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शनिवार, 6 अक्टूबर 2018

एक ग़ज़ल : जड़ों तक साज़िशें---

एक ग़ज़ल : जड़ों तक साजिशें गहरी---


जड़ों तक साज़िशें गहरी ,सतह पे हादसे थे
जहाँ बारूद की ढेरी , वहीं  पर  घर  बने थे

हवा में मुठ्ठियाँ ताने  जो सीना  ठोकते थे
ज़रूरत जब पड़ी उनकी ,झुका गरदन गए थे

कि उनकी आदतें थी देखना बस आसमाँ ही
ज़मीं पाँवों के नीचे खोखली फिर भी खड़े थे

अँधेरा ले कर आए हैं ,बदल कर रोशनी को
वो अपने आप की परछाईयों  से यूँ   डरे थे

बहुत उम्मीद थी जिनसे ,बहुत आवाज़ भी दी
कि जिनको चाहिए था जागना .सोए पड़े थे

हमारी चाह थी ’आनन’ कि दर्शन आप के हों
मगर जब भी मिले हम आप से ,चेहरे चढ़े  थे

-आनन्द.पाठक--

बुधवार, 3 अक्टूबर 2018

Laxmirangam: तुम फिर आ गए !!!

Laxmirangam: तुम फिर आ गए !!!: तुम फिर आ गए !!! --------------------------- बापू, तुम फिर आ गए !!! पिछली बार कितना समझाया था, पर तुम माने नहीं. कितनी ...

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सोमवार, 1 अक्टूबर 2018

शब्द ही सत्य है

शब्द मय है सारा संसार,
शब्द ही काव्य अर्थ विस्तार ।
शब्द ही जगती का श्रृंगार,
शब्द से जीवन है साकार।
शब्द से अर्थ नहीं है विलग,
शब्द से सुंदर भाव सजग।
शब्द का जैसा करो प्रयोग,
वैसा ही होता है उपयोगी।
शब्द कर देते हैं विस्फोट,
कभी लगती है गहरी चोट ।
नहीं शब्दों में कोई खोट,
शब्द लेकर भावों की ओट।
दिखा देते हैं अपना प्रभाव ,
खेल जाते हैं अपना दांव।
शब्दों से हो जाते हैं युद्ध,
टूटते दिल घर परिवार संबंध।
शब्द ही जोड़े दिल के तार,
बहती सप्त स्वरों की रसधार।
शब्द की शक्ति बड़ी अनंत,
शब्द से सृष्टि है जीवंत।
कभी बन कर लगते गोली,
कभी लगते कोयल की बोली।
कभी बन जाते हैं नासूर,
कभी बन जाते हैं अति क्रूर।
शब्द की महिमा अपरंपार,
शब्द ही जगती का आधार।
शब्द का विस्तृत है संसार,
शब्द मय है सारा संसार।

अभिलाषा चौहान
स्वरचित

गुरुवार, 27 सितंबर 2018

Laxmirangam: चाँदनी का साथ

Laxmirangam: चाँदनी का साथ: चाँदनी का साथ चाँद ने पूछा मुझे तुम अब रात दिखते क्यों नहीं? मैंने कहा अब रात भर तो साथ है मेरे चाँदनी. क्या पता तुमको, मैं कितना ...

बुधवार, 26 सितंबर 2018

केवल पल ही सत्य है

हर पल
कहता है कुछ
फुसफुसा कर
मेरे कानों में

मैं जा रहा हूँ
जी लो मुझे
चला गया तो
फिर लौट न पाऊंगा

बन जाऊंगा इतिहास
करोगे मुझे याद
मेरी याद में
कर दोगे फिर एक पल बर्बाद

इसलिए हर पल को जियो
उठो सीखो जीना
अतीत के लिए क्या रोना
भविष्य से क्या डरना

यह जो पल वर्तमान है
है वही परम सत्य
बाकी सब असत्य
यही कहता है हर पल
फुसफुसा कर मेरे कानों में ।
अभिलाषा चौहान 

मंगलवार, 25 सितंबर 2018

अस्तित्व

क्या यही संसार है?
क्या यही जीवन है?

झुठलाना चाहती हूं
इस सत्य को
पाना चाहती हूं
उस छल को

जो भटका देता है
छोटी सी नौका को
इस विस्तृत जलराशि में
डूब जाती है नौका
खो देती है अपना
अस्तित्व......!

भुला देता है संसार
उस छोटी सी नौका को
जिसने न जाने कितनों
को किनारा दिखाया !
सब कुछ खोकर भी
उस नौका ने क्या पाया?


अभिलाषा चौहान

शनिवार, 22 सितंबर 2018

एक ग़ज़ल : कौन बेदाग़ है---

एक ग़ज़ल

कौन बेदाग़ है  दाग़-ए- दामन नहीं ?
जिन्दगी में जिसे कोई उलझन नहीं ?

हर जगह पे हूँ मैं उसकी ज़ेर-ए-नज़र
मैं छुपूँ तो कहाँ ? कोई चिलमन नहीं

वो गले क्या मिले लूट कर चल दिए
लोग अपने ही थे कोई दुश्मन नहीं

घर जलाते हो तुम ग़ैर का शौक़ से
क्यों जलाते हो अपना नशेमन नहीं ?

बात आकर रुकी बस इसी बात पर
कौन रहजन है या कौन रहजन नहीं

सारी दुनिया ग़लत आ रही है नज़र
साफ़ तेरा ही मन का है दरपन नहीं

इस चमन को अब ’आनन’ ये क्या हो गया
अब वो ख़ुशबू नहीं ,रंग-ए-गुलशन नहीं

-आनन्द.पाठक--