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बुधवार, 26 सितंबर 2018

केवल पल ही सत्य है

हर पल
कहता है कुछ
फुसफुसा कर
मेरे कानों में

मैं जा रहा हूँ
जी लो मुझे
चला गया तो
फिर लौट न पाऊंगा

बन जाऊंगा इतिहास
करोगे मुझे याद
मेरी याद में
कर दोगे फिर एक पल बर्बाद

इसलिए हर पल को जियो
उठो सीखो जीना
अतीत के लिए क्या रोना
भविष्य से क्या डरना

यह जो पल वर्तमान है
है वही परम सत्य
बाकी सब असत्य
यही कहता है हर पल
फुसफुसा कर मेरे कानों में ।
अभिलाषा चौहान 

मंगलवार, 25 सितंबर 2018

अस्तित्व

क्या यही संसार है?
क्या यही जीवन है?

झुठलाना चाहती हूं
इस सत्य को
पाना चाहती हूं
उस छल को

जो भटका देता है
छोटी सी नौका को
इस विस्तृत जलराशि में
डूब जाती है नौका
खो देती है अपना
अस्तित्व......!

भुला देता है संसार
उस छोटी सी नौका को
जिसने न जाने कितनों
को किनारा दिखाया !
सब कुछ खोकर भी
उस नौका ने क्या पाया?


अभिलाषा चौहान

शनिवार, 22 सितंबर 2018

एक ग़ज़ल : कौन बेदाग़ है---

एक ग़ज़ल

कौन बेदाग़ है  दाग़-ए- दामन नहीं ?
जिन्दगी में जिसे कोई उलझन नहीं ?

हर जगह पे हूँ मैं उसकी ज़ेर-ए-नज़र
मैं छुपूँ तो कहाँ ? कोई चिलमन नहीं

वो गले क्या मिले लूट कर चल दिए
लोग अपने ही थे कोई दुश्मन नहीं

घर जलाते हो तुम ग़ैर का शौक़ से
क्यों जलाते हो अपना नशेमन नहीं ?

बात आकर रुकी बस इसी बात पर
कौन रहजन है या कौन रहजन नहीं

सारी दुनिया ग़लत आ रही है नज़र
साफ़ तेरा ही मन का है दरपन नहीं

इस चमन को अब ’आनन’ ये क्या हो गया
अब वो ख़ुशबू नहीं ,रंग-ए-गुलशन नहीं

-आनन्द.पाठक--

शनिवार, 15 सितंबर 2018

चन्द माहिया : क़िस्त 54

चन्द माहिया  :क़िस्त 54

:1:
ये कैसी माया है
तन तो है जग में
मन तुझ में समाया है

:2:
जब  तेरे दर आया
हर चेहरा मुझ को
मासूम नज़र आया

:3:
ये कैसा रिश्ता है
देखा कब उसको
दिल रमता रहता है

:4:
बेचैन बहुत है दिल
कब तक मैं तड़पूं
बस अब तो आकर मिल

:5:
यादें कुछ सावन की
तुम न आए जो
बस एक व्यथा मन की

-आनन्द.पाठक-

चिड़िया: क्षितिज

चिड़िया: क्षितिज: जहाँ मिल रहे गगन धरा मैं वहीं तुमसे मिलूँगी, अब यही तुम जान लेना राह एकाकी चलूँगी । ना कहूँगी फ़िर कभी कि तुम बढ़ाओ हाथ अपना, ...

"हिन्दी" (अतुल बालाघाटी)

दया सभ्यता प्रेम समाहित जिसके बावन बरनों में
शरणागत होती भाषाएं जिसके पावन चरनों में

जिसने दो सौ साल सही है अंग्रेजों की दमनाई
धीरज फिर भी धारे रक्खा त्याग नहीं दी गुरताई

तुमको अब तक भान नहीं है हिन्दी की करूणाई का
जिसने सबको गले लगाया ममतारूपी माई का

लेकिन बातें चल निकली है नाहक हिन्दी भाषा है
मूरख और अचेतन जन की बोझिल सी परिभाषा है

किस भाषा में सहनशीलता है इतनी यह बतलाओ
सिद्ध करो उस भाषा को तुम या हिन्दी को अपनाओ

शनिवार, 8 सितंबर 2018

एक ग़ज़ल : झूठ का जब धुआँ-----

एक ग़ज़ल :

झूठ का जब धुआँ ये घना हो गया
सच  यहाँ बोलना अब मना हो गया

आईना को ही फ़र्ज़ी बताने लगे
आइना से कभी सामना हो गया

रहबरी भी तिजारत हुई आजकल
जिसका मक़सद ही बस लूटना हो गया

जिसको देखा नहीं जिसको जाना नहीं
क्या कहें ,दिल उसी पे फ़ना हो गया

रफ़्ता रफ़्ता वो जब याद आने लगे
बेख़ुदी में ख़ुदी  भूलना हो गया

रंग चेहरे का ’आनन’ उड़ा किसलिए ?
ख़ुद का ख़ुद से कहीं सामना हो गया ?

-आनन्द.पाठक-