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शुक्रवार, 25 अप्रैल 2014

शब्दों की लाईनों को इंसा सीमायें मानते हैं--पथिक अनजाना--591वीं पोस्ट



शब्दों की लाईनों को इंसा सीमायें मानते हैं
मेरे यार शरीर को दिल को व जिन्दगी को गर दर्द देना चाहते हो
तो कर लो प्यार ही प्यार सिर्फ जिन्दगी से जीते जी तुम इक बार
दूर हटो इंसान निर्मित कयानात से दूर करो दुनिया से खुद को
यहाँ दर्द ही दर्द मिलेगा जिन लम्हों में प्यार साथ कोई नहीं हैं
प्यार प्रकृति से एंव बेजुबां से करो जुबां वाले प्यार जानते नही
दुनिया को स्थायी मानते  मंजिल जिन्दगी की पहचानते नही.हैं
राह प्रमाणित करते बहुतेरे ज्ञानी हैं पर ज्ञान को यह मानते नही
नही समझे  पथिक अनजाना  हमसफर साथियों के विचारों को
पढते लिखते पर शब्दों की लाईनों को आडी तिरछी सीमायें मानते
सीमा कैसी किसकी पर अर्थ प्रभाव से इंसान क्या अनजान हैं ?
उदेश्य इनका हित लक्ष्य में,पर शब्दों को अंगीकार करना व्यर्थ हैं

पथिक अनजाना