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गुरुवार, 21 अप्रैल 2016

...आओ बचाएं अपनी वसुंधरा?

हाल के कुछ साल, महीने और दिवस में नेपाल में आयी भूकंप त्रासदी, पाकिस्तान में बाढ़, जम्मू कश्मीर में जल प्रलय, जापान से लेकर अफगानिस्तान तक धरती के कंपने, इक्वाडोर में भूकंप जैसी भयावह खबरे अखबार की सुर्खियां रहीं। वर्तमान में लातूर का जल संकट, बुंदेलखंड और विदर्भ में सूखे के हाल से सभी परिचित हैं। अक्सर यह समाचार सुनने को मिलते हैं कि उत्तरी ध्रुव की ठोस बर्फ कई किलोमीटर तक पिघल गई है। सूर्य की पराबैगनी किरणों को पृथ्वी तक आने से रोकने वाली ओजोन परत में छेद हो गया है। इसके अलावा फिर भयंकर तूफान, सुनामी और भी कई प्राकृतिक आपदों की खबरें आप तक पहुँचती हैं, हमारे पृथ्वी ग्रह पर जो कुछ भी हो रहा है? इन सभी के लिए मानव ही जिम्मेदार हैं, जो आज ग्लोबल वार्मिग के रूप में हमारे सामने हैं। धरती रो रही है। निश्चय ही इसके लिए कोई दूसरा नहीं बल्कि हम ही दोषी हैं। भविष्य की चिंता से बेफिक्र हरे वृक्ष अधाधुंध काटे गए और यह क्रम वर्तमान में भी जारी है। इसका भयावह परिणाम भी दिखने लगा है। सूर्य की पराबैगनी किरणों को पृथ्वी तक आने से रोकने वाली ओजोन परत का इसी तरह से क्षरण होता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब पृथ्वी से जीव-जन्तु व वनस्पति का अस्तिव ही समाप्त हो जाएगा। जीव-जन्तु अंधे हो जाएंगे। लोगों की त्वचा झुलसने लगेगी और त्वचा कैंसर रोगियों की संख्या बढ़ जाएगी। समुद्र का जलस्तर बढ़ने से तटवर्ती इलाके चपेट में आ जाएंगे। इसके लिए समय रहते सोचना होगा। हम अपनी वसुंधरा को कैसे बचाएं। सोचना होगा, मुकम्मल रणनीति तैयार करनी होगी। सरकार को भी एक कानून बनाना होगा। इस बार पृथ्वी दिवस पर आइए हम सभी मिलजुलकर जल, जंगल और जमीन को कैसे बचाएं, जीवन को कैसे सुरक्षित रखें। इस पर न केवल विचार करें बल्कि संकल्प लें कि हम पर्यावरण को नुकसान नहीं पहुंचने देंगे।

धरती खो रही है अपना प्राकृतिक रूप
आज हमारी धरती अपना प्राकृतिक रूप खोती जा रही है। जहाँ देखों वहाँ कूड़े के ढेर व बेतरतीब फैले कचरे ने इसके सौंदर्य को नष्ट कर दिया है। विश्व में बढ़ती जनसंख्या तथा औद्योगीकरण एवं शहरीकरण में तेजी से वृध्दि के साथ-साथ ठोस अपशिष्ट पदार्थों द्वारा उत्पन्न पर्यावरण प्रदूषण की समस्या भी विकराल होती जा रही है। ठोस अपशिष्ट पदार्थों के समुचित निपटान के लिए पर्याप्त स्थान की आवश्यकता होती है। ठोस अपशिष्ट पदार्थों की मात्रा में लगातार वृद्धि के कारण उत्पन्न उनके निपटान की समस्या न केवल औद्योगिक स्तर पर अत्यंत विकसित देशों के लिए ही नहीं वरन कई विकासशील देशों के लिए भी सिरदर्द बन गई है।  भारत में प्लास्टिक का उत्पादन व उपयोग बड़ी तेजी से बढ़ रहा है। औसतन प्रत्येक भारतीय के पास प्रतिवर्ष आधा किलो प्लास्टिक अपशिष्ट पदार्थ इकट्ठा हो जाता है। इसका अधिकांश भाग कूड़े के ढेर पर और इधर-उधर बिखर कर पर्यावरण प्रदूषण फैलाता है।

गुरुवार, 14 अप्रैल 2016

चन्द माहिया : क़िस्त 32

:1:

माना कि तमाशा है
कार-ए-जहाँ यूँ सब
फिर भी इक आशा है

:2:
दरपन तो दरपन है
झूट नहीं बोले
क्या बोल रहा मन है ?

:3:
छाई जो घटाएं हों
दिल क्यूँ ना बहके
सन्दल सी हवाएं हों

:4:
जितना देखा है फ़लक
उतना ही होगा
बातों में सच की झलक

:5:
 कैसा ये नशा ,किसका ?
कब देखा उस को ?
एहसास है बस जिसका

-आनन्द पाठक
09413395592

मंगलवार, 12 अप्रैल 2016

Laxmirangam: दशा और दिशा

Laxmirangam: दशा और दिशा:                      दशा और दिशा                     मेरा पहला प्रकाशन ' दशा और दिशा ' ऊपर दिए लिंक पर उपलब्ध है. ई प...

शुक्रवार, 8 अप्रैल 2016

आदमी, आदमी को ही लूटता है

आदमी आदमी को ही लूटता है
अपना पराया सभी को लूटता है
क्‍या खोया क्‍या पाया सोचता है
दुख भीतर ही तो कचोटता है
जीवन में खो जाते है जो जो
उन्‍ही को बार बार खोजता है
हार जीत का प्रश्‍न है गौण अब
जीवन जीवन को ही घसीटता है
दे दे विराम कह दे अलविदा
यही विचार अब जहर घोलता है
अजब है तुम्हारी ये बड़ी बड़ी बातें
विक्षिप्त कभी झूठ नहीं बोलता है

वो कितने परिंदों को...............गजल


वो  कितने परिंदों को नाहक उडा़या है
तब जाकर दरख़्त पे एक घर बनाया है

कहता है बड़ा सम्मान है उसका जमानें में
मगर वो  जानता है  कि डर  बनाया है

जी कर सब्र मिले मर के क़फ़न मिल जाए
यही सोच  के मैंने  अपना शहर बनाया है

मेरे ख़्वाबों को उड़ान देने के लिए देखो
मेरे  बेटे ने  कागजों  का पर  बनाया है

कभी  हाल ऐसा  तो हरगिज  नहीं होता
मुझे  ऐसा  किसी ने जी  भर  बनाया है

नहीं मानता रुतबा किसी जिंदा शख़्स का
रुतबा  तो  शहीदों  ने मर  कर बनाया है

वह  शख़्स  मेरे  फ़कीरी से भी जलता है
जो  मुझको  इस क़दर  अक्सर बनाया है

मंगलवार, 5 अप्रैल 2016

Laxmirangam: जागो मानव जागो

Laxmirangam: जागो मानव जागो: जागो मानव जागो... https://pollinatorlink.files.wordpress.com/2014/01/kingparrot_drinking_img_9558.jpg अब तक तो आप सब ने गौर क...

रविवार, 3 अप्रैल 2016

लोग - हाल में घटित हिंसात्मक घटनाओं और प्रदर्शनों पर

समय बहुत विकट है देखो, आवेशों में बहते लोग
कहीं लोग हैं उपद्रवियों से, कहीं सहमे डरते लोग

लोकतंत्र का तंत्र जो बिगड़े, लोक भी धीरज ना धरे
असहले हाथों में लेकर, जाने क्या-क्या करते लोग

रहनुमा है कौन यहां पर, तथ्यों का कुछ पता नहीं
शोर मचाते, आग लगाते, नींद में देखो चलते लोग

बहुत हुई अब नासमझी, कब हिंसा ने क्या पाया है
देखे हमने घायल होते, कभी देखे हमने मरते लोग

प्रेम, क्षमा, संवाद से देखो, रस्ते कई खुल जाते हैं
तब देश स्वर्ग बन जाता है, खुशहाली में रहते लोग