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मंगलवार, 10 मार्च 2015

लघु व्यंग्य कथा 12 : अस्मिन असार संसारे ....



---’तीये’ की बैठक चल रही है । पंडित जी प्रवचन कर रहे हैं -"अस्मिन असार संसारे !..इस असार संसार में ..जगत मिथ्या है .ईश्वर अंश ...जीव अविनाशी
ज्ञानी ध्यानी लोगो ने कहा है ---पानी केरा बुलबुला अस मानुस की जात... तो जीवन क्या है... पानी का बुलबुला है ...नश्वर है..क्षण भंगुर है..मैं नीर भरी दुख की बदली...उमड़ी थी कल मिट आज चली...जो उमड़ा ..वो मिटा..जो आया है वो जायेगा ,,’जायते म्रियते वो कदाचित...तो फिर किसका शोक ....जो भरा है वो खाली होगा..यही जीवन है यही नश्वरता है गीता में लिखा है -"वासांसि जीर्णानि यथा विहाय ....अर्थात यह शरीर क्या है माया है ..फटा पुराना कपड़ा है ...आदमी इसे जान ले कि व्यर्थ ही इस कटे-फटे कपड़े को सँवार रहा था तो शरीर छूटने का कोई कष्ट नहीं....शरीर तो दीवार है .मिट्टी की दीवार ..एक घड़े की दीवार की तरह...जल में कुम्भ...कुम्भ में जल है ..बाहर भीतर पानी....फुटा कुम्भ जल जल ही समाना ...यह तथ कहें गियानी---... .."-
--"तुलसी दास जी ने कहा है क्षिति जल पावक गगन समीरा ...जब यह शरीर क्षिति का बना है मिट्टी का बना है तो इसके मिटने का क्या शोक करना.....मिट्टी का तन मिट्टी का मन क्षण भर जीवन मेरा परिचय...तो सज्जनों ! आप सब जानते है ..एक फ़िल्म का गाना है---चल उड़ जा रे पंक्षी कि अब यह देश हुआ बेगाना...शरीर पिंजरा है ..आत्मा पंक्षी है..आत्मा ने पिंजरा छोड़ दिया अब वह और पिंजरे में जायेगी...
पंडित जी ने अपना प्रवचन जारी रखा,, उन्हें आत्मा-परमात्मा जीव के बारे में जितनी जानकारी थी सब उड़ेल रहे थे

और धन ...धन तो हाथ का मैल है ...सारा जीवन प्राणी इसी मैल के चक्कर में पड़ा रहता है...इसी मैल को बटोरता है ..और अन्त में सब कुछ यहीं छोड़ जाता है ..धन तो माया है
धन मिट्टी है शास्त्रों में इसे "लोष्ठ्वत’ कहा गया है ...मगर सारी जिन्दगी आदमी इसी "लोष्ठ’ को एकत्र करता रहता है ..और अन्त में? अन्त में ’धन ’ की कौन कहे वो तो यह मिट्टी भी साथ नहीं ले जा सकता ... आदमी इस मिट्टी को समझ ले तो कोई दुख न हो....जब आवै सन्तोष धन ..सब धन धूरि समान’ अन्त में मालूम होता है कि आजीवन हम ने जो दौड़-धूप करता रहा वो सब तो धूल था ..तब तक बहुत विलम्ब हो चुका होता है---सब ठाठ पड़ा रह जायेगा...जब लाद चलेगा बंजारा...बंजारा चला गया..किस बात का शोक....
पंडित जी घंटे भर आत्मा-परमात्मा--जीव..जगत .माया...धन..मिट्टी आदि समझाते रहे और श्रोता भी कितना समझ रहे थे भगवान जाने

अन्त में ...अब हम सब मिल कर प्रार्थना करें कि भगवान मॄतक की आत्मा को शान्ति प्रदान करें और और परिवार को दुख सहने की शक्ति....."-पंडित जी का प्रवचन समाप्त हुआ

...लोग मृतक की तस्वीर पर ’श्रद्धा-सुमन’ अर्पित करने लगे ...पंडित जी ने जल्दी जल्दी पोथी-पतरा सम्भाला --चेले ने ’लिफ़ाफ़े’ में आई दान-दक्षिणा संभाली..इस जल्दी जल्दी के क्रम में चेले से 2-दक्षिणा का लिफ़ाफ़ा रह गया...पंडित जी की ’तीक्ष्ण दॄष्टि’ ने पकड़ लिया और चेले को एक हल्की सी चपत लगाते हुए कहा-" मूढ़ ! पैसा हाथ का मैल है..लिफ़ाफ़ा’ तो नहीं -यह लिफ़ाफ़ा क्या तेरा बाप उठायेगा..
पंडित जी ने दोनो लिफ़ाफ़े उठा कर जल्दी जल्दी अपने झोले में रख लिए...उन्हे अभी दूसरे ’तीये’ की बैठक में जाना है और वहाँ भी यही प्रवचन करना है---" अस्मिन असार संसारे !....पैसा हाथ का मैल है ....

-आनन्द.पाठक
09413395592

शनिवार, 7 मार्च 2015

एक होली-उत्तर गीत

मित्रो !
कल ’होली’ थी , सदस्यों ने बड़े धूम-धाम से ’होली’ मनाई।  आप ने उनकी "होली-पूर्व " की रचनायें पढ़ीं 
अब होली के बाद का एक गीत [होली-उत्तर गीत ]-... पढ़े,.

होली के बाद की सुबह जब "उसने" पूछा --"आई थी क्या याद हमारी होली में ?" 
  एक होली-उत्तर गीत
    
"आई थी क्या याद हमारी होली मे ?"
आई थी ’हाँ’  याद तुम्हारी होली में

रूठा भी कोई करता क्या अनबन में
स्वप्न अनागत पड़े हुए हैं उलझन में
तरस रहा है दर्पण तुम से बतियाने को
बरस बीत गए रूप निहारे दरपन में
पूछ रहे थे रंग  तुम्हारे बारे में -
मिल कर जो थे रंग भरे रंगोली में

होली आई ,आया फागुन का मौसम
गाने लगी हवाएं खुशियों की सरगम
प्रणय सँदेशा लिख दूँगा मैं रंगों से
काश कि तुम आ जाती बन जाती हमदम 
आ जाती तो युगलगीत गाते मिल कर
’कालेज वाले’ गीत ,प्रीति की बोली में

कोयल भी है छोड़ गई इस आँगन को
जाने किसकी नज़र लगी इस मधुवन को
पूछ रहा ’डब्बू"-"मम्मी कब आवेंगी ?
तुम्हीं बताओ क्या बतलाऊं उस मन को
छेड़ रहे थे नाम तुम्हारा ले लेकर
कालोनी वाले भी हँसी-ठिठोली में --आई थी ’हाँ याद तुम्हारी होली में 

-आनन्द.पाठक
09413395592

गुरुवार, 5 मार्च 2015

क्या अजब ज़माना है

क्या
अजब जमाना है
लोग
बेच डालते है
माँ का नाम
और
करते है व्यवसाय
माँ के नाम पर,

भूल जाते है
संबंधो को
लूट जाते है ज़ज्बात
और
 सजा लेते है
अपनी दूकान ,

बाँध डालते है
सीमाएं
धर्म और आस्था की,

तोड़ डालते है
विश्वास की डोर
और
कर डालते है
बेघर विश्वास को,

अर्थ का
समाज है
और
अर्थ के सम्बन्ध

छिनभिन्न कर डालते है
ममत्व और भातृत्व
सच क्या
ज़माना है ?

लघु कथा 11 : इवेन्ट मैनेजर

मंच के सभी मित्रों को होली की शुभकामनायें........



"...आप ही ’आनन’ जी है? फ़ेसबुक पर आप ही "अल्लम-गल्लम’ लिखते रहते है तुकबन्दिया शायरी करते रहते है?"-आगन्तुक ने सीधा तीर मारा
" जी आप कौन ?"-मैने प्रश्नवाचक मुद्रा में पूछा
"अरे ! आप ने मुझे नहीं पहचाना? मैं कवि ’फ़लाना’ सिंह ..बहुत दिनों से आप फ़ेसबुक पर दिखाई नहीं दिए तो सोचा आप के दर्शन कर अपना जीवन सँवार लूँ।"
अकारण  स्तुति वाचन से ,मैं सचेत हो गया -: " अच्छा किया कि आप ने अपने नाम के आगे कवि जोड़ दिया है वरना श्रोताओं का कोई भरोसा नहीं कि क्या समझ लें आप को --भ्रम की स्थिति स्वयं दूर कर दी आप ने --हिन्दी साहित्य में फेसबुक के रास्ते बहुत घुसपैठिये आ गये है आजकल.....""मैने कहा

" हें ! हें ! हें !! अच्छा मज़ाक कर लेते है आप भी। आप ने मेरी कविता नहीं पढ़ी ? कल ही छपी है ’फ़लाना’ पत्रिका में ..कतरन तो इन्टरनेट के सभी साईटों पर चढ़ा दी ..सभी मंच पर लगा दी है ...सैकड़ों लोगों ने "लाईक’ किया है दर्ज़नो नें ’वाह , वाह किया...पच्चीसियों ने अपनी ’टिप्पणियाँ लिखी कि ऐसे कविता हिन्दी साहित्य में पिछले 3 दशक से नहीं लिखी गई ..अगर उस समय लिखी जाती तो ’तार-सप्तक’ में अवश्य स्थान पाती....सोचा कि आप का आशीर्वाद भी लेता चलूं"

और उन्होने पत्रिका की कतरन मेरे सामने रख दिया। पढ़ा। सम्पादक ने अपनी तरफ़ से , उनके परिचय में उन्हे वरिष्ठ कवि ..कविता जगत में नया हस्ताक्षर..हिन्दी साहित्य को उनमें छिपी अनेक संभावनाओं का लाभ......एक नये तारे का अभ्युदय....और भी बहुत कुछ लिखा था। मैं तय नहीं कर पा रहा था कि कवि और सम्पादक में कौन महान है ।आप इसे मेरी तंग नज़र भी कह सकते है
" तार सप्तक’ में नहीं छपी तो कोई बात नहीं..."कविता अनवरत" में छप जायेगी ’सूद’ जी छाप रहें है आजकल। 3-खण्ड निकाल चुके हैं अबतक । आप की कविता जो है सो है मगर मैं आप की क्या सेवा कर सकता हूँ"
" आनन जी ! बस आप तो आशीर्वाद दीजिये इस ग़रीब-उल-फ़क़ीर को"

  मैने आशीर्वाद स्वरूप, मेज की दराज से एक ’रेट कार्ड’ निकाल कर उन के सामने बढ़ा दिया.उन्होने पढ़ा..हल्का सा मूर्छित हुए फिर चेतनावस्था में आते हुए कहा
" अयं ,ये क्या ? इसमें तो सब आईट्म का रेट लिखा है ....सम्मान कराने का .अलग...ताम्र-पत्र का अलग..स्तुति गीत का अलग...नारियल-साल भेंट करने का अलग...श्रोता इकठ्ठा करने का अलग...फोटो खिचवाने का अलग ..समीक्षा करवाने का अलग...आरती करने कराने का अलग....टिप्पणियां ’फ़्री ’ में है .पुस्तक विमोचन करवाने का अलग वरिष्ठ कवियों को आमन्त्रित करने का मय यात्रा-खर्च और ठहराने का रेट अलग....ये सब तो ’इवेन्ट मैनेजमेन्ट का रेट है ."तो क्या आप ने शे’र-ओ-शायरी करना छोड दिया है?"----उन्होने जिज्ञासा प्रगट की

" जी ,बहुत पहले छोड़ दिया फ़ायदे का सौदा नहीं था सो "इवेन्ट मैनेजमेन्ट" कम्पनी खोल ली और आप जैसे "छपास पीड़ित’ लेखकों कवियों की सेवा करता हूँ। कहिए कौन सा ’डेट बुक’ कर दूं । मैं तो कहता हूं कि आप भी यह कविता वविता लिखना छोड़ मेरी कम्पनी ज्वाइन कर लें, सुखी रहेंगे"
" बस बस पाठक जी ! मिल गया आशीर्वाद:"-- कवि ’फ़लाना सिंह -जो गये तो फिर लौट के इधर न आये।
सुना है उन्होने भी कोई कम्पनी खोल रखी है

[नोट : सुरक्षा कारणों से कॄपया ’कवि’ और ’पत्रिका" का नाम न पूछियेगा]
-आनन्द.पाठक.
09413395592


सोमवार, 2 मार्च 2015

एक लघु व्यंग्य कथा 10 : यू टर्न



".....राम राम !राम !! घोर कलियुग आ गया ....अब यह  देश नहीं चलेगा ...चार दिन इन्टर्नेट पर ’चैटिंग क्या कर ली कि सीधे "शादी" कर ली । इन ’फेसबुक" वालों ने तो धर्म ही भ्रष्ट कर के रख दिया ....." पंडित जी ने नाक-भौं सिकोड़ते हुए कथन जारी रखा - "--- अब आप ही  बताइए माथुर साहब !-देखा न सुना ,न घर का पता न खानदान का ...अरे यह भी कोई शादी हुई ....शादी विवाह में जाति देखी जाती है.... बिरादरी देखी जाती है ...अरे हमारे यहाँ तो गोत्र की कौन कहे ..हम तो ’नाड़ी" तक चले जाते हैं.....धर्म-कर्म भी कोई चीज  है कि नहीं ...शास्त्रों में क्या झूट लिखा है ...मनु-स्मृति में ग़लत लिखा है...विजातीय विवाह कोई विवाह होता है ...और वो भी कोर्ट में ...न पंडित न फ़ेरा ..न वर न बरात ..न अग्नि का फेरा .....ऐसे में तो संताने ’वर्ण-संकर’ ही पैदा होगी....धर्म का क्षय होगा "
माथुर साहब धर्म की यह  व्याख्या वह बड़े ’चाव’ से सुन रहे थे कारण कि उनके पड़ोसी अस्थाना साहब की बेटी भाग कर कोई विजातीय " कोर्ट मैरिज" कर ली थी
----------
कुछ वर्षों पश्चात.....एक दिन

रास्ते में पंडित जी और माथुर साहब टकरा गये.एक "ट्रैफ़िक-पोस्ट" पर.। ....प्रणाम पाती हुआ ...
माथुर साहब---" ...सुना है आजकल आप का ’छुट्टन’ आया है विलायत से छुट्टी पर ..छोटा था तो देखा था अब तो बड़ा हो गया होगा ...साथ में कोई "अंग्रेजन बहू’ भी साथ लाया है... ?
"- बड़ी संस्कारी बेटी है मेरी बहू ....उतरते ही "हाय-डैडू’- कहा ..इसाई "ब्राह्मण" की बेटी है..सुना है उसके पिता भी पूजा-पाठ कराते  है वहाँ । भाई ! शादी विवाह तो ऊपर वाला ही बनाता है..... हम कौन होते हैं ..... क्या देश क्या विलायत ...जोड़ियाँ तो स्वर्ग से ही बनती है...भगवान बनाते है ..सब में एक ही प्राण ,सब में एक ही खून ..सबके खून का एक ही रंग ..ये तो हम हैं कि हिन्दू मुसलिम सिख ईसाई छूत-अछूत कर बैठे हैं...’सर्व धर्म सदभाव देश आगे बढ़ेगा... बहू भी वहाँ नौकरी करती है ..अच्छा पैसा कमाती है..बेटा भी कभी कभी कुछ भेंज देता है .......दोनो राजी-खुशी रहें हमें और क्या चाहिए......

माथुर साहब को इस बहू-कथा में ज़्यादा ’आनन्द’ नही आ रहा था क्योंकि यह उनके पड़ोसी ’अस्थाना" साहब की बेटी की कथा न थी ....
फिर कुछ औपचारिक बात-चीत के बाद दोनों ने अपनी अपनी राह ली
पीछे "ट्रैफ़िक-पोस्ट’ पर लिखा था--" यू-टर्न"

-आनन्द.पाठक-
09413395592

शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2015

चन्द माहिया : क़िस्त 16


चन्द माहिया : क़िस्त 16

:1:
किस बात का हंगामा
ज़ेर-ए-नज़र तेरी
मेरा है अमलनामा

:2:
जो चाहे सज़ा दे दो
उफ़ न करेंगे हम
पर अपना पता दे दो

:3:
वो जितनी जफ़ा करते
क्या जाने हैं वो
हम उतनी वफ़ा करते

:4:

क़तरा-ए-समन्दर हूँ
जितना हूँ बाहर
उतना ही अन्दर हूँ

:5:
इज़हार-ए-मुहब्बत है
रुसवा क्या होना
बस एक अक़ीदत है


[शब्दार्थ ज़ेर-ए-नज़र = नज़रों के सामने
अमलनामा =कर्मों का हिसाब-किताब

-आनन्द.पाठक
09413395592

गुरुवार, 26 फ़रवरी 2015

एक लघु कथा : चार लाठी


----उनके चार लड़के थे।  अपने लड़कों पर उन्हे बड़ा गर्व था। और होता भी क्यों न । बड़े लाड़-प्यार  और दुलार से पाला था । सारी ज़िन्दगी इन्हीं लड़को के लिए तो जगह ज़मीन घर मकान करते रहे और पट्टीदारों से मुकदमा लड़ते रहे, खुद वकील जो थे ।
गाँव जाते तो सबको सुनाते रहते -चार चार लाठी है हमारे पास ।ज़रूरत पड़ने पर एक साथ बज सकती है ।  परोक्ष रूप से अपने विरोधियों को चेतावनी देने का उनका अपना तरीका था। जब किसी शादी व्याह में जाते तो बड़े गर्व से दोस्तों और रिश्तेदारों को सुनाते -चार चार लाठी है मेरे पास -बुढ़ापे का सहारा।
 इन लड़को को पढ़ाया लिखाया काबिल बनाया और भगवान की कृपा से चारो भिन्न भिन्न शहरों में जा बसे और अच्छे कमाने खाने लगे ।
  समय चक्र चलता रहा जिसकी जवानी होती है उसका बुढ़ापा भी होता है।लड़के अपने अपने काम में व्यस्त रहने लगे । लड़को का धीरे धीरे गाँव-घर आना जाना कम हो गया । समय के साथ साथ गाँव-घर छूट भी गया।पत्नी पहले ही भगवान घर चली गई थी अब अकेले ही घर पर रहने लगे थे -अपने मकान को देखते ज़मीन को देखते ,ज़मीन के कागज़ात को देखते जिसके लिए सारी उम्र भाग दौड की-इन बच्चों के लिए। शरीर धीरे धीरे साथ छोड़ने लगा और एक दिन उन्होने खाट पकड़ ली...अकेले नितान्त अकेले... सूनापन...कोई देखने वाला नहीं--कोई हाल पूछने वाला नहीं...लड़के अपने अपने काम में व्यस्त...कोई उनको अपने साथ रखने को तैयार नहीं ...लड़को को था कि उन्हें अपनी ज़िन्दगी जीनी  है..."बढ़ऊ’ को  आज नहीं तो कल जाना ही है अपने साथ रख कर क्यों अपनी ज़िन्दगी में खलल करें।
-- हफ़्तों खाट पर पड़े रहे ... मुहल्ले वालों ने चन्दा कर ’अस्पताल’ में भर्ती करा दिया। चारों लड़के खुश और निश्चिन्त  हो गये -’पापा की सेवा करने वाली मिल गई-नर्से सेवा करेंगी।  --कोई लड़का न ’पापा’ को देखने गया और न अपने यहाँ ले गया ।वही हुआ जो होना था और एक दिन ’पापा’भी  शान्त हो गये....
----
-कल तेरहवीं थी । चारों लड़के आये थे। एक साथ इकठ्ठा हुए थे पहली बार।
’भईया ! बड़े "संयोग’ से एक साथ इकठ्ठा हुए है हम सब। फिर न जाने कब ऐसा मौका मिलेगा ।’पापा’ का तो फ़ैसला हो गया। जगह ज़मीन का भी फ़ैसला हो जाता तो ....." -छोटे ने सकुचाते हुए प्रस्ताव रखा -बहुओं ने हामी भरी।

मगर .....फ़ैसला न हो सका --चारों ’लाठियां’ औरों पर क्या बरसती आपस में ही बज़ने लग गईं।

-आनन्द.पाठक-
09413395592