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शुक्रवार, 27 दिसंबर 2019

चन्द माहिया

चन्द माहिया

01
रंगोली आँगन की
देख रही राहें
छुप छुप कर साजन की

02
धोखा ही सही माना
अच्छा लगता है
तुम से धोखा खाना

03
औरों से रज़ामन्दी
महफ़िल में तेरी
मेरी ही ज़ुबाँबन्दी

04
माटी से बनाते हो
क्या मिलता है जब
माटी में मिलाते हो ?

05
सच,वो न नज़र आता
कोई है दिल में
जो राह दिखा जाता

-आनन्द.पाठक-

शनिवार, 21 दिसंबर 2019

एक ग़ज़ल : झूट इतना इस तरह बोला गया---

एक ग़ज़ल : झूठ इतना इस तरह ---



झूठ इतना इस तरह  बोला  गया
सच के सर इलजाम सब थोपा गया

झूठ वाले जश्न में डूबे  रहे -
और सच के नाम पर रोया गया

वह तुम्हारी साज़िशें थी या वफ़ा
राज़ यह अबतक नहीं खोला गया

आइना क्यों देख कर घबरा गए
आप ही का अक्स था जो छा गया

कैसे कह दूँ तुम नहीं शामिल रहे
जब फ़ज़ा में ज़ह्र था घोला गया

बेबसी नाकामियों के नाम पर
ठीकरा सर और के फ़ोड़ा गया

हो गई ज़रख़ेज़ ’आनन’ तब ज़मीं
प्यार का इक पौध जब रोपा गया


-आनन्द.पाठक-

शुक्रवार, 13 दिसंबर 2019

चन्द माहिया

चन्द माहिया

01
कुछ याद तुम्हारी है
उस से ही दुनिया
आबाद हमारी है

02
जब तक कि सँभल पाता
राह-ए-उल्फ़त में
ठोकर हूँ नई खाता

03
लहराओ न यूँ आँचल
दिल का भरोसा क्या
हो जाए न फिर पागल

04
जीने का जरिया था
सूख गया वो भी
जो प्यार का दरिया था

05
गिरते न बिखरते हम
काश ! सफ़र में तुम
चलते जो साथ सनम

आनन्द.पाठक

बुधवार, 20 नवंबर 2019

है संघर्ष ही जीवन

नादां है बहुत

कोई समझाये दिल को

चाहता उड़ना आसमाँ में

है पड़ी पांव ज़ंजीर

कट चुके हैं पंख

फिर भी उड़ने की आस

..

नादां है बहुत

कोई समझाये दिल को

डगमगा रही नौका बीच भंवर

फिर भी लहरों से

जुझने को तैयार

परवाह नहीं डूबने की

मर मिटने को तैयार

नहीं मानता दिल यह समझाने से भी

जब तक है साँस, रहेगी आस तब तक

है संघर्ष ही जीवन

अंतिम क्षण आने तक

रेखा जोशी 

Mujhe Yaad aaoge - Hindi Kavita Manch

मुझे याद आओगे


कभी तो भूल पाऊँगा तुमको, 
मुश्क़िल तो है|
लेकिन, 
मंज़िल अब वहीं है||

पहले तुम्हारी एक झलक को, 
कायल रहता था|
लेकिन अगर तुम अब मिले, 
तों भूलना मुश्किल होगा||

सोमवार, 11 नवंबर 2019

एक ग़ज़ल : भले ज़िन्दगी से हज़ारों शिकायत---

एक ग़ज़ल : भले ज़िन्दगी से हज़ारों ---

भले ज़िन्दगी से  हज़ारों शिकायत
जो कुछ मिला है उसी की इनायत

ये हस्ती न होती ,तो होते  कहाँ सब
फ़राइज़ , शराइत ,ये रस्म-ओ-रिवायत

कहाँ तक मैं समझूँ ,कहाँ तक मैं मानू
ये वाइज़ की बातें  वो हर्फ़-ए-हिदायत

न पंडित ,न मुल्ला ,न राजा ,न गुरबा
रह-ए-मर्ग में ना किसी को रिआयत

मेरी ज़िन्दगी ,मत मुझे छोड़ तनहा
किसे मैं सुनाऊँगा अपनी हिकायत

निगाहों में उनके लिखा जो पढ़ा  तो
झुका सर समझ कर मुहब्बत की आयत

बुरा मानने की नहीं बात ,’आनन’
है जिससे मुहब्बत ,उसी से शिकायत

-आनन्द.पाठक--

शब्दार्थ
फ़राइज़ = फ़र्ज़ का ब0व0
शराइत = शर्तें [ शर्त का ब0व0]
रह-ए-मर्ग = मृत्यु पथ पर [ मौत की राह में ]
अपनी हिकायत  = अपनी कथा कहानी
आयत = कलमा-ए-क़ुरान [ की तरह पाक] -

बुधवार, 6 नवंबर 2019

हरसिंगार

हे हरसिंगार
ओ शेफाली
अरी ओ प्राजक्ता !
सुना है
तू सीधे स्वर्ग से
उतर आई थी
कहते है
सत्यभामा की जलन
देवलोक से
पृथ्वी लोक पर
तुझे खींच लाई थी
तू ही बता
है ये चन्द्र का प्रेम
या सूर्य से विरक्ति
कि बरस में
फ़कत एक मास
सिर्फ रात को
देह तेरी
हरसिंगार के फूलों से
भरभराई थी !