एक ग़ज़ल : जड़ों तक साजिशें गहरी---
जड़ों तक साज़िशें गहरी ,सतह पे हादसे थे
जहाँ बारूद की ढेरी , वहीं पर घर बने थे
हवा में मुठ्ठियाँ ताने जो सीना ठोकते थे
ज़रूरत जब पड़ी उनकी ,झुका गरदन गए थे
कि उनकी आदतें थी देखना बस आसमाँ ही
ज़मीं पाँवों के नीचे खोखली फिर भी खड़े थे
अँधेरा ले कर आए हैं ,बदल कर रोशनी को
वो अपने आप की परछाईयों से यूँ डरे थे
बहुत उम्मीद थी जिनसे ,बहुत आवाज़ भी दी
कि जिनको चाहिए था जागना .सोए पड़े थे
हमारी चाह थी ’आनन’ कि दर्शन आप के हों
मगर जब भी मिले हम आप से ,चेहरे चढ़े थे
-आनन्द.पाठक--
जड़ों तक साज़िशें गहरी ,सतह पे हादसे थे
जहाँ बारूद की ढेरी , वहीं पर घर बने थे
हवा में मुठ्ठियाँ ताने जो सीना ठोकते थे
ज़रूरत जब पड़ी उनकी ,झुका गरदन गए थे
कि उनकी आदतें थी देखना बस आसमाँ ही
ज़मीं पाँवों के नीचे खोखली फिर भी खड़े थे
अँधेरा ले कर आए हैं ,बदल कर रोशनी को
वो अपने आप की परछाईयों से यूँ डरे थे
बहुत उम्मीद थी जिनसे ,बहुत आवाज़ भी दी
कि जिनको चाहिए था जागना .सोए पड़े थे
हमारी चाह थी ’आनन’ कि दर्शन आप के हों
मगर जब भी मिले हम आप से ,चेहरे चढ़े थे
-आनन्द.पाठक--

