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शनिवार, 24 जुलाई 2021

एक ग़ज़ल : हमें मालूम है --

 डायरी के पन्नों  से---

एक ग़ज़ल : हमें मालूम है संसद में ---



हमें मालूम है संसद में कल फिर क्या हुआ होगा,

कि हर मुद्दा सियासी ’वोट’ पर  तौला  गया होगा ।


वो,जिनके थे मकाँ वातानुकूलित संग मरमर  के,

हमारी झोपड़ी के  नाम हंगामा   किया  होगा


जहाँ भी बात मर्यादा की या तहजीब की आई,

बहस करते हुए वो गालियाँ  भी दे रहा  होगा


बहस होनी कभी जो थी किसी गम्भीर मुद्दे पर,

वहीं संसद में ’मुर्दाबाद’ का  नारा लगा होगा


चलें होंगे कभी चर्चे जो रोटी पर ,ग़रीबी  पर,

दिखा कर आंकड़ों  का खेल, सीना तन गया होगा ।


कभी मण्डल-कमण्डल पर, कभी ’मस्जिद पे, मन्दिर पर

इन्हीं के नाम बरसों से तमाशा हो रहा होगा ।


खड़े है कटघरे में हम , लगे आरोप ’आनन’ पर,

कि शायद भूल से हम ने कहीं सच कह दिया होगा ।


-आनन्द.पाठक-

शनिवार, 17 जुलाई 2021

चन्द माहिए

 

चन्द माहिए

 :1:

 दो चार क़दम चल कर,

 छोड़ न दोगे तुम,

 सपना बन कर, छल कर?

 

  :2:

 जब तुम ही नहीं हमदम,

 सांसे  भी कब तक

 देगी यह साथ, सनम !

 

 :3:

दुनिया की कहानी में,

शामिल है सुख-दुख,

मेरी भी कहानी में।

 

:4;

विपरीत हुई धारा,

और हवाओं ने

कश्ती को ललकारा।

 

5

कितनी भोली सूरत,

रब ने बनाई हो,

जैसे तेरी मूरत।

 

-आनन्द,पाठक-

रविवार, 11 जुलाई 2021

एक ग़ज़ल

 एक ग़ज़ल 


रिश्तों की बात कौन निभाता है आजकल 

वह बेग़रज़ न हाथ मिलाता  है आजकल


यह और बात है उसे सुनता न हो कोई

फिर भी वो मन की बात सुनाता है आजकल


कहना तो चाहता था मगर कह नहीं सका

कोई तो दर्द है ,वो छुपाता  है आजकल


लोगों के अब तो तौर-तरीक़े बदल गए

किस दौर की तू बात सुनाता है आजकल 


मौसम चुनाव का अभी आने को है इधर

वह ख़्वाब रोज़-रोज़  दिखाता है आजकल


सच बोल कर भी देख लिया ,क्या उसे मिला ?

वह झूठ की दुकान चलाता है आजकल 


’आनन’ बदल सका न ज़माने के साथ साथ

आदर्श का वो कर्ज़ चुकाता है आजकल ।


-आनन्द पाठक-

शनिवार, 3 जुलाई 2021

चन्द माहिए

 

चन्द माहिए

:1
सदक़ात भुला मेरा,
एक गुनह तुम को
बस याद रहा मेरा।

:2:
इक चेहरा क्या भाया,
हर चेहरे में वो
मख़्सूस नज़र आया।

;3:
हो जाता हूँ पागल,
जब जब साने से
ढलता तेरा आँचल।

4
उल्फ़त की यही ख़ूबी.
पार लगा वो ही
कश्ती जिसकी डूबी ।

5
क्या और तवाफ़ करूँ,
इतना ही समझा,
मन पहले साफ़ करूँ।

-आनन्द.पाठक-

मख़्सूस = प्रमुख, प्रधान.ख़ास तौर से
तवाफ़ = परिक्रमा, प्रदक्षिणा

सोमवार, 28 जून 2021

एक ग़ज़ल : वह शख़्स देखने में तो ---

 

 

एक ग़ज़ल


वह शख़्स देखने में तो लगता ज़हीन है,
अन्दर से हो ज़हीन, न होता यक़ीन है ।      


कहने को तो हसीन वह ,चेहरा रँगा-पुता,
दिल से भी हो हसीन तो, सच में हसीन है।           


सच बोल कर मैं सच की दुहाई भी दे रहा
वह शख़्स झूठ बोल के भी मुतमईन है ।                 


वह ज़हर घोलता है  फ़िज़ाओं में रात-दिन,
उसका वही ईमान है,  उसका वो दीन है ।     


ज़ाहिद ये तेरा फ़ल्सफ़ा अपनी जगह सही,
गर हूर है उधर तो इधर महजबीन है                               


क्यों  ख़ुल्द से निकाल दिए इस ग़रीब  को,
यह भी जमीं तो आप की अपनी जमीन है।                


आनन’ तू  बदगुमान में, ये तेरा घर नहीं,
यह तो मकान और का, बस  तू मकीन है।                 


-
आनन्द.पाठक-

शब्दार्थ 

ज़हीन = सभ्य ,भला आदमी
मुतमईन है = निश्चिन्त है  ,बेफ़िक्र है
फ़लसफ़ा = दर्शन ,ज्ञान

महजबीन = चाँद सा चेहरे वाली
खुल्द  से= जन्नत  से [ आदम का खुल्द से निकाले जाने की जानिब इशारा है ]

मकीन = निवासी

शनिवार, 19 जून 2021

अनुभूतियाँ: क़िस्त 08

अनुभूतियाँ : क़िस्त 08

 

1
दोनों के जब दर्द एक हैं,
फिर क्यों दिल से दिल की दूरी
एक साथ चलने में क्या है ,
मिलने में हैं क्या मजबूरी ?

 
2
रात रात भर तारे किस की ,
देखा करते  राह निरन्तर  ?
और जलाते रहते ख़ुद को
आग बची जो दिल के अन्दर ।

 
3
कितनी बार हुई नम आँखें,
लेकिन बहने दिया न मैने।
शब्द अधर पर जब तब उभरे
कुछ भी कहने दिया न मैने ।

 
4
छोड़ गई तुम, अरसा बीता,
फिर न बहार आई उपवन में ।
लेकिन ख़ुशबू आज तलक है,
दिल के इस सूने आँगन  में ।
 

 

-आनन्द.पाठक-

 


हर तरफ है मौत फिर डरना डराना छोड़ दो,



हर तरफ है मौत फिर डरना डराना छोड़ दो,

अपने साहिल को भी तुम अपना बताना छोड़ दो ।


अर्थियों के संग भी अपना कोई दिखता नहीं,

आज से अपनों पे अपना हक जताना छोड़ दो ।


जब तलक दस्तक न दे वो दर्द तेरे द्वार पे,

ज़िन्दगी की खुशियों को यूँ ही गँवाना छोड़ दो ।


अस्पतालों से निकलती लाशों को देखो ज़रा,

कह रहीं हैं अपनों से नफ़रत बढ़ाना छोड़ दो ।


ज़िन्दगी में ऐसा मंज़र आएगा सोचा न था,

आदमी से 'हर्ष' अब मिलना मिलाना छोड़ दो ।


-------हर्ष महाजन 'हर्ष'

◆◆◆

आइये समंदर को बदल डालें

 

आइये समंदर को बदल डालें

...

आइये आज समंदर को बदल डालें ,
मेरे  कुछ शेर हैं उनमें वज़न डालें |
मगर बदलूं कैसे बदनसीब मुक़द्दर, 
चलो हाथ की लकीरों में खलल डालें |

_________हर्ष महाजन

गुरुवार, 17 जून 2021

किरीट सवैया (8 भगण 211)

(किरीट सवैया)

भीतर मत्सर लोभ भरे पर, बाहर तू तन खूब
सजावत।
अंतर में मद मोह बसा कर, क्यों फिर स्वांग रचाय दिखावत।
दीन दुखी पर भाव दया नहिँ, आरत हो भगवान
मनावत।
पाप घड़ा उर माँहि भरा रख, पागल अंतरयामि
रिझावत।।
*********
*किरीट सवैया* विधान

यह 8 भगण (211) प्रति पद का वर्णिक छंद है। हर सवैया छंद की तरह इसके भी चारों पद एक ही तुकांतता के होने चाहिए। 12, 12 वर्ण पर यति रखने से रोचकता बढ जाती है।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया

शारदी छंद "चले चलो पथिक"

(शारदी छंद)

चले चलो पथिक।
बिना थके रथिक।।
थमे नहीं चरण।
भले हुवे मरण।।

सुहावना सफर।
लुभावनी डगर।।
बढ़ा मिलाप चल।
सदैव हो अटल।।

रहो सदा सजग।
उठा विचार पग।।
तुझे लगे न डर।
रहो न मौन धर।।

प्रसस्त है गगन।
उड़ो महान बन।।
समृद्ध हो वतन।
रखो यही लगन।।
=============
*शारदी छंद* विधान

"जभाल" वर्ण धर।
सु'शारदी' मुखर।।

"जभाल" =  जगण  भगण  लघु
।2।  2।।  । =7 वर्ण, 4चरण दो दो सम तुकान्त
*****************

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया

रविवार, 13 जून 2021

एक गीत : ज़िन्दगी से लड़ रहा हूँ --

 एक गीत : ज़िन्दगी से लड़ रहा हूँ ---


ज़िन्दगी से लड़ रहा हूँ ,मैं अभी हारा नहीं हूँ ,

बिन लड़े ही हार मानू ? यह नहीं स्वीकार मुझको ।


जो कहेंगे वो, लिखूँ मैं ,शर्त मेरी लेखनी पर,

और मेरे ओठ पर ताला लगाना चाहते हैं ।

जो सुनाएँ वो सुनूँ मैं, ’हाँ’ में ’हाँ’ उनकी मिलाऊँ

बादलों के पंख पर वो घर बनाना चाहते हैं॥


स्वर्ण-मुद्रा थाल लेकर आ गए वो द्वार मेरे,

बेच दूँ मैं लेखनी यह ? है सतत धिक्कार मुझको।


ज़िन्दगी आसां नहीं तुम सोच कर जितनी चली हो,

कौन सीधी राह चल कर पा गया अपन ठिकाना ।

हर क़दम, हर मोड़ पर अब राह में रहजन खड़े हैं

यह सफ़र यूँ ही चलेगा, ख़ुद ही बचना  या बचाना ।


जानता हूँ  तुम नहीं मानोगी  मेरी बात कोई-

और तुम को रोक लूँ मैं, यह नहीं अधिकार मुझको।


लोग अन्दर से जलें हैं, ज्यों हलाहल से बुझे हों,

आइने में वक़्त के ख़ुद को नहीं पहचानते हैं।

नम्रता की क्यों कमी है, क्यों ”अहम’  इतना भरा है

सामने वाले को वो अपने से कमतर मानते हैं।


एक ढूँढो, सौ मिलेंगे हर शहर में ,हर गली में ,

रूप बदले हर जगह मिलते वही हर बार मुझको।


-आनन्द.पाठक- 


गुरुवार, 3 जून 2021

कहानियां - एक गीत

 कहानियां ....

सुनाएगा जमाना कुछ 

कहानियां ...

वक्त के धारों की

बहते किनारों की 

कहानियां ...

कहानियां..

कहानियां ...


जब हम मिले थे पहले 

दिल धड़का हौले हौले

शोर उठा फिर मुझमें 

ढूंढूं मैं खुद को तुझमें 

इश्क़ ने   कोई दस्तक दी थी 

ख्वाबों में शिरकत की थी 

इश्क़ में .....इश्क़ ने  की कितनी  ...

मनमानियां ...नादानियां ...

आहों में सिमटी 

आहों में लिपटी 

 कहानियां 

तेरी मेरी कहानियां


धड़कन  के ताने बाने 

मैं जानू न तू ही जाने 

उलझी मैं ऐसी उनमें

जलूं फिर बुझूं  मैं खुद में 

तुझमें मैं ऐसे खो  गई 

आधी  थी पूरी हो गई  

जिस्म ने तेरे 

तन से मेरे 

की कितनी 

शैतानियां ... मनमानियां

आग में लिपटी 

आग में झुलसी 

अपनी जवानियां 

तेरी मेरी कहानियां 

कहानियां ...

कहानियां ...

Aha haha ..

Lala ..

Lalaaa..





 Sad part ...


मेरी तेरी है  कहानियां 

कहानियां ...


तुम मुड़ गए क्यों हमदम 

कह न सके कुछ भी हम

कब से खड़े है वहां पर 

छोड़ गए थे जहां पर 

आखों से धोते है, गम 

गुजरे  न वक्त ,न ही हम 

ज़ख़्म हरे है मन में 

न  जान है तन में 

सूने से इस तन  की 

टूटे से इस मन की 

तन्हाइयां  

मीलों तक फैली 

तन्हाइयां 

आंखों की जुबां से 

तेरी आंखों को बुलाती है 

विरानियां

वीरानियां ...


कहानियां ...

तेरी मेरी कहानियां ...


मंगलवार, 1 जून 2021

कभी कभी

 




मैं  किस्सा  हूं सुनो कुछ मैं कहूं 

एक   प्रीत पुरानी सा मैं  जुनूँ 

कुछ  वादों  के, कुछ यादों के  

बनूं एक  तराने  कभी कभी 


मैं दिन हूंं, धूप में   जलूं बुझूं 

मैं हवा हूं  , मैं फिर भी न बहूँ 

 शामों को क्षितिज  सिरहाने  पे

जडूं चांद सितारे  कभी कभी 


मैं बादल, धम धम गरजा करूं 

मैं बिजली सी पल पल मचला करूं 

मैं बूंद हूं , तेरे सिरहाने  पे  

पायल सी छनकू कभी कभी 


मैं फूल  सी खुद ही लरजा करूं 

शबनम  सी  खुद ही  पिघला करूं 

तेरे आंखों   से , तेरे होंठो से 

मचलूं खुद को मैं कभी कभी 


मैं ख्वाहिश हूं दिल में दुबकी रहूं 

मैं चाहत हूं नस नस में पलूं

तन्हा ख्वाबों के मौसम में 

धड़कन सी धडकूं कभी कभी 


मैं  इश्क़ हूं  मैं हर रंग  बनूं 

मैं इश्क़ हूं, मैं हर रंग ढलूं

बस   धूप धनक के रंगों सी 

बिखरूं तुझमें मैं कभी कभी



रविवार, 30 मई 2021

एक ग़ज़ल : उँगलियाँ वो सदा उठाते हैं

 एक ग़ज़ल 


उँगलियाँ वो सदा उठाते हैं

शोर हर बात पर मचाते हैं


आप की आदतों में शामिल है

झूठ की ’हाँ ’ में”हाँ ’ मिलाते हैं


आँकड़ों से हमें वो बहलाते

रोज़ सपने नए दिखाते हैं


बेच कर आ गए ज़मीर अपना

क्या है ग़ैरत ! हमें सिखाते हैं


लोग यूँ तो शरीफ़ से दिखते

साथ क़ातिल का ही निभाते हैं


चल पड़ा है नया चलन अब तो

दूध के हैं  धुले,  बताते हैं


दर्द सीने में पल रहा ’आनन’

हम ग़ज़ल दर्द की सुनाते हैं


-आनन्द.पाठक -

शुक्रवार, 28 मई 2021

आओ निहारिका हो जाए

 एक आकाश गंगा तुम  

एक निहारिका मैं 

अगनित तारों सूरज से 

भरे तुम 

कितने ही नजारे 

समाए हुई मैं 


एक काल से 

जलते हुए  तुम

एक समय से 

धधकती हुई मैं 


दूर सुदूर ब्रह्मांड में 

बसाये हुए तुम

और 

कुछ प्रकाश दूरी पे  

ठिठकी  हुई मैं 


सदियों से अपनी ओर

खींचते तुम

अनादि से तुम्हे

सम्मोहित करती हुई मैं 


सदियों के इस

रस्साकशी में 

न जीते हो तुम  

और न हारी हूं मैं 


तो आओ 

इस "मैं"  को मिटा कर 

इस "तुम"  को भुला कर 

बस राख राख 

 धुआं धुआं हो जाए

 

तितली के दो पंख सम

आज से ,अभी से 

 तितली  🦋 निहारिका

हो जाए 


और  फिर जन्म दे हम 

अगनित तारों को,

सौर्य मंडलों को,

और 

अनेकों ऊर्जा पिंडों सी

तुम्हारी और  मेरी 

अनंत  संततियो को !!



गुरुवार, 27 मई 2021

छप्पय "शिव-महिमा"

(छप्पय छंद)

करके तांडव नृत्य, प्रलय जग में शिव करते।
विपदाएँ भव-ताप, भक्त जन का भी हरते।
देवों के भी देव, सदा रीझें थोड़े में। 
करें हृदय नित वास, शैलजा सह जोड़े में।
प्रभु का निवास कैलाश में, औघड़ दानी आप हैं।
भज ले मनुष्य जो आप को, कटते भव के पाप हैं।।
*** *** ***

*छप्पय छंद* "विधान"

छप्पय एक विषम-पद मात्रिक छंद है। यह भी कुंडलिया छंद की तरह छह चरणों का एक मिश्रित छंद है जो दो छंदों के संयोग से बनता है। इसके प्रथम चार चरण रोला छंद के, जिसके प्रत्येक चरण में 24-24 मात्राएँ होती हैं तथा यति 11-13 पर होती है। आखिर के दो चरण उल्लाला छंद के होते हैं। उल्लाला छंद के दो भेदों के अनुसार इस छंद के भी दो भेद मिलते हैं। प्रथम भेद में 13-13 यानि कुल 26 मात्रिक उल्लाला के दो चरण आते हैं और दूसरे भेद में 15-13 यानि कुल 28 मात्रिक उल्लाला के दो चरण आते हैं।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया

रविवार, 23 मई 2021

एक ग़ज़ल

 एक ग़ज़ल 


आँकड़ों से हक़ीक़त छुपाना भी क्या !

रोज़ रंगीन सपने  दिखाना भी क्या !


सोच में जब भरा हो धुआँ ही धुआँ,

उनसे सुनना भी क्या और सुनाना भी क्या !


वो जमीं के मसाइल न हल कर सके

चाँद पर इक महल का बनाना भी क्या !


बस्तियाँ जल के जब ख़ाक हो ही गईं,

बाद जलने के आना न आना भी क्या !


अब सियासत में बस गालियाँ रह गईं,

ऎसी तहजीब को आजमाना भी क्या !


चोर भी सर उठा कर हैं चलने लगे,

उनको क़ानून का ताज़ियाना भी क्या !


लाख दावे वो करते रहे साल भर,

उनके दावों का सच अब बताना भी क्या !


इस व्यवस्था में ’आनन’ कहाँ तू खड़ा ,

तेरा जीना भी क्या, तेरा जाना भी क्या !


-आनन्द.पाठक-

ताज़ियाना = चाबुक .कोड़ा
मसाइल - मसले ,समस्याएँ

गुरुवार, 13 मई 2021

थोड़ा सा मिल जाए आसमां

 थोड़ा सा मिल जाए  आसमां

थोड़ी सी मांगू मैं जमीं

पानी सी कल कल बह चलूं 

गर किनारे हो जाए हमनशी....


I wanna paint  town ,all red 

I wanna do  all  I  have said 

I wanna be, in your arms 

I  wanna feel all your calm 


थोड़ा सा मिल जाए आसमान 

थोड़ी सी मांगू मैं जमीन ...


जबसे मिले हो हमनवां 

देखो देखो दिल  ये उड़ चला 

है ख्वाहिशें भी पतंग सी 

कि हवाएं भी मलंग सी 

Come on feel करो

 उन सांसों को 

तुमसे बंधी है उन आसों को 

बांधों मुझे इन धागों से 

सांसों को मेरी , तेरी सांसों से 


Far out there, when a  robin flies 

In the green meadows and smoky skies

The breeze flutters  and passes by 

The trees shudder and leaves sigh 

Will you hold my hand and walk by 

Till the life bids us adieu good bye ??




मंगलवार, 4 मई 2021

पंचिक "नेता बने"

नेता बने जब से ही गाँव के ये लप्पूजी,
राजनीति में भी वे चलाने लगे चप्पूजी।
बेसुरी अलापै राग,
सुन सभी जावै भाग।
लगे हैं ये कहलाने तब से ही भप्पूजी।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया

बरवै छंद "शिव स्तुति"

 बरवै छंद "शिव स्तुति"

सदा सजे शीतल शशि, इनके माथ।
सुरसरिता सर सोहे, ऐसो नाथ।।

सुचिता से सेवत सब, है संसार।
हे शिव शंकर संकट, सब संहार।

आक धतूरा चढ़ते, घुटती भंग।
भूत गणों को हरदम, रखते संग।।

गले रखे लिपटा के, सदा भुजंग।
डमरू धारी बाबा, रहे मलंग।।

औघड़ दानी तुम हो, हर लो कष्ट।
दुख जीवन के सारे, कर दो नष्ट।।

करूँ समर्पित तुमको, सारे भाव।
दूर करो हे भोले, भव का दाव।।
==============
बरवै छंद विधान:-

यह बरवै दोहा भी कहलाता है। बरवै अर्द्धसम मात्रिक छन्द है। इसके प्रथम एवं तृतीय चरण में 12-12 मात्राएँ तथा द्वितीय एवं चतुर्थ चरण में 7-7 मात्राएँ हाती हैं। विषम चरण के अंत में गुरु या दो लघु होने चाहिए। सम चरणों के अन्त में ताल यानि 2 1 होना आवश्यक है। मात्रा बाँट विषम चरण का 8+4 और सम चरण का 4+3 है। अठकल की जगह दो चौकल हो सकते हैं। अठकल और चौकल के सभी नियम लगेंगे।
********************
बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया

शनिवार, 24 अप्रैल 2021

एक ग़ज़ल

 

एक ग़ज़ल

सच कभी जब फ़लकसे उतरा है,
झूठ को नागवार  गुज़रा है।


बाँटता कौन है चिराग़ों को ,
रोशनी पर लगा के पहरा  है?


ख़ौफ़ आँखों के हैं गवाही में,
हर्फ़-ए-नफ़रत हवा में बिखरा है।


आग लगती कहाँ, धुआँ है कहाँ !
राज़ यह भी अजीब  गहरा है ।


खिड़कियाँ बन्द हैं, नहीं खुलतीं,
जख़्म फिर से तमाम उभरा है ।


दौर-ए-हाज़िर की यह हवा कैसी?
सच  भी बोलूँ तो जाँ पे ख़तरा है ।


आज किस पर यकीं करे ’आनन’
कौन है क़ौल पर जो ठहरा है ?

 


-
आनन्द.पाठक- 

 

गुरुवार, 22 अप्रैल 2021

शीर्षा छंद (शैतानी धारा)

शैतानी जो थी धारा।
जैसे कोई थी कारा।।
दाढों में घाटी सारी।
भारी दुःखों की मारी।।

लूटों का बाजे डंका।
लोगों में थी आशंका।।
हत्याएँ मारामारी।
सांसों पे वे थी भारी।।

भोले बाबा की मर्जी।
वैष्णोदेवी माँ गर्जी।।
घाटी की होनी जागी।
आतंकी धारा भागी।।

कश्मीरी की आज़ादी।
उन्मादी की बर्बादी।
रोयेंगे पाकिस्तानी।
गायेंगे हिंदुस्तानी।।
========
लक्षण छंद:-

"मामागा" कोई राखे।
'शीर्षा' छंदस् वो चाखे।।

"मामागा" = मगण मगण गुरु
(222 222 2),
दो-दो चरण तुकांत (7वर्ण प्रति चरण )
***************

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया

शुभमाल छंद "दीन पुकार"

सभी हम दीन।
निहायत हीन।।
हुए असहाय।
नहीं कुछ भाय।।

गरीब अमीर।
नदी द्वय तीर।।
न आपस प्रीत।
यही जग रीत।।

नहीं सरकार।
रही भरतार।।
अतीव हताश।
दिखे न प्रकाश।।

झुकाय निगाह।
भरें बस आह।।
सहें सब मौन।
सुने वह कौन।।

सभी दिलदार।
हरें कुछ भार।।
कृपा कर आज।
दिला कछु काज।।

मिला कर हाथ।
चलें सब साथ।।
सही यह मन्त्र।
तभी गणतन्त्र।।
==========
लक्षण छंद:-

"जजा" गण डाल।
रचें 'शुभमाल'।।

"जजा" =  जगण  जगण 
( 121    121 ) , 
दो - दो चरण तुकान्त , 6 वर्ण प्रति चरण
*****************
बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया

मंगलवार, 20 अप्रैल 2021

वो अफ़्साना

''वो अफ़्साना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन
..........उसे इक ख़ूबसूरत मोड़ दे कर छोड़ना अच्छा''

कई बार हर रिश्ते से पवित्र और सुखद दोस्ती का रिश्ता भी बिछड़ कर मिल ही जाता है , और ईश्वर कब कहाँ और कैसे इसकी रंगों के परत को उड़ा और कब कहाँ भर देता है इसका किसी को पता भी नही चलता है । एक दशक पहले जब सोशल साइट्स पर लोग जुड़ना शुरू किए थे तो लोग अपने परिवार के सदस्य मित्र और जान पहचान वालों की भी ख़ूब तलाश करते थे ।यह मायावी दुनिया किसी तिलिस्म से कम ना थी ।लोगों में दोस्ती करने की भी बड़ी ललक थी ।कोई मिल जाता तो बड़े हाल चाल पूछे जाते ।कहाँ से हो?... कैसे हो ??..किसको जानते हो ?? जैसे अनगिनत सवाल ।
आर्वी चेक रिपब्लिक में रहती थी तो फ़ेसबुक ट्विटर और ब्लॉग जैसे सोशल साइट्स पर ऐक्टिव भी रहती थी ।उसे लिखने का शौक़ था तो अपने विचार ऐसे माध्यम से व्यक्त भी किया करती थी ।लिखना उसका अपना शौक़ था और वह फ़ैशन की दुनिया में कार्यरत थी ।कभी रंगों के ताल-मेल के साथ शब्दों की भी अच्छा तालमेल कर जाती तो सभी चकित से रह जाते ।वह हिंदी और आंग्ल भाषा दोनो ही में बहुत ही अच्छा लिखती थी , उसकी दोनो ही भाषाओं पर अद्भुत पकड़ थी ।
अच्छा लेखन उसका फ़ेसबुक मित्र संख्या चार हज़ार के पार कर गयी सभी पढ़ते उसे ।उसी पाठक में एक पाठक था आरव रंजन ।उसके पोस्ट पर आरव ने अपने विचार रखे तो आर्वी धन्यवाद कह निकल गयी । दो तीन दिन बाद आरव का संदेश इनबॉक्स में भी पहुँच गया ।आर्वी ने हल्के से जबाब दिया और अपने काम में व्यस्त हो गयी ।सप्ताहंत और बर्फ़ भी बहुत गिर रही थी तो आज आउटिंग का कार्यक्रम स्थगित कर लैपटॉप ले कर बैठ गयी , कुछ ऑफ़िस के काम निपटा लिए फिर ट्विटर हैंडल पर ट्वीट किया और अब फ़ेसबूक पर status अपडेट करते ही कई विचारों की टिप्पडी की बरसात सी हो पड़ी ।शायरी का जबाब शायरी बहुत ही शायराना सा महोल बन गया और ख़ूब लिखती ही जा रही थी ।आरव का भी कई विचारों द्वारा आदान प्रदान हुआ ।आरव भी अच्छा लिख रहा था ,पर आर्वी अपनी धुन में थी ।
आरव साधारण सा पारिवारिक नेक दिल इंसान था और बातें करने को बेचैन भी रहता था। आरव ने आर्वी को संदेश भेजे लेकिन आदतन आर्वी ने उधर ध्यान नही दिया लेकिन जब वह खाली हुई तो उसने संदेश को देखा उसका जबाब दिया।आरव ने उससे दोस्ती की बात की, आर्वी के जबाब से संतुष्ट आरव ने उसे अपनी छोटी बहन बनने का आग्रह कर डाला, आर्वी का किसी भी रिश्ते पर कभी भी बहुत विश्वास नही था लिहाज़ा वह टाल गयी,लेकिन आरव अब जब बात करता आर्वी को कहता वह कितनी प्यारी है अगर उसकी कोई छोटी बहन होती तो बिलकुल उसी की तरह होती,आर्वी बातों को हंस कर टाल जाती।
आज सुबह जब आर्वी ने अपना फ़ेसबुक खोला उसने देखा आरव किसी रूप नाम की लड़की के status पर टिप्पडी में व्यस्त था,टिप्पडी में तारीफ़ पर तारीफ़,रूप भी हाज़िर जबाब हुए जा रही थी,अच्छी जुगलबंदी बनती दिख रही थी,यह सिलसिला अब अक्सर ही देखने को मिलने लगा था पर कुछ दिनो से ऐसा कुछ नही दिखा, इधर जब शायद आरव रंजन को रूप नही मिलती तो आर्वी से बातें करते और बातों में हज़ार सवाल करता कभी अपनी इच्छाओं कभी अपनी जीवनसगिनी कभी कुछ ऐसी बातें आर्वी से करता रहता था, आर्वी कभी कभी जबाब दे देती और कभी दो चार जबाब देकर फ़ेस बुक ही बंद कर चली जाती, इस तरह दोनो बातें तो करने लगे थे। आर्वी की तरह अब तक आरव की कई बहने फ़ेस बुक पर बन चुकी थीं।कुछ ही समय बाद फ़ेसबुक पर लिखने वालों ने किताब छपवा कर लेखक/लेखिका बन रहे थे।कवि सम्मेलन कर बड़े कवि और कवित्री के तमग़े से ख़ुद को नवाजे जा रहे थे।
शायद रूप भी अब बड़ी कवित्री के ओहदे को उठा चुकी थी वह विरासत में मिली हुई प्रतिभा को संभाल रही थी, लिहाज़ा आज आरव रंजन को रूप की ओर से बहुत तवज्जो नही मिल रही थी, आज आरव थोड़ा चिड़चिड़ा सा था और उसके पोस्ट पर कुछ तंज भरे लहजे में टिप्पडी लिखी थी, जिसे आर्वी ने पढ़ा और मुस्कुराकर मामले को समझ आगे बढ़ गयी।
आज आरव रंजन ने दो लाइन आर्वी से बातें करते करते लिखी ----

''हम को अच्छा नहीं लगता कोई हमनाम तिरा
कोई तुझ सा हो तो फिर नाम भी तुझ सा रक्खे''

आर्वी ने सोचा आरव ने यूँ ही लिखा दिया होगा शायद उसने कोई शायर को पढ़ लिया होगा।अब इस तरह कभी कभी आर्वी को आरव कभी दो कभी चार कभी कविता लिख भेजी, लगभग दो तीन सालों का साथ फ़ेसबुक पर दोनो का हो ही चुका था।एक दिन बात ही बात ने आर्वी ने कहा, '' इन बातों का क्या मतलब है मैं तो सिर्फ़ आप से बात कर लेती हूँ जस्ट लाइक अ फ़्रेंड ?आरव के स्वर कुछ तल्ख़ से हो उठे,उसने आर्वी से कहा फ़ालतू बातें ना करो आर्वी, '' तुम इतनी अच्छी हो सुंदर हो, वो बातें पुरानी हो चुकी हैं भूल जाओ उसे । इससे आर्वी को लगा कि आरव ने उसे कुछ ज़्यादा ही सोच रखा और अपने मन में कोई अलग ही जगह बना चुका है लेकिन कभी कभी आरव रंजन की बातें आर्वी को अटपटी सी लगती ।आर्वी की अपनी ज़िंदगी थी एक ख़ूबसूरत सा अच्छे पद पर कार्यरत स्मार्ट और उससे बेइंतहा प्यार करने वाला पति उसके सुंदर से प्यारे छोटे बच्चे ।एक अजनबी की रुहानी प्यार की बातें उसे बहुत लुभा नही पाती ,इधर उधर की बातें तक तो ठीक रहता था पर जैसे ही आरव आर्वी की तारीफ़ में कुछ लिखता ,उसे ऊब सी हो आती और आर्वी फ़ेसबुक बंद करके चली जाती । आज फिर आरव ने उसे सुंदरता की तारीफ़ करती हुई शायरी लिख भेजी,आज आर्वी भी उसकी इस बात को टोकते हुए बोली, '' आरव रंजन जी जब आपने दोस्ती की थी तो मुझे अपनी छोटी बहन कहा था न, तो फिर ये सब क्या है??
आरव के स्वर पहले ही तल्ख़ थे और आर्वी को लिखा तुम फ़ालतू बातें ना किया करो , वो बीती बातें हुईं, तुम इतनी ख़ूबसूरत हो.......ब्लाह...ब्लाह....ब्लाह
आर्वी ने अपना फ़ेसबुक बंद कर अपने काम में लग गयी ,फ़ुर्सत मिलने पर सोचने लगी क्या वास्तव में रिश्तों का कोई मोल नही या ज़रूरत के हिसाब से रिश्ते भी बनाए और सम्भाले जाते हैं । ख़ैर.......
आर्वी अब बातें बहुत ही कम करती इधर आरव और रूप सभी अपने अपने काम के सिलसिले में व्यस्त रहने लगे सभी आगे बढ़ते जा रहे थे । आर्वी भी धीरे धीरे सारी बातें समझ चुकी थी।इसी बीच आर्वी की माँ के अचानक निधन से आर्वी बुरी तरह टूट गयी।वह पूरी तरह अवसाद में चली गयी वह कई दिनो तक अस्पताल में रही अकस्सर अपनी माँ को याद करते करते बेहोश हो जाया करती थी, आर्वी के घर वालों को आर्वी को खोने का डॉक्टर सताने लगा था लेकिन डॉक्टरों के प्रयास ने आर्वी को काफ़ी हद तक ठीक कर दिया लेकिन हिदायत दी कि किसी तरह बात जिसे आर्वी के दिमाग़ पर असर डाले उससे आर्वी को दूर ही रखा जाय।
आर्वी ने अब आपने काम से पूरी तरह से दरकिनारा कर लिया।अब उसके पास पति बच्चे और ख़ुद उसका स्वास्थ्य ,जिसे सम्भालने में उसका पूरा समय निकल जाता।कभी कभी वह फ़ेसबुक खोलती उस पर उसने अपनी माँ की याद में पोस्ट डाली थी सामने आ जाती वह फिर बेचैन हो उठती।
लेकिन इधर कभी कभी आरव रंजन आर्वी से बातें करता और उस भारी समय में उसे दिलासे देता एक सच्चे और अच्छे मित्र की तरह।आर्वी को उससे हिम्मत मिलती थोड़ा दिमाग़ में भी माँ की लिखी बातों से पृथकता मिलती।लगभग साल बीत गया,समय ऐसे ही चलता रहता।आरव रंजन अपनी आदत की तरह उसे शायरी ग़ज़ल लिख भेजते लेकिन अब आर्वी असहज महसूस करती लिहाज़ा आर्वी आरव की इस आदत से बहुत ही जल्दी ऊब सी महसूस करने लगी थी और हर चीज़ आर्वी को जैसे तकलीफ़ ही दे रही थी आर्वी अपने ही हालात के आगे विवश थी और एक दिन उसने अपने फ़ेसबुक अकाउंट को ही हमेशा के लिए बंद कर दिया उसे बड़ा ही सुकून सा महसूस होने लगा लिहाज़ा उसे अपना यह निर्णय उचित लगा ।

लगभग दो साल बीतने के पश्चात आर्वी ने एक नया अकाउंट अपने दूसरे नाम 'आशि 'और तस्वीर के साथ बनायी और अब लिखने का सिलसिला फिर से शुरू किया, नए फ़्रेंड लिस्ट के साथ लिखने का नया कलेवर थोड़ा सुकून सा देने लगा था।परिस्थियों ने उसे और गम्भीर भी बना दिया था लिहाज़ा आर्वी की लेखनी समय की धार से और पैनी हो चली थी ।आर्वी किसी ग्रूप में कुछ लिखी थी उसपर कई लोगों के टिप्पडी से पोस्ट की रौनक़ कई दिनो से बढ़ रही थी ।आरव के भी उस पर कुछ शब्दों के फूल सजे गए थे ।आरव रंजन, आर्वी का हाथ माउस पर ही था उसने नाम पर क्लिक कर दिया ।
दो दिन बाद आरव की फ़्रेंड रिक्वेस्ट आर्वी के पास आ पहुँची ,आर्वी ने सोचा मित्र सूची में जोडू या न जोड़ूँ , इसी सोच में ही कन्फ़र्म बटन दब गया ।मित्र हो जाने के बाद आर्वी आरव की टाइमलाइन तक जा पहुँची ।उसने आरव की कलमकारी भी देखी पर अब आरव वैसा नही था । आरव की बहुत सी लिखी बातें आर्वी को दुखी कर गयी, आर्वी कोमल हृदय की लड़की थी शब्दों की बारीकी बख़ूबी समझती थी ।आरव ने हेलो लिखा । फिर इन बॉक्स , ये जनाब सुधरे नही आजतक कह मन ही मन आर्वी मुस्कुराई ।और जबाब भी दे दिया ।थोड़ी सी बातें हुई और आर्वी चली गयी ।
आदतन आरव आर्वी से अक्सर संदेश का आदान प्रदान करने लगा । दो तीन दिन आरव का कोई संदेश ना देख आर्वी को भी थोड़ी चिंता सी हुई आर्वी ने आरव से कारण जाने के लिए संदेश लिख भेजे । जबाब में आरव ने अपनी तबियत ख़राब की बात बताई और बातों ही बातों में आरव काफ़ी बातें भी कह गया ।आर्वी जाने अनजाने स्वयं को थोडी सी दोषी मान बैठी, आर्वी को लगा कि उसके माँ की निधन के बाद आरव उसको अकस्सर बातों से दिलासे देता था उसका मन इधर उधर बहल भी जाता था कभी नयी नयी शायरी कभी कुछ सवाल जैसे उस राह से उसे अलग ले जा रहे थे शायद समय आर्वी के अनुकूल हो रहा था, वजह जो भी रही हो।
आर्वी मन ही मन सोचने लगी आरव एक नेकदिल इंसान है ।शायद कहीं उसके दिल में भी एक दोस्त की कमी है जिससे वह खुल के बात कर सके ।पारिवारिक समस्याएँ टूटे सपनो को फीका रंग उसके सेहत पर साफ़ नज़र आ रहा था । आर्वी एक मनोविज्ञान की छात्रा रह चुकी थी लिहाज़ा उसका देखने का नज़रिया भी अलग था एक मनोचिकित्सक सी हर बात को समझ मानवता के धागे से आरव की समस्याओं को दूर करने की ठान ली जाने अनजाने उसने अपने ऊपर आरव रंजन के एहसान को एक दोस्त की तरह उतारना भी चाहती थी इसलिए उससे बंध गयी ।आरव अपनी सपनिली दुनिया में ख़ुश था । आज उसका जन्मदिन था और शायद आज पहले वह इतना ख़ुश कभी ना था ।आर्वी ने भी अपने बचपन का दोस्त इन दिनो में खो दिया था तो आरव में वह अपना वही दोस्त देख उसके साथ हो ली थी और उसे उसको उदास देखना अच्छा नही लगता था ।आज उसके जन्मदिन पर आर्वी ने शब्दों के गुलदस्ते और दोस्ती का साथ निभाने की वादे के साथ ढेरों शुभकामनाएँ भी दी ।आरव और आर्वी उस समय एक सच्ची दोस्त बन गये थे ।आरव का स्वास्थ्य भी अब सुधरने लगा था और आरव अब ख़ुश भी रहता था उसकी इसी ख़ुशी को देख आर्वी भी ख़ुश हो जाती थी ।
आर्वी हमेशा कहती ,
''हम से पूछो न दोस्ती का सिला
दुश्मनों का भी दिल हिला देगा
आदमी आदमी को क्या देगा
जो भी देगा वही खुदा देगा !!
लेकिन समय हमेशा एक सा नही रहता। आरव रंजन अपनी आदत के अनुसार आर्वी को एक कविता लिख भेजी।आर्वी ने अपना नाम तो बदल दिया था जिससे आरव रंजन उसे आर्वी नही समझ रहा था अब वह आशि थी।

जहाँ पर "रूप" छाया है
समझ लो तेरा साया है
वहाँ पर गम पराया है
वहीं सुख शांति होती है ।। रंजन

आर्वी/आशि ने कविता पढ़ते ही आरव से पूछा 'रूप' आपकी पत्नी का नाम है जिन्हें आप कोट कर लिखते हैं,अन्दाज़ क़ाबिले तारीफ़ है आपका। आरव ने सफ़ाई देते हुए कहा नही ये मेरी पत्नी का नाम नही यह मेरी काल्पनिक प्रेमिका है जिसका नाम अक्सर मेरी रचनाओं में होता है।आर्वी को समझते देर ना लगी ये रूप है कौन।सब कुछ जानते हुए भी आर्वी अनजान ही बनी रही।बातों ही बातों आरव रंजन ने आशि से आर्वी की बात भी कह डाली,कहा जहाँ से तुम हो वही से आर्वी थी क्या तुम आर्वी को जानती हो?
आशि ने आर्वी को ना जांनने की बात कही और सवाल करते हुए कहा कि क्या आर्वी आपकी कुछ ख़ास लगती थी क्या??
आरव रंजन ने इंकार करते हुए कहा कि, नही वह एक अच्छी लड़की थी बस ।
और बहुत अच्छा लिखती थी पर उसकी माँ के निधन के बाद उसे ना जाने क्या हुआ और वह फ़ेसबुक से अचानक ग़ायब हो गयी थी, बस कभी कभी उसकी फ़िक्र होती है।
आशि ने बात को टालते हुए बातों का रूख दूसरी ओर मोड़ दिया।
इस तरह बातों का सिलसिला तो चलता रहा।आरव रंजन का जन्मदिन आया तोहफ़े में आशि से एक अनोखा तोहफ़ा माँगा, आशि ने सहर्ष स्वीकार करते हुए एक कहानी में अपने विचारों को पिरोकर उसे तोहफ़े में दे दिया।
आरव रंजन ने आशि की लिखने के तौर तरीक़े से बहुत प्रभावित होते हुए उसे किताब छपवाने का प्रस्ताव दे डाला हालाँकि आरव ने आर्वी को भी यह प्रस्ताव दे रखा था पर आर्वी ने कभी भी कोई उत्साह नही दिखाया।इस बार कहानी की किताब की बात थी और आशि ने आरव रंजन की बात को रखते हुए उस पर पूरा विश्वास करते हुए किताब के लिए हाँ कह दिया । आशि अपनी कहानी को समेटने और उन्हें क़रीने से करने में जुट गयी अब आशि और आरव के बीच बात का ज़रिया किताब ही रहता, इस बात में कहीं आशि को लगने लगा था की उसकी कोई किताब नही छप सकती, यह बात उसने आरव रंजन से भी कही। आरव ने कहा तुम मुझ पर सारी बातें छोड़ दो।बातें बढ़ने लगी चैट और फ़ोन दोनो से दोनो बातें करने लगे और इसी बीच आरव ने अपने प्यार का इज़हार भी आशि से कर दिया लेकिन आशि ने कहा आरव जी हम एक अच्छे दोस्त है और हमेशा रहेंगे और मैंने आपको एक दोस्त के अलावा किसी और नज़र से नही देखा मेरे मन में आपके लिए बहुत इज़्ज़त है पर........
इसी बीच आशि ने भी अपनी सच्चाई बताते हुए कहा की वही आर्वी है और बोली मैं आपसे आपका प्यार का हक़ भी छीन रही हूँ........
आरव रंजन ने आर्वी से कहा तुम मेरी आदत हो....
आशि आर्वी बोली आरव जी आदतें समय के साथ बदल जाती है इसलिए मुझे ऐसे ना कहो आप....
आरव ने कहा मेरी आदत कभी नही बदलती......
समय गुज़रता रहा किताब में रिश्ते उलझ गये और रिश्ते की डोर खिच सी गयी....
आरव समय के साथ बदल गया....
आर्वी स्वाभिमानी और कर्मठ लड़की तो थी ही पर दिल की बहुत नाज़ुक और सीधी सच्ची लड़की थी...उससे आरव का रुखा और बदला व्यवहार समझ नही आ रहा था।
वह कारण जाने के लिए आरव को फ़ोन और संदेश देती अब आरव उसे अनदेखा करने लगा था।एक दिन आर्वी ने देखा आरव रंजन रूप की पोस्ट पर अपनी दुआएँ दिए जा रहा था अब यह बार बार होने लगा।अब आर्वी को सारी बात साफ़ साफ़ समझ आ गयी थी। शायद आर्वी की वह दुआ जो उसने आरव रंजन को दी थी कि मैं दुआ करूँगी की आपका प्यार आपको मिल जाय शायद खुदा के यहाँ क़ुबूल हो गयी थी। आरव रंजन की रूप उसे मिल गयी थी।आर्वी ने यह सब देख समझ कर अपने क़दम पीछे कर लिए और अब आरव रंजन को कभी ना परेशान करने के वादे के साथ आपना रूख पीछे की ओर मोड़ लिया था ।
आरव रंजन ने आर्वी को साहिर बना दिया था आशि ने दिल ही दिल में उसके किए के लिए शुक्रिया कहते हुए उससे दूर होने का फ़ैसला ले लिया।
आर्वी कहती थी कि-----
''वो अफ़्साना जिसे अंजाम तक लाना न हो मुमकिन
उसे इक ख़ूबसूरत मोड़ दे कर छोड़ना अच्छा.............''
आर्वी को वही छोड़ आशि कहीं आगे निकलने के लिए अपने क़दम बढा दिए थे ।

Shweta Misra