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मंगलवार, 30 जून 2015

कांग्रेस एक राष्ट्रीय पार्टी न होकर राष्ट्रीय सर्कस लगती है

कांग्रेस की दशा और दिशा देखकर अब ये साफ़ लगने लगा है ये राष्ट्रीय पार्टी न होकर राष्ट्रीय सर्कस है जिसके कारिंदे रोज़ नए नए करतब दिखाते रहते हैं।इस राष्ट्रीय सर्कस में काम करने वालों को  जानवर तो सीधे -सीधे  नहीं कहा जा सकता क्योंकि इनकी शक्लें आदमियों से मिलतीं हैं   जिनमें वैसे तो इन दिनों जरायमपेशा (जरायम उर्फ़ जयराम रमेश )भी शामिल हैं लेकिन सर्कस के केंद्र लगातार कथित दिग्विजय सिंह ही बने हुए हैं। इन्हें कांग्रेस से जिस प्रदेश में भी प्रभारी या आभारी बनाके भेजा है इनके हाथ पराजय ही लगी है।

इनका नवीनतम शगूफा शिवराज सिंह जी से ताल्लुक रखने वाली एक क्लिपिंग है जिसमें चुनाव पूर्व शिवराज को अपने कारिंदों (कार्यकर्ताओं )से सामान्य बातचीत करते दिखाया गया है इस वायदे के साथ कि उनका पार्टी में चुनाव बाद पूरा ध्यान रखा जाएगा। ज़नाब दिग्विजय सिंह जी यहीं नहीं रुके ये क्लिप आपने चुनाव आयोग को भी भेज दी। जांच करने के बाद चुनाव आयोग ने बतलाया कि दिग्विजय सिंह की तरह ये क्लिप भी झूठ  का पुलिंदा ही नहीं एक दम से  नकली है।जिसमें ज़नाब दिग्गी एक दो लोगों की आवाज़ें नकल करके उतारने  में करतबी साबित हुए हैं।

सोनिया को सोचना चाहिए ऐसे सर्कसी लोगों से कांग्रेस को कोई फायदा नहीं हो रहा है उलटे पार्टी की बची खुची साख भी चुक  रही है।पार्टी ४४ सांसदों के आंकड़े पे आ खड़ी हुई है।  जयराम रमेश को लोग जरायम कहने लगे हैं। हम नहीं कहते लोग ऐसा कह रहे हैं तो कुछ सोच समझ के ही कह रहे हैं लेकिन कांग्रेस समर्थक एंटीइंडियाटीवी  जैसी चैनलों को ये बात समझ नहीं आती जिन्होनें दिग्गी की नकली क्लिप को खूब उछाला। अब क्या वे इस भोपाली बाज़ीगर को उछालेंगे ?

 कांग्रेस एक राष्ट्रीय पार्टी न होकर राष्ट्रीय सर्कस लगती है। 

परछाईयाँ: प्रभू की सेवा और मेवा.

परछाईयाँ: प्रभू की सेवा और मेवा.: प्रभु की सेवा और मेवा. इसी साल रेलवे बजट में प्रभु ने कहा था कि हम किसी प्रकार से किराया में वृद्धि नहीं करेंगे बल्कि इस वर्ष हम रेल ....

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अंततः कहना चाहूँगा कि -

कम से कम सुपरफास्ट ट्रेनों में तो बिना आरक्षण सफर बंद ही कर देना चाहिए. इंटरनेट पर बुक की गई टिकटों को – गाड़ी विशेष के मंजिल पर पहुँचने के बाद ही स्वतः निरस्त होना चाहिए . वेईटिंग वाले यात्री खिड़की टिकटों की तरह सफर कर सकना चाहिए. रेलवे के पास-पीटीओ धारकों के लिए भी इंटरनेटपर आरक्षण की सुविधा होनी चाहिए. 

बात रही अन्य जन सुविधाओं की रेलवे के चाहिए कि अपने बातों से नहीं काम से बताए कि सुविधाएं बढ़ रही हैं.




अच्छा होगा कोई रेलवे विभाग का कर्मचारी इसे प्रभु या फिर महाप्रभु तक पहुचाने में मदद करे. देखें कही जूँ भी रेंगती है या नहीं.

परछाईयाँ: प्रभू की सेवा और मेवा.

परछाईयाँ: प्रभू की सेवा और मेवा.: प्रभु की सेवा और मेवा. इसी साल रेलवे बजट में प्रभु ने कहा था कि हम किसी प्रकार से किराया में वृद्धि नहीं करेंगे बल्कि इस वर्ष हम रेल ...

नेहरूवंश के चार अवशेष : क्रमश :श्रीमती सोनिया नेहरू -राहुल नेहरू -प्रियंका नेहरू -राबर्टवाड्रा झूठ का पिटारा हैं




सोमवार, 29 जून 2015


नेहरूवंश के चार अवशेष झूठ का पिटारा हैं

नेहरूवंश के चार अवशेष   क्रमश :श्रीमती सोनिया नेहरू -राहुल नेहरू -प्रियंका नेहरू -राबर्टवाड्रा  झूठ का पिटारा हैं (श्रीमती मेनका और वरुणगांधी को तो ये चारों नेहरू वंश का अवशेष मानते ही  नहीं हैं  )य़े चारों ही इस वक्त खुद तो चुप्पी साढ़े हैं , लेकिन झूठ बोलने के लिए इन्होनें जयराम रमेश ,सुरजेवाला जैसों को छोड़ा हुआ है। ये झूठ बोलने का धारावाहिक सिलसिला तब भी जारी है जबकि हंसराजरहबर की किताब -नेहरू बे -नकाब के चुनिंदा अंश इन दिनों पुन : चर्चा में हैं। जिसमें इनके प्रधान पुरुष नेहरू द्वारा बोला गया झूठ बारहा  उजागर हुआ है।

ज़नाब जवाहर लाल नेहरू महात्मा गांधी के कंधे पे चढ़के प्रधानमन्त्री बने थे। जबकि १५ में से १२ राज्य सरदार पटेल के पक्ष में थे। सरदार पटेल गांधी जी की शेष भारत के लोगों की तरह ही बेहद इज़्ज़त करते थे उन्होंने सहर्ष  उप्रधानमंत्री एवं गृहमंत्री बनना स्वीकार कर लिया था।लेकिन नेहरू झूठ पर झूठ बोले जा रहे थे। इसीक्रम को आगे बढ़ाते हुए ज़नाब ने एक पत्र तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद जी को इस आशय का लिखा कि कांग्रेस कार्यसमिति के बहुलांश सदस्य राजगोपालाचार्य को राष्ट्रपति बनाना चाहते हैं। इन लोगों में नेहरू  ने सरदार पटेल को भी शामिल बतलाया।

राजेन्द्रजी नेहरू और सरदार दोनों को जानते थे। नेहरू की औकात और महत्वकांक्षाओं से भी वाकिफ थे। बात सरदार तक भी पहुंची। सरदार ने नेहरू को फटकारा नेहरू खिसियाकर बोले आपका उल्लेख उस पत्र में गलती से हुआ है।

कुछ  तो नेहरू के इन कथित वंशधरों को भी शर्म आनी चाहिए जो अभी भी अपने प्रवक्ताओं से लगातार नए नए झूठ बुलवा रहें हैं.

नवीनतम झूठ है :धौलपुर का महल वसुंधरा राजे ने कब्ज़ा लिया था यह राजस्थान सरकार की संपत्ति थी।  तथ्य यह है: वसुंधराजी धौलपुर की महारानी थीं।

जिस कांग्रेस के प्रधान पुरुष नेहरू ने हद दर्ज़े के घटिया काम किये हों नेताजी सुभाष के परिवार की खुफियागिरी करवाई हो शहीदे आज़म भगत सिंह पे नज़र रखवाई हो ,कश्मीर का मामला अपनी आलमी छवि चमकाने की फिराक में यूएनओ में लेजाकर उलझाया हो उसके इन नामशेष अवशेषों को अब झूठ बुलवाये जाने से बाज़ आना चाहिए। बाद में ये प्रवक्ता भी सोनिया के उकसाने पर अपने द्वारा बोले गए झूठ पर बगलें झांकेंगे इसमें हमें ज़रा भी संदेह नहीं है। ईश्वर इन प्रवक्तानुमा लोगों को सद्बुद्धि दे इनकी हिफाज़त करे।

जैश्रीकृष्णा।   

सोमवार, 29 जून 2015

मुश्किल में चलने वाले

मुश्किल में चलने वाले
तेरा कदम अमर हो जाएगा
राहों में कठिनाई आती है
ये नियति की परिपाटी है
यही तुम्हारा धन कुबेर है
चिर चिरातन अक्षय यह थाती है
हिम्मत हार के थक मत जाना
बाघाओं से सीख तू लेना जाना
पग पग मन में धीरज रखना
तेरा साहस अजर हो जाएगा
राहों के साथी नहीं आबाद करेंगे
उलझाकर बस क्षण बर्बाद करेंगे
छोड़ो, मत इनसे नाता जोड़ो
हैं जितने बेकार के रिश्ते तोड़ो
कठिन डगर से कांटे भी हटाना है
लम्बी यात्रा, दूर बहुत जाना है
जब निरन्तर पथ पर बढ़ते जाओगे
अविस्मरणीय सफर हो जाएगा ।

एक बनेगा चमन मुहब्बत का

एक बनेगा चमन मुहब्बत का
जब सबको सब समान दिखेगा
ये दुनिया जन्नत हो जाएगी
जब ईन्सानों में भगवान दिखेगा
मस्जिद में आरती की थाली सजेगी
और मन्दिर में आजान दिखेगा
हिन्दु का लब अल्लाह पुकारेगा
मियां के लब पे ईश्वर का गुनगान दिखेगा
भेदभाव मिट कर जब खाक बनेंगें
मुफलिस में जब मेहमान दिखेगा
हर सख्श जमीं पर ही जन्नत पा जायेगा
अगर यहां आदमियत का उनवान दिखेगा
हिन्दू मुस्लिम ना सिख ईसाई हैं
पहले सब भाई हैं ये पैगाम दिखेगा

रविवार, 28 जून 2015

कुटिल हंसी देखिये गुलाम नबी आज़ाद की और सोनिया की आनुषांगिक मुस्कराहट भी

तुष्टिकरण के नाम पर विघटनवादी राजनीति की इंतिहा

अब इस देश में तीज त्योहारों की बात करना भी कांग्रेस साम्प्रादायिक होना बतला रही है।आप रक्षाबंधन पे यदि एक सामन्य बात  यह कह दें कि बहन बेटियों को तोहफे में दीजिये एक रुपैया बीमा योजना तो सोनिया के उकसाने पर गुलाम नबी आज़ाद फट कह देंगे प्रधानमन्त्री रमजान की मुबारकबाद तो देते नहीं हैं रक्षाबंधन की बात करते हैं। इतना बुरा हाल तो मोहम्मद अली जिन्ना के समय भी इस देश का नहीं था जब महात्मा गांधी सरे आम रामराज्य की बात करते थे। किसी ने उन्हें सांप्रदायिक नहीं कहा। ये कांगेस के शासन में ही होता है कबीर के दोहे -कांकर पाथर जोरि के मस्जिद लई  चिनॉय ....,तथा दिन  में रोज़ा रखत हैं रात हनत  हैं गाय 'को …  पाठ्यक्रम से निकाल दिया जाता है। रामधुन पर शताब्दी एक्सप्रेस में पाबंदी लगती है। तुष्टिकरण की राजनीति कमीनगी के इस स्तर तक पहुंचेगी सोनिया के रहते क्या वे अपनी सास के पिता की तरह हिन्दू मुस्लिम लाइन पर इस देश का एक और बंटवारा करवाना चाहतीं हैं ?आखिर क्या है उनकी मंशा जो गुलामनबी आज़ाद जैसे मुसलमानों को उकसा रहीं हैं रमजान को मुद्दा बनाके। क्या हो रहा है अफगानिस्तान और दुनिया भर की और मस्जिदों में गुलाम नबी आज़ाद नहीं जानते क्या ?कत्ले आम !या कुछ और। मस्जिदों को खूनी बनाके रख दिया है। और आप भारतीय तीज त्योहारों की बात पे नाक भौं सिकोड़ रहे हैं।हद है बेशर्मी  की। कुटिल हंसी देखिये गुलाम नबी आज़ाद की और सोनिया की आनुषांगिक मुस्कराहट भी।   

अब कांग्रेस का सत्ता पर तो अधिकार रहा नहीं पर कौवे कांव कांव करना थोड़ी न छोड़ते हैं

बहुत नहीं थे सिर्फ चार थे काले कौवे ,

कभी- कभी जादू हो जाता है दुनिया में ,

दुनिया भर के गुण दिखते हैं औगुणियों में ,

ये औगुणिये चार बड़े सरताज़ हो गए ,

इनके नौकर चील गरूड़ और बाज़ हो गए।

सन्दर्भ २५ जून ,१९७५ को इंदिराजी द्वारा घोषित आपात काल का है जिसकी याद सदैव कांग्रेस बनाये रखना चाहती है -जब तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद ने इंदिराजी द्वारा भेजे एक साधारण रुक्के पर हस्ताक्षर कर दिए थे। ये कोई संसद द्वारा बहुमत से पारित प्रस्ताव या ऑर्डिनेंस नहीं था। इलाहाबाद हाईकोर्ट से राजनारायण मामले में इंदिरा हार गईं  थीं।सुप्रीम कोर्ट ने भी बाद में कहा था कि इंदिरा भले आगामी छ : माह तक तो प्रधानमंत्री बनी रह सकतीं हैं। लेकिन न तो वह वोट कर सकेंगी और न ही लोकसभा की किसी भी कार्रवाई पर अपने हस्ताक्षर।

उस समय सिद्धार्थ शंकर रे ,बंसीलाल ,विद्याचरण शुक्ल ,एसकेबरुआ ,अम्बिका सोनी ये पांच जने थे जो रोज़ाना ट्रक भरभर कर नारे लगवाने वालों को लेजाकर इंदिरा के समर्थन में नारे लगवा देते थे। अम्बिका सोनी की यूं कांग्रेस सरकार में कोई हैसियत नहीं थीं। अलबत्ता वे संजय गांधी की चहेती थीं। ये वे जन थे जो इंदिराजी को कहते थे जनमत तुम्हारे साथ है तुम इस्तीफा मत दो। इसी का आधार लेते हुए इंदिरा जी ने यह कहते हुए कि जनता मुझे चाहती है-जनता से उसके जीने का अधिकार छीन कर इमरजंसी लगा दी। मीसा(Maintenance Of Internal Security Act ) लागू कर दिया। अखबार वालों को कोई भी रिपोर्ट छापने से पहले सीनियर एसपी को दिखानी लाज़िमी कर दी। 

दरअसल देश में कोई आपात काल के हालात नहीं थे। आपातकाल कांग्रेस की मानसिकता है राजपाट कायम रखने  की।मन की  हविश की गद्दी न छूटे , बनाये रखने की।  अब कांग्रेस का सत्ता पर तो अधिकार रहा नहीं पर कौवे कांव कांव करना थोड़ी न छोड़ते हैं।कांग्रेस ने आव देखा न ताव लोकतांत्रिक अधिकारों की हत्या  करवा दी।आडवाणी ने कांग्रेस की इसी मानसिकता की  ओर हाल ही में  संकेत किया था। इसलिए कांग्रेस को खुश होकर कोई बगलें बजाने की ज़रुरत नहीं है।इसी रक्तबीज कांग्रेस से देश को खतरा है जो इन दिनों जाति सूचक शब्द मोदी के बहाने नफरत की खेती कर रही है। जातिवाद का विष बो रही है।

और वो सोनिया हश हश करके गुलामनबी आज़ाद जैसों को उसकाती रहती है। ज़नाब नबी फरमाते हैं मोदी सब जगह जा रहे है लेकिन मुसलमानों को रमज़ान की मुबारकबाद नहीं देते। 

गौर तलब यह भी है रमज़ान को पाक महीना कहने वाले मुसलमान मुसलमानों को ही दुनिया भर की मस्जिदों में मार रहे हैं। गुलाम नबीआज़ाद  बतलाएं ऐसे में मोदी क्या कहकर और  किसे रमझान की मुबारकबाद दें?  

माँ

कितना दुख अंंगीकार कर
नवमास का तप स्वीकार कर
जलपान के परहेज के मध्य
हृदय मेंं धारण किये संंकल्प
धरती पर उतारा किलकता नन्हा
नन्हा
वो नन्हा
जिसके नवनेत्र थे जग से अनजान
अंंग अंंग मेंं समाये थे
युग को परिवर्तित करने की शक्ति
पर वो था एकदम बेजान
भीषण ग्रीष्म मेंं तपते आम्र वृक्ष के मानिंंद
जो पानी के अभाव मेंं सूख जाये
मांं ने रूई के फाहे लेकर दूध मेंं
और उस फूल से होंंठो के बीच
बूंंद देकर नन्हे जीवन का पोषण किया
दिन प्रतिदिन अनगिनत मर्तबा
कपडे गीले हो जाते मलमूत्र से
निश्छल मन से सफाई करती
जब भी मुन्ना रोने लगता और चुप न होता
वह भी भर आती आंंखोंं मेंं आंंसू
लिए ममता व करूणा से
और कुछ छण भी दूर नहींं होने देती
लाडले को अपने आँचल की साये से
चूमती पूचकारती खिलाती नहलाती
बैठकर आँचल मेंं लिए सुलाती
तब तक सोती नहींं
जब तक मुन्नर सो न जाए
कितना स्नेह करती है वो अपनी बच्चे से
यही है उसकी ममता
और इसिलिए वो है मांं……………

शनिवार, 27 जून 2015

राजनीति में जातिवाद का ज़हर फैलाने वाले गुलामवंशी कांग्रेसी

राजनीति में जातिवाद का ज़हर फैलाने वाले गुलामवंशी कांग्रेसी इन दिनों जाति  सूचक शब्द मोदी को बदनाम कर रहें हैं। आजकल ये कुछ चुनिंदा शब्द बोल रहे हैं जैसे बड़ा मोदी ,छोटा मोदी। पता नहीं इन्होनें बिहार के सुशील मोदी को क्यों छोड़ दिया है और उस मोदी को क्यों छोड़ दिया है जिनके नाम से एक पूरा नगर मोदी नगर   बसा हुआ है।

अब जबकि ललित मोदी ने कपिल सिब्बल से भी अपनी (२०१० -२०१४ )के दरमियान कई मर्तबा भेंट होने का ज़िक्र किया है कांग्रेस की सरपरस्त सोनिया और हाईकमान के अंग रूप माने जाने वाली प्रियंका और राबर्ट वाड्रा  से भी अलग अलग भेंट की बात की है। कौन सी ताकत है जो हाईकमान को जुबां खोलने से रोक रही है। इनका चुप इनके इन्वॉल्वमेंट की खबर देता है। आखिर ललित मोदी को यूपीए शासन के (२०१०-१४ )की अवधि में भगोड़ा घोषित क्यों नहीं घोषित किया गया। किसने रोका था। अब जबकि हाई कोर्ट के चार मान्य न्यायाधीश अलग अलग मौकों पे उन्हें निर्दोष घोषित कर चुके हैं। कांग्रेस क्यों उन्हें बदनाम कर रही है क्या इसीलिए की वे जातिसूचक शब्द मोदी से जाने जाते हैं।

कांग्रेस खुद महात्मा समझे जाने वाले मोहनदास कर्मचन्द गांधी की ओट लिए बैठी है। इसे बे -ओट करके राबर्ट गांधी के नाम से ही आइन्दा जाना  जायेगा।कांग्रेस ने   राजनीति में जातिवाद का ज़हर फैलाने के लिए अपने दरबारियों को खुला छोड़ रखा है।

देश सावधान रहे ज़मीन हड़पु दामाद वाड्रागांधी कांग्रेस से।

पादनी  बोले सो बोले इंटोरा  भी बोले। सरपरस्त  सोनिया फ़टाफ़ट मुंह खोले वरना उन्हें सांठगाँठिया ही समझा  जाएगा।  

एक ग़ज़ल : तेरे बग़ैर भी...

तेरे बग़ैर भी कोई तो ज़िन्दगी होगी
चिराग़-ए-याद से राहों में रोशनी होगी

कहा था तुमने हमेशा जो साथ देने का
ये बात मैने ही तुमसे ग़लत सुनी होगी

निगाह-ए-शौक़ से मैं हर्फ़ हर्फ़ पढ़ लूँगा
लबों पे बात जो आ कर रुकी रुकी होगी

यहाँ से ’तूर’ बहुत दूर है मेरे ,जानाँ !
कलाम उनसे कि तुमसे ,वफ़ा वही होगी

सितम का दौर भी इतना न आजमा मुझ पर
अगर मैं टूट गया फिर क्या आशिक़ी होगी !

तमाम बन्द भले हो गए हों दरवाजे
मगर उमीद की खिड़की तो इक खुली होगी

कहाँ कहाँ न गया चाह में तेरे ’आनन’
मेरे जुनूँ की ख़बर क्या तुझे कभी होगी ?

-आनन्द.पाठक-
09413395592

"पाँच क्षणिकाएँ" (अमन चाँदपुरी)

पाँच क्षणिकाएँ
---
(1)
'परिवर्तन'
जीवन में परिवर्तन
जरूरी होता है
उसे उत्कृष्ट बनाने के लिए 
जैसे,
कुछ समय पहले 
अपनी ही रची हुई 
कविता में
परिवर्तन करना।
(2)
'कब्र में'
ज़िन्दगी के दरवाजे पर
हलचल कर रही है मौत
अन्त समय में
ठंडक कुछ ज़्यादा ही 
सता रही है मुझे
समेंटकर रख लूँ इसे
सुना है कब्र में 
बड़ी गर्मी पड़ती है
 तब शायद ये 
कुछ काम आये मेरे।
(3) '
बिजली का बिल'
बिजली का बिल घर आया
तो मालूम हुआ
रौशनी पैसे से आती है
न पैसा, न बिजली
अब कुछ भी नहीं है मेरे पास।
(4)
'अलाव'
सर्द तेज हवाओं से
रात भर खौफ खाता रहा
अलाव सोचा
ठंडक में गर्मी दूँ
या खुद को ठंडक से बचाऊँ।
(5) 
'धूप का इंतजार'
तुम्हें धूप दिखे
तो बता देना 
उसे मेरे घर का पता
कहना,
बहुत से नहाये हुये कपड़े
सूखने को पड़े हैं 
तुम्हारे इंतजार में।
- अमन चाँदपुरी
मेरा परिचय-- 
वास्तविक नाम- अमन सिंह 
जन्मतिथि- 25 नवम्बर 1997 
जन्म स्थान- ग्राम व पोस्ट - चाँदपुरटांडाअम्बेडकर नगर 
शिक्षा- बी. ए. 
पिता - श्री सुनील कुमार सिंह 
लेखन- 15 मई 2012 से 
विधाएं- कविताक्षणिकाहाइकु 
सम्पर्क- ग्राम व पोस्ट - चाँदपुरटांडा
अम्बेड़कर नगरयू.पी. 
मोबाईल - +919721869421 
मेल- kaviamanchandpuri@gmail.com

शुक्रवार, 26 जून 2015

ये मेरा मन क्यों पागल सा है

ये मेरा मन क्यों पागल सा है
सावन का आवारा बादल सा है
इस जग में रुप तेरा सलौना है
और खूशबू तेरा संदल सा है
क्यों लगता है तनहाई में अक्सर
मेरे सीने में कुछ हलचल सा है
जाने कहाॅ है खुदमुख्तारी साजन
सब तेरे आगे कायल सा है
हाय ये जुल्फों का घना अंधेरा
खो जाने दो ये जंगल सा है
तेरी बातें दिल छू जाती है मेरी
तेरा स्वर बिल्कुल पायल सा है

राजनीति में नफरत की खेती करने वाले

राजनीति में नफरत की खेती करने वाले

राजनीति में नफरत की खेती करने वालों को श्री ललित मोदी ने यह कहकर बेक फुट पे खड़ा कर दिया है कि पूर्व में एक रेस्टोरेंट में वह अलग अलग श्रीमती प्रियंका गांधी एवं श्रीमान राबर्ट वाड्रा से भी मिल चुके हैं। इसे कांग्रेसी चिरकुटों ने आमने सामने की आकस्मिक भेंट कहकर टाल दिया है।यूं श्रीमान ललित मोदी दो मर्तबा सोनिया  से भी मिल चुके हैं।ये पुत्री -दामाद सोनिया तिकड़ी बताये क्या आशय था इस मीटिंग का।

पूछा ये भी जाना चाहिए दिग्विजय जैसे चिरकुटों से कि यदि ललित मोदी ललित गांधी के नाम से जाने जाते तब भी क्या ये उन्हें विश्व अपराधी की तरह और उनसे मिलने वालों को गंभीर अपराधी  की तरह प्रस्तुत करते।

कांग्रेस को दरअसल मोदी नाम से चिढ़ है।  बड़ा मोदी छोटा मोदी। सोनिया ने अपनी एक चुनावी सभा में नरेंद्र मोदी जी को खूनी ह्त्यारा  कह दिया था।बाद में सोनिया को लेने के देने पड़  गए थे।

श्रीमान ललित मोदी भी कांग्रेस का यही हाल करने वाले हैं जिनके तत्कालीन मंत्री चिदंबरम ने ही उन्हें २०१० में वीज़ा दिलवाया था इंग्लैंड का।

इस दौर में राजनीति में नफरत की खेती करने वालों से देश को बड़ा खतरा पैदा हो गया है।इनसे देश को सावधान रहने की ज़रुरत है। डिमोनाइज़ेशन की कला में ये गुलाम वंशीय कांग्रेस माहिर है। यही वे लोग हैं जो बिला वजह ललित मोदी को एक विश्व अपराधी की तरह इसलिए प्रस्तुत कर रहे हैं क्योंकि उनके नाम के आगे मोदी लगा है। 

गुरुवार, 25 जून 2015

वफादार जमाई

वफादार जमाई

सर्वस्वीकृत मान्य सिद्धांत है बेटा पत्नी के पक्ष में डटके  खड़ा होता रहा है। वो स्साला कमांडर भी खड़ा हो गया तो इसमें कोई नै बात नहीं। पूत सबके एक से ही सपूत होते हैं। बड़ी बात ये है जो धीरूभाईजी के साथ पहली मर्तबा घटी है। पहली बार की चुभन ज्यादा होती है। धीरे धीरे ही कम होगी।

धीरू अभी सुबहो सुबहो सो कर ही उठा है।सुबहो न अभी ठीक से आँखें भी कहाँ खोली हैं।  उठते ही गुनगुने सेलाइन वाटर से गरारे करने की  आदत है सो पानी के गरारे खंगालता ड्राइंग से किचिन की ओर बढ़ रहा है। बेटा हमेशा की तरह पत्नी का बगल बच्चा बना बैठा था।एक ऑब्सेशन के तहत  बापधीरू को देखते ही कमांडर -बेटा  बोला पापा आपने मेरी सासु माँ को क्या कह दिया वो रात भर सो नहीं पाईं ,आप उनके परमेश्वर पति की जुबान  अपने मुंह में लेके क्या बोल गए ?

लो कर लो बात अब समधन -समधी की हंसी मज़ाक भी सेंसर होगी इस घर में धीरू मन में सोचता रहा । बेटे ने सास के प्रति अपनी वफादारी निभाने के साथ साथ पत्नी को भी जता दिया -देखा पौ  फटते ही बाप की पेशी लगा दी।स्साला अब तक पत्नी की ही हिमायत लेता था। अब सास की भी लेगा।पत्नी के चेहरे पर एक परम संतोष का भाव था। कप्तान पत्नी मन ही मन मुस्कुरा रही थी। ये कप्तान की डिग्री उसने एक परम्परा के तहत पति के ओहदे से अपना ओहदा स्वयं एक दर्ज़ा बढ़ाके हासिल की है। 

सुख

सुख की अकांक्षा है
तो उस मार्ग पे पग बढ़ाना सीखो
जिसका पड़ाव सुख है
और प्रारम्भ दुख ।
उस तक पहुंचने से पहले
आने वाले कठिनाईयों से
रखो जूझने व लड़ने की साहस ।
सुख के प्रत्येक मार्ग
दुख व पीर से निकल कर जातें हैं
क्योंकि दुख व पीड़ा की अति
प्रेरित करती है सुख का आसरा ढूढ़ने को।
और
अकर्म अनुचित व अनैतिक कर्म
निकलने ही नहीं देते
दुख की खाई से ।
आओ संकल्प लें
कांटों को चूमने का
अगर गुलाब पाना है।
आओ प्रण करें
अंधेरे को स्वीकार करने का
अगर प्रभात का आलिंगन करना है।
आओ शपथ लें
सूर्य की रौशनी से दृष्टिी मिलाने का
अगर चांदनी में नहाना है चांद की तो ।

वफादार दामाद

सर्वस्वीकृत मान्य सिद्धांत है बेटा पत्नी के पक्ष में डटके  खड़ा होता रहा है। वो स्साला कमांडर भी खड़ा हो गया तो इसमें कोई नै बात नहीं। पूत सबके एक से ही सपूत होते हैं। बड़ी बात ये है जो धीरूभाईजी के साथ पहली मर्तबा घटी है। पहली बार की चुभन ज्यादा होती है। धीरे धीरे ही कम होगी।

धीरू अभी सुबहो सुबहो सो कर ही उठा है। उठते ही गुनगुने सेलाइन वाटर से गरारे करने की  आदत है सो पानी के गरारे खंगालता ड्राइंग से किचिन की ओर बढ़ रहा है। बेटा हमेशा की तरह पत्नी का बगल बच्चा बना बैठा था। बाप धीरू को देखते ही कमांडर बेटा  बोला पापा आपने मेरी सासु माँ को क्या कह दिया वो रात भर सो नहीं पाईं ,आप उनके परमेश्वर पति की जुबान  अपने मुंह में लेके क्या बोल गए ?

लो कर लो बात अब समधन समधी की हंसी मज़ाक भी सेंसर होगी इस घर में धीरू मन में सोचता रहा । बेटे ने सास के प्रति अपनी वफादारी निभाने के साथ साथ पत्नी को भी जता दिया -देखा पौ  फटते ही बाप की पेशी लगा दी।स्साला अब तक पत्नी की ही हिमायत लेता था। अब सास की भी लेगा। 

शीर्षक :वफादार दामाद 

वफादार दामाद

सर्वस्वीकृत मान्य सिद्धांत है बेटा पत्नी के पक्ष में डटके  खड़ा होता रहा है। वो स्साला कमांडर भी खड़ा हो गया तो इसमें कोई नै बात नहीं। पूत सबके एक से ही सपूत होते हैं। बड़ी बात ये है जो धीरूभाईजी के साथ पहली मर्तबा घटी है। पहली बार की चुभन ज्यादा होती है। धीरे धीरे ही कम होगी।

धीरू अभी सुबहो सुबहो सो कर ही उठा है। उठते ही गुनगुने सेलाइन वाटर से गरारे करने की  आदत है सो पानी के गरारे खंगालता ड्राइंग से किचिन की ओर बढ़ रहा है। बेटा हमेशा की तरह पत्नी का बगल बच्चा बना बैठा था। बाप धीरू को देखते ही कमांडर बेटा  बोला पापा आपने मेरी सासु माँ को क्या कह दिया वो रात भर सो नहीं पाईं ,आप उनके परमेश्वर पति की जुबान  अपने मुंह में लेके क्या बोल गए ?

लो कर लो बात अब समधन समधी की हंसी मज़ाक भी सेंसर होगी इस घर में धीरू मन में सोचता रहा । बेटे ने सास के प्रति अपनी वफादारी निभाने के साथ साथ पत्नी को भी जता दिया -देखा पौ  फटते ही बाप की पेशी लगा दी।स्साला अब तक पत्नी की ही हिमायत लेता था। अब सास की भी लेगा। 

शीर्षक :वफादार दामाद 

बुधवार, 24 जून 2015

मेरे रहगुजर में मुद्दतों से कब दीया जली


मेरे रहगुजर में मुद्दतों से कब दीया जली
धुँआ उठता रहा धड़कनों में चिमनियाँ जली
अकेले घुटकर जीने का एहसास मुझको है
तनहा जब जब रोया तो सिसकियाँ जली
हर दिन किस कदर नींद आती है रात को
उनसे पूछिए, कि जिनकी आशियाँ जली
इस जहाँ में कितने अजीम आए और चल दिए
एक दिन वो भी जले और उनकी अस्थियाँ जली
उस जंग में तनहा मुफलिस ही नहीं लुटे गए
उस आग में कितने सिकंदरों की हस्तियां जली
उस से बिछड़कर जब और से सगाई होने लगी
बदन की हल्दियाँ जली हाथों की मेंहदियाँ जली
ऐसा था वो चिराग जिसे बुझाने की चाह में
हर मर्तबा शिकस्त खाकर वो आँधियाँ जली

"पाँच हायकु" (अमन चाँदपुरी)

"पाँच हाइकु"
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1.
नन्हीं गौरैया
कमरे में आते ही
पंखे से भिड़ी।
2.
धान लगाती
ढेर सारी गोपियाँ
कजरी गाती।
3.
हार पे हार
बहुत निर्लज्ज है
फिर तैयार।
4.
बिखरे बीज
धरती खुश हुई
मिली संतान।
5.
बड़ा सुकून
कन्धों पर उठाया
चार लोगों ने।
अमन चाँदपुरी 

किस बात का पश्चाताप

किस बात का पश्चाताप है
ईश्वर का शाप है
कल वह था
आज आप हैं
परसों किसी और का अलाप है
कहीं विच्छेद है
तो कहीं मिलाप है
कहीं पाप है
तो कहीं राम नाम का जाप है
यही तो समस्त संसार का कार्यकलाप है
सुख के पश्चात दुख
दुख के पश्चात सुख
अटल है जब यह निरंतरता
तब किस बात का करना है हुक
निसंकोच तू चलता रहा है जीवन पथ पर
लेकिन देखो सम्मुख खड़ी है मृत्यु
क्रियांवित होता रहेगा सृष्टि नियम ।
कभी उमस है तो कभी ठण्ड है
कभी ठण्ड है तो कभी ताप है
फिर नाहक सोचकर उबने की क्या बात है
तुम जानते हो भांप बूंद बनकर
बारिश में पानी का रूप लेता है
और पानी से बनता भांप है
मानव से मिट्टी का अस्तित्व
मिट्टी से मानव है
ये जग
निर्मित से नाश होने का संगम है
इसकी कार्यगति पर
न किसी का जोर चलता है न चलेगा
हमारा बस एक ही ध्येय होना चाहिए
कि भगवान के चरणों में समर्पित कर
प्रत्येक कार्य करें
चिंता न करें
क्योंकि यह व्यर्थ है
और इसका परिणाम सुखद भी न आने वाला है
इसलिए यही सोचें
जो भी मिला ईश्वर का प्रसाद है
भगवान सबका ही रखवार है
और सबकुछ उसी के हाथ है
फिर किस बात का पश्चाताप है ।