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शनिवार, 7 दिसंबर 2013

डा श्याम गुप्त के पद......




कान्हा तेरी वंसी मन तरसाए |
कण-कण ज्ञान का अमृत बरसे, तन मन सरसाये |
ज्योति-दीप मन होय प्रकाशित, तन जगमग कर जाए |
तीनलोक में गूंजे यह ध्वनि,  देव दनुज मुसकाये |
पत्ता-पत्ता, कलि-कलि झूमे, पुष्प-पुष्प खिल जाए |
नर-नारी की बात कहूँ क्या, सागर उफना जाए |
बैरन छेड़े तान अजानी , मोहनि  मन्त्र चलाये |
राखहु श्याम’ मोरी मर्यादा, मुरली मन भरमाये ||




सुअना नाम रटे का होई |
नाम धाम रटि  रटि कै सुअना, पार भया ना कोई |
धन की बतियाँ कहत सुने ते, कौन धनी होइ जावै|
पानी पानी कहत रहै नित, प्यास कहाँ बुझि पावै |
का घड़ियाल बजाए होई , का परसाद चढ़ाए |
पुहुप पात भेंटे का होई, जो सत करम न भाए |
बिनु समुझे बूझे जाने बिनु, नाम रटे क्या होता |
माया ज्यों ही सम्मुख आवे, वही रटन्ता  तोता |
राम रूप गुन धारै-परसै, सोइ गुन करम करै |
श्याम', श्याम  महिमा  चित धारे, सो भाव सिन्धु तरै ||