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रविवार, 26 जून 2016

फिर उठता हूँ गर गिरता हूँ

फिर चलता हूँ गर रुकता हूँ
मैं तपता हूँ मैं गलता हूँ
किस्मत कह लो, सूरज कह लो
फिर उगता हूँ गर ढलता हूँ

उजियारे सब तुमही रख लो
अंधियारे में मैं रहता हूँ
जुगनू कह लो, दीपक कह लो
फिर जलता हूँ गर बुझता हूँ

मंजिल मुबारक तुमको, मैं तो
राहों से पत्थर चुनता हूँ
इंसाँ कह लो, झरना कह लो
फिर उठता हूँ गर गिरता हूँ

...मेरी अन्य रचनाएँ अनुगूँज पर

बुधवार, 1 जून 2016

कुर्सी

एक कहानी सुनाता हूँ
जो आँखों की बयानी है,
वो कुर्सी जो बैठी है
हुकूमत की निशानी है।

राजा की तरह उसपर
जो इंसान है बैठा,
गलतफहमी में रहता है
कि भगवान है बैठा। 

जी हुज़ूरी की यहाँ
वो सरकार चलाता है,
है धोखे में पड़ा
कि संसार चलाता है।

अमीरों की है सुनता
बस पैसा उगाता है,
ज़मीनें बंजर हो रहीं, देखो

किसान फंदा लगाता है।

रविवार, 3 अप्रैल 2016

लोग - हाल में घटित हिंसात्मक घटनाओं और प्रदर्शनों पर

समय बहुत विकट है देखो, आवेशों में बहते लोग
कहीं लोग हैं उपद्रवियों से, कहीं सहमे डरते लोग

लोकतंत्र का तंत्र जो बिगड़े, लोक भी धीरज ना धरे
असहले हाथों में लेकर, जाने क्या-क्या करते लोग

रहनुमा है कौन यहां पर, तथ्यों का कुछ पता नहीं
शोर मचाते, आग लगाते, नींद में देखो चलते लोग

बहुत हुई अब नासमझी, कब हिंसा ने क्या पाया है
देखे हमने घायल होते, कभी देखे हमने मरते लोग

प्रेम, क्षमा, संवाद से देखो, रस्ते कई खुल जाते हैं
तब देश स्वर्ग बन जाता है, खुशहाली में रहते लोग

बुधवार, 24 फ़रवरी 2016

ज़िन्दगी

अमरबेल सी नहीं ज़िन्दगी, खिलती है मुरझाती है

कभी ग़मों से आँख मिलाती, खुशियों संग मुस्काती है

उम्मीदों का ताना बाना, खुद ही बुनती जाती है
ख़ामोशी में दिन कटता है, सपनों संग बतियाती है

दुनिया जैसे रंगमंच हो, अभिनय भी करवाती है
खुद को शाबाशी है देती, खुद पे ही खिसियति है

असमंजस का जाल है बुनती, खुद ही फंसती जाती है
तजुर्बे तब सारे लगा कर, बुजुर्गों सा समझती है

अद्भुत है अविराम ज़िन्दगी, संगीत सी बहती जाती है
रंग बिरंगे कई रूपों से, जीना हमें सिखाती है

अमरबेल सी नहीं ज़िन्दगी, खिलती है मुरझाती है

रविवार, 4 अगस्त 2013

कलम की खुशबू

बहुत समय बाद कुछ लिखना चाहा 

तो कलम की जगह अपना मोबाइल उठाया

ज़िन्दगी की खिटपिट और मोबाइल की पिट पिट से तंग
बस कुछ शब्द ही जोड़ पाया

भौतिकता में उलझी ज़िन्दगी पे खुद से कई सवाल किए
और अपने ही सवालों के आगे खुद को निरुत्तर पाया

मन ढूँढ रहा था कलम की खुशबू 
और कोस रहा था मन ही मन तकनीक को भी

झुँझलाकर मैंने तैयारी कर ली सोने की
मोबाइल को लगाया साइलेंट मोड पर

पर ये मन लगा रहा अपने उधेड़बुन में
कि आखिर कलम की वो खुशबू कहाँ गयी ?