मैं तपता हूँ मैं गलता हूँ
किस्मत कह लो, सूरज कह लो
फिर उगता हूँ गर ढलता हूँ
उजियारे सब तुमही रख लो
अंधियारे में मैं रहता हूँ
जुगनू कह लो, दीपक कह लो
फिर जलता हूँ गर बुझता हूँ
मंजिल मुबारक तुमको, मैं तो
राहों से पत्थर चुनता हूँ
इंसाँ कह लो, झरना कह लो
फिर उठता हूँ गर गिरता हूँ
...मेरी अन्य रचनाएँ अनुगूँज पर