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शनिवार, 9 मई 2020

"हे! गुलमोहर" (कृष्ण आधुनिक)

प्रिय गुलमोहर,
निस्संदेह तुम फल न देते हो
किन्तु,जब ग्रीष्म ऋतु में
सूर्य की तपिश से
मौत रूपी अग्नि बरसती है
तब तुम हरे भरे हो
जीवन जीने का संकेत देते हो
और जो तुम विशालकाय हो
तो तुम्हारी पत्तियां
नन्हीं नन्हीं ही तो हैं
तुम्हारे पुष्प जो असुगंधित हैं
भले ही हैं
कोई तोड़ता रोंदता तो नहीं है
हे गुलमोहर वृक्ष,
तुम्हारी नन्हीं नन्हीं
करीने से सजी पत्तियां
बहुत सुन्दर लगती हैं
और टहनियों में जड़े सुंदर पुष्प
और उनका रंग
बहुत भाते हैं
भाती है तुम्हारी छाया भी
ग्रीष्म ऋतु में।

--
कृष्ण आधुनिक