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शनिवार, 24 सितंबर 2022

एक हास्य व्यंग्य : टाइम-पास

एक हास्य-व्यंग्य : टाइम-पास

 "टाइम पास" की शुद्ध हिंदी क्या होती है, पता नहीं। "गूगल बाबा" से भी पूछा तो उन्होने कुछ खास बताया नहीं।
केजरीवाल साहब शायद कुछ बता सकें काफी अनुभव है उनको इसमें। शायद झख मारना होता होगा । ख़ैर।

 टाइम-पास होती बड़ी मज़ेदार चीज़ है। शाश्वत है अमूर्त है अमर है। हर काल में अस्तित्व रहा है। इतिहास गवाह है।
राजा-महाराजा भी टाइम पास करते थे -कभी रंग महल में ,कभी चारण के साथ कभी -भाट-दरबारियॊं के साथ। कुछ टाइम बचा तो
तो फ़ालतू की 1-2 लड़ाई लड़ कर टाइम पास करते थे। यह प्रथा आज भी है। यूक्रेन है-रूस है। चीन अभी सोच रहा है।
विपक्ष वाले हर चुनाव के पहले एकता एकता कर के टाइम पास करते हैं ।हासिल कुछ नहीं होता।
 नवाबी काल में कुछ कनकौए उड़ा उड़ा कर, कुछ मुर्गे-तीतर-बटेर लड़ा लड़ा कर टाइम पास करते थे। कुछ नवाबज़ादों को 1-2 बटेर हाथ लग 
भी जाती थी । ।प्रेमचन्द जी के शतरंज के के खिलाड़ी’ को ही देख लें- मिर्ज़ा साहब गवाह है। बैठक खाने में जगह न मिली तो गोमती 
के किनारे खंडर में ही बैठ कर टाइम-पास किया करते थे। नवाब वाज़िद अली शाह की गिरफ़्तारी भी, उनके टाइम-पास में खलल न डाल सकी
 सल्तनत क्या चीज़ है टाइम पास वालों के सामने। आज भी ज़िन्दा है यह कला । न्यूज चैनल पर टी0वी0 पर हर शाम दंगल में, हुंकार में ताल-ठोंक के, की शकल में,
जिसको देख देख कर आप भी यह सुख प्राप्त कर सकते है। इसीलिए मैं कहता हूँ टाइम-पास करना एक कला है ,शाश्वत है। अमूर्त है। अमर है।

 मुझ से अच्छा टाइम पास कौन कर सकता है। बचपन में चन्दा मामा पढ़ पढ़ कर टाइम-पास करता था। उस ज़माने में ’कार्टून चैनेल’नहीं हुआ करते थे। बड़ा हुआ तो एक "सेकेंड हैंड’-साइकिल ले कर "उसकी" गली का चक्कर लगा लगा कर टाइम-पास करता था
नतीज़ा यह हुआ कि मैं हाई स्कूल में फेल हो गया और ’वो’ किसी ’ एम्बेसडर वाले के साथ निकल ली। उस ज़माने में ’एम्बेसडर’ और फ़ियेट ही हुआ करता था। आज का वक़्त होता तो ’वो’किसी ’मर्सीडिज’ वाले का साथ निकल लेती और मैं हाइ-स्कूल में फ़ेल हो कर भी किसी प्रदेश का उप-मुख्य मंत्री या मंत्री बना होता। 

खैर वक़्त की अपनी रफ़्तार होती है।आज गगनचुम्बी वाली फ़्लैट और टावर-हाइट के ज़माने में इस सुख से वंचित हो गया। अब चक्कर लगाने का मौक़ा ही नहीं
मिलता और अगर मिला भी तो डर यही रहेगा कि मेरा संदेश किसी और माले पर रहने वाली को न चला जाए । उसे कैसे मालूम चलेगा कि 
चालीस माले की बिल्डिंग मे किस माले वाली का चक्कर लगा रहा हूं~?

 सरकारी नौकरी में टाइम-पास करने की कोई कमी नहीं थी। जितना चाहो -उतना । जब टाइम-पास करते करते मन उकता जाता था ,जी भर जा्ता था तो 1-2 सरकारी काम भी निपटा देता था टाइम-पास के लिए। विभाग में मेरे एक साथी थे। मैं उनका चेला था । कहते थे--बने रहॊ पगला -काम करेगा अगला।
सो इसी मूल मंत्र से निष्ठापूर्वक टाइम पास करते करते मैं भी रिटायर भी हो गया वह भी रिटायर हो गए। टाइम-पास करने वालों को टाइम की कमी नही रहती। मगर पूछने पर यही कहते हैं---यार मेरे पास टाइम नही है अभी।
 
 रिटायरोपरान्त, सुबह सुबह उठ कर अपने ’मोबाइळ देव’ को प्रणाम करता हूँ। बिस्तर पर लेटे लेटे ही गुड-नाइट -गुड मार्निंग-वाला मेसेज पड़ता हूँ
पिछली रात मेरे द्वारा लिखे गए ’वन-लाइनर’ सूक्ति वाक्य पर .मेरे "डी0 पी0 पर. मेरे फ़ेसबुक की स्टोरी पर, मेरे ह्वाट्स अप स्टैटस पर कितने लाइक मिले
कितनी टिप्पणियाँ आईं-गिनता हूँ, ह्वाट्स पर आये अयाचित ’उपदेशों को’ , सूक्ति वाक्यॊ को पढ़ता हूँ-तब जाकर कहीं अँगड़ाई लेता हूँ। कमाल यह कि हर बार वही उपदेश हज़ारों बार अग्रसरित [फ़ारवर्ड] किए हुए होते हैं -मगर सब नया नया -सा लगता है।
फ़िराक़ गोरखपुरी साहब ने कहा भी -

हज़ार बार ज़माना इधर से गुज़रा है
नई नई सी है तेरी रहगुज़र फिर भी

जब कि फ़िराक़ साहब के ज़माने में ह्वाटस अप नहीं था -मगर उनकी दृष्टि बहुत दूर तक की थी --ह्वाट्स अप तक थी।
फिर नहा-धो कर पूजा पाठ कर चंदन-टीका लगा कर अपनी गद्दी पर बैठता हूँ -बड़ी मुहब्बत से ,शिद्दत से उन तमाम संदेशों का जवाब देता हूँ। कभी बर्थ-डे का . कभी मैरेज-डे का , कभी RIP भी कर देता हूँ। और यह सब करते करते दो-पहर हो जाता है कि श्रीमती जी का ह्वाट्स अप मेसेज आता है -- अगर उन ’मेसेंन्जड़ियॊ से फ़ुरसत मिल गई हो तो लंच रख दिया है खा लेना।
उन्होने शायद ’मेसेन्जड़ियॊ; का तुक ’गजेड़ियों’-नशेड़ियों-गजेड़ियो से मिलाया होगा।अरे श्रीमती जी किसकी हैं !इतनी तुकबन्दी तो मेरी सुहबत से आ ही गई होगी।
 वैसे इन सब महानुभावों में कोई ख़ास फ़र्क होता भी नहीं।

 टाइम पास करने के सबके अपने अपने तरीके हैं। कवि का तरीका अलग--शायर का तरीका अलग ।कवयित्रियॊ का तरीका अलग। रिटायरियॊ का तरीका अलग कविता चोरो का तरीका अलग। नेताओं का तरीका अलग। कुछ तो फ़्री बिजली, फ़्री पानी, फ़्री राशन की घोषणा कर के टाइम पास करते हैं। कुछ मुफ़्त की ’रेवड़ी" बाँट बाँट कर टैम-पास करते हैं।
 कवयित्रियाँ टाइम पास नहीं करती। उन्हे टाइम ही नहीं मिलता ’ब्यूटी पार्लर’ से। कवि ही टाइम-पास करते हैं कवयित्रियों के साथ। बहन जी यह बहन जी वह। और मैं ’कवि’ नहीं हूँ। 
 सबसे खतरनाक ढंग से टाइम पास कवि/शायर करता है। अगर आप फँस गए तो समझिए वह अपनी गीत-ग़ज़ल सुना सुना कर आप की जान ले लेगा और आप ने वाह वाह नहीं किया तो आप की 
बखिया उधेड़ कर-कि आप ने कहाँ कहाँ से कौन कौन सी कविता चोरी कर मंच से पढ़ी है--।

एक बार ऐसे ही फँस गया । बहुत दिन हो गए थे। सोचा फोन कर भाई जी का हालचाल ले लूँ।
प्रणाम भाई जी-मैने फोन किया।
-अहा! सौभाग्य मेरा। आप जैसे श्रीमन के आप के स्मरण मात्र से इस अकिंचन का मन पल्लवित , पुष्पित प्रफुल्लित हो गया--’
[ लगता है वह श्रीमान जी उधर हिंदी का शब्दकोश खोल कर बैठे है।]
-श्री मान जी --अभी अभी एक ग़ज़ल हुई है --ज़रा सुनिएगा -अपनी बहुमूल्य राय बताइएगा। इस ग़ज़ल की विशेषता यह है कि मैने ऐसा रदीफ़ और क़ाफ़िया बाँधा है कि मियाँ ग़ालिब भी ऐसा रदीफ़ बाँधने से पहले दो बार सोचते----अच्छा अब यह दूसरी ग़ज़ल सुनिएगा श्रीमन - नए रंग की ग़ज़ल है--अभी तक किसी शायर ने इस रंग में ग़ज़ल नहीं कही है ---वाह वाह -- क्या ग़ज़ल कही मैने ---यह मेरा लघु और विनम्र प्रयास है---अरे हाँ यह ग़ज़ल सुनाना तो भूल ही गया जब मैं सब्ज़ी लाने बाज़ार जा रहा था --रिक्शे पर बैठे बैठे यह ग़ज़ल हो गई--इस ग़ज़ल पर तो मुझे इस सप्ताह का पुरस्कार भी मिला --- टैग करता हूँ आप को--और यह गीत ---अहा क्या गीत लिखा मैने--हॄदय निचोड़ कर रख दिया समझिए यह गीत नहीं जिगर का टुकड़ा है लहू से लिखा हो मानो--।
भाई जी--यह दोहा तो आप को सुनाना भूल ही गया ---जिस पर मुझे ’दोहा-शिरोमणि’ पुरस्कार मिला है कल ही---अच्छा चलते चलते एक ’हाइकू’
भी सुन लें --मैने पहली बार इसमे एक नया प्रयोग किया है कि बिना किसी सार्थक भाव के भी हाइकू लिखा जा सकता है। बस एक आख़िरी और-----

उन्होने एक और--एक और कहते कहते पूरे एक घंटे अपनी 3-4 ग़ज़ले--1-2 गीत., 3-4 दोहे 3-4 हाइकू सुना कर ही दम लिया। मैं ’सेरीडान’ की टैबलेट खोजने लगा। फोन पर अपनी चरण-’पादुका’ ढूंढने का कोई अर्थ नहीं था सो फोन काटने की गरज़ से मैने कहा- 
- ’सर! एक शे’र मेरा भी सुन लें’
’हाँ हाँ , अवश्य अवश्य। इस अकिंचन का सौभाग्य होगा कि आप जैसे महान कवि के मुखारविन्द से कोई शे’र सुन रहा हूँ--जी सुनाइए-स्वागत 
मैने सुनाया

 वह क़ैद हो गया है अना के मकान में
 खुद ही क़सीदा पढ़ने लगा खुद की शान में

’तुम जलते हो मेरी लोकप्रियता से’ सम्मान से -कह कर उन्होने फोन काट दिया।

मैं तब से सोच रहा हूँ कि भाई साहब ’टाइम-पास’ कर रहे थे या ’आत्म-श्लाघा’ के ’बाथरूम-टब’ में छपछपा रहे थे या क़ाफ़िया मिला रहे थे।

अस्तु

-आनन्द.पाठक-

शुक्रवार, 23 सितंबर 2022

नोरा और वो

 एक दशक पहले यूरोप से अफ्रीका जब मेरा आना हुआ तो रुई के फाहे की तरह गिरते बर्फ की जगह यहाँ की ठंडी पुरवाई मेरे मन को लुभाती चली गयी मन हज़ार तरह की आशंकाओं से घिरा था l यूरोप का अत्याधुनिक माहोल और यहाँ के लोग प्रकृति पर पूरी तरह निर्भर l एअरपोर्ट से बाहर आते ही कुछ दूर आने पर शांत समुन्दर जिसमे कोई भी हलचल नही ,जिसके समुन्दर होने पर मुझे यकीं तो नही हुआ लेकिन मेरे मन में एक खूबसूरत एहसास की तरह ठहर गया l मन तुलनात्मक दृष्टिकोण से हर चीज़ को देख रहा था कभी कोई चीज़ मन में बैठती कोई सिरे से खारिज करती l रास्ते में बड़े बड़े बिभिन्न भांति के पेड़ों से घिरे जंगलों में झांकते आम के बड़े बड़े वृक्ष आश्चर्य से मन को भर रहे थे l आम भी अलग अलग तरह के दिख रहे थे मन कौतुहल से भर उठा और ड्राइवर से पूछा की यह आम का ही पेड़ है या किसी और का ? डाइवर ने स्पष्टिकरन करते हुए एक पेड़ की देखते हुए गाड़ी को किनारे में park कर दी और गाड़ी से उतर कर आम तोड़ के ले आया l आम को हाथ में ले कर मन इतना प्रफुल्लित हुआ कि जैसे किसी अपने बिछड़े परिजन से मिल रही हूँ l यूरोप में 5 यूरो का एक आम और यहाँ जंगल ...कैसा विरोधाभास है प्रकृति पर यह दृश्य प्रत्यक्ष दिख रहा था वास्तव में यूरोप में पेड़ों के नीचे बिछे सेव भी उतना मन को प्रफुल्लित नही कर सके थे जितना अपने देश के फलों के राजा आम ने किया l यूरोप की चकाचौंध पर नैसर्गिक दृश्य हावी होने लगे थे l रास्ते भर ड्राइवर से यहाँ के भाषा और परिवेश की बातें सुनते सुनते 2 घंटे का सफर कैसे कट गया पता ही नही चला और हम अपने रिसोर्ट में आ गये l अब कुछ महीनो का अस्थायी आवास यही था और यहाँ रहते हुए अलग अलग तरह के लोगों से मिलते सुनते यहाँ की संस्कृति काफी करीब से देखने को और समझने को मिलने लगी l यहां के लोगों में भारत और भारतीय सिनेमा के प्रति सम्मान और दीवानगी , फ़िल्मी गानों को गाकर भारतीओं को रिझाने की कोशिशें कभी कभी बड़ी दिलकश भी लगती हैं l इसी बीच इक समारोह में जाने का अवसर मिला जिसमे हम शामिल भी हुए l कई तरह के लोगों से मेल मिलाप भी हुआ l समारोह में नोरा नाम की एक लड़की से भी मुलाक़ात हुई l नोरा सुन्दर मिलनसार व्यक्तित्व की स्वामिनी थी l बातों ही बातो में पता चला की उसे जानवरों से बेहद लगाव है और उसने एक अजगर पाल रखा है और वह उसके साथ सोता खेलता भी है l सुनकर मैं तो एक अनजाने भय से काँप उठी और उससे पूछ बैठी तुम्हे डर नही लगता ?

नोरा कहने लगी वह बहुत प्यारा है और अभी तो बच्चा है घर में इधर उधर घूमता है कभी कभी मैं नींद में रहती हूँ तो बिस्तर में मेरे आ जाता है और मुझ से लिपट जाता है l मुझे बड़ी हैरानी हुई अभी तो अपने देश में गाय भैंस घोडा खरगोश और कुत्ते ही पालतू पशु के रूप में देखा था और मैं उनसे भी डर जाती थी ये कहाँ मैं घने जंगल में आ गयी और ये महारानी तो मुझे मॉडर्न दिख तो रही है पर है अन्दर से भयंकर जंगली l नोरा के लिए उस अजगर से सुन्दर प्यारा और दिल के करीब जितना था उतना तो कोई नही लग रहा था और जब तक साथ थी सिर्फ उसी की बातें ,मुझे ऊब सी लगने लगी थी l किसी तरह हम वहां से निकल अपने रिसोर्ट आ गये l हालाकि रिसोर्ट में भी शुतुरमुर्ग मोर रंग बिरंगे तोते जैसे मन मोहने वाले कुछ जानवर थे l शाम हमारी इन्ही को आस पास घूमते देखते बीत जाती l धीरे-धीरे हम भी यहाँ के माहोल से परिचित हो चुके थे और हमारे अपने आवास में शिफ्ट होने का समय भी नजदीक आ रहा था l लगभग तीन-चार महीने रहने के उपरांत हम अपने आवास में पहुच गये l नोरा भी उसी कैंपस में ही थी लिहाजा अक्सर मुलाक़ात होने लगी और उसके पालतू जानवर की बातें जो मुझे अन्दर से एक डर ही महसूस करवाती उससे सुनती रही l एक दिन मैं अपने बेटे को स्कूल से लेने जा रही थी कि नोरा मिल गयी पूछने पर पता चला कि हॉस्पिटल जा रही है उसका पालतू हफ्ते भर से खाना नही खा रहा है और अक्सर उससे कुछ ज्यादा ही लिपट रहा है l नोरा को उसके भूखे रहने से उसके मर जाने की आशंका ने घेर रखा था l खैर नोरा उसको लेकर जब डॉक्टर के पास पहुची तो डॉक्टर ने गहन जांच की जिसमे कुछ न पाया l डॉक्टर का अब अगला सवाल नोरा से था 'क्या यह आपको लिपटता है ?' नोरा ने बड़ी खुशी से जबाब हाँ में दिया और यह भी बताया की कभी कभी इतनी जोर से लिपटा रहता है कि उससे छुड़ाना भी थोडा मुश्किल होता है l डॉक्टर चुपचाप सुनते रहे ,नोरा की सारी बातें सुनने के बाद एक गहरी साँस लेते हुए डॉक्टर ने कहा ,''यह आपको निगलना चाहता है और जब आप से लिपटता है तो आपसे लाड प्यार में नही बल्कि आपकी माप लेता है कि आपको निगलने के लिए उसके पेट में कितनी जगह होनी चाहिए और अब यह बड़ा हो गया है तो अपनी पेट में जगह बना रहा है भूखे रह कर '' यह सुनकर नोरा के होश उड़ गये उसे समझ ही नही आया की करे तो क्या करे ,जिसे वो इतना लाड प्यार दे रही है वही उसकी मौत है और मौत भला किसको प्यारी लगती है l नोरा हास्पिटल से सीधे जंगल की ओर चली गयी और उसे ले जाकर जंगल के बाहर छोड़ आई पर उसके मन में डर ने घर कर लिया, उसने किसी भी जानवर को पालतू न रखने की कसम खा ली और मैंने राहत की साँस क्युकि अब मुझे उसके खतरनाक पालतू के बारे में नही सुनना पड़ेगा और जिसकी वजह से मैं उसके घर में भी पैर रखने से डरती थी आसानी से आ जा सकुंगी
~Shweta Misra

गुरुवार, 15 सितंबर 2022

एक कविता

 कविता


फूल बन कर कहीं खिले होते
जनाब ! हँस कर कभी मिले होते
किसी की आँख के आँसू
बन कर बहे होते
पता चलता
यह भी ख़ुदा की बन्दगी है
क्या चीज़ होती ज़िन्दगी है ।


आप को फ़ुरसत कहाँ
साज़िशों का ताना-बाना
बस्ती बस्ती आग लगाना
थोथे नारों से
ख्वाब दिखाना।
सब चुनाव की तैयारी है
दिल्ली की कुर्सी प्यारी है।


-आनन्द.पाठक-

शनिवार, 10 सितंबर 2022

एक व्यंग्य : टैग करने वालो से

 एक व्यंग्य : ---’टैग करने वालों से’

रेडियो पर गाना बज रहा है। झूठ। आइपैड, आइपोड के ज़माने में रेडियॊ।

अच्छा, तो मोबाइल पर गाना बज रहा है--

"अल्लाह बचाए नौज़वानो से ,

-- ---  ---

 तौबा है ऐसे इन्सानों से ,

   अल्लाह बचाए----"

और इधर मैं गा रहा था--


बाते हैं मीठी मीठी , रचना है फीकी फीकी।

कहता हूँ मै सीधे सीधे, कविताएँ उल्टी-पुल्टी  

अल्लाह बचाए ’टैग वालों ’ से । अल्लाह !

अल्लाह बचाए---


गाना जो भी हो, दर्द एक -सा है। फ़र्क इतना है कि वो गा रही हैं मैं गा रहा हूँ। वह मनचले नौज़वानो से परेशान है

मैं ज्ञानी टैग वालों से ।

"टैग करना" क्या होता है? "शो-रूम" पीढ़ी वाले फ़ेसबुकिया नौज़वान अच्छी तरह जानते होंगे ,

और जो "म्यूजियम मैटिरल" वाले लोग है,[जैसे मैं ], तो उन्हे स्पष्ट कर दूँ कि यह एक मानसिक बीमारी है

जिसमे आप अपनी रचना को श्रेष्ठ मानते है और-  मान न मान मैं तेरा मेहमान- वाली शैली में।-

अपने फ़ेसबुकिया मित्रों के ’वाल ’ पर चेंप देते हैं।। यह एक घातक बीमारी तो नहीं, पातक बीमारी ज़रूर है ।

 इस बीमारी मेंआदमी ’विक्षिप्त’ भी हो सकता है। तब उसे होश नहीं रहता कि वो किसी के गाल पर "टैग’

कर रहा है कि किसी के सर पर ’टैप’ कर रहा है। 

 इस बीमारी हर वक़्त फ़ेसबुक चेक करते रहना अच्छा लगता है। कितने लाइक आए--कितने कमेन्ट मिले -

-कितने वाह वाह हुए। कितनो ने मुझे ख़िताब दिया। रात में सोते हुए भी अपनी रचना का ’लाइक’ गिनता है 

और कमेन्ट पढ़ता है, आल्हादित होता है।

चिकित्सा शास्त्र में इसे ’ फ़ेसबुखेरिया" कहते हैं--मलेरिया --फ़ाइलेरिया --लभेरिया-- की तर्ज़ पर। 

। यह अपने अनुभव से कह रहा हूँ-फ़ेस बुखेरिया-का अनुभव। इस रोग में ’भूख’ नही लगती ।


 -कल एक सज्जन फ़ेसबुक पर विलाप करते हुए मिल गए। उनके कई मित्र है जो उनके ’वाल’ पर[गाल पर नहीं] हर रोज़ 

2-4-10 रचनाएँ टैग कर देते हैं। कचरा फ़ैला देते है। और भाई साहब हैं कि रोज़ सुबह सुबह झाड़ू लेकर अपना ’वाल साफ़’ करते हैं

 और मनोच्चरित गाली भी देते हैं, उन टैग वालो को जो यहाँ उल्लेख करने योग्य भी नहीं। मैने सलाह दिया कि भाई साहब! उन सबको 

"ब्लाक’ क्यों नहीं कर देते। { पाठको को मैं ज़रा स्पष्ट कर दूँ कि कुछ महिला-कवयित्रियों  ने मुझे  ब्लाक कर रखा है ,मगर वह "टैग" के कारण नहीं।]

भाई साहब कहने लगे- पाठक जी! शरीफ़ आदमी हूँ ,शराफ़त में मारा जाता हूँ। अगर उनको  नहीं है अपनी तो है । 


फ़ेसबुक पर हर दूसरा आदमी -कवि है .लेखक है, ग़ज़लकार है,साहित्यकार है, साहित्य के  एक्सपर्ट है।

वह बस लिखता रहता है निरन्तर, परन्तु पढ़ता नहीं । न अपना न किसी और का ।

 मैं भी ऐसे 2-4 ’टैग वालों ’से पीड़ित हूँ। कई बार मना किया, हाथ जोड़ा, माफ़ी माँगी ,करबद्ध प्रार्थना की। 

आप  के चरण किधर हैं, प्रभु-भी कई बार पूछा। मगर वह कहाँ माने।


 वो कब बाज़ है मुझे ’टैग’ कर के

 हमी थक गए है हटाते-हटाते

 

 कई बार कहा-भाई साहब माना कि आप , वरिष्ठ कवि है, गरिष्ठ कवि है, शिष्ट कवि हैं. राष्ट्रीय कवि है

अन्तर्राष्ट्रीय कवि है, अन्तरराष्ट्रीय कवि है, इस सदी के महान कवि हैं ,प्रथम कवि है, अन्तिम कवि हैं

हिंदी साहित्य के चाँद हैं सूरज हैं, मगर  मेरी आँख में उँगली डाल डाल कर यह सब क्यूँ बता रहे हैं?

जब सूरज आसमान पर चढ़ेगा तो देख लेंगे।


वो कहते हैं --भाई साहब! हम लोगों का मकसद इतना होता है कि आप देखे--मैं बड़ा हुआ तो कितना -- और तुम रह गए ठिगनामैं कहाँ से कहाँ चला आया और तुम ? मैं कितना सनद प्रमाण पत्र बटॊर लाया, और तुम? मैं कितना नारियल फ़ोड़ आया और तू[ अब वह तुम से तू पर आ गए-बड़े कवि हो गए ] मैं कितना साल ओढ़ आया और तू ?मैं कितना मुशायरा लूट आया और तूो।यह देख मेरी फोटो-"दद्दू" के साथ और तू । यह देख मेरी प्रोफ़ाइल --यह ’बुक’ मेरा देखो-- ये सूट मेरा देखो--ये बूट मेरा देखो --मैं हूँ शायर लंदन का।

खैर वह इन्ही सब  में मगन है। हिंदी की सेवा कर रहे हैं । हिंदी कृतार्थ हो रही है । हम आप कौन होते  है उन्हें टोकने वाले।

कविता कर के वह खुद न लसे

कविता लसी पा यह ’टैग ’ कला

टैग करने वालों की हालत तो यह है कि --

कल जिसे अपनी कविता सुना कर आया था

उसी के टैग का पत्थर मेरी तलाश में है ।


[ नूर जी से क्षमा याचना सहित]

लोग टैग इसलिए करते हैं कि हमे पता चलता रहे कि ’फ़ेसबुक ’पर आजकल हिंदी का दशा-दिशा क्या चल रही है।


[ नोट ; चलते चलते अपने "टैग करने वाले नौज़वान भाइयॊ से-क्षमा याचना सहित -

मजरूह सुल्तानपुरी साहब का शे’र है [शायद] -


जफ़ा के ज़िक्र पर तुम क्यों सँभल कर बैठ गए

तुम्हारी बात नहीं, बात है ज़माने  की ।


वैसे -जफ़ा करने और टैग करने में कोई फ़र्क नहीं --भाव बरोबर है ]

अच्छा । आज इतना ही। चलते हैं । अभी यह लेख "टैग’ करने जाना है ।

सादर


-आनन्द.पाठक-



मंगलवार, 6 सितंबर 2022

एक ग़ज़ल : उनसे हुआ है आज तलक

 एक ग़ज़ल


उनसे हुआ है आज तलक सामना नहीं
कोई ख़बर नहीं है कोई राबिता नहीं ।

दिल की ज़ुबान दिल ही समझता है ख़ूबतर,
तुमने सुना वही कि जो मैने कहा नहीं ।

दावा तमाम कर रहे हो इश्क़ का मगर,
लेकिन तुम्हारे इश्क़ में हर्फ़-ए-वफ़ा नहीं ।

आती नहीं नज़र मुझे ऐसी तो कोई शै ,
जिसमें तुम्हारे हुस्न का जादू दिखा नहीं ।

वो हमनवा है, यार है, सुनता हूँ आजकल ,
वो मुझसे बेनियाज़ है लेकिन ख़फ़ा नहीं ।

वह राह कौन सी है जो आसान हो यहाँ,
इस दिल ने राह-ए-इश्क़ में क्या क्या सहा नहीं।

लोगो की बात को न सुना कीजिए हुज़ूर !
’कहना है उनका काम, मैं दिल का बुरा नहीं ।

जो भी सुना है तुमने किसी और से सुना
’आनन’ खुली किताब है तुमने पढ़ा नहीं ।

-आनन्द.पाठक -
शब्दार्थ
राबिता =राब्ता = सम्पर्क
शै = चीज़
हमनवा‘ = समान राय वाला
बेनियाज़ = बेपरवा

शुक्रवार, 2 सितंबर 2022

एक गजल

एक ग़ज़ल 

हर बार अपनी पीठ स्वयं थपथपा रहे
’कट्टर इमानदार हैं-खुद को बता रहे

दावे तमाम खोखले हैं ,जानते सभी
क्यों लोग बाग उनके छलावे में आ रहे?

झूठा था इन्क़लाब, कि सत्ता की भूख थी
कुर्सी मिली तो बाद अँगूठा  दिखा रहे

उतरे हैं आसमान से सीधे ज़मीन पर
जो सामने दिखा उसे बौना बता रहे

वह बाँटता है ’रेवड़ी’ खुलकर चुनाव में
जो लोग मुफ़्तखोर हैं झाँसे मे आ रहे

वो माँगते सबूत हैं देते मगर न खुद
आरोप बिन सबूत के सब पर लगा रहे

वैसे बड़ी उमीद थी लोगों की ,आप से
अपना ज़मीर आप कहाँ बेच-खा रहे

’आनन’ वो तीसमार है इसमें तो शक नहीं
वो बार बार काठ की हंडी चढ़ा रहे ।

-आनन्द.पाठक-

बुधवार, 17 अगस्त 2022

एक ग़ज़ल


एक ग़ज़ल


नई जब राह पर तू चल तो नक़्श-ए-पा बना के चल,

क़दम हिम्मत से रखता चल, हमेशा सर उठा के चल ।



बहुत से लोग ऐसे हैं , जो काँटे ही बिछाते हैं ,

अगर मुमकिन हो जो तुझसे तो गुलशन को सजा के चल । 



डराते है तुझे वो बारहा बन क़ौम के ’लीडर’ ,

अगर ईमान है दिल में तो फिर नज़रें  मिला के चल ।



किसी का सर क़लम करना, सिखाता कौन है तुझको ?

अँधेरों से निकल कर आ, उजाले में तू आ के चल ।



तुझे ख़ुद सोचना होगा ग़लत क्या है सही क्या है ,

फ़रेबी रहनुमाओं से ज़रा दामन बचा के चल ।



न समझें है ,न समझेंगे , वो अन्धे बन गए क़स्दन ,

मशाल इन्सानियत की ले क़दम आगे बढ़ा के चल ।



सफ़र कितना भी हो मुशकिल, लगेगा ख़ुशनुमा ’आनन’

किसी को हमसफ़र, हमराज़ तो अपना बना के चल ।




-आनन्द.पाठक-


शब्दार्थ


क़स्दन = जानबूझ कर