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शुक्रवार, 4 अप्रैल 2014

जीवन के रंग

1
 अपने संग
 सहेजती मैं रंग
 तितली बन।
2
 टूटे सपने
 रूठ गए अपने
 बने पराये ।
3
खोजती पंख
छू लेती आसमान
 मेरी उड़ान ।
4
 खोये शब्‍द
ना लिखा गया पूरा
गीत अधूरा।
  5
माँ का सपना
बने घर अपना
जोड़े सामान ।
6
 मैं हूँ खोजती
खो गए सभी मोती
माला पिरोती ।
7
करो स्‍वीकार
सपने हों साकार
ये एतबार।
8        
खिले गुलाब 
न। हों संग ये काँटे
दर्द मिटा दे।
9
मेरी तन्‍हाई
कभी लेगी बिदाई
रात,ना आई।
10
ये सुख -भ्रांति
दुख देता अशांति
खोजते शांति ।

शुक्रवार, 23 अगस्त 2013

मानव तुम ना हुए सभ्य




आज भी कई
होते चीरहरण
कहाँ हो कृष्ण
                ***
रही चीखती
क्यों नहीं कोई आया
उसे बचाने
                ***
निर्ममता से
तार-तार इज्ज़त
करें वहशी
                ***
हुआ वहशी
खो दी इंसानियत
क्यों आदमी ने
                ***
तमाम भय
असुरक्षित हम
कैसा विकास
                ***
कैसी ये व्यथा
क्यों रहे जानवर
पढ़-लिख के
                ***
वामा होने की
कितनी ही दामिनी
भोगतीं सज़ा
                ***
बेबस नारी
अजीब-सा माहौल
कैसा मखौल
                ***
ओ रे मानव
कई युग बदले
हुआ ना सभ्य
                ***

अजीब व्याख्या


जहाँ कहीं भी
हो नारी का सम्मान
बसें देवता
                ***
अजीब व्याख्या
करें चीरहरण
पूजते नारी
                ***
बदले युग
मानव तुम कभी
हुए ना सभ्य
                ***

रविवार, 4 अगस्त 2013



मित्रता दिवस पर सभी मित्रों को हार्दिक शुभकामनाओं के साथ यह हाइकु समर्पित....

बनो यूँ बड़े
भूले नहीं सुदामा
मित्र तुमको.

HAPPY FRIENDSHIP DAY:-))

Dr. Sarika Mukesh