक वृत्तांत लीजिये संत और चोर दोनों मंदिर की ओर जा रहे हैं। संत पूजा अर्चना के लिए चोर चोरी के लिए। चरण क्रिया है। फलार्थ भिन्न  होंगे ।

बच्चे  के मुख से निकली बात उसके अपने समय में सहज है वही बात कोई बड़ा कहे तो  विक्षेप बन जाएगी।  

नहाना .....


शावर में जब गया नहाने......

लगा पानी की धारा
जैसे गंगा सा
बहता प्यार हमारा
गर्म नर्म पानी
ने मुझ को यूँ लपेटा
आगोश में हो तूने
जैसे मुझे समेटा

भाप उठती रही
गर्म पानी से ऐसे
तेरी मंडराती रूह आयी हो
जैसे जोड़ने अपने नाते

तेज पानी सर पे रहा
ऐसे थप थपाता
सोये एहसासों को
जैसे हो जगाता

पानी फ़र्श से टकराता
रहा ऐसी धुन लगाता
मेरी उमंगो के गीत
जैसे वोह हो गाता

पानी की ये बूंदें
सब मिलके धीरे धीरे
तेरी भावनाओं से मेरे
दिल को हो जैसे सिलाता

जो मैल थी दुनिया की
तन मन पे जम आयी
साबुन से धो मैंने
आत्मा है सजाई

दिल ने मेरे फिर
मीठी सी धुन लगाई
न जाने क्यों गा उठा मैं
तेरे प्यार की शहनाई

शीशे पे धुंद जमी थी
उंगली से यूँ लिखा था
"मुझे भूलना नहीं तुम
मेरा प्यार जगा के रखना"
क्या तुमने ये लिखा था

गीला बदन ये मेरा
तेरी प्यास से सुकाया
फिर मैंने इत्र जब लगाया
तेरी याद में जा खोया
तुझे याद कर के रोया

न आया कर तू हरदम
हर वक़्त इस तरह से
दर्द मेरा तू नहीं जानती
और तेरी ख़ामोशी
मुझ से बातें करने से नहीं मानती
                                                  ......इंतज़ार

माया महा ठगनी हम जानी -कबीर

माया महा ठगनी हम जानी -कबीर 

माया महा ठगनी हम जानी।।

 तिरगुन फांस लिए कर डोले बोले मधुरे बानी।।

 केसव के कमला वे बैठी शिव के भवन भवानी।। 

पंडा के मूरत वे बैठीं तीरथ में भई पानी।।

 योगी के योगन वे बैठी राजा के घर रानी।। 

काहू के हीरा वे बैठी काहू के कौड़ी कानी।।

 भगतन की भगतिन वे बैठी बृह्मा के बृह्माणी।।

 कहे कबीर सुनो भई साधो यह सब अकथ कहानी।।

Maya is the  external energy (Apara shakti ,Bahiranga shakti )of Lord Krishna having attributes of Sat,Rajas and Tamo Gunas .The world is projected through this Maya ,the Prakriti of the Lord .The Lord is the master of Maya .Maya is her Dasi but is an illusory power for the un -initiated conditioned soul .

Maya is the secretary of Lord Krishna .He is the President of this Jagat.

Kabir [1398-1488]
Kabir was a weaver and mystic poet from northern India and lived in Hindu holy city of Benares. He was an important influence on the Hindus and Muslims of his time and also a profound influence on Guru Nanak, the first guru of the Sikh religion. Many poems of Kabir can be found in the Guru Granth Sahib, the sacred scriptures that form the Guru of Sikhism.


Kabir was born in a weaver's family and later adopted by childless Muslim weavers named Niru and Nimma, who found him near Lahara Tara lake, adjacent to the holy city of Varanasi. [3] But his birth is surrounded by legends. Some say he was really the son of a Brahmin widow, adopted by the Muslim couple. [4]

Early in his life Kabir became a disciple of the Hindu bhakti saint Ramananda. It was unusual for a Hindu teacher to accept a Muslim student, but legend has it the young Kabir found a creative way to overcome all objections. Kabir knew which temple Ramananda meditated in each day before dawn, and Kabir lay down on the steps outside. Ramananda walked out in the dark and stepped on the boy's body. Astonished, he leaped up, and cried, "Rama!" Kabir then jumped up and said, "You spoke the name of God in my presence. You initiated me. I'm your student!"[5]

A Bhakti saint, who sang the ideals of seeing all of humanity as one, his name, Kabir, is often interpreted as Guru's Grace.

A weaver by profession, Kabir ranks among the world's greatest poets. In India, he is perhaps the most quoted author. The Holy Guru Granth Sahib contains over 500 verses by Kabir. The Sikh community in particular and others who follow the Holy Granth, hold Kabir in the same reverence as the other ten Gurus.

Kabir openly criticized all sects and gave a new direction to the Indian philosophy. This is due to his straight forward approach that has a universal appeal. It is for this reason that Kabir is held in high esteem all over the world. To call Kabir a universal Guru is not an exaggeration.

Kabir is also considered one of the early northern India Sants. One source for modern adaptations of Kabir's poetry is Robert Bly's The Kabir Book: Forty-Four of the Ecstatic Poems of Kabir.

The details of Kabir's life are mixed with legends - some say he married one Loi and brought up two adopted children Kamal and Kamali, and that Emperor Sikandar Lodi, angered by Kabir's refusal to salute him tried to get him killed by drowning, burning and other means of torture. 

Throughout his life Kabir preached and worked as a weaver in the neighbourhood of Benares. Owing to his teachings he was an object of dislike both to Hindus and to Muslims, and it is said that he was denounced to Sikandar Lodi, king of Delhi, as laying claim to divine attributes, but escaped by his ready tongue. 


Kabir died at Maghar near Gorakbpur, and a dispute at once arose as to the disposal of his remains, which were claimed, by Hindus and Muslims, the former desiring to cremate and the latter to bury them. While they wrangled, Kabir himself appeared and bade them raise the cloth which covered the corpse. When this was done, it was found that the body had vanished, but a heap of flowers occupied its place. Half of these were burnt after the Hindu custom at a spot now known as Kablr Chaura in Benares, and the rest were buried at Maghar, which became the headquarters of the Muslim portion of the sect that still follows Kabir. They are named Kabirpanthis. A tomb was built there which was subsequently repaired about 1867 by a Muslim officer of the Mughal army.


The basic religious principles he espouses are simple. According to Kabir, all life is an interplay of two spiritual principles. One is the personal soul (Jivatma) and the other is God (Paramatma). It is Kabir's view that salvation is the process of bringing into union these two divine principles.

There is only one consciousness and no second .At the level of the individuality it is referred as 
Soul and at the level of totality the Supreme Soul .This Jagat is an expression of God Himself .It is an appearance ,the God is neither inside it ,nor or outside it .Because if it happens He will become finite (inside and not outside and or outside and not inside ).

Jagat is a transactional reality (an empirical and or Pragmatic reality and not an absolute reality ).It is not Mithya ,it is very much there but is a tenure ,an appearance in time .

Jagat appears during the Day of Brahmaji and dissolves back into Him during the night of Brahmaji .

43,20,000 X1000 Human years =1 Day of Brahmaji (and same duration is night ).

365 days of Brahmaji =1 year of Brahmaji .

Brahmaji lives for 100 such years .This is called one Ayu (life span )of Brahmaji .This is equal to 1 Day of Vishnu Bhagvan .Vishnubhagvan has also 100 yrs of life in His Vishnu yrs terms .

1 Ayu of Vishnu is 1 Nimish of Shiva .

This is the Pulsating spiritual Universe and hence an appearance in time .

At a subtler level (philosophical level of Vedanta )the three Soul ,Supreme Soul and Jagat are one and not three .God is not different from us .

In Bhagvad Gita Bhagvan says I am the President of my Prakriti (Maya )that projects this world and everything else .I am the witness to all actions that takes place and remain uneffected by them .You too can do so by becoming the witness and let action happen by my Prakriti ,the three Gunas and their interplay .As you observe your breathing you find that breathing is happening .Become the witness of this breathing and all thoughts that are coming and going into and out of  your mind .

Our consciousness is like electricity by which all actions are performed all soft ware and Hardwares perform their actions .This elctricity is Me ,Bhgavan says .



Maya, maha thagini hum jaani...

Bhagatan key bhaktini hoyey baithi, Brammah key brammbhani, Kahat Kabir suno ho santo, Yeh sab akath kahani, Maya, yeh sab ...