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शनिवार, 14 सितंबर 2013

कविता...हिन्दी की रेल.....हिन्दी दिवस पर ....डा श्याम गुप्त ....



कविता...हिन्दी की रेल.....हिन्दी दिवस पर ....डा श्याम गुप्त ....


                                        

अंग्रेज़ी की मेट्रो
हिन्दी की ये रेल न जाने, 
चलते चलते क्यों रुक जाती |
जैसे  ही रफ़्तार पकडती,  
जाने क्यूं  धीमी  होजाती ||

कभी  नीति सरकारों की या, 
कभी नीति व्यापार-जगत की |
कभी रीति इसको ले डूबे , 
जनता के व्यबहार-जुगत   की ||


हम सब भी दैनिक कार्यों में, 
अंग्रेज़ी का पोषण करते |
अंग्रेज़ी अखबार मंगाते, 
 नाविल  भी  अंग्रेज़ी पढते ||

अफसरशाही कार्यान्वन जो
 सभी नीति का करने वाली |
सब  अंग्रेज़ी  के   कायल  हैं, 
 है अंग्रेज़ी ही पढने  वाली ||


नेताजी  लोकतंत्र क्या है,  
पढने अमेरिका  जाते हैं |
व्यापारी कैसे सेल करें,  
योरप से सीख कर आते हैं ||


यान्त्रीकरण का दौर हुआ, 
फिर धीमी इसकी चाल हुई |
टीवी  बम्बैया-पिक्चर से,  
इसकी भाषा बेहाल हुई ||                                           
हिन्दी की छुक छुक

छुक छुक कर आगे रेल बढ़ी, 
कम्प्युटर मोबाइल आये |
पहियों की चाल रोकने को, 
अब  नए बहाने फिर आये ||

फिर चला उदारीकरण दौर, 
हम तो उदार जगभर के लिए |
दुनिया ने फिर भारत भर में, 
 अंग्रेज़ी  दफ्तर खोल लिए ||

अब बहुराष्ट्रीय कंपनियां है,
 सर्विस की मारा मारी है |
हर तरफ तनी है अंग्रेज़ी,  
हिन्दी तो बस  बेचारी है ||

हम बन् क्लर्क अमरीका के,
इठलाये जग पर छाते  हैं |
उनसे ही मजदूरी लेकर,  
उन पर  ही  खूब लुटाते हैं ||

क्या इस भारत में हिन्दी की, 
मेट्रो भी कभी चल पायेगी |
या छुक छुक छुक चलने वाली ,
पेसेंजर ही  रह जायेगी ||