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मंगलवार, 31 जनवरी 2017

एक क़ता

                                                एक क़ता

खुशियाँ चली गई हैं  मुझे कब की छोड़ कर 
अब तुम भी साथ छोड़ने को कह रहे हो ,ख़ैर !

दो चार गाम चल के , गए  रास्ता बदल 
जीने को लोग जीते हैं  अपनों के भी बग़ैर 

रखना दुआ में याद कभी इस हक़ीर को 
जो आशना तुम्हारा जिसे कह रही हो ग़ैर

जिस मोड़ पर मिली थी ,वहीं मुन्तज़िर हूँ मै
काबा यहीं है मेरा यहीं आस्तान-ए-दैर 


-आनन्द पाठक-
08800927181
शब्दार्थ 
दो-चार गाम = दो चार  क़दम 
हक़ीर          = तुच्छ [कभी कभी लोग स्वयं को अति विनम्रता से भी कहते हैं]
आशना        = चाहने वाला 
मुन्तज़िर       =प्रतीक्षारत
आस्तान-ए-दैर = तुम्हारे दहलीज का पत्थर

गुरुवार, 26 जनवरी 2017

उर्दू बहर पर एक बातचीत : क़िस्त 23 [ बह्र-ए-मुतक़ारिब -1]

उर्दू बह्र पर  बातचीत : क़िस्त 23 [ बह्र-ए-मुतकारिब -1]

Discliamer clause -वही जो क़िस्त 1 में है ]

नोट : चूँकि किसी बह्र पर पूरी  चर्चा , किसी एक क़िस्त में समेटना संभव नहीं है अत: पाठकों की सुविधा के लिए हर बह्र के आगे 1---2---3---4 लिखते चलेंगे ।  क़िस्त अपनी रौ में राह-ए-रवा रहेगी ]

.......---पिछली क़िस्त में हम उर्दू शायरी में प्रचलित 19-बह्र के नाम लिख चुके हैं  जिसमें पहला नाम बह्र-ए-मुतक़ारिब था।सच तो यह है कि क्लासिकी अरूज़ में यह बह्र पहले नं0 पर नहीं आती  बल्कि इस बहर का सबसे बाद में इज़ाद हुआ और वो भी हिन्दी के गीतो से वज़ूद में आया ।परन्तु हिन्दी पाठकों की सुविधा के लिए मैने इसे पहले लेना  मुनासिब इस लिए समझा कि यह बहर बड़ी ही आसान ,सरल,सहज,दिलकश लोक प्रिय , गेय , संगीतमय मारूफ़ और मानूस बह्र है । यही कारण है कि हिन्दी फ़िल्मों में बहुत से गाने इसी बह्र में लिखे गये जो आज भी उतने ही लोकप्रिय कर्णप्रिय  है जितने कल थे। लगभग सभी प्रसिद्ध शायरों ने इस बह्र में शायरी की है और हमारे नौ-मश्क़ [ उभरते हुए ]शायर अमूमन इसी  बह्र् से शायरी की शुरुआत करते है ।
हिन्दी में  हिन्दी कवियों ने भी इसी बहर  में [छन्द ] कहें  और बहुत ही  ही लोकप्रिय  मधुर  गीत दिए हैं ।

इस बहर का बुनियादी रुक्न है      फ़ऊलुन..........फ़ऊलुन ------फ़ऊलुन-----फ़ऊलुन
 1 2  2  -------1 2 2 -------1 2 2............  1  2  2 .
इस बह्र के मुरब्ब: सालिम या मुसद्द्स सालिम में बहुत कम अश’आर कहें गए है ।ज़्यादा तर अश’आर या ग़ज़ल मुसम्मन सालिम और उसकी मानूस मुज़ाहिफ़ शकल में  ही कहीं गईं हैं ।इसी लिए मुरब्ब: सालिम  और मुसद्दस सालिम की मिसाल ज़्यादा नहीं मिलती ।हमारे नौ जवान शायर आगे आने वाले दिनों में इस बहर में ग़ज़ल कहना पसन्द करें ।
सालिम रुक्न फ़े’अलुन कैसे बनता है -पहले बता चुके है ।एक  वतद-ए-मज्मुआ+ एक सबब-ए-ख़फ़ीफ़ से बनते हैं
इस क़िस्त में चर्चा बहर-ए-मुतक़ारिब-सालिम की हे करेंगे   ।बह्र-ए-मुतक़ारिब मुज़ाहिफ़ की चर्चा अगली क़िस्त में करेंगे
1-बह्र-ए-मुतकारिब मुरब्ब: सालिम :- एक शे’र  देखें -
122---122      यानी    फ़ऊलुन----फ़ऊलुन
122---122 यानी    फ़ऊलुन-----फ़ऊलुन

मुतकारिब इस लिए कि शे’र में रुक्न [फ़ऊलुन 122] का प्रयोग किया गया है ,मुरब्ब: इस लिए कि शे"र में 4-बार [यानी मिसरा में 2बार प्रयोग किया गया है ।इसकी मिसाल तो कम है और बहुत कम शायरों ने ,लगभग  न के बराबर या कहें कि आँटा मे नमक के बराबर ही प्रयोग किया है ।चन्द अरूज़ी असातिज़ा [ उर्दू छन्द शास्त्र के गुरुजन ] ने खुद-साख़्ता [यानी ख़ुद की बनाई शे’र [उदाहरण/मिसाल  देने के लिए] गढ़े  हैं ..शे’र में शे’रीअत  या मयार की बात नहीं बल्कि बात समझाने के लिए गढ़ा गया है ।  समझाने के लिए इस हक़ीर फ़क़ीर ने ऐसा ही एक ख़ुद  साख़्ता [स्वयं की बनाई हुई] शे’र गढ़ा है [ यहाँ मयार और शे’रिअत का पास [ख़्याल ]न रखियेगा
  इशारों की बातें
न आई जुबाँ पर
कहानी मगर लिख
दिया आसमाँ पर
किसी शे’र या मिसरा के सही वज़न की जाँच -बह्र में है या बहर से ख़ारिज़ है -का सबसे मुस्तफ़ीद और मुस्तनद [ सही और प्रामाणिक ] विधि त्तो ’तक़्तीअ- करना ही होता है। तक़्तीअ करने के कुछ अपने उसूल होते हैं और खुद में  यह एक अलग से विषय है जिस पर हम  कभी आगे  चर्चा करेंगे। फिर भी हम यहाँ रुक्न के वक़्फ़ा  को /......./........./......./  से दिखायेंगे कि मिसरा या शे’र वज़न में है या नहीं?

अब इसकी तक़्ती’अ कर के देख लेते है
1 2  2  / 1  2  2
इ शा रों / की बा तें [ यहाँ -की- को बहर के वज़न की माँग पर 2- के बजाय -1- पर लिया जायेगा ]
1   2  2 / 1 2 2
न आ ई / जु बाँ पर
1  2    2  / 1 2  2
क हा नी /म गर लिख
1   2   2   / 1 2  2
दि या आ /स माँ पर
यानी मिसरा में 2-और शे;र में  4- रुक्न का इस्तेमाल हुआ है
इस बह्र में एक बात ध्यान देने की है -चूँकि  मिसरा उला  में 2-ही रुक्न होते है और वो मुक़ाम है सदर--अरूज़ का ]यानी इस बहर के शे’र में ’हस्व’ का मुकाम  नही होता
यही बात मिसरा सानी में भी है } इस में भी दो रुक्न का मुक़ाम   इब्तिदा---जर्ब  का है और इस में भी हस्व का मुकाम नहीं होता । अर्थात  बह्र-ए--मुतक़ारिब मुरब्ब: सालिम में ’हस्व’ का मुकाम नहीं होता

2- बह्र-ए-मुतकारिब मुसद्दस सालिम :  इसका बुनियादी शकल है

फ़ऊलुन---- --फ़ऊलुन--------फ़ऊलुन  [यानी   122------122------122
फ़ऊलुन-------फ़ऊलुन--------फ़ऊलुन  [यानी  122-------122------122

मुतकारिब इस लिए कि शे’र में रुक्न [फ़ऊलुन 122] का प्रयोग किया गया है ,मुसद्दस इस लिए कि शे"र में 6-बार [यानी मिसरा में 3 बार प्रयोग किया गया हैऔर सालिम इस लिए कि यह रुक्न [फ़ऊलुन 122] अपनी सालिम शकल में ही प्रयोग हुआ है बिना किसी काट-छाँट के कतर-व्योंत के या बिना किसी ज़िहाफ़ के। इनकी मिसाल भी कम ही दस्तयाब [प्राप्त]  है ।फिर भी पर आलिम उस्ताद  डा0 आरिफ़ हसन ख़ान साहब के हवाले से एक शे’र पेश करता हूँ
बहाती रहीं   अश्क आंखे
गुज़रती रही शाम-ए-फ़ुरक़त
इसकी तक़्ती’अ कर के देखते हैं
1 2 2   / 1 2  2/   1  2 2
ब हा ती / र हीं अश्/ क आं खे
1   2   2  / 1 2  2/  1  2    2  
गु ज़र ती / रही शा /म-ए-फ़ुर क़त
यानी मिसरा में 3-और शे;र में 6- रुक्न का इस्तेमाल हुआ है

-ए- यहाँ इज़ाफ़त है --इसके बारे में इसी किस्त में नीचे   चर्चा की है
एक शे’र और देखें [आलिम जनाब कमाल अहमद सिद्द्क़ी साहब के हवाले से]

पहुँचती है कू-ए-मलामत
हमारी ख़बर हम से पहले
अब इस की तक़्तीअ भी देख लेते हैं
1  2     1 / 1  2  2  / 1 2  2
प हुँच ती / है कू-ए-/म ला मत
1  2   2/ 1 2  2     / 1  2  2
ह मारी /ख़ बर हम /से पह ले
यानी मिसरा में 3-और शे;र में 6- रुक्न का इस्तेमाल हुआ है
3- बह्र-ए-मुतकारिब मुसम्मन सालिम :  यह बहुत ही मक़्बूल बहर है और अमूमन सभी शायरों ने इस बहर में या इसकी मुज़ाहिफ़ बहर में कुछ न कुछ ग़ज़ल ज़रूर कहे है }और इसके मिसाल एक नहीं दो नहीं सैकड़ों मिल जायेंगी । हर नौ-मश्क़ शायर अपनी शायरी की शुरुआत अमूमन इसी बहर से करता है ---
इस की बुनियादी शकल यूँ है
फ़ऊलुन-------फ़ऊलुन------फ़ऊलुन-----फ़ऊलुन   [यानी  122----122-----122-----122
फ़ऊलुन--------फ़ऊलुन-------फ़ऊलुन----फ़ऊलुन [यानी   122----122------122----122
 अल्लामा इक़बाल साहब का एक  शे’र देखें -बहुत मशहूर शे’र है

सितारों से आगे जहाँ और भी है
अभी इश्क़ के इम्तिहाँ  और भी हैं
मुतकारिब इस लिए कि शे’र में रुक्न [फ़ऊलुन 122] का प्रयोग किया गया है ,मुसम्मन इस लिए कि शे"र में 8-बार [यानी मिसरा में 4-बार और सालिम इस लिए कि यह रुक्न [फ़ऊलुन 122] अपनी सालिम शकल में ही प्रयोग हुआ है बिना किसी काट-छाँट के कतर-व्योंत के या बिना किसी ज़िहाफ़ के।इस की तक़्तीअ कर के देखते हैं
1 2  2  /  1  2  2 / 1 2  2 / 1 2 2
सि ता रों / से आ गे /ज हाँ औ/ र भी है
1 2  2  /  1  2  2 / 1 2  2 / 1 2 2
अ भी इश्/ क़ के इम्/ति हाँ औ/ र भी हैं
यानी मिसरा में 4-और शे;र में 8- रुक्न का इस्तेमाल हुआ है
उमीदन ,बात साफ़ हो गई होगी
चलिए  हिन्दी फ़िल्म का एक गाना सुनाते हैं आप ने भी सुना होगा -कश्मीर की कली का है -बहुत ही मधुर गीत है

इशारों इशारों में दिल लेने वाले 
बता ये हुनर तूने  सीखा कहाँ से
निगाहों निगाहों से जादू चलाना
मेरी जान सीखा है तूने  जहाँ से 

ये गीत भी इसी बहर में है -मुतक़ारिब मुसम्मन सालिम ।मुतकारिब इस लिए कि शे’र में रुक्न [फ़ऊलुन 122] का प्रयोग किया गया है ,मुसम्मन इस लिए कि शे"र में 8-बार [यानी मिसरा में 4-बार और सालिम इस लिए कि यह रुक्न [फ़ऊलुन 122] अपनी सालिम शकल में ही प्रयोग हुआ है बिना किसी काट-छाँट के कतर-व्योंत के या बिना किसी ज़िहाफ़ के।इस की तक़्तीअ कर के देखते हैं
  1 2  2    / 1 2 2   /  1 2   2/ 1 2 2
इ शा रों /इ शा रों /में दिल ले/ने वा ले
1  2 2  / 1 2  2 / 1  2  2  / 1 2 2
ब ता ये / हु नर तू/ ने  सी खा /क हाँ से
1 2   2/  1 2  2 / 1 2  2/  1 2 2
नि गा हों / नि गा हों /से जा दू /च ला ना
1  2  2  / 1 2  2 / 1 2  2/ 1 2 2
मे री जा/ न सी खा /है तू ने  / ज हाँ से
यानी मिसरा में 4-और शे;र में 8- रुक्न का इस्तेमाल हुआ है
इसी बह्र में हिन्दी फ़िल्म अप्रिल फ़ूल -के गाने का मुखड़ा सुनाते हैं -बड़ा ही दिलकश गाना है -आप ने भी सुना होगा

तुम्हें प्यार करते है करते रहेंगे
कि दिल बन के दिल में धड़कते रहेंगे
अब इस की तक़्तीअ कर के देखते है
1  2  2  /1  2  2  / 1  2  2  / 1 2 2
तु म्हें प्या/ र करते /है करते /  रहेंगे     [यहाँ तुम्हें के =म्हें- को वज़न की माँग  पर -मे- का वज़न 2 लेंगे
1  2  2 / 1 2 2 /   1 2  2/  1 2 2
कि दिल बन/ के दिल में /धड़कते /रहेंगे
यानी मिसरा में 4-और शे;र में 8- रुक्न का इस्तेमाल हुआ है

अगर आप ध्यान से ऊपर देखे तो मैने -में....ने....से....है....के--[ऐसे ही और बहुत से ] को मैने 1[ हरकत]  की वज़न पर लिया है जब कि दर हक़ीक़त इसे -2- [सबब] की वज़न पर लेना चाहिए था । एक कारण तो यही है कि उस मुक़ाम पर बहर की माँग थी  -जहाँ पर फ़’ऊलुन का ’फ़े’ [हरकत] आता है अत: हमें इन लफ़्ज़ को गिरा कर शे;र पढ़ना था तभी बहर क़ायम रह सकती थी --लय क़ायम रह सकता है और गाते वक़्त या तलफ़्फ़ुज़ [शे’र की अदायगी वक्त] इसे हल्का सा दबा कर पढ़ना है  । इस गिराने या दबाने से शे’र के मानी में कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता है और तरन्नुम  भी क़ायम रहता है । यह अमल उर्दू शायरी में जायज है । हिन्दी छन्द में शब्द के गिराने या दबाने की सुविधा नही है -बल्कि वहाँ दो लघु को [1 1] को एक गुरु [2] या vice versa समझने की सुविधा है } क्यों कि हिन्दी के छन्द ’मात्रिक वर्ण’ पर आधारित होते हैं

अगर इस गाने को  -कि दिल बन कर  दिल में धड़कते रहेंगे - गायें तो क्या फ़र्क़ पड़ेगा ? अर्थ और भाव में तो कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा मगर....
अरूज़ के लिहाज से फ़र्क़ पड़ेगा -मिसरा बहर से ’खारिज़’ हो जायेगा । बे-वज़न हो जायेगा } गायक को गाने में दिक़्क़त पेश आयेगी । देखिए कैसे ?
सवाल यह कि मिसरा -कि दिल बन कर दिल में धड़कते रहेंगे-भाव और अर्थ से तो ख़ारिज़ नहीं हो रहा है तो बह्र से क्यूँ ख़ारिज़ हो जायेगी?आप आँख बन्द कर शे’र पढ़े आप को खुद महसूस होगा कि शे’र के ’प्रवाह’[ Flow] में कुछ बाधा पड़ रही है -smooth ’ प्रवाह नही है कहीं न कहीं कुछ खटक रहा है -खटक इस लिए रहा है ये मिसरा बहर से खारिज़ जो है ।

कि दिल बन कर दिल में धड़कते रहेंगे-की तक़्ती’अ करते है
1   2      2   / 2   2      2   /1  2  2/ 1  2 2
कि दिल बन/ कर दिल में /ध ड़क ते /र हें गे
आप -कर- और -के- पर ध्यान दें। पहले गाने [मूल गीत] में -के- है जिसका वज़न -1-पर है  लेकिन तबादिल शे’र में  वहाँ ’कर’ है जिसका वज़न -2- है [ कर को दबा कर-क- तो नहीं पढ़ सकते है न]। अब यह तबादिल [बदला हुआ ] मिसरा सालिम के वज़न में नहीं रह पायेगा   [2 2 2 ] हो जायेगा जो  फ़ऊलुन का वज़न भी नहीं है
इसी लिये कहते हैं कि  शे’र [गज़ल] इतनी नाज़ुक होती है बिला ज़रूरत यह एक भी मज़ीद [अतिरिक्त] हर्फ़ तक -न ज़्यादे न कम - बर्दास्त नहीं  कर सकती ---लफ़्ज़ की तो बात ही छोड़ दीजिये
जो आलू-प्याज की तरह अश’आर कहे और लिखे जाते हैं उनमें 100-50 ग्राम वज़न में इधर उधर हो जाये तो क्या फ़र्क़ पड़ता है मगर सो शे’र  सोने सा ख़रा मयारी और सच्चा शे’र होता है 1-2 मिली ग्राम का भी-वज़न  इधर उधर का बर्दास्त नहीं कर सकता।
अगर आप अरूज़ जानते हैं , समझते हैं तो ये फ़र्क़ भी आप आसानी से समझ जायेंगे वरना तो फ़ेसबुक पर तो हर तीसरा आदमी ग़ज़ल और शे’र कह रहा है ..और ग़लतियों की निशान्दीही कीजिये तो बुरा मान जाते हैं लोग
लेकिन एक सच  यह भी है  शे’र  कहना और लिखना जितना आसान समझते हैं लोग उतना ही मुश्किल है ----ये तो  बाज़ार है --जो चलता है वही बिकता है....अब तो  बे-वज़न और बे बह्र -बेमज़ा-रुखे -ग़ैर मयारी शे’र पर भी 100-200  वाह वाह करने वाले मिल जाते हैं ..उन्हें अरूज़  से  क्या लेना-देना है?

पर हाँ ,यह भी सच है कि social media पर अभी भी कुछ लोग हैं जो बह्र-वज़न-तफ़ाईल का पास [ख़याल] रखते हैं  पर ऐसे लोग बहुत कम हैं
 खैर इल्म तो इल्म है-सीखने में क्या हरज है --जानेंगे तभी तो सही या ग़लत का फ़र्क कर सकेंगे।
अब बहर-ए-मुतक़ारिब मुसम्मन सालिम के दो चार अश’आर लिख रहे हैं । तक़्ती’अ कर के आप ख़ुद जाँच लीजियेगा

(1)   जहाँ तेरा नक़्श-ए-क़दम देखते हैं 
ख़ियाबां ख़ियाबां इरम  देखते है

बना कर फ़क़ीरों का हम भेस ’ग़ालिब’
तमाशा-ए-अहल-ए-करम देखते हैं -ग़ालिब

(2) जो इस शोर से ’मीर’ रोता रहेगा
तो हमसाया काहे को सोता रहेगा 

मुझे काम रोने से अकसर है ,नासेह !
तू कब तक मेरे मुँह को धोता रहेगा -मीर-

(3) तू तायर है परवाज़ है काम तेरा
तेरे सामने आसमां और भी हैं

गए दिन कि तनहा था मैं अन्जुमन में
यहाँ अब मेरे राजदां  और भी हैं -इक़बाल-

(4) जुनूं से गुजरने का जी चाहता है
हँसी जब्त करने का जी चाहता 

वो हमसे ख़फ़ा हैं ,हम उन से ख़फ़ा हैं
मगर बात करने का जी चाहता  है -शकील बदायूनी-

[ नोट  हम उनसे खफ़ा हैं --की तक्ती’अ करेंगे तो बह्र की माँग पर इस की तक़्ती’अ होगी
1   2  2  / 1 2 2
ह मुन से / ख़फ़ा है --कारण कि हम का ’म’ सामने के -उ- से वस्ल [मिल कर] हो कर  -मु- की आवाज़ सुनाई देगी और यही तलफ़्फ़ुज़ तक्तीअ मे भी लिया जायेगा। अत: शकील बदायूनी का यह शे’र पूरे वज़न में है ]

और अन्त में
अब राक़िम -उल-हरूफ़ यानी इस हक़ीर का भी एक शे’र बर्दास्त कर लें जो हर मज़्मून  के आखिर में लिखता रहा हूँ

अभी नस्र के कुछ बयां और भी हैं..........
ज़िहाफ़ात् के कुछ निशां और भी हैं.....

फ़ैसला आप कीजिये कि यह शे’र किस बहर में है और इसका पूरा नाम क्या होगा ? अच्छा पकड़ लिया ? मुबारक आप को कि अब आप ने समझ लिया कि बहर-ए-मुताक़ारिब मुसम्मन सालिम क्या होता है ।शुक्रिया।
 ऐसे और भी बहुत से अश’आर आप को मिल जायेंगे सब का सब यहां लिखना मुमकिन भी नहीं है । मुझे लगता है कि अब आप कम अज कम [कम से कम] -मुतक़ारिब मुसम्मन सालिम - में कहे गए अश’आर या ग़ज़ल तो आप पहचान ही सकते है ।अगर आप गुनगुना कर इसे कई बार दुहराए तो आप को पता चल जायेगा कि वज़न कहाँ से ख़ारिज़ हो रही है या बह्र कितनी मक़्बूल है
एक बात और  
यहां लिखने के लिए भले हम ----तेरा---मेरा--तू---तो---जो--- लिख दिए हों पर बह्र की माँग पर इसे
तिरा ---मिरा....तु----तो [को हल्का सा दबा कर] ---जो-- [को हल्का सा दबा कर] ही पढ़ेंगे  और उर्दू शायरी में यह जाइज है कारण कि उर्दू शायरी तलफ़्फ़ुज़ से चलती है  और तक़्तीअ में भी इसे वक़्त ज़रूरत -1- के वज़न पर ही लेंगे।
एक बात और
आप जो ऊपर तमाशा-ए-अहल-ए-करम या ऐसे ही और भी लफ़्ज़ जैसे दिल-ए-नादां... जाने-मन .. बाज़ीचा-ए-एतफ़ाल...जिसे इज़ाफ़त-ए-कसरा या सिर्फ़ इज़ाफ़त  भी कहते है और  जो -ए- आप देख रहे हैं , तक़्ती’अ में ,बहर की माँग पर आप चाहे तो पहले वाले हर्फ़ से जोड़ कर [यानी वस्ल कर] -2- की वज़न पर ले सकते है और न चाहें तो -1- की वज़न पर ही रहने दे  सकते हैं । शायर की मर्जी । इसे शायरी में poetic liscence कहते हैं । मगर नस्र में यह छूट हासिल नही है । नस्र में ऐसे लफ़्ज़ को ’खीच कर’ नहीं पढ़ेंगे यानी नस्र में दिल-ए-नादां को दिले नादां नहीं पढ़ेंगे बल्कि दिल के -ल-पर पर एक हल्का सा दबाव [हल्का सा जबर की हरकत देकर] पढ़ेगे । याद कीजिये जब हम सबब और वतद की परिभाषा लिख रहे थे तो कहा था इज़ाफ़त की तर्क़ीब  =दिल् [सबब्-ए-ख़फ़ीफ़् ] को दिल [ सबब्-ए-सक़ील् ] कर् सकते  है वरना तो उर्दू में -सबब-ए-सक़ील का कोई लफ़्ज़ ही नही मिलेगा और न ही  वतद-ए-मफ़रुक़ का ही [यानी जिस लफ़्ज़ के अन्त में ’मुतहर्रिक ’आता हो।  
ठीक यही बात शब-ओ-रोज़ -----रंजो-ग़म.........गुलो-बुलबुल......जिसे हम इत्फ़ या अत्फ़ कहते है  पे भी लागू होती है ।इस case में भी वही poetic Liscence हासिल है ।
जब तक़्तीअ कैसे करते हैं और इसके क्या क्या उसूल है -की चर्चा करेंगे तो यह चर्चा तफ़्सील से वहां भी करेंगे।
अब कुछ चर्चा ’मुज़ाइफ़’ की भी कर लेते है
मुज़ाइफ़ का उर्दू  लग़वी [शब्द कोशीय ] माने होता है -किसी चीज़ को दो गुना -करना यानी मुसद्दस मुज़ाइफ़ का माने हुआ 6x2 =12 यानी वो शे’र जिसमें 12 सालिम  रुक्न का इस्तेमाल हुआ हो [यानी एक मिसरा मे 6 रुक्न] । कभी कभी इसे 12-रुक्नी बहर भी कहते है
उसी प्रकार ’मुसम्मन मुज़ाइफ़; का माने हुआ 8x2=16 यानी वो शे’र जिसमें 16-सालिम रुक्न का इस्तेमाल हुआ हो [यानी एक मिसरा में 8-रुक्न ] कभी कभी ऐसे शे’र को 16-रुक्नी बहर भी कहते है
मुसम्मन मुज़ाहिफ़ का एक  मिसाल  मुस्तनद अरूज़ी कमाल अहमद सिद्द्क़ी साहब के हवाले से पेश करता हूँ

 किया हमने मौक़ूफ़ आहों का भरना, तो क्यों कर ये पहुँचेगी बाब-ए-असर तक
ये वादे की शब है तुम आओ न आओ ,हमें जागना है तुलू-ए-सहर तक

अब इसकी तक़्तीअ भी देख लेते है

  1  2   2      /1 2   2 / 1  2   2  /  1  2   2  /  1   2   2   / 1    2 2  / 1  2  2    / 1  2  2
  कि या हम /ने मौ क़ू /फ़ आ हों /का भर ना, /तो क्यों कर/ ये पहुँ चे /गी बा ब-ए-/अ सर तक
 1  2  2  / 1   2   2 / 1   2     2   / 1  2  2  / 1  2  2 / 1  2 2/ 1  2  2/ 1  2  2
ये वा  दे /की शब है /तु (मआ)ओ /न आओ /,ह में जा /गना है /तु लू-ए-/ स हर तक
यानी हर मिसरा में 8 रुक्न और शे’र मे 16-रुक्न
[नोट  बह्र की माँग पर तुम आओ को  - तु माओ  की वज़न पर पढ़ा जायेगा -  यानी  तुम के म का वस्ल सामने वाले -आ- से होकर -मा- की आवाज़ सुनाई दे रही है और यही तलफ़्फ़ुज़ तक़्तीअ में भी लिया जायेगा

इसी प्रकार बहर-ए-मुतक़ारिब मुसद्दस मुज़ाइफ़ सालिम की मिसाल आप को अगर कहीं दस्तयाब [प्राप्त] हो तो मुझे ज़रूर लिखियेगा-शुक्र गुज़ार रहूँगा

अच्छा पिछले क़िस्त में -आप से एक सवाल किया था ---[........तुम्हें याद हो न कि याद हो]

सवाल यह था कि शे’र देख कर - मुरब्ब: सालिम मुज़ाइफ़[ 8 रुक्न ]  और मुसम्मन सालिम [8 रुक्न] में फ़र्क़ कैसे करेंगे? अगली क़िस्त में हम मिल कर इसका समाधान ढूँढने की कोशिश करेंगे

अगली क़िस्त में बहर-ए-मुतक़ारिब पर चर्चा जारी रखते हुए इसकी मुज़ाहिफ़ [ज़िहाफ़ लगी हुई ] बह्र पर चर्चा करेंगे

--इस मंच पर और भी कई साहिब-ए-आलिम मौज़ूद हैं उनसे मेरी दस्तबस्ता [ हाथ जोड़ कर] गुज़ारिश है कि अगर कहीं कोई ग़लत बयानी या ग़लत ख़यालबन्दी  हो गई हो तो निशान्दिही ज़रूर फ़र्मायें ताकि मैं ख़ुद को  दुरुस्त कर सकूं ।बा करम मेरी मज़ीद [अतिरिक्त] रहनुमाई फ़र्माये ।मम्नून-ओ-शुक्रगुज़ार रहूँगा।

अभी नस्र के कुछ बयां और भी हैं..........
ज़िहाफ़ात् के कुछ निशां और भी हैं.....

एक बात बड़े ही अदब से एतराफ़ [स्वीकार] करता हूँ कि इन तमाम अक़्सात ,तज़्क़िरात  और तहरीर के लिए अपने आलिम अरूज़ी साहिबान  कमाल अहमद सिद्द्क़ी साहब , डा0 शम्सुर्र्हमान फ़ारुक़ी साहब ,आलिम जनाब  सरवर आलम राज़ ’सरवर ’ साहब  , बड़े भाई अजीज  दोस्त डा0 आरिफ़ हसन ख़ान साहब  का तह-ए-दिल  से मम्नून-ओ-शुक्र गुज़ार हूँ जिनकी किताबों से  कुछ पढ़ सका ,समझ सका और लिख सका ।वगरना इस हक़ीर कि बिसात कहाँ  औक़ात कहां । इन तज़्क़िरात में  मेरा कुछ भी नहीं है बस  आलिम साहिबान  के अरूज़ पर किए गए कामों का हिन्दी तर्जुमा समझिए........

[नोट् :- पिछले अक़सात  [क़िस्तों ]के आलेख [ मज़ामीन ]आप मेरे ब्लाग पर  भी देख सकते हैं 

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-आनन्द.पाठक-
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मंगलवार, 24 जनवरी 2017

सड़क दुर्घटनाएं और हम
सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2015 में लगभग 150000 लोगों की अलग-अलग सड़क दुर्घटनाओं में मृत्यु हुई. दस वर्ष पहले, 2005 में, 94000 लोगों की सड़क दुर्घटनाओं में मृत्यु हुई थी.
यह आंकडें चौंकाने वालें हैं. पर अपने चारों ओर देख कर ऐसा लगता नहीं है कि किसी को ज़रा सी भी चिंता या घबराहट हुई है. 
हर दिन चार सौ लोगों का सड़क हादसों में मर जाना किसी भी सभ्य देश में एक अति गंभीर समस्या मानी जाती और इस समस्या को लेकर सभी विचार-विमर्श कर रहे होते.
लेकिन इस देश में तो यह बात चर्चा का विषय भी नहीं है. और लगता नहीं है की निकट भविष्य में स्थिति में कोई सुधार होगा. सबसे डराने वाली बात यह है कि आम नागरिक भी सड़क पर अपनी-अपनी गाड़ियां  चलाते समय अपनी और अपने प्रियजनों की सुरक्षा को कोई ख़ास महत्व देते हैं.
सुबह की सैर करते समय मैंने कई बार लोगों को लाल-बत्ती की अवहेलना करते देखा है, उलटी दिशा से गाड़ियों को चलते देखा है, स्कूल बसों और वैनों को अति तेज़ गति से चलते देखा है.
सबसे डराने वाला दृश्य तो तब होता है जब अपने स्कूटर या बाइक पर एक या दो (और कभी-कभी तो तीन) बच्चों को बिठा कर एक पिता धड़ल्ले से, लाल-बत्ती की परवाह किये बिना, अपनी गाड़ी को सड़क पर, कभी सही और कभी गलत दिशा में, दौड़ाता है.  
ऐसा दृश्य मैंने एक बार नहीं, बीसियों बार देखा है. और आश्चर्य तो तब होता है जब महिलाओं को भी, बच्चों को साथ लिए, ऐसे ही लापरवाह अंदाज़ में कार या स्कूटर चलाते देखता हूँ. समझ में नहीं पाता कि यह लोग अपने बच्चों के जीवन के साथ ऐसा खिलवाड़ कैसे कर लेते हैं.
ऐसे माता-पिता अपने बच्चों को क्या संस्कार दे रहे हैं, यह भी सोचने की बात है. ऐसे ही लोगों के बच्चे अकसर सड़कों पर अपनी गाड़ियां सडकों पर लापरवाही से चलाते हैं और आये दिन किसी न किसी को दुर्घटना में आहत कर देते हैं या मार डालते हैं.
दुर्घटनाएं तो चौबीसों घंटे घटती रहती हैं पर मैंने सुबह के समय की बात इसलिये की क्योंकि सुबह के समय हज़ारों माता-पिता और लाखों बच्चे घरों से स्कूल जाने के लिए निकलते हैं और एक सभ्य समाज से अपेक्षा की जा सकती है कि उस समय लोग कम से कम बच्चों की सुरक्षा को लेकर सचेत होंगे. 
गाड़ियों की संख्या हर दिन बढ़ती जा रही है. गाड़ियां चलाने के शिष्टाचार को हम हर दिन भूलते जा रहे है, नियम कानून के प्रति हमारा सम्मान हर दिन घटता जा रहा है. अगर इस वर्ष सड़क पर मरने वालों की संख्या दो लाख तक भी पहुँच जाती है तो मुझे कोई आश्चर्य न होगा. 

सोमवार, 23 जनवरी 2017

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 22 [ बह्र]

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 22 [ बह्र]

[[Disclaimer Clause  : वही जो क़िस्त 1 में है]

आप जानते हैं कि उर्दू शायरी में 19-बहूर [ बह्र की जमा] प्रचलित हैं जो निम्न है
सालिम बहर
1 बह्र-ए-मुतक़ारिब
2 बह्र-ए-मुतदारिक
3 बह्र-ए-हज़ज
4 बह्र-ए-रमल
5 बह्र-ए-रजज़
6 बह्र-ए-वाफ़िर
7 बह्र-ए-कामिल
मुरक़्क़ब बहर 
8 बह्र-ए-तवील
9 बह्र-ए-मदीद
10 बह्र-ए-वसीत
11 बह्र-ए-मुन्सरिह
12 बह्र-ए-मुक्तज़िब
13 बह्र-ए-मुज़ारि’अ
14 बह्र-ए-ख़फ़ीफ़
15 बह्र-ए-मुतजस
16 बह्र-ए-सरी’अ
17 बह्र--ए-जदीद
18 बह्र-ए-क़रीब
19 बह्र-ए-मुशाकिल
-----
उर्दू में बह्रें ,फ़ारसी और अरबी जुबान से होते हुए आई है जैसे बहर-ए-कामिल और बहर-ए-वाफ़िर अरबी की बह्रें है
 बहूर के बारे में चन्द बुनियादी बातों पर बातें करना ग़ैर मुनासिब न होगा।
 बह्र 1 से लेकर 7 तक  सालिम बह्र कहलाती है
बह्र  8 से लेकर 19 तक मुरक़्क़ब बह्र कहलाती है
ये मुरक़्क़ब बहर दो या दो से अधिक [कभी कभी 3 ] रुक्न से मिल कर बनती है । इनमें से कुछ बह्रें तो अपने मुसद्दस शक्ल में ही प्रयोग मे लाई जाती हैं और कुछ मुज़ाहिफ़ शकल में ।इन सबका विवेचन अलग से individually अलहदा अल्हदा आगे करेंगे कि ये मुरक़्क़ब बहर   बनती  कैसे हैं
सालिम बहर =ऐसी बहर जिसमें सिर्फ़ सालिम रुक्न का ही  इस्तेमाल होता है।यानी सालिम रुक्न [ बिना कोई काँट-छाँट या कतर-ब्योंत किए  या बिना किसी  ज़िहाफ़ के ] मुसल्लम प्रयोग करते है ।आप जानते हैं कि सालिम रुक्न की तादाद 8-है  और हर रुक्न किसी न किसी बहर की बुनियादी रुक्न है जैसे

बहर-ए-मुतक़ारिब का बुनियादी रुक्न है -- फ़ऊलुन  [12 2]--- वतद1+सबब1
बहर-ए-मुतदारिक का बुनियादी रुक्न है---फ़ाइलुन   [2 12] --------सबब1+ वतद1
बहर-ए-हज़ज       का बुनियादी रुक्न है----मफ़ाईलुन    [12 2 2]--------वतद1+सबब1+सबब1
बहर-ए-रमल       का बुनियादी रुक्न है.........फ़ा इला तुन [ 2 12 2]--------सबब1+वतद1+सबब1
बहर-ए-रजज़       का बुनियादी रुक्न है ---मुस तफ़् इलुन्[ 2 2 1 2]------सबब1+सबब1+वतद1
बहर-ए-वाफ़िर     का बुनियादी रुक्न है---मफ़ा इ ल तुन्  [ 1 2 1 1 2]----वतद1+सबब2+सबब1
बहर-ए-कामिल    का बुनियादी रुक्न है----मु त फ़ा इ लुन् [1 1 2 12 ]-----सबब2+सबब1+वतद1

[हमने यहाँ  हम वतद और सबब से कुछ दिलचस्प बातें देखेंगे]
आप जानते हैं कि सालिम रुक्न की तादाद तो 8 है मगर सालिम बहर 7-ही क्यों बनी ? 8-क्यों नही बनी ?
जवाब सीधा है। वो 8-वाँ रुक्न है ’मफ़ ऊ लातु [2 2 2 1] बह्र-ए-मुक्तज़िब का ।-ये सालिम रुक्न तो है मगर इस से सालिम बह्र नहीं बन सकती कारण कि इस रुक्न के अन्त में -तु- है जो मुतहर्रिक है [यानी हरकत लगा हुआ है]  और उर्दू ज़बान में कोई भी आख़िरी लफ़्ज़ मुतहर्रिक नहीं होता [साकिन होता है] ख़ासतौर से कोई भी शे’र या मिसरा का [आख़िरी हर्फ़ मय हरकत नहीं होता । अगर इस से सालिम रुक्न बनाया भी जाए तो बज़ाहिर आखिर में =मफ़ऊलातु -आयेगा यानी आखिरी हर्फ़ मय हरकत -तु-होगा जो शे’र में जाइज़ नहीं है। तो फिर? कुछ नहीं इस पर कुछ ज़िहाफ़ का अमल कर के -तु- को साकिन कर के प्रयोग करेंगे ।तब उस स्थिति में फिर यह सालिम नहीं कहलायेगा बल्कि मुज़ाहिफ़ कहलायेगा
अब हम वतद और सबब से कुछ बातें देखते हैं-

वतद1 --को आप वतद-ए-मज्मुआ समझें ,[लिखने की तवालत से बचने के लिए  संक्षेप में लिख दिया]
सबब1---को सबब-ए-ख़फ़ीफ़ समझें        [-तदैव-]
सबब2 ---को सबब-ए-सक़ील  समझे        [-तदैव-]
इससे pictorially समझने में आसानी होगी

अच्छा ,वतद और सबब से एक बात याद आ गई ।कहीं पढ़ा था कि -सबब- का एक लुग़वी माने[शब्द कोशीय अर्थ]  ’रस्सी’ और ’वतद’ माने ’खूँटा’ भी होता है
इल्मे-ए-अरूज़ में इस रस्सी -खूँटा का क्या मानी ? हम नहीं समझे ? शायद आप भी नहीं समझें होंगे ।चलिए समझने की एक कोशिश करते हैं
वतद माने खूँटा ... आप ऊपर के अर्कान देखे सबमें एक वतद आ रहा है-किसी खूँटे की तरह और सबब  दो  रस्सी जो  वतद [खूंटा] से  बँधा हुआ लग रहा है -कभी बायें ,कभी दायें कभी ,कभी आगे कभी पीछे आ रहा है और बहर बनती जा रही है ।हाँला कि क्लासिकी अरूज़ में ये बहर तो दायरे [वृत] से निकलती है ।यहाँ भी किसी वृत के परिधि पर 1 ....2......2......2...लिख लें  और  एक एक स्पेस छोड़ कर गिर्दान करते चलें तो आप क ये  सुबाई [7-हर्फ़ी] बह्रें मिलती चलेंगी } इसे अरूज़ की भाषा में ;दायरा’ कहते हैं । यहाँ पर विस्तार में जाने की ज़रूरत नहीं है ।
कहते हैं -जो दो  5-हर्फ़ी बह्रें [ मुतक़ारिब और मुतदारिक ]हैं उनका इज़ाद बाद में हुआ और वो भी हिन्दी के गीत /छन्द शास्त्र से हुआ है । हमारे यहाँ  हिन्दी के छन्द में दशाक्षरी सूत्र -यमाताराजभानसलगा  [यानी यगण,,,मगण,,,,..तगण....] का प्रयोग किया जाता है और इनका भी एक निश्चित वजन होता है जैसे
यगण  =यमाता = 1 2 2  ये तो उर्दू में फ़ऊलुन [1 2 2] है जो बहर-ए-मुतकारिब का बुनियादी रुक्न है
रगण  =राजभा = 2 1 2  ये तो उर्दू  में फ़ाइलुन [2 1 2] है जो बहर-ए-मुतदारिक का बुनियादी रुक्न है
एक दिलचस्प बात और..... इन दोनों रुक्न में इत्तिफ़ाक़न  मुतदारिक का इज़ाद पहले हुआ और मुतक़ारिब का बाद में ।
ख़ैर...हमारे कुछ ब्लागर साथी  इस दशाक्षरी सूत्र से उर्दू अर्कान के समन्वय पर -एक मंच पर लाने का काम कर रहे हैं।
बहर-ए-कामिल और बहर-ए-वाफ़िर क्या एक दूसरे के बर अक्स नहीं लगते  हैं
एक दिलचस्प बात और ....ये अर्कान ऐसे Design किए गए है कि .हर एक रुक्न cyclically एक दूसरे से बरामद की जा सकती है जैसे
122 ----122...122....122..... ये बहर-ए-मुतक़ारिब का वज़न है
अब बस  दो  space आगे खिसका दीजिये फिर देखिए क्या होता है
212 ----212----212---212    ये बहर-मुतदारिक का वज़न आ गया
इसी तरह आप और भी अर्कान पर अमल कर के देख सकते हैं

मुरब्ब: = अगर किसी शे’र [ दोनो मिसरो को मिला कर ]में 4-रुक्न [यानी एक मिसरा में 2-रुक्न] आते हैं तो उसे ’ मुरब्ब:’ कहते हैं
मुसद्दस =अगर किसी शे’र [ दोनो मिसरो को मिला कर ]में 6-रुक्न[यानी एक मिसरा में  3-रुक्न ] आते हैं तो उसे ’ मुसद्दस’ कहते हैं
मुसम्मन =अगर किसी शे’र [ दोनो मिसरो को मिला कर ]में 8 -रुक्न [यानी एक मिसरा मे 4-रुक्न ]आते हैं तो उसे ’ मुसम्मन ’कहते हैं

अगर किसी शे’र मे 5-रुक्न/7-रुक्न/9-रुक्न आए तो उसका क्या नाम होगा ??
आ ही नहीं सकता  कारण कि शे’र में रुक्न जब भी आयेगा तो ’सम’ संख्या में ही आयेगा 4-6-8- के शकल में  । किसी शे’र में  ’मिसरा’ भी तो 2-ही [सम] होते हैं ।हा हा हा हा ।
हाँ एक स्थिति ज़रूर आ सकती है कि किसी शे’र में 8-12-16 रुक्न ज़रूर आ सकता  है [यानी मिसरा में 4-6-8 रुक्न हों] तो इसे भी क्रमश: मुरब्ब: ...मुसद्दस....मुसम्मन ही कहेंगे बस आगे .मुजाइफ़’ लफ़्ज़ बढ़ा देंगे [ मुजाअफ़ माने ही ’दो गुना करना] होता है और नाम होगा ’मुज़ाअफ़ मुसद्दस’.....मुज़ाअफ़.मुसम्मन’.....। कभी कभी इसे 12-रुक्नी या 16-रुक्नी शे’र भी कहते है
एक सवाल
8-रुक्नी] शे’र को क्या कहेंगे ? मुसम्मन  या ’मुज़ाअफ़  मुरब्ब: ???
 । ज़रा सोचियेगा इस पर ।
एक बात और
ये सभी 19-बहूर एक समान न तो मक़्बूल है और न ही लय पूर्ण  है  ,और न ही सभी संगीतमय ही है।न ही  कोई शायर इन सभी बहूर में शायरी ही करता है } वो तो बस चन्द मक़्बूल बह्र में ही शायरी करता है
अच्छी शायरी के लिए सिर्फ़ वज़न ,,बहर...ज़िहाफ़,, रुक्न ,,,..ही काफ़ी नहीं है । अरूज़ की जानकारी  तो बस आधी  बात है ।बाक़ी आधी बात तो शे’रिअत ग़ज़लियत तग़ज़्ज़ुल भाव अर्थ कथन में   है जो शायरी को बुलन्दी देता है

अब अगली क़िस्त में इन तमाम बहूर पर One by One एक एक कर के चर्चा करते चलेंगे

--इस मंच पर और भी कई साहिब-ए-आलिम मौज़ूद हैं उनसे मेरी दस्तबस्ता [ हाथ जोड़ कर] गुज़ारिश है कि अगर कहीं कोई ग़लत बयानी या ग़लत ख़यालबन्दी  हो गई हो तो निशान्दिही ज़रूर फ़र्मायें ताकि मैं ख़ुद को  दुरुस्त कर सकूं और बा करम मेरी मज़ीद [अतिरिक्त] रहनुमाई भी फ़र्माये ।मम्नून-ओ-शुक्रगुज़ार रहूँगा।

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रविवार, 22 जनवरी 2017

एक ग़ज़ल : यकीं होगा नहीं तुम को.....

एक ग़ज़ल : यकीं होगा नहीं तुम को....

यकीं होगा नहीं तुमको  मिरे तर्ज़-ए-बयाँ  से
जबीं का एक ही रिश्ता तुम्हारे आस्ताँ  से

फ़ना हो जाऊँगा जब राह-ए-उल्फ़त में तुम्हारी
ज़माना तुम को पहचानेगा  मेरी दास्ताँ  से

मिली मंज़िल नहीं मुझको भटकता रह गया हूं
बिछुड़ कर रह गया  हूँ  ज़िन्दगी के कारवाँ से

यूँ उम्र-ए-जाविदाँ  लेकर यहाँ पर कौन आया 
सभी को जाना होगा एक दिन तो इस जहाँ  से

चमन को है कहाँ फ़ुरसत कि होता ग़म में शामिल
बिना खिल कर ही रुख़सत हो रहा हूँ मैं यहाँ से

बनाया खाक से मुझको तो फिर क्यूँ बेनियाज़ी !
कभी देखा तो होता हाल-ए-’आनन’ आस्माँ  से

-आनन्द पाठक-
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 शब्दार्थ
तर्ज़-ए-बयाँ से = कहने के तर्रीक़े  से
जबीं = माथा/ सर/पेशानी
आस्तां = दहलीज /चौखट
उम्र-ए-ज़ाविदां = अमर /अनश्वर
बेनियाज़ी =उपेक्षा
हाल-ए-आनन = आप द्वारा सॄजित ये बन्दा [आनन] किस हाल में है । सवाल परवरदिगार से है

शनिवार, 21 जनवरी 2017

उर्दू बह्र पर एक बातचीत :किस्त 21[ज़िहाफ़ात]

                                  उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 21 [ज़िहाफ़ात]

[[Disclaimer Clause  : वही जो क़िस्त 1 में है]

.............. पिछली कड़ियों में मैने ज़िहाफ़ात के बारे में कुछ चर्चा की थी जैसे सबब-ए-ख़फ़ीफ़ पर लगने वाले ज़िहाफ़ ,सबब-ए-सक़ील पर लगने वाले ज़िहाफ़ ,वतद-ए-मज्मुआ पर लगने वाले ज़िहाफ़ या वतद-ए-मफ़रुक़ पर लगने वाले ज़िहाफ़। साथ ही मुफ़र्द ज़िहाफ़ की चर्चा की और मुरक़्क़ब ज़िहाफ़ की भी। फिर आम ज़िहाफ़ और ख़ास ज़िहाफ़ क्या होते हैं पर भी बात चीत की । हम ये तो दावा नहीं कर सकते  कि   सारे ज़िहाफ़ात की चर्चा मुकम्मल हो गई मगर इतना ज़रूर है कि  कुछ हद तक चर्चा हुई  है जिससे ये समझा जा सकता है कि  ज़िहाफ़ क्या होता है और कैसे अमल करता है।दो या दो से अधिक ज़िहाफ़ [मुरक़्क़ब ज़िहाफ़] कैसे किसी सालिम रुक्न के टुकड़े [अजज़ा] पर अमल [व्यवहॄत] होता है । विशेष जानकारी के लिए अरूज़ की किसी भी मुस्तनद [प्रमाणिक]  किताब से सन्दर्भ लिया जा सकता है।

एक बात तो तय हैं कि ये सारे ज़िहाफ़ात उर्दू शायरी के ’सालिम’ रुक्न के अवयवों [ अजज़ा [जिनकी संख्या 8-है] पर ही लगता है।ये मुफ़र्द या मुरक़्क़ब] ज़िहाफ़ कभी ’मुज़ाहिफ़’ रुक्न पे अमल नहीं करते -ये अरूज़ की बुनियादी उसूल के ख़िलाफ़ होगा।
हाँ दो ज़िहाफ़ ऐसे हैं जो ’मुज़ाहिफ़’ पर अमल करते हैं -सालिम’-रुक्न पर नहीं और वो है

(1) तस्कीन-ए-औसत का अमल
(2)  तख़्नीक़     का अमल 
आज हम इन्ही दोनों तरक़ीब-ए-अमल पर चर्चा करेंगे
अर्कान का सारा खेल  हर्फ़-ए-’हरकत-ओ-साकिन का है ।
तस्कीन-ए-औसत : अगर किसी -’एक ही मुज़ाहिफ़ रुक्न ’- में    3-मुत्तहर्रिक [ यानी हरकत लगा हुआ हर्फ़]  लगातार और एक साथ आ जाये तो बीच का ’हर्फ़-ए-हरकत’ साकिन हो जाता है  शर्त यह कि इस अमल से  [ग़ज़ल या शे’र की ] बह्र  का वज़न न बदल जाये ।और  बरामद रुक्न को ,’मस्कून’ कहते हैं
[यही ’औसत’  गणित में भी बोलते है-यानी 3-संख्याओं का ’औसत’ निकालना यानी ’बीच’ वाला अंक]
अब कुछ ऐसे अल्फ़ाज की चर्चा कर लेते है जिस में 3-हर्फ़ मय हरकत आता ह॥  आखिरी वाला हर्फ़ तो ख़ैर ’साकिन’ होगा ही  [कारण की उर्दू ज़बान में कोई लफ़्ज़ ’हरकत’ पर नहीं गिरता -बल्कि ’साकिन; पर ही गिरता है]
अकसर्----हरकत्----...कसरत्.........रमज़ान्....बरकत्   वग़ैरह वग़ैरह । ज़ाहिर है कि इसमें शुरु के 3-हर्फ़ पर लगातार हरकत [जबर  की हरकत है ]
अगर् अरूज़् की भाषा मे कहें तो [ सबब  की परिभाषा अगर आप को याद हो तो ]
अकसर्   = 1 1 2  =यानी सबब-ए-सक़ील [11]+सबब-ए-ख़फ़ीफ़[2]
हरकत्   = 1 1 2  =यानी सबब-ए-सक़ील [11]+सबब-ए-ख़फ़ीफ़[2]
कसरत्   =1 1 2  =यानी सबब-ए-सक़ील [11]+सबब-ए-ख़फ़ीफ़[2]
बरकत्   =1 1 2  =यानी सबब-ए-सक़ील [11]+सबब-ए-ख़फ़ीफ़[2]
तस्कीन-ए-औसत के अमल से इसे हम पढ़ेंगे
अक् सर्.. ..........हर् कत्..........कस् रत् ........बर् कत् ...........

अक् सर् =2 2 =यानी सबब्-ए-ख़फ़ीफ़्
हर् कत् =2 2  =यानी  सबब्-ए-ख़फ़ीफ़्
कस् रत्= 2 2 = यानी सबब्-ए-ख़फ़ीफ़्
बर् कत् = 2 2 =यानी  सबब्-ए-ख़फ़ीफ़्

हालांकि 4-हर्फ़ी जुमला का यहाँ सबब से काम तो चल गया ।मगर अरूज़ में इसे ’ फ़ासिला’ कहते हैं ।इसकी चर्चा मैने पहले नहीं किया कारण कि ज़रूरत ही नहीं पड़ी   ।थोड़ी सी चर्चा यहाँ कर लेते है। फ़ासिला की 2-क़िस्में होती है}
(1) फ़ासिला सुग़रा
(2) फ़ासिला कबरा

फ़ासिला सुग़रा = वो 4-हर्फ़ी जुमला/कलमा  जिसमें हर्फ़ क्रमश:   हरकत+हरकत+हरकत+साकिन हो
फ़ासिला कबरा = वो 5-हर्फ़ी जुमला/कलमा  जिसमें हर्फ़ क्रमश:   हरकत+हरकत +हरकत+हरकत+साकिन  हो

[अरबी ज़ुबान , 5-हर्फ़ी जुमला या कलमा तो afford कर सकता परन्तु उर्दू जुबान में ऐसे लफ़्ज़ मुश्किल से मिलते है ,कम ही प्राप्य है।
 मिलने को तो उर्दू जुबान में ’सबब-ए-सक़ील’ या वतद-ए-मफ़रुक़ के independent अल्फ़ाज़ भी नहीं मिलते है]
अब तस्कीन-ए-औसत पर एक बार फिर आते हैं
तस्कीन-ए-औसत :-अगर किसी -’एक ही मुज़ाहिफ़ रुक्न ’- में    3-मुत्तहर्रिक [ यानी हरकत लगा हुआ हर्फ़]  लगातार और एक साथ आ जाये तो बीच का ’हर्फ़-साकिन हो जाता है  शर्त यह कि इस अमल से  [ग़ज़ल या शे’र की ] बह्र न बदल जाये । 
”एक ही मुज़ाहिफ़ रुक्न ’- से मेरा आशय है कि जब सालिम रुक्न पर हम मुफ़र्द[एकल] या मुरक़्क़ब[ मिश्रित] ज़िहाफ़ का अमल कर रहे थे तो अजब अजब क़िस्म और शकल की मुज़ाहिफ़ रुक्न बरामद हो रहा था और कभी कभी तो ऐसी भी शकल बरामद हो रही थी कि 3-मुतहर्रिक हर्फ़ एक साथ सिलसिलेवार भी मिल मिल रहा था } बस यहीं ’और ऐसी ही ’मुज़ाहिफ़ रुक्न की शकल ’पर तस्कीन-ए-औसत का अमल होता है । आप चाहे तो करें और एक नई रुक्न बना लें और न चाहें तो न करें -आप की मरजी।वज़न में कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा।
 आप ऊपर देख ही रहे हैं  कि चाहे तस्कीन-ए-औसत का अमल करे न करे वज़न 4-ही रहेगा बस लफ़्ज़ की अदायगी बदल जायेगी
जब सालिम रुक्न ’फ़ा इला तुन [2 12 2]’ पर ज़िहाफ़ ख़ब्न का अमल किया था तो -फ़ इला तुन [1 12 2]  मिला था  यानी [ फ़े-ऐन-लाम-अलिफ़-ते- नून]   जिसमे ’फ़े-ऐन-लाम’ 3-मुतहर्रिक है जो एक साथ लगातार आ गए।अब तस्कीन-ए-औसत  का अमल [इस मुज़ाहिफ़ शकल पर} किया जा सकता है जिस की बदौलत जो बीच में -ऐन [मुतहर्रिक है] को साकिन किया जा सकता है ।
तब?
 तब फ़े+ऐन [साकिन][2]  ...,लाम+अलिफ़[साकिन][2] ..... ते+नून [साकिन][2]  हो सकता है यानी  तस्कीन-ए-औसत की अमल से एक रुक्न [2 2 2] भी बरामद की जा सकती है तब इसका रुक्न का  नाम-’मख़्बून मस्कून’ होगा ।
मस्कून -शब्द जोड़ने से यह पता चलता है कि यह रुक्न तस्कीन-ए-औसत से बरामद हुई है । आगे की चर्चा में यथा स्थान जहाँ जहाँ इसकी ज़रूरत पड़ेगी हम निशान्दिही करते चलेंगे।

तस्कीन-ए-औसत  की ताक़त का अन्दाज़ा आप इस बात से लगा सकते है कि इस के अमल से रुबाई की एक वज़न से 24- वज़न बरामद किए जा सकते हैं । कैसे ? इस बात की चर्चा हम आगे करेंगे जब रुबाई के अर्कान की चर्चा करेंगे
इसी प्रकार इसी अमल से  ’माहिया’ के एक वज़न से 18-रुक्न बरामद किए जाते है

तख़्नीक़ का अमल :- अगर किसी दो {पास पास के )मुज़ाहिफ़ रुक्न में 3-मुतहर्रिक [यानी हरकत लगा हुआ हर्फ़] लगातार और एक साथ आ जाये तो बीच का मुतहर्रिक -साकिन हो जाता है शर्त यह कि इस अमल से बह्र न बदल जाए  । अगर आप  ध्यान से देखे तो दोनो का अमल लगभग एक जैसा ही है बस फ़र्क़ है तो मुज़ाहिफ़ रुक्न की position  का।यानी इस परिभाषा को यूँ भी परिभाषित कर सकते है
अगर किसी मुज़ाहिफ़ रुक्न के आखिर में ’मुतहर्रिक’ हर्फ़ आता है और ठीक उसके सामने वाला रुक्न वतद-ए-मज्मुआ हो [बज़ाहिर दो हरकत होगा ही होगा]  तब 3-मुतहर्रिक जमा हो गए तो सर-ए-वतद[जो अब बीच में आ गया ]  को साकिन कर देगे जो अपने से सामने वाले रुक्न के मुतहर्रिक से जुड जायेगा और सबब-ए-ख़फ़ीफ़ का वज़न देखा । इस स्थिति में हासिल रुक्न को ’मुख़्निक़’ कहते है

इन दोनो ज़िहाफ़ात की चर्चा विस्तार से यहाँ करना ग़ैर मुनासिब होगा ।आगे की चर्चा में जब कहीं इस तर्क़ीब की ज़रूरत पड़ेगी तो बीच बीच में Hint करते चलेंगे।ख़ुदा ख़ुदा कर के तबसिरा-ए-ज़िहाफ़ात  सरसरी तौर पे खत्म हुआ।

अब आगे की किस्त में-- उर्दू शायरी में प्रचलित 19- बहर की चर्चा  अश’आर सहित करेंगे

--इस मंच पर और भी कई साहिब-ए-आलिम मौज़ूद हैं उनसे मेरी दस्तबस्ता [ हाथ जोड़ कर] गुज़ारिश है कि अगर कहीं कोई ग़लत बयानी या ग़लत ख़यालबन्दी  हो गई हो तो निशान्दिही ज़रूर फ़र्मायें ताकि मैं ख़ुद को  दुरुस्त कर सकूं और बा करम मेरी मज़ीद [अतिरिक्त] रहनुमाई भी फ़र्माये ।मम्नून-ओ-शुक्रगुज़ार रहूँगा।

अभी नस्र के कुछ बयां और भी हैं..........
ज़िहाफ़ात् के कुछ निशां और भी हैं.....


[नोट् :- पिछले अक़सात के आलेख आप मेरे ब्लाग पर  भी देख सकते हैं 

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-आनन्द पाठक
08800927181

शुक्रवार, 20 जनवरी 2017

दो मुक्तक

                                 दो  मुक्तक
:1:
बात यूँ ही  निकल गई  होगी
रुख़ की रंगत बदल गई होगी
नाम मेरा जो सुन लिया  होगा
चौंक कर वो सँभल गई होगी

:2;

कौन सा है जो ग़म दिल पे गुज़रा नहीं
बारहा टूट कर भी  हूँ   बिखरा   नहीं
अब किसे है ख़बर क्या है सूद-ओ-ज़ियाँ
इश्क़ का ये नशा है जो  उतरा नहीं

शब्दार्थ
सूद-ओ-जियाँ = लाभ-हानि

आनन्द.पाठक
08800927181

बुधवार, 18 जनवरी 2017

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 20 [मुरक़्क़ब ज़िहाफ़ात[

उर्दू बह्र पर एक बातचीत " क़िस्त 20 [मुरक़्क़ब ज़िहाफ़ात]

[[Disclaimer Clause  : वही जो क़िस्त 1 में है]

 ----पिछली कड़ी में हम 4-मुरक़्क़ब ज़िहाफ़्  ख़ब्ल्......शक्ल्.......ख़रब्.......सरम्...... पर् चर्चा कर चुके हैं । अब कुछ और मुरक़्क़ब  ज़िहाफ़ात की चर्चा करेंगे

5-ज़िहाफ़ सतर : यह मिश्रित [मुरक़्क़ब] ज़िहाफ़ भी दो मुफ़र्द ज़िहाफ़ ख़रम+ क़ब्ज़ से मिल कर बना है । मुज़ाहिफ़ को ’अस्तर’कहते हैं  और यह ज़िहाफ़ भी सदर/इब्तिदा से मख़्सूस है
चूँकि ख़रम का ज़िहाफ़ ’मफ़ा ईलुन’ से मन्सूब है। ’मफ़ा’ के मीम [सर-ए-वतद ] को गिराना -ख़रम कहलाता है अत: यह ज़िहाफ़ ’मफ़ाईलुन’ पर लगता है और् पाँचवें मुक़ाम् पर् जो साकिन् [सबब्-ए-ख़फ़ीफ़् का ] का गिराना क़ब्ज़् कहलाता है 
मफ़ा ई लुन् [12 2 2 ]+सतर् = फ़ा  इ लुन्  [2 12 ] यानी पहले मक़ाम् से ’मीम्’ गिरा दिया और् पाँचवें मुक़ाम् से ’ये’ [ई =ऐन्+ये] गिरा दिया तो बाक़ी बचा ’फ़ा इ लुन् [ऐन् मुतहर्रिक् है ] जिसे ’फ़ाइलुन्;[212] से बदल् लिया

6-ज़िहाफ़् ख़ज़्ल्  :-यह् भी  एक् मिश्रित् ज़िहाफ़ है जो मुफ़र्द [एकल] ज़िहाफ़ इज़्मार+तय्य के संयोग से बना है । मुज़ाहिफ़ का नाम  ’मख़्ज़ूल’ है  । यह आम ज़िहाफ़  है।
आप जानते है - ज़िहाफ़ इज़्मार का काम है सालिम रुक्न के सबब-ए-सकील  के  दूसरे स्थान पर जो मुतहर्रिक है]-को साकिन करना और ज़िहाफ़ तय्य का काम है सालिम रुक्न के सबब-ए-ख़फ़ीफ़ के चौथे स्थान पर हो-जो साकिन है को गिराना ।
अब यह सूरत सिर्फ़ एक ही सालिम रुक्न में ही सम्भव  [मुमकिन] है और वह  सालिम रुक्न है ’मु त फ़ा इलुन [1 1 2 12]= जिस में  मु त [1 1][सबब-ए-सकील]+फ़ा [2] [सबब-ए-ख़फ़ीफ़]+ इलुन [12] [वतद-ए-मज्मुआ] है
  मु त फ़ा इलुन [1 1 2 12] + ख़ज़्ल = मुत् फ़ इलुन् [ 2 1 12] यानी दूसरे मुक़ाम् पर् जो -त- [जो मुतहर्रिक् है] को साकिन् किया तो-त्-[साकिन्] बचा जो मीम् के साथ् मिल् कर् -मुत् [2] बना लिया । और् - फ़ा - [फ़े+अलिफ़] का अलिफ़ जो चौथे स्थान पर है -तय्य’ के अमल से गिरा दिया तो बचा फ़े [मुतहर्रिक वज़न 1] इस प्रकार अमल के बाद जो शेष रुक्न बची वो बची मुत् फ़ इलुन् [ 2 1 12 [ जिसे रुक्न् -मुफ़् त इलुन् से बदल् लिया 

7- ज़िहाफ़ क़सम :- यह मुरक़्क़ब ज़िहाफ़ भी दो मुफ़र्द [एकल] ज़िहाफ़ असब+अज़ब से मिल कर बना है मुज़ाहिफ़ को ’अक़सम’ कहते है । यह ज़िहाफ़ भी सदर और इब्तिदा से मन्सूब है
आप जानते है कि ज़िहाफ़ ’असब’ का काम है सबब-ए-सक़ील के दूसरे मुत्तहर्रिक [जो किसी  सालिम रुक्न  के पांचवें मुक़ाम पर आता हो तो ] को साकिन करना 
और अजब का काम है वतद-ए-मज्मुआ के सर-ए-रुक्न को ’ख़रम’ करना यानी कहीं  ’मुफ़ा’ [वतद मज्मुआ ] आए तो मीम को गिराना ।आप अगर ग़ौर से देखें तो ’सबब-ए-सक़ील [2-हर्फ़ी] का हर्फ़-ए-दोयम पाँचवे मक़ाम पर तभी आयेगा जब कि इस के पहले वतद [3 हर्फ़ी] आता हो । और ऐसा बस एक ही रुक्न है -मफ़ा इ ल तुन’ [1 2 1 1 2] जो ये शर्त पूरी करता है
मुफ़ा इ ल तुन [12 1 1 2]+ क़सम = फ़ा इल् तुन् [ 2 2 2 ] यानी ज़िहाफ़् ’अज़ब्’ से मुफ़ा का ’मीम्’ गिरा दिया और् ज़िहाफ़् असब् से ’इ ल ’ [सबब्-ए-सक़ील्] के ’लाम’ को साकिन् कर् दिया तो बाक़ी बचा फ़ा इल् तुन् [2 2 2] जिसे रुक्न् ’मफ़् ऊ लुन्’ [2 2 2] से बदल लिया ।[इ ल [1 1]  सबब्-ए-सक़ील्  जब  इल् [2] हो जाता है तो सबब्-ए-ख़फ़ीफ़् का वज़न् देता है ]
8-ज़िहाफ़ जमम :-यह मुरक़्क़ब [ मिश्रित]ज़िहाफ़ दो मुफ़र्द [एकल] ज़िहाफ़ अज़ब+अक़्ल से मिल कर बना है । इस की मुज़ाहिफ़ शकल को ’अज़्म’ कहते हैं और यह ज़िहाफ़ भी शे’र में सदर/इब्तिदा से  मख़्सूस है 
  आप जानते हैं   [और जैसा  ऊपर लिख भी चुके हैं] कि अजब का काम है वतद-ए-मज्मुआ के सर-ए-रुक्न को ’ख़रम’ करना यानी कहीं  ’मुफ़ा’ [वतद मज्मुआ] आए तो ’मीम’ को गिराना । और ’ज़िहाफ़ ’अक़्ल’ का काम है -सबब-ए-सक़ील के मुतहर्रिक दोयम [यानी सबब-ए-सक़ील में दूसरे स्थान पर का मुत्तहर्रिक अगर पाँचवें स्थान पर आए तो ]---को गिराना है। हम यह भी जानते हैं कि यह स्थिति सिर्फ़ एक रुक्न में बन सकती है और वो रुक्न है-मुफ़ा इ ल तुन ; जिसम वतद-ए-मज्मुआ [3]+सबब-ए-सक़ील [2]+सबब-ए-ख़फ़ीफ़[2] आता है 
मुफ़ा इ ल तुन [12 1 1 2 ]+ जमम = फ़ा इ तुन [2 1 2] यानी मुफ़ा का ख़रम कर दिया यानी मीम गिरा दिया  तो बचा ’फ़ा’[2] और अक़्ल के अमल से ’इ ल ’ [सबब-ए-सक़ील ] का लाम गिरा दिया तो बचा खाली -इ[1] यानी मुज़ाहिफ़ रुक्न हो गई -फ़ा इ तुन [2 1 2] जिसे मानूस रुक्न ’फ़ाइलुन’ [212] से बदल लिया
 एक बार दोनो ज़िहाफ़ ’क़सम’ और ’जमम’ को ध्यान से देखें ---कोई फ़र्क़ नज़र आता है ? जी हाँ है फ़र्क़ । और वो फ़र्क़ है मात्र  हर्फ़-ए-सक़ील के हर्फ़-ए-दोयम मुतहर्रिक में । पहले केस में यह  ’साकिन’ करार पाता है जब कि दूसरे केस में यह ’साकित’ यानी गिरा दिया गया है 
चलते चलते एक बात और ---हम नौ मश्क़ शायर [यानी नवी नवी  शायर जो शायरी करते हैं ] तो 2122  1222  22  122 .....जैसे अलामत लगा कर शायरी करते है ..यह तरीक़ा शुरुआती दौर में तो काम कर जाता है मगर गहराईयों में उतरने  पर यह निज़ाम भी बहुत  कारगर नहीं होता  " देख कर नहीं बता सकते कि 1 की अलामत साकिन के लिए है या हरकत के लिए है जैसे 
इल  और इल्  दोनो ही सबब है  पहले का वज़न 1 1 है और दूसरे का वज़न 2 है ।पर जब -ल- मय हरकत होगा तब भी वज़न 1 से दिखाते है और जब -ल- मय साकिन होगा तब भी वज़न 1 से ही दिखाते हैं ।
मगर घबराइए नहीं------ फिर भी गिर्दान 1222  2122   2212....अलामत बहुत हद तक कारगर साबित होती है। यह बात तो मैने यूँ ही लिख दी--बात चली तो बात निकल आई
खैर ..अब अगले ज़िहाफ़ पर चलते है 

9- ज़िहाफ़ नक़्स : यह मुरक़्क़ब ज़िहाफ़ भी दो मुफ़र्द ज़िहाफ़ असब+कफ़्फ़ से मिल कर बना है इसके मुज़ाहिफ़ को -मन्क़ूस- कहते हैं
ज़िहाफ़ ’असब’ का काम तो आप ने ऊपर देख ही लिया है कि कैसे अमल करता है।ज़िहाफ़ असब का काम है अगर सालिम रुक्न में -सबब-ए-सक़ील के दूसरे मुत्तहर्रिक जो किसी  सालिम रुक्न  के पांचवें मुक़ाम पर आता हो तो उस को साकिन करना और ज़िहाफ़ कफ़्फ़ का काम है कि सालिम रुक्न में सबब-ए-ख़फ़ीफ़ का साकिन अगर ’सातवें’ मुक़ाम पर आता है तो उसको गिराना ।  ऐसी स्थिति -  एक ही रुक्न में आती है और वो वही रुक्न है --मुफ़ा इ ल तुन् [12 1 1 2] जो उपर लिखा है 
मुफ़ा इ ल तुन [12 1 1 2] +नक़्स  = मुफ़ा इ ल् तु [1 2 2 1] यानी पाँचवे मुक़ाम् पर् जो-ल- मुतहर्रिक् है -को साकिन् -ल्- करना और् सातवें मुक़ाम् पर् जो -न्- साकिन् है -को गिराना तो बाक़ी बचा मुफ़ा इल् तु [ 12 2 1]  यहां-तु [1] मय् हरकत् बचा
जिसे -मफ़ा ईलु [12 21] से बदल् लिया 
10- ज़िहाफ़्  अक़्स् :-यह् मुरक़्क़ब ज़िहाफ़ दो  ज़िहाफ़  अज़ब+नक़्स से मिल कर बना है दूसरे शब्दों में आप यह भी कह सकते हैं कि यह 3-मुफ़र्द ज़िहाफ़ अज़ब+असब+कफ़ से मिल कर बना है  ,इसके मुज़ाहिफ़ का नाम ’अक़स’ है और यह ज़िहाफ़ भी शे’र के सदर/इब्तिदा मुक़ाम के लिए निर्धारित है
अजब का काम है वतद-ए-मज्मुआ के सर-ए-रुक्न को ’ख़रम’ करना यानी कहीं  ’मुफ़ा’ [वतद मज्मुआ ] आए तो मीम को गिराना और ज़िहाफ़ असब का काम है सबब-ए-सक़ील के मुतहर्रिक दोयम [जो किसी सालिम रुक्न के पाँचवे मुक़ाम पर आता हो] को साकिन करना और ज़िहाफ़ कफ़ का काम है सबब-ए-ख़फ़ीफ़ के साकिन [जो सालिम रुक्न के सातवें मुक़ाम पर आता हो] को गिराना ।अब ऐसी स्थिति तो सिर्फ़ एक ही सालिम रुक्न में हो सकती है और वो है -मुफ़ा इल तुन
मुफ़ा इ ल तुन् [12 1 1 2] + अक़्स = फ़ा इल् तु [2 2 1 यानी अज़ब् से मुफ़ा को ख़रम् किया यानी मीम् को गिरा दिया तो बचा -फ़ा’ ,ज़िहाफ़् असब् से चौथे स्थान पर जो [सबब-ए-सक़ील का ] -ल-मुतहर्रिक है को साकिन किया तो बचा -इ ल् - और् ज़िहाफ़् कफ़् से सातवें मुक़ाम पर जो नून साकिन है -को गिरा दिया तो बचा -तु-।इस प्रकार कुल मिला कर बाक़ी बचा --फ़ा इल् तु [2 2 1] जिसे रुक्न् -मफ़् ऊ लु [2 2 1] से बदल् लिया

11- ज़िहाफ़ क़तफ़ =यह मुरक़्क़ब ज़िहाफ़ दो मुफ़र्द ज़िहाफ़ असब+हज़्फ़  से मिल कर बना है और मुज़ाहिफ़ को ’मक़्तूफ़’ कहते हैं और यह ज़िहाफ़ शे’र के मुक़ाम अरूज़ और जर्ब से मख़्सूस है
आप जानते है कि ज़िहाफ़ ’असब’ का काम है सबब-ए-सक़ील के दूसरे मुत्तहर्रिक जो किसी  सालिम रुक्न  के पांचवें मुक़ाम पर आता हो तो उस को साकिन करना और ज़िहाफ़ हज़्फ़ का काम है  सालिम रुक्न के  आख़िर में [अगर सबब-ए-ख़फ़ीफ़ आता हो तो ]  ’को गिराना । अब ऐसा रुक्न तो बस एक ही है -मुफ़ा इ ल तुन [1 2 1 1 2 ] यानी वतद[मुफ़ा]1 2  +सबब-ए-सक़ील[ इ ल ] 1 1  +सबब-ए-ख़फ़ीफ़ [तुन] 2 , जिस पर यह अमल हो सकता है
मुफ़ा इ ल तुन [12 1 1 2] + क़तफ़  = मुफ़ा इ ल् [ 12 2] यानी इ ल के लाम् को साकिन् कर् दिया तो बचा -ल्- और् हज़्फ़् से तुन् गिरा दिया तो  बचा  -मुफ़ा इल् [1 2 2] जिसे -फ़ऊलुन् [1 2 2] से बदल् लिया

12-ज़िहाफ़ ख़ल’अ = यह मुरक़्क़ब ज़िहाफ़  दो मुफ़र्द ज़िहाफ़  ख़ब्न+क़त’अ के संयोग से बना है  और मुज़ाहिफ़ का नाम -मख़्लू’अ-होगा और यह ज़िहाफ़ भी शे’र के अरूज़ और जर्ब के मुक़ाम से निर्धारित है 
आप जानते हैं कि ज़िहाफ़ ख़ब्न का काम है सबब-ए-ख़फ़ीफ़ [जो रुक्न के शुरु में आता हो तो  ] के हर्फ़-ए-साकिन को गिराना है और ज़िहाफ़ क़त’अ का काम है वतद-ए-मज़्मुआ [अगर रुक्न के आखिर में आता हो] को साकिन को गिराना और उससे पहले जो हर्फ़-ए-मुतहर्रिक है को साकिन करना } अब ऐसा रुक्न तो बस एक ही है जिसमे सबब-ए-ख़फ़ीफ़ शुरु[2]  में आता है और वतद मज़्मुआ रुक्न[21] के आख़िर में आता है और वो रुक्न है --मुस् तफ़् इलुन् [2 2 12]
मुस् तफ़् इलुन् [ 2 2 12] + ख़ल’अ = मु तफ़् इ ल् [1 2 2] यानी मुस् का -स्-गिरा दिया और इलुन् का -न्- गिरा दिया और् उस् से पहले जो मुतहर्रिक् -लु- है उसे साकिन् कर दिया तो बाक़ी बचा मु तफ़् इल् [1 2 2] जिसे मानूस् रुक्न् -फ़ऊलुन् [1 2 2] से बदल लिया  
13-ज़िहाफ़ नह्र =यह मुरक़्क़ब ज़िहाफ़ दो मुफ़र्द ज़िहाफ़ जद्द’अ+कसफ़ से मिल कर बना है और मुज़ाहिफ़ नाम होगा-मन्हूर्। यह ज़िहाफ़ भी शे’र के अरूज़ और जर्ब मुक़ाम से मख़सूस है
आप जानते हैं किसी रुक्न के शुरु  में 2-सबब-ए-ख़फ़ीफ़ लगातार आए तो इसको गिराना ’जद्द’अ कहलाता है और किसी रुक्न के आखिर में वतद-ए-मफ़रुक़ [हरकत+साकिन+हरकत] आए तो हरकत दोयम को गिरा देना ’कसफ़’कहलाता है । अब ऐसी स्थिति  तो सिर्फ़ एक ही रुक्न में होगी और वो रुक्न है -मफ़ ऊ लातु’ [बह्र-ए-मुक़्तज़िब का बुनियादी रुक्न]
मफ़ ऊ लातु 2 2 2 1]  + नह्र = ला [2] यानी ज़िहाफ़ जद्द’अ की अमल से दोनो सबब-ए-ख़फ़ीफ़ मफ़ और ऊ दोनो गिरा दिया और कस्फ़ के अमल से लातु का मुतहर्रिक -तु-गिरा दिया तो बाक़ी बचा -ला [लाम+अलिफ़] [2] इसे मानूस रुक्न फ़े’अ [2] यहाँ ऐन साकिन है  
14-ज़िहाफ़् सलख़ = यह् मुरक़्क़ब् ज़िहाफ़् दो मुफ़र्द ज़िहाफ़ जब्ब+वक़्फ़ से मिल कर बना है और मुज़ाहिफ़ को -मस्लूख़्-कहते हैं 
आप जानते हैं कि ज़िहाफ़ ’जब्ब’ का काम है दो अस्बाब-ए-ख़फ़ीफ़ [जो किसी रुक्न के आख़िर में आते हों] को एक साथ गिराना और वक़्फ़ का काम है वतद-ए-मफ़रूक़ के मुतहर्रिक दोयम को साकिन करना 
तो ऐसी स्थिति सिर्फ़ एक सालिम रुक्न में आता है और वो रुक्न है -फ़ा’अ ला तुन [21 2 2 ] यानी बहर-ए-रमल  का बुनियादी रुक्न का मुफ़स्सिल शकल है
फ़ा’अ ला तुन [2 1 2 2] + सलख = फ़ा’अ [2 1] यहाँ -ऐन साकिन है । यानी ज़िहाफ़ जब्ब से दोनों  सबब-ए-ख़फ़ीफ़ [जो रुक्न के अन्त में है] -ला- और -तुन- गिरा दिया और फ़ा’अ [जिस में -ऐन- मुत्तहर्रिक है ] को साकिन कर दिया तो बचा -ऐन [साकिन] अत: बाक़ी बचा -फ़ा’अ [ बसकून-ए-ऐन ] [21]
15-ज़िहाफ़ दरस = यह मुरक़्क़ब ज़िहाफ़ दो मुफ़र्द ज़िहाफ़ क़स्र+बतर से मिल कर बना है और मुज़ाहिफ़ का नाम है -मद्रूस् ।यह ज़िहाफ़ भी अरूज़ और जर्ब से मख़्सूस है
आप जानते है कि ज़िहाफ़ कस्र का काम है सबब-ए-ख़फ़ीफ़ [अगर रुक्न के आख़िर मे हो तो ] के हर्फ़-ए-साकिन को गिराना और उस से पहले के मुतहर्रिक को साकिन करना  और [अगर किसी रुक्न के आखिर में सबब-ए-ख़फ़ीफ़ हो और उस से पहले वतद-ए-मज्मुआ हो तब]  ज़िहाफ़ बतर का काम है -वतद-ए-मज्मुआ को गिराना 
ऐसी स्थिति तो निम्न रुक्न में बनती है फ़ा इला तुन  [ 2 12 2]
फ़ा इला तुन् [2 12 2] + दर्स = फ़ा त् [21] यानी ज़िहाफ़् कस्र् से तुन का -न-[नून] गिरा दिया और इस से पहले जो मुतहर्रिक -तु- है को साकिन कर दिया तो -त्- बचा और ज़िहाफ़ बतर से वतद -ए-मज्मुआ -इला- गिरा दिया तो बचा रह गया- फ़ा -और -त्- यानी  -फ़ा त् [2 1] जिसे मानूस् रुक्न् -फ़ा’अ [21] [बसकून्-ए-ऐन्] से बदल् लिया

16-ज़िहाफ़ जह = यह भी एक मुरक़्क़ब ज़िहाफ़ है जो दो मुफ़र्द ज़िहाफ़ बतर+हज़्फ़ से मिल कर बना है और मुज़ाहिफ़ का नाम है ---मजहूफ़
आप जानते हैं कि [अगर किसी रुक्न के आखिर में सबब-ए-ख़फ़ीफ़ हो और उस से पहले वतद-ए-मज्मुआ हो तब]ज़िहाफ़ बतर का काम है -वतद-ए-मज्मुआ को गिराना [
और [अगर सबब-ए-ख़फ़ीफ़ रुक्न के आख़िर में आता हो तो ] ज़िहाफ़ हज़्फ़ का काम है सबब-ए-ख़फ़ीफ़ को गिराना  सालिम रुक्न ’फ़ा इला तुन’ ही एक ऐसा सालिम् रुक्न् है जो यह शर्त पूरा  करता है
  फ़ा इला तुन [2 12 2 ] + जह्फ़ = फ़ा [2] यानी ज़िहाफ़ बतर की अमल से वतद-ए-मज्मुआ [ इला 1 2 ] गिरा दिया और ज़िहाफ़ हज़्फ़ की मदद से सबब-ए-ख़फ़ीफ़ -’ तुन’[2] गिरा दिया तो बाक़ी बचा ’फ़ा’ [2] जिसे मानूस रुक्न ’फ़े’अ [2]  [बसकून-ए-एन]से बदल लिया
17 ज़िहाफ़ रब्ब’अ = यह भी एक मुरक़्क़ब ज़िहाफ़ है जो दो मुफ़र्द ज़िहाफ़ ख़ब्न +बतर से मिल कर बना है और जिसके  मुज़ाहिफ़ नाम होगा-मरबू’अ
आप जानते ही हैं कि ज़िहाफ़ खब्न का काम है सबब-ए-ख़फ़ीफ़ [जो रुक्न के शुरु में आता हो] का हर्फ़-ए-साकिन को  गिराना और  ज़िहाफ़ बतर का काम है -वतद-ए-मज्मुआ को गिराना [अगर किसी रुक्न के आखिर में सबब-ए-ख़फ़ीफ़ हो और उस से पहले वतद-ए-मज्मुआ हो तब] अब ऐसी शर्त तो सालिम रुक्न ’फ़ा इला तुन [2 12 2] में ही आती है 
फ़ा इला तुन [2 12 2] +रब्ब’अ = फ़ तुन् [1 2] यानी ज़िहाफ़ ख़ब्न के अमल से सबब-ए-ख़फ़ीफ़ -फ़ा[2] का अलिफ़ गिरा दिया तो बचा -फ़े- और बतर के अमल से -वतद-ए-मज्मुआ -इला- [12] गिरा दिया तो बाक़ी बचा तुन्-[2]
इस प्रकार बचा -फ़ तुन् [12] जिसे मानूस रुक्न -फ़ ’अल् [1 2] से बदल् लिया यहाँ -ल्- साकिन् है  और् ऐन् मय् हरकत् है  जो ’अ [ऐन+लाम् मिलकर ’अल्- [2] बना लिया सबब्-ए-ख़फ़ीफ़]
---------------------------------------
(क)    अभी मुरक़्क़ब ज़िहाफ़ का ज़िक़्र ख़त्म  नहीं हुआ । ये तो मात्र उन ज़िहाफ़ात का ज़िक़्र ख़त्म हुआ जिनके मुरक़्क़ब का कोई नाम होता है । दो या दो से अधिक ज़िहाफ़ हैं  ऐसे हैं  जो किसी सालिम् रुक्न् पर् अलग् अलग् अमल् तो करते हैं मगर् उनका  कोई संयुक्त मुर्क़्क़ब नाम तो नहीं है,  परन्तु सालिम रुक्न के टुकड़ों पर one by one काम करते हैं ,अमल करते हैं और उनके मुज़ाहिफ़ नाम में इन दोनों मुफ़र्द ज़िहाफ़ का नाम शामिल कर लेते  हैं । मुफ़र्द [एकल] ज़िहाफ़ कभी भी हासिल-ए-मुज़ाहिफ़ पर नहीं लगाते यानी मुज़ाहिफ़ का मुज़ाहिफ़ नहीं होगा -उसूलन ये ग़लत होगा
(ख) ऐसा नहीं है कि मुज़ाहिफ़ पर ज़िहाफ़ नहीं लगते । लगते हैं --ज़रूर लगते है । उसके के लिए Exclusively दूसरा निज़ाम [व्यवस्था] है और इस व्यवस्था का नाम है
(i) तस्कीन-ए-औसत का अमल 
(ii) तख़्नीक़ का अमल 

  और् ये दोनो ज़िहाफ़ -मात्र मुज़ाहिफ़ रुक्न पर ही अमल करते है ......सालिम रुक्न पर अमल नहीं करते ।
बेहतर होगा कि इसकी चर्चा हम अलग से और विस्तार से किसी अगली क़िस्त में करें तो भ्र्म की गुंजाइश नहीं रहेगी और बात भी साफ़ साफ़ समझ में आ जायेगी।
(ग)   और भी बहुत से मुरक़्क़ब ज़िहाफ़ है जिनका ज़िक़्र यहाँ पर मैने नहीं किया है  जो किसी भी अरूज़ की मुस्तनद [प्रमाणित] किताब में मिल जायेगी । हम ने तो मात्र उन्हीं ज़िहाफ़ात का ज़िक़्र किया है जो मानूस हैं और उर्दू शायरी में कसरत [बहुतायत] से प्रचलित [राइज़] है । एक बात तो तय हैं कि मुतक़्क़ब ज़िहाफ़ जो दो या दो से ज़्यादा एकल ज़िहाफ़ से मिल कर बना है उन तमाम एकल जिहाफ़ का ज़िक़्र और उनके तरीक़-ए-अमल पर चर्चा पहले ही कर चुका हूँ 
अगली कड़ी में ज़िहाफ़ात की चर्चाओं को एक जगह पर sum up करते हुए  ,कुछ अन्य विषयों पर चर्चा करूँगा जिससे  सुधी पाठक गण को विषय को दुहराने और समझने में सुविधा होगी ।    

--इस मंच पर और भी कई साहिब-ए-आलिम मौज़ूद हैं उनसे मेरी दस्तबस्ता [ हाथ जोड़ कर] गुज़ारिश है कि अगर कहीं कोई ग़लत बयानी या ग़लत ख़यालबन्दी  हो गई हो तो निशान्दिही ज़रूर फ़र्मायें ताकि मैं ख़ुद को  दुरुस्त कर सकूं ।बा करम मेरी मज़ीद [अतिरिक्त] रहनुमाई फ़र्माये ।मम्नून-ओ-शुक्रगुज़ार रहूँगा।

अभी नस्र के कुछ बयां और भी हैं..........
ज़िहाफ़ात् के कुछ निशां और भी हैं.....

एक बात बड़े ही अदब से एतराफ़ [स्वीकार] करता हूँ कि इन तमाम अक़्सात और तज़्क़िरात के लिए अपने आलिम अरूज़ी साहिबान  कमाल अहमद सिद्द्क़ी साहब , आलिम जनाब  सरवर आलम राज़ ’सरवर ’ साहब  ,मेरे  बड़े भाई अजीज  दोस्त डा0 आरिफ़ हसन ख़ान साहब  का तह-ए-दिल  से मम्नून-ओ-शुक्र गुज़ार हूँ जिनकी किताबों से  कुछ पढ़ सका ,समझ सका और लिख सका ।वगरना इस हक़ीर कि बिसात कहाँ  । इन तज़्क़िरात में  मेरा कुछ भी नहीं है बस साहिबान  के अरूज़ पर किए गए कामों का हिन्दी तर्जुमा समझिए........

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-आनन्द.पाठक-
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सोमवार, 16 जनवरी 2017

क्यों चुनते है हम अपराधिक छवि के नेताओं को?
राजनीति में अपराधिक छवि के लोगों का आना हम सब के लिए एक चिंता का विषय होना चाहिए, पर ऐसा है नहीं.
संसद के २०१४ के चुनाव के बाद, एक-तिहाई सदस्य ऐसे हैं जिन के विरुद्ध अपराधिक मामले हैं और इनमें से २१% तो ऐसे सदस्य हैं जिनके विरुद्ध गंभीर मामले हैं.
‘कार्नेगी इंन्डाउमेंट फॉर इंटरनेशनल पीस’ के ‘मिलन वैष्णव’ का मानना है कि लोग अपराधिक छवि के नेताओं को इस लिए चुनते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि ऐसे नेता उनके लिए कुछ कर पायेंगे, खासकर ऐसे प्रदेशों में जहां सरकारी तन्त्र थोड़ा कमज़ोर  हो चुका है.
मिलन वैष्णव की बात कुछ हद तक सही हो सकती है,  पर मेरा मानना है की हम भारतीयों को इस बात से कोई ख़ास फर्क नहीं पड़ता की जिस व्यक्ति को हम चुनकर लोक सभा या विधान सभा या पंचायत वगेरह में भेज रहे हैं उसका चरित्र कैसा है. न्याय की परिभाषा हमारी अपनी ही होती है जो समय और स्थिति के अनुरूप बदलती रहती है. क़ानून और व्यस्था में हमारा अधिक विश्वास नहीं है. दूसरे की सुख सुविधा की चिंता हम कम ही करते हैं.
हम जब सड़कों पर अपनी गाड़ियां दौड़ाते हैं तो इस बात की बिलकुल परवाह नहीं करते कि हमारे कारण दुर्घटना में किसी की जान भी जा सकती है. कुछ दिन पहले जारी की गयी रिपोर्ट के अनुसार २०१५ में लगभग ५ लाख सड़क दुर्घटनाएं घटी जिन में एक लाख सतहत्तर हज़ार लोगों ने जान गवाई, अर्थात हर एक घंटे में कहीं न कहीं बीस लोगों की सड़क दुर्घटनाओं में मृत्यु हुई.
यह एक भयावह स्थिति है पर कितने लोग हैं जो इस बात को लेकर चिंतित हैं. हम अब भी वैसे ही सड़कों पर अपनी गाड़ियां दौड़ाते हैं जैसे दौड़ाते आये हैं. अधिकतर लोग तो सड़क पर किसी को रौंद कर या आहत कर पल भर को रुकते भी नहीं और दुर्घटना स्थल से तुरंत भाग जाते हैं. कोई विरला ही वहां रुक कर ज़ख़्मी की सहायता करता है. 
इस देश में सिर्फ २४ लाख लोग ही मानते हैं कि उनकी आय दस लाख से अधिक है. यह एक हास्यास्पद बात ही है. एन सी आर में ही दस लाख रुपये कमाने वालों की संख्या शायद २४ लाख से अधिक हो.  सत्य तो यह है की लाखों-लाखों  लोग आयकर से बचने के लिए आयकर रिटर्न भरते ही नहीं या फिर झूठे और गलत रिटर्न भरते हैं.
अपने आस पास देख लें, आपको सैंकड़ों ऐसे घर दिखाई दे जायेंगे जो नियम-कानून की अवहेलना कर बनाये गए हैं या जिनमें नियमों के विरुद्ध फेर-बदल किये गए हैं.
सरकारी कार्यलयों में आपके कुछ ही लोग दिखेंगे जो अनुशासन का पालन करते हुए पुरी निष्ठा और लगन के साथ अपना काम करते हैं. अधिकतर तो बस समय काटते हैं या अपने पद का दुरूपयोग करते हैं.
ऐसे कितने ही उदाहरण आपको मिल जायेंगे जो दिखलाते हैं कि  नियम, व्यवस्था, अनुशासन को लेकर हमारा व्यवहार बहुत ही लचीला है. इस कारण हम लोगों को इस बात से कोई ख़ास फर्क नहीं पड़ता कि जिस व्यक्ति को हम अपना वोट दे रहें हैं वह एक अपराधी है या दल-बदलू है या उसका चरित्र संदेहास्पद है.

अगर ऐसा न होता तो इतनी बड़ी संख्या में अपराधिक छवि के लोग संसद, विधान सभाओं और दूसरी अन्य संस्थाओं के लिए न चुने जाते.  दोष राजनीतिक पार्टियों का उतना नहीं जितना नहीं हमारा है. हम अपने को दोषमुक्त मानने के लिए राजनीतिक दलों को दोषी ठहरा देतें हैं. इस कारण निकट भविष्य में स्थिति में किसी सुधार की आशा करना गलत होगा. 

बुधवार, 11 जनवरी 2017

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 19 [मुरक़्क़ब ज़िहाफ़ात]

उर्दू बह्र पर एक बातचीत " क़िस्त 19 [मुरक़्क़ब ज़िहाफ़ात]

[[Disclaimer Clause  : वही जो क़िस्त 1 में है]

----- पिछली  क़िस्तों में ,अब तक हम ’मुफ़र्द ज़िहाफ़’ का ज़िक़्र कर चुके है यानी वो एकल ज़िहाफ़ जो सालिम रुक्न पर अकेले और एक बार ही लगता है। मुरक़्क़ब ज़िहाफ़ -दो या दो से अधिक ज़िहाफ़ - से मिल कर बनता है । कभी कभी इन मिश्रित [मुरक़्क़ब] ज़िहाफ़ का एक संयुक्त नाम भी होता है और कभी कभी नहीं भी होता है । कुछ ऐसे मुरक़्क़ब ज़िहाफ़ के नाम लिख रहे है जिनके नाम होते है जैसे
1-ख़ब्ल =ख़ब्न +तय्य = मुज़ाहिफ़ नाम होगा- ’मख़्बूल’
2-शकल =ख़ब्न+कफ़्फ़ =मुज़ाहिफ़ नाम होगा-मश्कूल
3-ख़रब =ख़रम+कफ़्फ़ = मुज़ाहिफ़ नाम होगा-अख़रब
4-सरम =सलम+क़ब्ज़ = मुज़ाहिफ़ नाम होगा-असरम
5-सतर =ख़रम+क़ब्ज़ =मुज़ाहिफ़ नाम होगा-असतर
6-ख़ज़ल =इज़्मार+तय्य =मुज़ाहिफ़ नाम होगा-मख्ज़ूल
7-क़सम =असब+अज़ब  =मुज़ाहिफ़ नाम होगा-अक़्सम्
8-जमम =अज़ब+अक़ल =मुज़ाहिफ़ नाम होगा-अजम्
9-नक़्स =असब+कफ़्फ़ =मुज़ाहिफ़ नाम होगा-मन्क़ूस्
10-अक़्स =अज़ब+नक़्स =मुज़ाहिफ़ नाम होगा- अक़स्
11-क़तफ़ =असब+हज़फ़ =मुज़ाहिफ़ नाम होगा-मक़्तूफ़्
12-ख़ल’अ =ख़ब्न+क़त’अ = मुज़ाहिफ़ नाम होगा-मख़्लू’अ
13-नहर =जद्द’अ+कसफ़=मुज़ाहिफ़ नाम होगा-मन्हूर्
14-सलख़ =जब्ब+वक़्फ़ = मुज़ाहिफ़ नाम होगा-मस्लूख़्
15-दरस =क़स्र+बतर = मुज़ाहिफ़ नाम होगा-मद्रूस्
16-हज़फ़ =बतर+हज़्फ़ =मुज़ाहिफ़ नाम होगा-महज़ूफ़्
17-रब’अ =ख़ब्न +बतर = मुज़ाहिफ़ नाम होगा-मरबू’अ
 इसके अलावा ,कुछ मुरक़्क़ब  ज़िहाफ़ ऐसे भी हैं जिनका कोई संयुक्त नाम तो नहीं है पर अमल एक साथ करते हैं ।ऐसे ज़िहाफ़ात की चर्चा हम आगे करेंगे


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1-इसके अलावा भी कभी कभी सालिम रुक्न पर 2-ज़िहाफ़ अलग-अलग लगते है उनका कोई एकल नाम तो नही है परन्तु बहर के नाम में उसे शामिल कर लेते हैं
जिसकी चर्चा बाद में करेंगे
2- ऊपर के लिस्ट में बाईं तरफ़ जो दो अलग अलग ज़िहाफ़ के नाम लिखे हैं उस के बारे में और उनके अमल के तरीक़ों के बारे में पहले ही सविस्तार चर्चा कर चुका हूँ । अब इनका रुक्न पर  "एक साथ" कैसे  अमल करेंगे देखेंगे
3- एक बात साफ़ कर दूं मुरक़्क़ब ज़िहाफ़ रुक्न पर एक साथ अमल करते हैं ।यह नहीं  कि सालिम रुक्न के किसी टुकड़े पर एक ज़िहाफ़ का अमल करा दिया और मुज़ाहिफ़ रुक्न बरामद हो गई फिर मुज़ाहिफ़ रुक्न पर दूसरे ज़िहाफ़ का अमल कराया। यह उसूलन ग़लत होगा ।मुज़ाहिफ़ पर ज़िहाफ़ नहीं लगाते [ सिवा ’तस्कीन’ और तख़्नीक़’ के जिसकी चर्चा हम बाद में करेंगे।
 4- जब हम मुफ़र्द [एकल] ज़िहाफ़ का ज़िक़्र कर रहे थे तो देखा था कि मुफ़र्द ज़िहाफ़ सालिम रुक्न के किसी ख़ास टुकड़े पर [यानी सबब या वतद पर] ही लगता था और उन्हें श्रेणियों में exclusively  बाँट रखा था जैसे सबब-ए-ख़फ़ीफ़ पर लगने वाले ज़िहाफ़ , वतद-ए-मज्मुआ पर लगने वाले ज़िहाफ़ या सबब-ए-सकील पर लगने वाले ज़िहाफ़ वग़ैरह वग़ैरह ,परन्तु ऐसी श्रेणी विभक्ति ’मुरक़्क़ब ज़िहाफ़’ के case में नहीं किया जा सकता है ।कारण कि मुरक़्क़ब ज़िहाफ़ दो या दो से ज़्यादे मुख़्त्लिफ़ [विभिन्न] मुफ़र्द ज़िहाफ़ के combination से बने है जिनके असरात सालिम रुक्न के अलग अलग टुकड़ो [वतद या सबब] पर एक साथ होंगे अत: मुरक़्क़्ब ज़िहाफ़ as a singleton  किसी ख़ास टुकड़े से मख़्सूस नही किया जा सकता
5- आप् इतने मुफ़र्द् या मुरक़्क़ब् ज़िहाफ़ात् देख् कर् आप् घबड़ाईए नहीं ।अगर आप शायरी करते हैं तो इतने अर्कान और इतने ज़िहाफ़ात में उमीदन आप शायरी नहीं करते होंगे ।आप चन्द मक़्बूल अर्कान और चन्द मक़्बूल ज़िहाफ़त में ही करते होंगे।अत: आप को न तो सारे अर्कान [19] और न ही सारे ज़िहाफ़ात की ज़रूरत पड़ेगी। मुख़्तलिफ़ शायर के मुख़्तलिफ़ अर्कान पसन्ददीदा होते हैं और उन्हीं से मयार की शायरी करते है : अत: ज़िहाफ़ात ..ये क्या होते हैं ..ये कैसे बनते हैं .ये कैसे अमल करते हैं -- के बारे में जानने में क्या हर्ज है।
एक बात और
शे’र-ओ-सुख़न के दो पहलू हैं --एक तो यही ’अरूज़’ का पहलू  और दूसरा ;तग़्ग़ज़्ज़ुल का पहलू --एक दूसरे के पूरक हैं
अरूज़ के बारे में जानना तो मात्र  शायरी का ’आधा’ भाग ही जानना हुआ --औज़ान का...बहर का ...ज़िहाफ़ का ..तक़्ती’अ का जानना हुआ
शायरी की content ,भाव..कथन..असरात ,,तो मश्क़ से ही आती है यह तो फ़न है हुनर है...ख़ुदा  की ने’मत है
अगर दोनो पहलू एक साथ रहें तो फिर मयार की शायरी होगी ....अमर होगी ...सोने पे सुहागा होगा...सोने में सुगन्ध होगा।
  अब हम एक एक कर इन ज़िहाफ़ के अमल देखते हैं

ज़िहाफ़ ख़ब्ल :-यह ज़िहाफ़ दो ज़िहाफ़ के संयोग से बना है  खब्न + तय्य  और् मुज़ाहिफ़ को ’मख़्बूल्’ कहते है ।और यह् एक् आम् ज़िहाफ़ है ।हम ख़ब्न और तय्य के तरीक़ा-ए-अमल की चर्चा पिछली किस्त में कर चुके है। हम जानते हैं कि मुफ़र्द ज़िहाफ़ ख़ब्न और  मुफ़र्द ज़िहाफ़ तय्य .सबब-ए-ख़फ़ीफ़ पर लगते है जिसमे ज़िहाफ़् ख़ब्न् तो सबब्-ए-ख़फ़ीफ़् के दूसरे मुक़ाम् पर् और् ज़िहाफ़ तय्य सबब-ए-ख़फ़ीफ़ के चौथे मुकाम पर असर डालता है  तो यह मिश्रित ज़िहाफ़ ’ख़ब्ल ’ भी  बज़ाहिर ऐसे रुक्न पर लगेगा जो  -सबब[2]+सबब[2]+वतद [3] से बनता ऐसे 2-ही सालिम रुक्न है  मुस् तफ़् इलुन् [2 2 12] और् मफ़् ऊ लातु [2 2 21]

अब हम इस ज़िहाफ़ का अमल देखते हैं
मुस् तफ़् इलुन् [2 2 12] + ख़ब्ल्   = मु त इलुन् [ 1 1 12] यानी  खब्न् से दूसरे स्थान् पर  मुस् का साकिन् -स्- गिरा दिया और् तय्य् से   चौथे स्थान् का साकिन्-फ़्- गिरा दिया तो बाक़ी बचा ’मु त इलुन् [1 1 12]  जिसे मानूस् रुक्न् ’फ़ इ लतुन् [1 1 12] से बदल् लिया
मफ़् ऊ लातु [ 2 2 2 1 ]+ख़ब्ल्  = म अ लातु [1 1 21 ] यानी ख़ब्न् से दूसरे स्थान् मफ़् का  साकिन् -फ़्- और् तय्य् से चौथे स्थान् पर्  "ऊ’ का ’वाव्’ गिरा दिया तो बाक़ी बचा म ’अ [एन् ब हरकत्] लातु [ 1 1 2 1] जिसे मानूस् बहर् -फ़ इ लातु- से बदल् लिया
 जब् बहर रजज़ और बहर मुक़्तज़िब की चर्चा करेंगे तो वहाँ भी इन ज़िहाफ़ की चर्चा करेंगे कि कैसे ये ज़िहाफ़ बहर की रंगारंगी में योगदान करते हैं

 ज़िहाफ़् शकल् : यह् ज़िहाफ़् दो ज़िहाफ़् के संयोग् से बना है ख़ब्न् और् कफ़् से। और् मुज़ाहिफ़् को -मश्कूल् -कहते हैं ।और यह एक आम ज़िहाफ़ है ।हम ख़ब्न और कफ़् के तरीक़ा-ए-अमल की चर्चा पिछली किस्त में कर चुके है।ज़िहाफ़ खब्न् , सबब्-ए-ख़फ़ीफ़् के दूसरे मुक़ाम पर अमल करता है जब कि ज़िहाफ़ कफ़ सबब-ए-ख़फ़ीफ़ के ’सातवें ’ मक़ाम पर अमल करता है }बज़ाहिर यह उन्ही रुक्न में संभव है जो -सबब[2] +वतद[3]+सबब[2] से बनता है और ऐसे रुक्न 2 है जैसे ’फ़ा इला तुन्’ और मुस् तफ़्’अ इलुन् [ मुस तफ़् इलुन् की मुन्फ़सिल् शकल्] जिसमे ज़िहाफ़् खब्न् और् कफ़् लग् सकता है
 फ़ा इला तुन् [2 12 2] + शकल्  = फ़ इला तु [1 12 1] यानी  ज़िहाफ़् ख़ब्न् के अमल् से फ़ा [सबब्-ए-ख़फ़ीफ़् का अलिफ़्] और् ज़िहाफ़् कफ़् की अमल् से सातवें मुक़ाम पर् सबब्-ए-ख़फ़ीफ़् का -न्- को गिरा दिया ,बाक़ी बचा -फ़् इला तु [ 1 12 1]
मुस् तफ़्’अ लुन् [ 2 21 2] +शकल् = मु तफ़्’अ लु [ 1 21 1] यानी ज़िहाफ़् ख़ब्न् से मुस् का -स्-[जो दूसरे मुक़ाम् पर् है  और् ज़िहाफ़् कफ़् लुन् का -न्- [जो सातवें मुक़ाम् पर् है] गिरा दिया तो बाक़ी बचा  मु तफ़्’अ लु [ 121 1] जिसे मफ़ाइलु [12 11] [एन् -ब हरकत्] दे बदल लिया

ज़िहाफ़ ख़रब : यह ज़िहाफ़ दो ज़िहाफ़ -ख़रम+कफ़्फ़ के संयोग से बना है -और मुज़ाहिफ़ को ’अख़रब’ कहते है हम जानते हैं कि ’ख़रम’  वतद [ वतद-ए-मज्मुआ ] पर लगता है और इस का काम है वतद के सर को क़लम करना यानी गिराना और ’कफ़’ का काम है सातवें मक़ाम पर जो सबब-ए-ख़फ़ीफ़ का साकिन है गिराना । और यह तभी मुमकिन है जब रुक्न -वतद [3] +सबब[2]- सबब[2] से बना हो । और 8-सालिम रुक्न में से मात्र 1-रुक्न ही ऐसा है जिसमे यह निज़ाम पाया जाता है
और वह  है----मुफ़ा ई लुन [12 2 2] =वतद+सबब+सबब
मुफ़ा ई लुन [12 2 2 + खरब   =  फ़ा ई लु [2 2 1] यानी मुफ़ा जो वतद-ए-मज्मुआ है का सर ’मु’ [मीम] का ख़रम कर दिया  तो बचा ’फ़ा’ और सातवें  मुक़ाम पर सबब-ए-ख़फ़ीफ़ का  नून साकिन है गिरा दिया तो बाक़ी बचा ई लु [यानी लाम  मय हरकत]
तो हासिल हुआ ’फ़ा ई लु [2 2 1] इसे रुक्न मफ़ऊलु [2 2 1] से  बदल लिया यह् ज़िहाफ़् शे’र् के सदर् और् इब्तिदा के मुक़ाम् पर लगते हैं

ज़िहाफ़ सरम : यह भी एक मुरक़्क़ब [मिश्रित] ज़िहाफ़ है जो दो मुफ़र्द ज़िहाफ़ [एकल] सलम+ क़ब्ज़ से मिल कर बना है ।मुज़ाहिफ़ को ’असरम’कहते हैं। [ वतद मज्मुआ] के सर-ए-वतद को गिराना यानी ख़रम करना ही ’फ़ऊलुन; के केस में सलम कहलाता है और सबब-ए-खफ़ीफ़ के पाँचवें मुक़ाम से हर्फ़-ए-साकिन को गिराना क़ब्ज़ कहलाता । यह स्थिति तभी बन सकती है जब रुक्न में -वतद-ए-मज्मुआ[3]+ सबब-ए-ख़फ़ीफ़ [2] से बना है  और 8-सालिम रुक्न में से 1-ही रुक्न ऐसा है जिसमें यह निज़ाम है और वह है ’फ़ऊलुन’
फ़ऊलुन् [12 2 ]+ सरम् = ऊ लु [21] यानी ख़रम् के अमल् से -मफ़ा [12] वतद् मज्नुआ का ’फ़े’ और् क़ब्ज़् के अमल् से पाँचवें मुक़ाम् पर् का साकिन् -नून्-[न्] गिरा दिया तो बाक़ी बचा -ऊलु [लाम् मय् हरकत्] जिसे रुक्न् -फ़’अ लु [लाम् मय् हरकत्] से बदल् लिया । यह् ज़िहाफ़् शे’र् के सदर् और् इब्तिदा के मुक़ाम् पर लगते हैं

इस सिलसिले के  बाक़ी ज़िहाफ़ात की चर्चा  अगली क़िस्त में करेंगे....

--इस मंच पर और भी कई साहिब-ए-आलिम मौज़ूद हैं उनसे मेरी दस्तबस्ता [ हाथ जोड़ कर] गुज़ारिश है कि अगर कहीं कोई ग़लत बयानी या ग़लत ख़यालबन्दी  हो गई हो तो निशान्दिही ज़रूर फ़र्मायें ताकि मैं ख़ुद को  दुरुस्त कर सकूं ।बा करम मेरी मज़ीद [अतिरिक्त] रहनुमाई फ़र्माये ।मम्नून-ओ-शुक्रगुज़ार रहूँगा।

अभी नस्र के कुछ बयां और भी हैं..........
ज़िहाफ़ात् के कुछ निशां और भी हैं.....


[नोट् :- पिछले अक़सात के आलेख आप मेरे ब्लाग पर  भी देख सकते हैं 

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-आनन्द.पाठक-
0880092 7181