सांसें बुलाती हैं---पथिक अनजाना -524 वीं
दूरियाँ इसलिये नही बढाई कि मैं जिन्दगी जीना चाहता हू
जरूरत जामे की कर्मों की मौजूदगी जग
में जाहिर करती हैं
मजबूरियों से नही मैं भयभीत नही
करना बन्दगी चाहता हू
चाहत सिर्फ शांत संगीत की जीने का सबब
इंसा कोबताती हैं
संगीत धुनजब सांस की धुन के संग मिल लय
बनता हैं
सारी समस्याऔ से बचने का कवच आसपास तनजाता
हैं
भीतर वह मधुर धुन छाती जहाँ जिन्दगी
होश खोजातीहैं
नही इच्छा फिरजहाँ में आये हिसाब बाकी
सांसें बुलातीहैं
मजबूरियाँ इंसा को जीते बाद मरने मजबूर
कर जाती हैं
पथिक
अनजाना