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रविवार, 3 अप्रैल 2016

लोग - हाल में घटित हिंसात्मक घटनाओं और प्रदर्शनों पर

समय बहुत विकट है देखो, आवेशों में बहते लोग
कहीं लोग हैं उपद्रवियों से, कहीं सहमे डरते लोग

लोकतंत्र का तंत्र जो बिगड़े, लोक भी धीरज ना धरे
असहले हाथों में लेकर, जाने क्या-क्या करते लोग

रहनुमा है कौन यहां पर, तथ्यों का कुछ पता नहीं
शोर मचाते, आग लगाते, नींद में देखो चलते लोग

बहुत हुई अब नासमझी, कब हिंसा ने क्या पाया है
देखे हमने घायल होते, कभी देखे हमने मरते लोग

प्रेम, क्षमा, संवाद से देखो, रस्ते कई खुल जाते हैं
तब देश स्वर्ग बन जाता है, खुशहाली में रहते लोग

रविवार, 31 मई 2015

मेरी पहली दोस्त

जब हुआ मेरा सृजन,
माँ की कोख से|
मैं हो गया अचंभा,
यह सोचकर||

कहाँ आ गया मैं,
ये कौन लोग है मेरे इर्द-गिर्द|
इसी परेशानी से,
थक गया मैं रो-रोकर||

तभी एक कोमल हाथ,
लिये हुये ममता का एहसास|
दी तसल्ली और साहस,
मेरा माथा चूमकर||

मेरे रोने पर दूध पिलाती,
उसे पता होती मेरी हर जरूरत|
चाहती है वो मुझे,
अपनी जान से  भी बढ़कर||

उसकी मौजूदगी देती मेरे दिल को सुकून,
जिसका मेरी जुबां पर पहले नाम आया|
पहला कदम चला जिसकी,
उंगली पकड़कर||

http://hindikavitamanch.blogspot.in/2015/05/blog-post_13.html