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मंगलवार, 5 नवंबर 2013

पत्थर बरसाने का मेला


21वीं सदी के इस दौर में शिमला के समीप एक ऐसा गांव है, जहां पर अभी भी पुरानी परंपरा पूरे रस्मों रिवाज के साथ निभाई जाती है। शिमला शहर से 35 किलोमीटर दूर धामी में पत्थरों के खेल का मेला होता है। दिवाली से एक दिन बाद इस मेले का आयोजन किया जाता है। दो गांव के लोगों के बीच तब तक पत्थर बरसाए जाते हैं, जब तक किसी के शरीर से खून नहीं निकल जाता। शरीर से खून निकलने के बाद राज परिवार के लोग इस खूनी खेल के खत्म होने की घोषणा करते हैं। भद्रकाली के मंदिर में खून का टीका करते हैं। एक-दूसरे पर पत्थर बरसा कर जान लेने पर उतारू लोग दो ही पल में गले मिलकर नाटी डालते हैं। खून का टीका होने के बाद दोनों गुटों के लोग आपस में गले मिलते हैं। लोगों के लिए भले ही यह मेला मनोरंजन का केंद्र रहता हो, लेकिन क्षेत्र के लोगों की आस्था मेले के इस खेल से जुड़ी हुई है। दिवाली से ठीक एक दिन बाद धामी स्थित खेल का चौरा नामक स्थान पर इस मेले का आयोजन किया जाता है। धामी क्षेत्र के दो गांव जमोगी व कटेड़ू की टोलियां मैदान के दोनों तरफ गुटों में बंट जाती हैं। मैदान के बीच में सती का शारड़ा है इसके दोनों तरफ गांव के यह लोग खड़े रहते हैं। दोनों टोलियों की तरफ से तब तक पत्थर बरसाए जाते हैं, जब तक किसी के शरीर से खून निकलना बंद नहीं हो जाता। पत्थर से घायल हुए व्यक्ति के खून से भद्रकाली के मंदिर में टीका किया जाता है।  आधुनिकता के इस दौर में लोगों में यह परंपरा खत्म होने के बजाय बढ़ रही है। दिवालीसे ठीक 11 दिन बाद कालीहट्टी नामक स्थान पर भी इसी तरह के मेले का आयोजन किया जाता है। यह जगह शिमला से 30 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। वहां पर भी कालीमाता का मंदिर है। दो गांव के लोग वहां पर भी आस्था के नाम पर एक-दूसरे पर पत्थर बरसाते हैं।

साभार     दिव्‍य हिमाचल 

बुधवार, 9 अक्टूबर 2013

श्याम स्मृति-......मानव मन, धर्म व समाज ...डा श्याम गुप्त ....

                        श्याम  स्मृति-......मानव मन, धर्म समाज ...
                    जिस प्रकार मानव मन विभिन्न मानसिक ग्रंथियों का पुंज है, समाज भी व्यक्तियों का संगठन है|  मन बड़ा ही अस्थिर है, चलायमान है, वायवीय तत्व है | इस पर नियमन आवश्यक है |
                   कानून मनुष्य ने बनाए हैं, उनमें छिद्र अवश्यम्भावी  हैं, धर्म शाश्वत है, वही मन को स्थिरता दे सकता हैधर्महीन मानव, धर्महीन समाज, धर्महीन देश ...स्थिरता तो क्या एक क्षण खडा भी नहीं रह सकता .... अपने पैरों परआज विश्व की अस्थिरता का कारण है धर्महीन समाज |    धर्म का अर्थ सम्प्रदाय नहीं है | आज के चर्चित "रिलीज़न" वास्तव में सम्प्रदाय ही हैं | धर्म और रिलीज़न दो भिन्न संस्थाएं हैंआज चर्चित भिन्न-भिन्न  मत-मतान्तर, धार्मिक नियम ..धर्म नहीं हैं | धर्म तो एक ही है और वह शाश्वत है | धर्म का अर्थ है ...कर्तव्य का पालन,,,,,| और धर्म का केवल एक ही सिद्धांत है..."कभी दूसरों को दुःख मत दो |"......
परहित सरिस धर्म नहीं भाई
परपीड़ा सम नहीं अधमाई |

" सर्वें सुखिना सन्तु 
सर्वे सन्तु निरामया |
सर्वे पश्यन्तु भद्राणि,
मा कश्चिद दुखभाग्भवेत ||"