मित्रों!

आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं।

बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए।


फ़ॉलोअर

रौशन जसवाल विक्षिप्त लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
रौशन जसवाल विक्षिप्त लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

सोमवार, 11 मार्च 2024

शंखनाद संगठन साहित्य, संगीत,लेखन, रंगमंच और पत्रकारिता के लिए 14 विभूतियों को सिरमौर गौरव-2024

 

नाहन ,साहित्य ,संगीत ,कला ,मीडिया ,रंगमंच और समाजसेवा के क्षेत्र में प्रदेशभर में पिछले कई वर्षों से राज्यस्तरीय आयोजन करने वाली संस्था "शंखनाद संगठन" ने  नाहन में कला भाषा एवं संस्कृति अकादमी शिमला के सहयोग से एक राज्यस्तरीय भव्य आयोजन किया ज़िसमें प्रदेशभर में साहित्य ,संगीत ,कला ,रंगमंच ,मीडिया और लेखन के क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य करने वाली 14 विभूतियों को शंखनाद विशिष्ट सम्मान " सिरमौर गौरव -2024 " से विभूषित किया गया  .शंखनाद संगठन के प्रदेश अध्यक्ष श्री ललित शर्मा और निदेशक डॉ.श्रीकांत अकेला के अनुसार इस भव्य अलंकरण समारोह में सेवानिवृत आई ए एस अधिकारी श्री कश्मीर चन्द मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए  जबकि प्रसिद्ध लेखक भाषा संस्कृति विभाग के पूर्व सहायक निदेशक ,पूर्व सहायक निदेशक भाषाविद श्री गोपाल दिलैक ने समारोह की अध्यक्षता  की ,इस विशिष्ट सम्मान समारोह में पूर्व अतिरिक्त सचिव विधि विभाग ,प्रसिद्ध चिंतक राजेन्द्र भट्ट ,प्रसिद्ध समाजसेवी विनोज शर्मा और भारत विकास परिषद नाहन के अध्यक्ष और समाजसेवी एल. आर. भारद्वाज समारोह के विशिष्ट अतिथि थे  ,संस्था के पदाधिकारियों के अनुसार इस समारोह में प्रथम सत्र में गीत संगीत और सम्मान समारोह हुआ  और दूसरे सत्र में साहित्यिक गोष्ठी आयोज़ित की गई  ,  जिसकी अध्यक्षता प्रदेश की वरिष्ठ साहित्यकार श्रीमती शबनम शर्मा ने की , कार्यक्रम  में प्रसिद्ध कवि भुवन जोशी और अनिल शर्मा ने बेहतर मंच संचालन किया,इस  समारोह में साहित्य लेखन के क्षेत्र में सोलन के डॉ.प्रेमलाल गौतम,साहित्य लेखन के क्षेत्र में मंडी की प्रसिद्ध लेखिका डॉ.रेखा वशिष्ठ ,लेखन और समीक्षा के क्षेत्र में कांगडा के विजय उपाध्याय  ,रंगमच के किये नाहन के राकेश शर्मा ,कला के क्षेत्र में सोलन के डॉ.चमन शर्मा ,लोक संगीत के लिए संगड़ाह के हरिचन्द ठाकुर, शास्त्रीय संगीत के लिए मनोज कुमार ,साहित्य लेखन के लिए नाहन की अनुदीप भारद्वाज , कहानी लेखन में सिरमौर की लेखिका विजय रानी बंसल ,संगीत के लिए डॉ.मृत्युंजय शर्मा ,सकारात्मक पत्रकारिता के क्षेत्र में अक्स मीडिया के प्रधान सम्पादक अरूण साथी और एम बी एम न्यूज नेटवर्क की वरिष्ठ पत्रकार रेणु कश्यप, साहित्य के लिए डॉ.कुलदीप भाटिया ,लोक संस्कृति के संरक्षण के लिए आरती शर्मा को शंखनाद विशिष्ट सम्मान सिरमौर गौरव -2024 प्रदान किया गया  ,दूसरे सत्र में एक कवि सम्मेलन आयोजित किया गया जिसमें दीपराज विश्वास ,शबनम शर्मा ,रविता ,सुनिता भारद्वाज ,मौ क्युम ,चिरानन्द शास्त्री ,अनिल शर्मा ,भुवन जोशी , डॉ श्रीकांत ,रेणु गोस्वामी ,साधना शर्मा ,दिलीप वशिष्ठ ,गोपाल दिलैक ,एल आर भारद्वाज ,अनुदीप भारद्वाज ,सरला गौतम ,विजय रानी बंसल ,विजय उपाध्याय ,आदि ने काव्य पाठ किया ,

शनिवार, 10 जून 2023

शूलिनी मेला

हिमाचल को प्राचीन काल से ही देव भूमि के नाम से संबोधित किया गया है। यदि हम ये कहें कि हिमाचल देवी देवताओं का निवास स्थान रहा है । हमारे कई धर्म ग्रन्थों में भी हमे हिमाचल का विवरण मिलता है। महाभारत 
,पदमपुराण और कनिंघम जैसे धर्म ग्रन्थों में हमे हिमाचल का विवरण मिलता है। इस सब से हम ये अनुमान लगा सकते है कि हिमाचल प्राचीन काल से ही देवी देवताओं का प्रिय स्थान रहा है ।

हिमाचल प्रदेश के 12 जिलों में सोलन  एक महत्‍वपूर्ण जिला है। सोलन  जिला मुख्यालय है । सोलन  राज्य की राजधानी शिमला से लगभग 47  किलोमीटर और  5,090 फीट की औसत ऊंचाई पर स्थित है।  कालका-शिमला राष्ट्रीय राजमार्ग-22 पर  स्थित है । नैरो-गेज कालका-शिमला रेलवे सोलन से होकर गुजरती है। पंजाब हिमाचल सीमा पर स्थितसोलन हिमालय की शिवालिक पहाड़ियों में बसा है ।

सोलन  का नाम देवी शूलिनी देवी के नाम पर रखा गया है । हर साल जून में  3 दिवसीय  शूलिनी मेला आयोजित किया जाता है। सोलन तत्कालीन रियासत  बघाट की राजधानी थी । 

सोलन को मशरूम शहर  रूप में जाना जाता है क्योंकि  मशरूम की खेती के साथ-साथ चंबाघाट में  मशरूम अनुसंधान निदेशालय भी है। टमाटर के थोक उत्पादन के कारण सोलन को लाल सोने का शहर भी कहा जाता है। 

सोलन में कई प्राचीन मंदिर  हैं। देश की सबसे पुरानी ब्रुअरीज  मोहन मैकिन भी सोलन में  है। धारों की धार  पहाड़ी पर 300 साल पुराना किला भी है। शूलिनी माता मंदिर और जटोली शिव मंदिर पर्यटकों के लिए लोकप्रिय स्थान हैं। कालाघाट ओच्‍छघाट में तिब्‍बती  मठ इस क्षेत्र के सबसे प्रसिद्ध मठों में से एक है।


मां शूलिनी मेला लगभग 200 साल से मनाया जा रहा है।  इस मेले का इतिहास बघाट रियासत से जुड़ा हैं।  यह मेला हर साल जून माह में मनाया जाता है। इस दौरान मां शूलिनी शहर के भ्रमण पर निकलती हैं व वापसी में अपनी बहन के पास दो दिन के लिए ठहरती हैं। इसके बाद अपने मंदिर स्थान पर वापस पहुंचती हैंइसलिए इस मेले का आयोजन किया जाता है। माना जाता है कि माता शूलिनी सात बहनों में से एक थी। अन्य बहनें हिंगलाज देवीजेठी ज्वाला जीलुगासना देवीनैना देवी और तारा देवी के नाम से विख्यात हैं। सोलन नगर बघाट रियासत की राजधानी हुआ करती थी। इस रियासत की नींव राजा बिजली देव ने रखी थी। बारह घाटों से मिलकर बनने वाली बघाट रियासत का क्षेत्रफल लगभग 30  वर्ग मील में फैला हुआ था। इस रियासत की प्रारंभ में राजधानी जौणाजी कुछ समय कोटी और बाद में सोलन बनी। राजा दुर्गा सिंह इस रियासत के अंतिम शासक थे।

माँ शूलिनी देवी दुर्गा या पार्वती का प्रमुख रूप है। उन्हें देवी और शक्तिशूलिनी दुर्गाशिवानी और सलोनी के नाम से भी जाना जाता है। माँ शूलिनी भगवान शिव की शक्ति हैं।

भगवान विष्णु के चौथे अवतार नरसिंहउपद्रवी असुर राजा हिरण्यकश्यप को मारने के बाद अपने क्रोध को नियंत्रित नहीं कर सके। नरसिंह पूरे ब्रह्मांड के लिए खतरा बन रहे थे तब भगवान शिवनरसिंह को शांत करने के लिए शरभ के रूप में प्रकट हुए। शरभ एक आठ पैरों वाला जानवर थाजो शेर या हाथी से अधिक शक्तिशाली था और सिंह को शांत करने में सक्षम भी था। नरसिंह को शांत करने के लिए भगवान शिव के आशीर्वाद से शूलिनी भी प्रकट हुई थीं। माँ शूलिनी सोलन के लोगों की कुल देवी हैं। प्रदेश में मनाए जाने वाले पारंपरिक एवं प्रसिद्ध मेलों में माता शूलिनी मेला का भी प्रमुख स्थान है। बदलते परिवेश के बावजूद यह मेला अपनी प्राचीन परंपरा को संजोए हुए है।

मान्यता है कि माता शूलिनी के प्रसन्न होने पर क्षेत्र में किसी प्रकार की प्राकृतिक आपदा या महामारी का प्रकोप नहीं होता हैबल्कि सुख-समृद्धि व खुशहाली आती है। मेले की यह परंपरा आज भी कायम है। कालांतर में यह मेला केवल एक दिन ही अर्थात् आषाढ़ मास के दूसरे रविवार को शूलिनी माता के मंदिर के समीप खेतों में मनाया जाता था। सोलन जिला के अस्तित्व में आने के पश्चात् इसका सांस्कृतिक महत्व बनाए रखने तथा इसे और आकर्षक बनाने के अलावा पर्यटन की दृष्टि से बढ़ावा देने के लिए राज्य स्तरीय मेले का दर्जा प्रदान किया गया और तीन दिवसीय उत्सव का दर्जा प्रदान किया गया है। वर्तमान समय में यह मेला जहां जनमानस की भावनाओं  से जुड़ा हैवहीं पर विशेषकर ग्रामीण लोगों को मेले में आपसी मिलने-जुलने का अवसर मिलता है जिससे लोगों में आपसी भाईचारा तथा राष्ट्र की एकता व अखंडता की भावना पैदा होती है।