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गुरुवार, 26 नवंबर 2015

गीत "ये धरा राम का धाम है" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)


रम रहा सब जगह राम है।
ये धरा राम का धाम है।।

सच्चा-सच्चा लगे,
सबसे अच्छा लगे,
कितना प्यारा प्रभू नाम है।
ये धरा राम का धाम है।।

नाम जप लो अभी,
राम भज लो सभी,
लगता कोई नहीं दाम है।
ये धरा राम का धाम है।।

वो खुदा-ईश्वर,
सबको देता है वर,
वो ही रहमान है श्याम है।
ये धरा राम का धाम है।।

वो अजर है अमर,
सब जगह उसका घर,
सबके करता सफल काम है।
ये धरा राम का धाम है।।

बुधवार, 3 जून 2015

"कलम मचल जाया करती है" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

"प्रेरणा-अंशु" मासिकपत्रिका
के अप्रैल-मई, 2015 के 
संयुक्तांक में मेरी कविता
"कलम मचल जाया करती है"
जब कोई श्यामल सी बदली, 
सपनों में छाया करती है! 
तब होता है जन्म गीत का, 
रचना बन जाया करती है!! 
निर्धारित कुछ समय नही है, 
कोई अर्चना विनय नही है, 
जब-जब निद्रा में होता हूँ, 
तब-तब यह आया करती है! 
रचना बन जाया करती है!! 
शोला बनकर आग उगलते, 
कहाँ-कहाँ से  शब्द निकलते, 
अक्षर-अक्षर मिल करके ही, 
माला बन जाया करती है! 
रचना बन जाया करती है!! 
दीन-दुखी की व्यथा देखकर, 
धनवानों की कथा देखकर, 
दर्पण दिखलाने को मेरी,
कलम मचल जाया करती है! 
रचना बन जाया करती है!! 
भँवरे ने जब राग सुनाया, 
कोयल ने जब गाना गाया, 
मधुर स्वरों को सुनकर मेरी,
नींद टूट जाया करती है! 
रचना बन जाया करती है!! 
बैरी ने  हुँकार भरी जब, 
धनवा ने टंकार करी तब, 
नोक लेखनी की तब मेरी, 
भाला बन जाया करती है! 
रचना बन जाया करती है!!

रविवार, 31 मई 2015

मेरी पहली दोस्त

जब हुआ मेरा सृजन,
माँ की कोख से|
मैं हो गया अचंभा,
यह सोचकर||

कहाँ आ गया मैं,
ये कौन लोग है मेरे इर्द-गिर्द|
इसी परेशानी से,
थक गया मैं रो-रोकर||

तभी एक कोमल हाथ,
लिये हुये ममता का एहसास|
दी तसल्ली और साहस,
मेरा माथा चूमकर||

मेरे रोने पर दूध पिलाती,
उसे पता होती मेरी हर जरूरत|
चाहती है वो मुझे,
अपनी जान से  भी बढ़कर||

उसकी मौजूदगी देती मेरे दिल को सुकून,
जिसका मेरी जुबां पर पहले नाम आया|
पहला कदम चला जिसकी,
उंगली पकड़कर||

http://hindikavitamanch.blogspot.in/2015/05/blog-post_13.html

बुधवार, 3 दिसंबर 2014

"शीतलता बढ़ गई पवन में" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

शीतलता बढ़ गई पवन में।
कुहरा छाया नील गगन में।
IMG_0829
चारों ओर अन्धेरा छाया,
सूरज नभ में है शर्माया,
पंछी बैठे ठिठुर रहे हैं,
देख रहे हैं घर-आँगन में।
कुहरा छाया नील गगन में।

वाहन की गति हुई मन्द है,
चहल-पहल हो गई बन्द है,
शीतल धुआँ नजर आता है,
ऊनी कपड़े लदे बदन में।
कुहरा छाया नील गगन में।

शनिवार, 12 अप्रैल 2014

आज का प्रेम


मनुष्य (इस संसार का सबसे अद्भुत प्राणी),
जिसका प्रेम प्रत्येक छण !
कलेंडर से जल्दी बदलता है,
और समय से भी तेज चलता है !!

औरत (संसार की सबसे रहस्यमय प्रजाती),
को देखते ही प्रेम में पड़ जाता है !
और फिर जनसंख्या और महंगाई,
से भी तेज बढता जाता है !!

पहले ही दिन अट्रैक्सन होता है,
फिर कनेक्सन होता है !
दूसरे ही दिन कन्वेंसन होता है,
और अंत में इस प्रेम नामक दवा,
की एक्सपायरी डेट ख़त्म हो जाती है !!

और फिर मनुष्य (मोबाईल फोन),
से औरत नामक सीम निकाल दी जाती है !
और फिर सस्ती, टिकाऊ  और सुन्दर ऑफर,
वाले सिम (महिला) की तलाश शुरू हो जाती है !!

और कभी - कभी तो यह,
'शादी' नामक ज्वार तक पहुँच जाती है !
और फिर 'तलाक' नामक भाटा पर,
आकर ख़त्म होती है !!


http://hindikavitamanch.blogspot.in/

मंगलवार, 31 दिसंबर 2013

"नये साल का सूरज" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मैं नये साल का सूरज हूँ,
हरने आया हूँ अँधियारा।
 मैं स्वर्णरश्मियों से अपनी,
लेकर आऊँगा उजियारा।।

चन्दा को दूँगा मैं प्रकाश,
सुमनों को दूँगा मैं सुवास,
मैं रोज गगन में चमकूँगा,
मैं सदा रहूँगा आस-पास,
मैं जीवन का संवाहक हूँ,
कर दूँगा रौशन जग सारा।
लेकर आऊँगा उजियारा।।

मैं नित्य-नियम से चलता हूँ,
प्रतिदिन उगता और ढलता हूँ,
निद्रा से तुम्हें जगाने को,
पूरब से रोज निकलता हूँ,
नित नई ऊर्जा भर  दूँगा,
चमकेगा किस्मत का तारा।
लेकर आऊँगा उजियारा।।

मैं दिन का भेद बताता हूँ,
और रातों को छिप जाता हूँ,
विश्राम करो श्रम को करके,
मैं पाठ यही सिखलाता हूँ,
बन जाऊँगा मैं सरदी में,
गुनगुनी धूप का अंगारा।
लेकर आऊँगा उजियारा।।

मैं नये साल का सूरज हूँ,
हरने आया हूँ अँधियारा।।

बुधवार, 31 जुलाई 2013

शर्ते प्रिया की



मैं कश्ती तू पतवार प्रिये |


तू मांझी  मैं मंझधार प्रिये |

तुम वित्तमंत्री बन जाना |


मैं गृहमंत्री बन जाऊँगी |

तुम मेरे स्वप्न सजा देना |

मैं तेरा घर महका दूंगी |

पूरा होगा परिवार प्रिय | 

तू मांझी मैं मंझधार प्रिय 


तुम खूब कमा कर घर आना |

मैं शोपिंग लिस्ट थमा दूंगी |


भूले से भी जो मना किया |

मायके वाले बुलवा लूंगी |

ये धमकी नहीं मनुहार प्रिय |

तू मांझी मैं मंझधार प्रिय 



जो कभी रूठ तुमसे जाऊं |

दे साडी मुझे मना लेना |

जो थक जाऊं मैं कभी |

तो खाना बाहर से मंगवा लेना |

ये कर लो तुम स्वीकार प्रिय |

तू मांझी मैं मंझधार प्रिय 

तुम बैठो मेरे पास प्रिय|

 बस मेरी तारीफे करना |

न इधर उधर तुम देख कभी |

ठंडी ठंडी आहें भरना |

वर्ना ...........


तू मांझी मैं मंझधार प्रिये। 

जीना होगा दुश्वार प्रिये |

तू मांझी मैं मंझधार प्रिये।। 
इस खट्टी मीठी नोक झोक |

में प्यार सदा बढता जाए |

तुझ पर मेरा मुझ पर तेरा |

यूँ रंग सदा चदता  जाए |

तुम हो मेरा संसार प्रिये |

तू मांझी मैं मंझधार प्रिये।। 


सोमवार, 29 जुलाई 2013

"सतरंगी-शहनाई हो"

'सतसईया' का दोहा हो या,  'पदमावत'चौपाई हो ?
या बच्चन की 'मधुशाला'की,सबसे श्रेष्ठ रुबाई हो ?
केश-कज्जली ,छवि कुन्दन सी,
चन्दन जैसी   गंध   लिये |
देवलोक    से     पोर-पोर में,
भर   लाई   क्या  छंद प्रिये | 
 चक्षुचकोर,चन्द्रमुख चंचल,चन्दनवन से आई हो ?
या बच्चन की 'मधुशाला'की,सबसे श्रेष्ठ रुबाई हो ?
रक्त - कपोल,   नासिका तीखी, 
अधर  पगे, मधु  प्याले से |
क्षण-क्षण मुस्कानों से पूरित-,
मृग-नयना ,   मतवाले    से |
मदमाती,मदमस्त,मुखर सी,मस्त-मस्त अंगडाई हो ?
या बच्चन की 'मधुशाला'की, सबसे  श्रेष्ठ रुबाई हो ?
देह-कलश  से बरस    रही है, 
यौवन   की   रसधार    प्रिये  |
पुष्प - लता सी  स्वर्ण-देह में,
घुंघरू   सी   झनकार   प्रिये |
मलयागिरि से चली मस्त हो,  मंद वही पुरवाई हो ?
 या बच्चन की 'मधुशाला'की ,सबसे श्रेष्ठ रुबाई हो ?
मेरे लिये सुमुखि आई हो ?,
धरती पर  नव-छन्द लिए |
महक रहा  जो  मधुर गंध  से,
अमृत-घट  निज  संग  लिए |
सप्त-लोक के सप्त-सुरों की , सतरंगी-शहनाई हो ?
या बच्चन की 'मधुशाला'की ,सबसे श्रेष्ठ रुबाई हो ?