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गुरुवार, 28 जुलाई 2016

आनंद मंत्रालय
मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री की पहल से प्रेरित हो कर एक अन्य राज्य के मुख्यमंत्री ने भी अपनी सरकार में ‘आनंद मंत्रालय’ बनाने का विचार किया.
वह झटपट अपने बड़े भाई के पास दौड़े. बड़े भाई जेल में बंद होते हुए भी पार्टी के अध्यक्ष थे, उन्हीं के आदेश पर मुख्यमंत्री सब निर्णय लेते थे. बड़े भाई ने सोच-विचार कहा की पत्नी (अर्थात बड़े भाई की पत्नी) से बात करो. पत्नी भारत सरकार में एक मंत्री के पद पर भी थीं.  लेकिन हर निर्णय वह अपने मामा की सलाह पर लेती थीं.
मामा बोले, अच्छा विचार है. बनवारी लाल बहुत परेशान रहते हैं, उन्हें मंत्री जो न बनाया था. यह मंत्रालय उन्हें सौंप दो.
बनवारी लाल जी मामा के चहेते थे पर बड़े भाई को फूटी आँख न सुहाते थे. मामा राजनीति के पुराने खिलाड़ी थे, जानते थे कि कम से कम बीस चुनाव क्षेत्रों में बनवारी लाल की पकड़ थी. साल भर में चुनाव होने वाले थे. कई पार्टियाँ बनवारी लाल को अपनी ओर खींच रहीं थीं. मुख्यमंत्री को बात जंच गयी. बनवारी लाल जी ‘आनंद मंत्री’ बन गए.
बड़े भइया ने सुना तो आग-बबुला हो गए. उधर बनवारी लाल भी अप्रसन्न थे. चुनाव सिर पर थे, साल भर ही मंत्री रह सकते थे. उन्हें पी डब्लू डी जैसा विभाग चाहिए था.  ‘आनंद मंत्री’ बन कर वह ‘कुछ’ न कर पायेंगे, इस बात का उन्हें अहसास था.
शाम कुमार को ‘आनंद मंत्रालय’ का सचिव नियुक्त किया गया. वह तीन वर्षों से बिना किसी कार्यभार के अपना समय काट रहे थे. न्यायलय ने आदेश दे रखा था कि उन्हें तुरंत किसी पद पर नियुक्त किया जाए. उनके बारे में प्रसिद्ध था कि कानून की हर किताब उन्होंने रट रखी थी. जिस भी मंत्री के पास उन्हें भेजा जाता था वह मंत्री चार दिनों में ही उनसे छुटकारा पाने को आतुर हो जाता था.
मंत्री जी के हर प्रस्ताव पर शाम कुमार मंत्री जी को बीसियों कायदे-कानून समझा देते थे. शांत चित भाव से वही करते थे जो उन्हें न्याय-संगत, तर्क-संगत, विधि-संगत, नियम-संगत और लोकोपकारी लगता था. मंत्री अपने बाल नोच लेते थे पर  शाम कुमार बड़े शांत स्वभाव से अपने काम में जुटे रहते थे. कोई भी मंत्री उन्हें उत्तेजित या क्षुब्द न कर पाया था.
शाम कुमार को अपने समक्ष पा कर बनवारी लाल के हाथ अपने सिर की ओर उठे. बहुत प्रयास के बाद ही वह अपने को अपने बाल नोचने से रोक पाए.
‘नया विभाग है, तुरंत नये कायदे-कानून बनाने होंगे, तभी तो हम राज्य के इन पीड़ित लोगों को आनंदित कर पायेंगे,’ शाम कुमार ने शांत लहजे में कहा.
‘कायदे-कानूनों की क्या कोई कमी हैं इस देश में जो आप को नए कानून बनाने की सूझ रही है? अगर लोगों के कष्टों को दूर करना है तो कुछ कायदे-कानून हटाने की सोचें. मिनिमम गवर्नेंस की बात करें,’ मंत्री ने थोड़ा खीज कर कहा.
‘कानून तो दूसरे विभागों के हटेंगे, हमारे विभाग के कानून तो बनाने होंगे. पहली बार यह विभाग बना है, कानून तो बनाने ही होंगे.............’
‘क्यों न हम अलग-अलग देश जाकर पता लगाएं कि वहां उन देशों में ऐसे मंत्रालय किस भांति चलते हैं, किस तरह वहां की सरकारें लोगों को आनन्द पहुंचातीं हैं?’ बनवारी लाल ने टोक कर कहा. वह दो बार मंत्री रह चुके थे लेकिन एक बार भी वह किसी विदेशी दौरे पर न जा पाए थे. कई नये-नये मंत्री तो दस-बीस देश घूम आये थे, परिवारों सहित. यह बात उन्हें बहुत खलती थी.
‘कुछ नये लोगों की भर्ती भी करनी होगी विभाग में,’ शाम कुमार अपनी धुन में बोले.
भर्ती की बात सुनते ही मंत्री के कान खड़े हो गये. बोले, ‘मेरी अनुमति के बिना एक भी आदमी भर्ती न हो.’
‘आप निश्चिंत रहें, इस विभाग में हर काम पूरी तरह नियमों के अनुसार ही होगा. भर्ती नियमों के अनुसार...............’ शाम कुमार भर्ती नियमों एक लम्बी व्याख्या करने लगे. अब बनवारी लाल अपने को रोक न पाये और अपने बाल नोचने लगे. मन ही मन वह मुख्यमंत्री को कोस रहे थे.

बनवारी लाल और शाम कुमार को देख कर तो नहीं लगता कि यह मंत्रालय लोगों को कभी को भी आनंदित कर पायेगा. फिर भी मुख्यमंत्री और उनके बड़े भाई की पत्नी के मामा आनंदित हैं, शायद आने वाले तूफ़ान का उन्हें अभी आभास नहीं.

रविवार, 15 मई 2016

गाय और वीवीआइपी
(कई वर्ष पुरानी बात है. मैं लोधी रोड पर स्थित एक मंदिर के भीतर था. मंदिर के निकट सड़क किनारे एक गाय बैठी थी. प्रधान मंत्री उसी समय उस रास्ते से जाने वाले थे. सुरक्षा का पूरा बंदोबस्त था. जीप में बैठे एक अधिकारी ने गाय को देखा. उसको बाद जो कुछ हुआ उससे प्रेरित हो कर यह रचना लिखी थी.)

मोहल्ले में गहमा-गहमी थी. और होती भी क्यों न? आखिर बात ही ऐसी थी. मोहल्ले में वीवीआइपी आने वाले थे.

हमारे मोहल्ले में एक स्कूल के अध्यापक  रहते हैं. अब तक बहुत कम लोगों को उनके होने का पता था. एक अध्यापक जैसे मामूली व्यक्ति का किसी दूसरे के जीवन में क्या महत्व हो सकता है? जिस देश में पैसा और सत्ता ही महानता के मापदंड हों वहां अध्यापक जैसा व्यक्ति किस गिनती में आता है.


इन्हीं अध्यापक की बेटी का विवाह था. अध्यापक जी ने वीवीआइपी को न्योता दिया था. वीवीआइपी ने न्योता स्वीकार कर लिया था.

वैसे इन अध्यापक का राजनीति से दूर-दूर तक का संबंध भी न था. न उन्होंने कभी किसी पार्टी को चंदा दिया था, न किसी राजनेता की चरण रज माथे पर लगाई थी. शायद ही किसी चुनाव में उन्होंने अपना मत डाला हो. परन्तु फिर भी उनकी बेटी के विवाह में वीवीआइपी आ रहे थे.

यह भाग्य की उठा पटक ही थी कि स्कूल के दिनों का उनका अभिन्न मित्र आज वीवीआइपी था. उन दिनों आज के वीवीआइपी आज के अध्यापक के पीछे-पीछे घूमा करते थे. हर छोटी-बड़ी समस्या के निधान हेतु अपने मित्र पर निर्भर थे. परीक्षा के समय तो उन की नैया मित्र (अर्थात आज के अध्यापक) के सहारे ही पार लगती थी.

आज अध्यापक जी के अभिन्न मित्र वीवीआइपी हैं; पर वीवीआइपी बनने के बाद भी वह अपने बचपन के मित्र को भूले नहीं हैं. अतः मित्र की बेटी के विवाह का निमन्त्रण सहर्ष  स्वीकार कर लिया. वैसे वीवीआइपी जी को इस बात का पूरा आभास था कि इस विवाह में सम्मिलित होकर अपनी छवि को वो जितना निखार पायेंगे उतना वह बीस सभाओं में भाग लेकर भी शायद न निखार पायें. निमन्त्रण स्वीकार हुआ और रातों रात अध्यापक मोहल्ले के वीवीआइपी बन गये.

वीवीआइपी आते उससे पहले कई पुलिस के अफसर आये, सुरक्षा कर्मी आये. सड़क पर लगी बत्तियां जो वर्षों से बंद थीं जलने लगीं, जिन नालियां की सफ़ाई वर्षों से न हुई थी उनकी सफ़ाई हुई. विवाह के पूर्व और पश्चात ऐसा बहुत कुछ हुआ, पर जिस घटना का उल्लेख मैं करना चाहता हूँ वह विवाह मंडप से कुछ दूर घटी थी.

वीवीआइपी के आने से पहले ही वधु के घर की ओर जाने  वाले रास्ते पर  सुरक्षा कर्मी तैनात हो गई थे. विवाह रात में था पर सुरक्षा कर्मी दुपहर बाद ही तैनात हो गये थे. अपने में बेहद उकताये हुए सुरक्षा कर्मी हर आने जाने वाले पर पैनी(?) नज़र रखे हुए थे. विवाह मंडप की ओर जाने वाली सड़क पर वाहन खड़ा करने की मनाई थी.  गुब्बारे वाले और ऐसे अन्य लोग जो विवाह मंडपों के बाहर अपनी रोज़ी-रोटी चलाते हैं, उन्हें तो मोहल्ले के निकट भी फटकने न दिया गया.

वीवीआइपी के आने में अधिक समय न था. एक सुरक्षा कर्मी की नज़र एक गाय पर पड़ी. गाय सड़क के किनारे निश्चिंत बैठी जुगाली कर रही थी. चारों ओर तैनात पुलिस और पुलिस के बंदोबस्त से वह पूरी तरह बेखबर थी. सुरक्षा कर्मी कुछ तय न कर पाया कि उसे क्या करना चाहिये. बेमन से उसने गाय को आवाज़ दी. गाय ने कोई प्रतिक्रिया व्यक्त न की. असमंजस में डूबा वह गाय के निकट आया और धीरे-धीरे उठ-उठबोल, गाय को उठाने का प्रयत्न करने लगा.

किसी ध्यान मग्न योगी की तरह गाय जुगाली करती रही. सुरक्षा कर्मी इधर-उधर देखता रहा. उसे कुछ समझ न आया कि उसे क्या करना चाहिये. झुंझला कर वह अपनी निश्चित जगह पर आकर खड़ा हो गया. वह धीमे-धीमे कुछ बुदबुदा रहा था और गाय को ऐसे देख रहा था जैसे गाय गाय न होकर एक ऐसी मुजरिम हो जो उसकी आँखों के सामने ही अपराध कर रही हो.

सारे प्रबंध का निरीक्षण करने के लिए एक अधिकारी अपनी जीप में चला आ रहा था. उसका आना इस बात का सूचक था कि वीवीआइपी बस आ ही रहे थे. अधिकारी अपने आप में पूरी तरह संतुष्ट था, उसके प्रबंध में कभी भी कोई कोताही न हुई थी. अचानक अधिकारी की नज़र गाय पर पड़ी. वह चौंका जैसे कोई भूत देख लिया हो, “हटाओ उसे, जल्दी हटाओ उसे.भोंपू पर वह ज़ोर से चिल्लाया.

आस पास खड़े सुरक्षा कर्मिओं की प्रतिक्रिया वैसी ही थी जैसी उस आदमी की होती है जो अनायास बिजली का नंगा तार छू लेता है. पाँच-सात सुरक्षा कर्मी गाय की ओर ऐसे दौड़े जैसे शिकारी कुत्ते अपने शिकार की ओर दौड़ते हैं. कुछ सिपाही  ज़ोर-ज़ोर से चिल्ला रहे थे, कुछ सीटी बजा रहे थे.

इस अप्रत्याशित आक्रमण से घबरा कर गाय एक झटके से उठी और सड़क के बीचों-बीच आ गई. पल भर को गाय निर्णय न कर पाई कि उसे किस ओर भागना चाहिये. तभी जीप में बैठे अधिकारी और अन्य सुरक्षा कर्मियों पर जैसे बिजली सी गिरी. गाय उस ओर ही भागने लगी जिस ओर से वीवीआइपी आने वाले थे.          

वीवीआइपी किसी भी क्षण आ सकते थे और गाय थी कि उसी ओर भागी जा रही थी. गाय के पीछे चार-पाँच सिपाही भाग रहे थे. जीप में बैठे अधिकारी को कुछ न सूझा तो उसने भी अपनी जीप उन सिपाहियों के पीछे भगा दी. गाय को अपने पद और अधिकार का अहसास दिलाने के लिए उसने जीप का सायरन भी बजाना शुरू कर दिया. भोंपू पर उसका चिल्लाना बंद न हुआ था.

लगभग सुनसान सड़क पर भागती एक गाय, उस गाय के पीछे भागते चार-पाँच सिपाही, उन सिपाहियों के पीछे दौड़ती, सायरन बजाती जीप,  जीप में बैठे अधिकारी का भोंपू पर चिल्लाना, यह सब एक अद्भुत दृश्य था.

तभी वीवीआइपी की गाड़ी आती दिखाई दी. वीवीआइपी स्वयं बैठे तो एक ही गाड़ी में थे पर उस गाड़ी की चारों ओर सात-आठ गाड़ियाँ और थीं. इस काफ़िले और गाय का कभी भी आमना सामना हो सकता था. अचानक गाय सड़क छोड़, एक संकरी-सी गली में घुस गई.

वीवीआइपी गाड़ियों की  सड़क पर भागते सिपाहियों और उनके पीछे आती जीप से टक्कर होते-होते बची. सड़क पर तैनात अन्य सिपाही और अधिकारी सांस रोके खड़े थे, सब किसी अनहोनी की प्रतीक्षा कर रहे थे. पर कोई अनहोनी न हुई, सौभाग्य से. वीवीआइपी का काफ़िला बिना रुके(और बिना अपनी गति घटाये) आगे बढ़ गया.
सुरक्षा कर्मी एक दूसरे को ऐसे देख रहे थे जैसे किसी दुः स्वप्नॅ से जागे हों. पर जीप में बैठे अधिकारी की हालत खराब थी. वह सब को गालियां दे रहा था.

अगले दिन समाचार पत्रों में छपा कि वीवीआइपी सुरक्षा नियमों का उलंग्न करने के अपराध में कुछ अधिकारियों को निलम्भित कर दिया गया था, और गाय के मालिक का पता न लगने के कारण, गाय को हिरासत में ले लिया गया था.  

सुरक्षा नियमों की समीक्षा करने के लिए एक उच्च स्तरीय कमेटी भी बना दी गई थी.
© आइ बी अरोड़ा