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शनिवार, 9 मई 2020

"हे! गुलमोहर" (कृष्ण आधुनिक)

प्रिय गुलमोहर,
निस्संदेह तुम फल न देते हो
किन्तु,जब ग्रीष्म ऋतु में
सूर्य की तपिश से
मौत रूपी अग्नि बरसती है
तब तुम हरे भरे हो
जीवन जीने का संकेत देते हो
और जो तुम विशालकाय हो
तो तुम्हारी पत्तियां
नन्हीं नन्हीं ही तो हैं
तुम्हारे पुष्प जो असुगंधित हैं
भले ही हैं
कोई तोड़ता रोंदता तो नहीं है
हे गुलमोहर वृक्ष,
तुम्हारी नन्हीं नन्हीं
करीने से सजी पत्तियां
बहुत सुन्दर लगती हैं
और टहनियों में जड़े सुंदर पुष्प
और उनका रंग
बहुत भाते हैं
भाती है तुम्हारी छाया भी
ग्रीष्म ऋतु में।

--
कृष्ण आधुनिक

13 टिप्‍पणियां:

  1. जी नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा रविवार(१०-०५-२०२०) को शब्द-सृजन- २० 'गुलमोहर' (चर्चा अंक-३६९७) पर भी होगी।
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    आप भी सादर आमंत्रित है
    ….
    अनीता सैनी

    जवाब देंहटाएं
  2. वाह!

    बहुत ख़ूब!

    सुंदर सृजन जिसमें गुलमोहर से जुड़े विभिन्न आयाम चित्रित हुए हैं।

    बधाई एवं शुभकामनाएँ।

    जवाब देंहटाएं
  3. वाह!!!
    बहुत ही सुन्दर...

    जवाब देंहटाएं
  4. बहुत सुंदर सृजन।
    सार्थक कथ्य के साथ।

    जवाब देंहटाएं