मित्रों!

आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं।

बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए।


फ़ॉलोअर

हिन्दी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
हिन्दी लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शनिवार, 15 सितंबर 2018

"हिन्दी" (अतुल बालाघाटी)

दया सभ्यता प्रेम समाहित जिसके बावन बरनों में
शरणागत होती भाषाएं जिसके पावन चरनों में

जिसने दो सौ साल सही है अंग्रेजों की दमनाई
धीरज फिर भी धारे रक्खा त्याग नहीं दी गुरताई

तुमको अब तक भान नहीं है हिन्दी की करूणाई का
जिसने सबको गले लगाया ममतारूपी माई का

लेकिन बातें चल निकली है नाहक हिन्दी भाषा है
मूरख और अचेतन जन की बोझिल सी परिभाषा है

किस भाषा में सहनशीलता है इतनी यह बतलाओ
सिद्ध करो उस भाषा को तुम या हिन्दी को अपनाओ

सोमवार, 16 सितंबर 2013

क्या जरुरी है की

क्या जरुरी है की 
इश्क करें 
और बेकरार हो जाएँ 
चोरी करें और फरार हो जाएँ 
जुर्म करें 
और गिरफ्तार हो जाएँ 
भलाई करें 
और कुसूरवार हो जाएँ
इंतजार करें 
और चौकीदार हो जाएँ 
दिन काटें सोकर 
और बेकार हो जाएं 
देते रहें मशवरें 
और सलाहकार हो जाएँ 
बिक जाएँ सियासत में 
और पत्रकार हो जाएँ 
बन जाएँ सनसनीखेज खबर 
और अखबार हो जाएँ 
क्या जरुरी है 
की हम लड़ें अपने हक के लिए 
और गुनाहगार हो जाएँ 
इस से तो भला है 
हम चुप रहें आँखें मूंदकर 
और भारत की सरकार हो जाएँ 


शनिवार, 14 सितंबर 2013

कविता...हिन्दी की रेल.....हिन्दी दिवस पर ....डा श्याम गुप्त ....



कविता...हिन्दी की रेल.....हिन्दी दिवस पर ....डा श्याम गुप्त ....


                                        

अंग्रेज़ी की मेट्रो
हिन्दी की ये रेल न जाने, 
चलते चलते क्यों रुक जाती |
जैसे  ही रफ़्तार पकडती,  
जाने क्यूं  धीमी  होजाती ||

कभी  नीति सरकारों की या, 
कभी नीति व्यापार-जगत की |
कभी रीति इसको ले डूबे , 
जनता के व्यबहार-जुगत   की ||


हम सब भी दैनिक कार्यों में, 
अंग्रेज़ी का पोषण करते |
अंग्रेज़ी अखबार मंगाते, 
 नाविल  भी  अंग्रेज़ी पढते ||

अफसरशाही कार्यान्वन जो
 सभी नीति का करने वाली |
सब  अंग्रेज़ी  के   कायल  हैं, 
 है अंग्रेज़ी ही पढने  वाली ||


नेताजी  लोकतंत्र क्या है,  
पढने अमेरिका  जाते हैं |
व्यापारी कैसे सेल करें,  
योरप से सीख कर आते हैं ||


यान्त्रीकरण का दौर हुआ, 
फिर धीमी इसकी चाल हुई |
टीवी  बम्बैया-पिक्चर से,  
इसकी भाषा बेहाल हुई ||                                           
हिन्दी की छुक छुक

छुक छुक कर आगे रेल बढ़ी, 
कम्प्युटर मोबाइल आये |
पहियों की चाल रोकने को, 
अब  नए बहाने फिर आये ||

फिर चला उदारीकरण दौर, 
हम तो उदार जगभर के लिए |
दुनिया ने फिर भारत भर में, 
 अंग्रेज़ी  दफ्तर खोल लिए ||

अब बहुराष्ट्रीय कंपनियां है,
 सर्विस की मारा मारी है |
हर तरफ तनी है अंग्रेज़ी,  
हिन्दी तो बस  बेचारी है ||

हम बन् क्लर्क अमरीका के,
इठलाये जग पर छाते  हैं |
उनसे ही मजदूरी लेकर,  
उन पर  ही  खूब लुटाते हैं ||

क्या इस भारत में हिन्दी की, 
मेट्रो भी कभी चल पायेगी |
या छुक छुक छुक चलने वाली ,
पेसेंजर ही  रह जायेगी ||