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बुधवार, 14 जनवरी 2015

मकर संक्रान्ति 2015 की शुभकामनाएं

मंच के सभी मित्रों/सदस्यों को

मकर संक्रान्ति की शुभ कामनाएं

मौसम आया है पतंग का
बच्चे-बूढ़ों  के उमंग का
उड़ी पतंगे आसमान में
चित्र बनाती रंग-बिरंग का


-आनन्द.पाठक
09413395592

रविवार, 11 जनवरी 2015

एक लघु कथा


" तुम ’राम’ को मानते हो ?-एक सिरफिरे ने पूछा
-"नहीं"- मैने कहा
उसने मुझे गोली मार दी क्योकि मै उसकी सोच का हमसफ़ीर नहीं था और उसे स्वर्ग चाहिए था
"तुम ’रहीम’  को मानते हो ?"-दूसरे सिरफिरे ने पूछा
-"नही"- मैने कहा
उसने मुझे गोली मार दी क्योंकि मैं काफ़िर था और उसे जन्नत चाहिए थी।
" तुम ’इन्सान’ को मानते हो"- दोनो सिरफिरों ने पूछा
-हाँ- मैने कहा
फिर दोनों ने बारी बारी से मुझे गोली मार दी क्योंकि उन्हें ख़तरा था कि यह इन्सानियत का बन्दा कहीं  जन्नत या स्वर्ग न हासिल कर ले
 xx                       xxx                           xxx                      xxx

बाहर गोलियाँ चल रही हैं। मैं घर में दुबका बैठा हूँ ।
 अब मेरी ’अन्तरात्मा’ ने मुझे गोली मार दी कि मैं घर से बाहर क्यों नहीं निकलता।
और ,मैं घर में ही मर गया ।

-आनन्द.पाठक-
09413395592

शुक्रवार, 9 जनवरी 2015

एक गीत : जै माँ गंगे ! जै माँ गंगे !



फिसल गए तो हर हर गंगे ,जै माँ गंगे ! जै माँ गंगे !

वो विकास की बातें करते करते जा कर बैठे दिल्ली
कब टूटेगा "छीका" भगवन ! नीचे बैठी सोचे बिल्ली
शहर अभी बसने से पहले ,इधर लगे बसने भिखमंगे
जै माँ गंगे ! जै माँ गंगे ! ........

नई हवाऒं में भी उनको जाने क्यों साजिश दिखती है
सोच सोच बारूद भरा हो मुठ्ठी में माचिस  दिखती है
सीधी सादी राहों पर भी चाल चला करते बेढंगे
जै माँ गंगे ! जै माँ गंगे ! .....

घड़ीयाली आँसू झरते हैं, कुर्सी का सब खेलम-खेला
कौन ’वाद’? धत ! कैसी ’धारा’,आपस में बस ठेलम-ठेला
ऊपर से सन्तों का चोला ,पर हमाम में सब हैं नंगे
जै माँ गंगे ! जै माँ गंगे !

रामराज की बातें करते आ पहुँचे हैं नरक द्वार तक
क्षमा-शील-करुणा वाले भी उतर गए है पद-प्रहार तक
बाँच रहे हैं ’रामायण’ अब ,गली गली हर मोड़ लफ़ंगे
जै माँ गंगे ! जै माँ गंगे !

अच्छे दिन है आने वाले साठ साल से बैठा ’बुधना"
सोच रहा है उस से पहले उड़ जाए ना तन से ’सुगना’
खींच रहे हैं "वोट" सभी दल शहर शहर करवा कर दंगे
जै माँ गंगे ! जै माँ गंगे !


-आनन्द-पाठक-
09413395592

मंगलवार, 6 जनवरी 2015

हम गरीब लोग हैं........


हम गरीब लोग हैं
हमारी तिजोरी में सिर्फ़
चार शब्दों का बस खजाना था
अनाड़ी थे इसलिये
कुछ पहली रचनाओं में ही
सब खर्च कर दिया
और कुछ उधार ले खा गए
अब हालत ये है कि
कंगाली के दिल हैं आ गए
और उधार मिलता नहीं
दिल में कुछ उबरता नहीं
चोरी की तो
पकड़े जाने का डर है सताता
जेल जाने को भी
अभी दिल में अरमान नहीं जागा
रिश्वत भी लें तो किससे मांगें
जानने वाले अब
पहचानने से भी इंकार करते हैं
फिर भी हम कविता से प्यार करते हैं
भूख तो भूख है
रोकने से रूकती नहीं
अपनी नहीं तो न सही
अब उनकी परोसी जो भी है
उसी से गुजर बसर करते हैं
                     ........इंतज़ार

रविवार, 4 जनवरी 2015

विरह के तम........

विरह के तम में जीते हैं
उम्मीद की किरणे हैं कम
इन गहरे ठंडाये कोहरों ने
आसमान को घेर
सूर्य की मित्रता का
हल्का दिया है रंग
सूर्ये के मजबूत इरादों को भी
मजबूरी का सबक सिखा
दिखलाया एक नितान्त ढंग
"इंतज़ार" कर इंतज़ार कुछ और अभी
एक दिन इन कोहरों को
सूर्ये नहीं तो
मार भगायेगा
नयी ऋतुओं का क्रम

                   ........इंतज़ार

शुक्रवार, 2 जनवरी 2015

चन्द माहिया : क़िस्त 12

चन्द माहिया : क़िस्त 12

:1:
दीदार न हो जब तक
यूँ ही रहे चढ़ता
उतरे न नशा तब तक

:2:

ये इश्क़ सदाकत है
खेल नहीं , साहिब !
इक राह-ए-इबादत है

:3:

बस एक झलक पाना
मानी होता है
इक उम्र गुज़र जाना

:4:

अपनी पहचान नहीं
बाहर ढूँढ रहा
भीतर का ध्यान नहीं

:5:

जब तक मैं हूँ ,तुम हो
कैसे कह दूँ मैं
तुम मुझ में ही गुम हो 

-आनन्द.पाठक
09413395592

गुरुवार, 1 जनवरी 2015

रंग-ए-जिंदगानी: तलाश जारी हैं...

रंग-ए-जिंदगानी: तलाश जारी हैं...: चलती हुई बस चलाता हुआ बस चालक यात्रियों के बीच बेठा हुआ एक अच्छा आदमी सहयात्री, सहपाठी या अलग-थलग लगता है या हैं..... अचा...