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रविवार, 30 मई 2021

एक ग़ज़ल : उँगलियाँ वो सदा उठाते हैं

 एक ग़ज़ल 


उँगलियाँ वो सदा उठाते हैं

शोर हर बात पर मचाते हैं


आप की आदतों में शामिल है

झूठ की ’हाँ ’ में”हाँ ’ मिलाते हैं


आँकड़ों से हमें वो बहलाते

रोज़ सपने नए दिखाते हैं


बेच कर आ गए ज़मीर अपना

क्या है ग़ैरत ! हमें सिखाते हैं


लोग यूँ तो शरीफ़ से दिखते

साथ क़ातिल का ही निभाते हैं


चल पड़ा है नया चलन अब तो

दूध के हैं  धुले,  बताते हैं


दर्द सीने में पल रहा ’आनन’

हम ग़ज़ल दर्द की सुनाते हैं


-आनन्द.पाठक -

शुक्रवार, 28 मई 2021

आओ निहारिका हो जाए

 एक आकाश गंगा तुम  

एक निहारिका मैं 

अगनित तारों सूरज से 

भरे तुम 

कितने ही नजारे 

समाए हुई मैं 


एक काल से 

जलते हुए  तुम

एक समय से 

धधकती हुई मैं 


दूर सुदूर ब्रह्मांड में 

बसाये हुए तुम

और 

कुछ प्रकाश दूरी पे  

ठिठकी  हुई मैं 


सदियों से अपनी ओर

खींचते तुम

अनादि से तुम्हे

सम्मोहित करती हुई मैं 


सदियों के इस

रस्साकशी में 

न जीते हो तुम  

और न हारी हूं मैं 


तो आओ 

इस "मैं"  को मिटा कर 

इस "तुम"  को भुला कर 

बस राख राख 

 धुआं धुआं हो जाए

 

तितली के दो पंख सम

आज से ,अभी से 

 तितली  🦋 निहारिका

हो जाए 


और  फिर जन्म दे हम 

अगनित तारों को,

सौर्य मंडलों को,

और 

अनेकों ऊर्जा पिंडों सी

तुम्हारी और  मेरी 

अनंत  संततियो को !!



गुरुवार, 27 मई 2021

छप्पय "शिव-महिमा"

(छप्पय छंद)

करके तांडव नृत्य, प्रलय जग में शिव करते।
विपदाएँ भव-ताप, भक्त जन का भी हरते।
देवों के भी देव, सदा रीझें थोड़े में। 
करें हृदय नित वास, शैलजा सह जोड़े में।
प्रभु का निवास कैलाश में, औघड़ दानी आप हैं।
भज ले मनुष्य जो आप को, कटते भव के पाप हैं।।
*** *** ***

*छप्पय छंद* "विधान"

छप्पय एक विषम-पद मात्रिक छंद है। यह भी कुंडलिया छंद की तरह छह चरणों का एक मिश्रित छंद है जो दो छंदों के संयोग से बनता है। इसके प्रथम चार चरण रोला छंद के, जिसके प्रत्येक चरण में 24-24 मात्राएँ होती हैं तथा यति 11-13 पर होती है। आखिर के दो चरण उल्लाला छंद के होते हैं। उल्लाला छंद के दो भेदों के अनुसार इस छंद के भी दो भेद मिलते हैं। प्रथम भेद में 13-13 यानि कुल 26 मात्रिक उल्लाला के दो चरण आते हैं और दूसरे भेद में 15-13 यानि कुल 28 मात्रिक उल्लाला के दो चरण आते हैं।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया

रविवार, 23 मई 2021

एक ग़ज़ल

 एक ग़ज़ल 


आँकड़ों से हक़ीक़त छुपाना भी क्या !

रोज़ रंगीन सपने  दिखाना भी क्या !


सोच में जब भरा हो धुआँ ही धुआँ,

उनसे सुनना भी क्या और सुनाना भी क्या !


वो जमीं के मसाइल न हल कर सके

चाँद पर इक महल का बनाना भी क्या !


बस्तियाँ जल के जब ख़ाक हो ही गईं,

बाद जलने के आना न आना भी क्या !


अब सियासत में बस गालियाँ रह गईं,

ऎसी तहजीब को आजमाना भी क्या !


चोर भी सर उठा कर हैं चलने लगे,

उनको क़ानून का ताज़ियाना भी क्या !


लाख दावे वो करते रहे साल भर,

उनके दावों का सच अब बताना भी क्या !


इस व्यवस्था में ’आनन’ कहाँ तू खड़ा ,

तेरा जीना भी क्या, तेरा जाना भी क्या !


-आनन्द.पाठक-

ताज़ियाना = चाबुक .कोड़ा
मसाइल - मसले ,समस्याएँ

गुरुवार, 13 मई 2021

थोड़ा सा मिल जाए आसमां

 थोड़ा सा मिल जाए  आसमां

थोड़ी सी मांगू मैं जमीं

पानी सी कल कल बह चलूं 

गर किनारे हो जाए हमनशी....


I wanna paint  town ,all red 

I wanna do  all  I  have said 

I wanna be, in your arms 

I  wanna feel all your calm 


थोड़ा सा मिल जाए आसमान 

थोड़ी सी मांगू मैं जमीन ...


जबसे मिले हो हमनवां 

देखो देखो दिल  ये उड़ चला 

है ख्वाहिशें भी पतंग सी 

कि हवाएं भी मलंग सी 

Come on feel करो

 उन सांसों को 

तुमसे बंधी है उन आसों को 

बांधों मुझे इन धागों से 

सांसों को मेरी , तेरी सांसों से 


Far out there, when a  robin flies 

In the green meadows and smoky skies

The breeze flutters  and passes by 

The trees shudder and leaves sigh 

Will you hold my hand and walk by 

Till the life bids us adieu good bye ??




मंगलवार, 4 मई 2021

पंचिक "नेता बने"

नेता बने जब से ही गाँव के ये लप्पूजी,
राजनीति में भी वे चलाने लगे चप्पूजी।
बेसुरी अलापै राग,
सुन सभी जावै भाग।
लगे हैं ये कहलाने तब से ही भप्पूजी।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया

बरवै छंद "शिव स्तुति"

 बरवै छंद "शिव स्तुति"

सदा सजे शीतल शशि, इनके माथ।
सुरसरिता सर सोहे, ऐसो नाथ।।

सुचिता से सेवत सब, है संसार।
हे शिव शंकर संकट, सब संहार।

आक धतूरा चढ़ते, घुटती भंग।
भूत गणों को हरदम, रखते संग।।

गले रखे लिपटा के, सदा भुजंग।
डमरू धारी बाबा, रहे मलंग।।

औघड़ दानी तुम हो, हर लो कष्ट।
दुख जीवन के सारे, कर दो नष्ट।।

करूँ समर्पित तुमको, सारे भाव।
दूर करो हे भोले, भव का दाव।।
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बरवै छंद विधान:-

यह बरवै दोहा भी कहलाता है। बरवै अर्द्धसम मात्रिक छन्द है। इसके प्रथम एवं तृतीय चरण में 12-12 मात्राएँ तथा द्वितीय एवं चतुर्थ चरण में 7-7 मात्राएँ हाती हैं। विषम चरण के अंत में गुरु या दो लघु होने चाहिए। सम चरणों के अन्त में ताल यानि 2 1 होना आवश्यक है। मात्रा बाँट विषम चरण का 8+4 और सम चरण का 4+3 है। अठकल की जगह दो चौकल हो सकते हैं। अठकल और चौकल के सभी नियम लगेंगे।
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बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया