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मंगलवार, 14 दिसंबर 2021

आ रही बस याद तेरी.. नवगीत

उलझनों में झूलता नित

सुख बने हैं राख ढेरी

छिन गया अब चैन मनका

आ रही बस याद तेरी।


नीम की वो छाँव ठंडी

धान के वे खेत सुंदर

बोलती चौपाल पे जब

दर्द के उमड़े समंदर

बाँटते घर सुख-दुख जहाँ

याद में नित करें फेरी।


कंगनों ने पनघटों पे

प्रीत की लिख दी कहानी

पायलों के घुंघरुओं ने

तान जब छेड़ी सुहानी

गीत से तब भोर जागी

धूप ने खुशियाँ बिखेरी।


इस चमकती रोशनी में

डूबते इंसान कितने

ओढ़ते सब है मुखौटा

टूटते कितने हैं सपने

सोचता मन गाँव प्यारा

ये डगर रंगीन मेरी।



अभिलाषा चौहान'सुज्ञ'



 

पाति-एक मित्र के नाम

बाग़  में  जब आती थी चिनार के सूखे पत्तों की बाढ़,

चुपचाप देखते रहते थे हम पर्वतों की चोटियाँ-

वो ले लेती थीं घुमक्कड़ बादलों की आड़,

डल झील के किनारे चलते रहते थे मीलों-मील,

चुपचाप सुनते थे दूर जाती

किसी नाव के चप्पुओं की धीमी-धीमी थाप,

यूहीं खड़े हम  देखते रहते थे

पानी पर झूमती लहरें को,

अचानक छू जाती थी मन को

किसी नादान बच्ची की मुस्कान,

बंद रोशनी में सुनना पुराने गीत,

ख़ामोशी को बना लेना मन का मीत,

सब याद है, कुछ भी भुला नहीं

इतनी दूर आने के बाद भी,

जैसे रुका हुआ हूँ वहीं पर अभी तक,

जिन पेचदार रास्तों में

सदा के लिये खो गये थे तुम,

उन रास्तों की यादें भी अब

धीरे-धीरे हो रही हैं गुम,

जीवन में कितना खोया कितना पाया,

कितना सोचा कितना जी पाया, 

यह सब पर जैसे है निरर्थक,

मन तो जैसे अभी भी है अटका

ज़मीन पर बिखरे चिनार के सूखे पत्तों में,

डल झील की निर्मल लहरों में,

बंद रोशनी और पुराने गीतों में.

रविवार, 12 दिसंबर 2021

संदेह-एक लघु कथा

सिवाय लालाजी के हर किसी को संदेह था कि उसने ही धोबी की बारह वर्षीय लड़की के साथ दुष्कर्म किया था.वह लालाजी का चहेता था और उसे पूरा विश्वास था कि अपनी अकूत संपदा का वह उसे ही अपना वारिस बनायेंगे.

वह भी समझ रहा था कि सब उस पर संदेह करते है. यद्यपि किसी के पास कोई प्रमाण न था. लेकिन वह चिंतित था कि कहीं सब मिलकर लालाजी के मन में यह संशय न पैदा कर दें कि दोषी कोई और नहीं, वही था. ऐसी बातों को लेकर लालाजी बहुत संवेदनशील थे. ज़रा सा संदेह भी उनके विश्वास को चोट पहुँचा सकता था.

अगर लालाजी के मन यह बात घर कर गई तो उसका भविष्य अंधकारमय हो जाएगा. उसे कुछ करना होगा, उसने तय किया. कुछ ऐसा करना होगा जिससे लालाजी का उसके प्रति विश्वास  अटूट हो जाए.

रात के खाने पर उसने अचानक कहा, “आप सब लोग क्या सोच रहे हैं मैं अच्छी तरह समझता हूँ. पर लालाजी, यह लोग अकारण ही मुझे दोषी मान रहे हैं. मैं निर्दोष हूँ.....अगर...अगर आप में से कोई भी एक प्रमाण दे दे, ज़रा सा प्रमाण दे दे तो मैं....मैं अपना जीवन समाप्त कर लूंगा.”

उसकी बात सुन कर किसी ने कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की. हर कोई उसे घूर कर देखता रहा.

उसने सामने रखी रोटी का एक बड़ा टुकड़ा तोडा. फिर लालाजी की ओर देखते हुए उसने धीमी पर गम्भीर वाणी में कहा, “अगर मैं दोषी हूँ तो यह रोटी का टुकड़ा निगलते ही मेरे प्राण निकल जाएँ.”

उसने रोटी का टुकड़ा निगला और अगले ही पल लुढ़क कर नीचे गिर गया.


मंगलवार, 7 दिसंबर 2021

 

                      कोरोना काल में हमारा मीडिया

मार्च के अंतिम सप्ताह में हमारे परिवार में एक शिशु का आगमन हुआ. स्वाभाविक था कि हमें अस्पताल के कुछ चक्कर लगाने पड़े. अब यही कारण था या कुछ और हमें समझ नहीं आया लेकिन १३ अप्रैल को मेरे बेटे ( शिशु के पिता) को कोरोना हो गया. अगले तीन दिनों के अंदर घर के सभी सदस्य संक्रमित हो गये.

मुझे और मेरी पत्नी को वैक्सीन का एक इंजेक्शन लग चुका था इसलिए हम दोनों को अधिक परेशानी न हुई. चार या पाँच दिन बुखार रहा. फिर हमारी स्थिति में सुधार आने लगा.

लेकिन बेटे और बहु को बहुत कष्ट सहना पड़ा. अस्पताल में भर्ती होने की आवश्यकता तो नहीं आई. परन्तु बहुत मुसीबत झेलनी पड़ी. हमें सबसे अधिक चिंता शिशु की थी. कारण, मेरे बेटे के एक मित्र के परिवार के सब लोगों को जब कोरोना हुआ था तो उसका तीन माह का बच्चा भी इससे प्रभावित हुआ था.

इस कठिनाई के समय में सबसे अच्छी बात यह रही कि हम समाचार पत्रों और मीडिया से दूर रहे. समाचार पत्र तो लॉकडाउन के लगते ही मेरे बेटे ने लेना बंद कर दिया था. टीवी मेरे बेटे ने ले नहीं रखा. इस कारण हमें इस बात से पूरी तरह अनभिक्ष थे कि समाचार पत्रों में क्या लिखा जा रहा था और टीवी पर क्या दिखाया जा रहा था.

मई के अंत में जब हमारी गाड़ी पटरी पर लौटी तो जम्मू में माँ की तबियत बिगड़ने लगी. जून के शुरू होते ही हम जम्मू चले गये और वहाँ भी मीडिया से दूरी बनी रही. माँ कैलाशवासी हो गईं और मध्य-जुलाई में वापस लौटे.

यहाँ आकर पता चला कि कोरोना काल में मीडिया ने किस प्रकार की रिपोर्टिंग की थी. लौट कर जिससे भी हमारी बात हुई उसने यही कहा कि कठिनाई के समय में मीडिया से दूरी बना कर हमने बड़ी समझदारी का काम किया था.

जब देश में लोग एक भयावह स्थिति का सामना कर रहे थे, तब  मीडिया के प्रतिष्ठित महानुभाव लोगों का मनोबल तोड़ने का पूरा प्रयास कर रहा था. ऐसे-ऐसे दृश्य दिखाए गये कि भले-चंगे लोग भी सहम गये थे.

चूँकि मैंने स्वयं यह समाचार देखे या पढ़े नहीं इसलिय किसी निर्णय पर पहुँचना सरल नहीं है. लेकिन यू ट्यूब चैनलों पर कुछ विश्लेषकों को सुना उससे पता चलता है कि कोरोना काल में भी मीडिया राजनीति करने से नहीं चूका.  लेकिन यह आश्चर्यजनक नहीं है. इन लोगों की कौन फंडिंग कर रहा है वह जानना भी कठिन है. यह लोग किस के एजेंडा पर चल रहे हैं उसका अनुमान ही लगाया जा सकता है.

शनिवार, 4 दिसंबर 2021

एक गीत : मौसम है मौसम बदलेगा

 एक  गीत : -- मौसम है, मौसम बदलेगा



सुख का मौसम, दुख का मौसम, आँधी-पानी का हो मौसम
मौसम का आना-जाना है , मौसम है मौसम बदलेगा ।

अगर कभी हो फ़ुरसत में तो, उसकी आँखों में पढ़ लेना
जिसकी आँखों में सपने थे  जिसे ज़माने ने लू्टे  हों ,
आँसू जिसके सूख गए हो, आँखें जिसकी सूनी सूनी
और किसी से क्या कहता वह, विधिना ही जिसके रूठें हो।

दर्द अगर हो दिल में गहरा, आहों में पुरज़ोर असर हो
 चाहे जितना पत्थर दिल हो, आज नहीं तो कल पिघलेगा ।
-- कल पिघलेगा।

दुनिया क्या है ? जादूघर है, रोज़ तमाशा होता रहता
देख रहे हैं जो कुछ हम तुम, जागी आँखों के सपने हैं 
रिश्ते सभी छलावा भर हैं, जबतक मतलब साथ रहेंगे
जिसको अपना समझ रहे हो, वो सब कब होते अपने हैं॥

जीवन की आपाधापी में, दौड़ दौड़ कर जो भी जोड़ा 
चाहे जितना मुठ्ठी कस लो, जो भी कमाया सब फिसलेगा ।
--सब फ़िसलेगा।

जैसा सोचा वैसा जीवन, कब मिलता है, कब होता है,
जीवन है तो लगा रहेगा, हँसना, रोना, खोना, पाना।
काल चक्र चलता रहता है. रुकता नहीं कभी यह पल भर
ठोकर खाना, उठ कर चलना, हिम्मत खो कर बैठ न जाना ।

आशा की हो एक किरन भी और अगर हो हिम्मत दिल में
चाहे जितना घना अँधेरा, एक नया सूरज निकलेगा ।
--- एक सूरज निकलेगा।

विश्वबन्धु, सोने की चिड़िया, विश्वगुरु सब बातें अच्छी,
रामराज्य की एक कल्पना, जन-गण-मन को हुलसा देती ,
अपना वतन चमन है अपना, हरा भरा है खुशियों वाला
लेकिन नफ़रत की चिंगारी बस्ती बस्ती झुलसा देती ।

जीवन है इक सख्त हक़ीक़त देश अगर है तो हम सब हैं
झूठे सपनों की दुनिया से कबतक अपना दिल बहलेगा ।
--- दिल बहलेगा।


-आनन्द पाठक-

शुक्रवार, 3 दिसंबर 2021

 

मुफ्त बिजली, मुफ्त पानी

“तो आप का कहना है...किसी को सब्सिडी नहीं मिलनी चाहिए?” मुकन्दी लाल जी ने पूछा.

“प्रश्न यह नहीं है कि सब्सिडी मिलनी चाहिए या नहीं मिलनी चाहिए. प्रश्न यह है कि किसे मिलनी चाहिए और कब तक.” 

“अर्थात?”

“मुफ्त बिजली की ही बात करते हैं. मान लीजिये एक आदमी है जो एक महीने में पचास हज़ार रूपये कमाता है और उसका पड़ोसी पूरे साल में पचास हज़ार कमाता है. तो आपके विचार में क्या दोनों को एक समान बिजली पर सब्सिडी मिलनी चाहिए?”

“नहीं, बिलकुल नहीं.”

“अभी क्या हो रहा है. जिसकी आर्थिक स्थिति विषम नहीं है उसे भी सब्सिडी दी जा रही है. हर ओर मुफ्तखोरी चल रही है. नेता भी खुश लोग भी खुश.”

“क्यों?”

“राजनीति के लिए. मुफ्त बिजली, मुफ्त पानी, मुफ्त साड़ियाँ, मुफ्त..मुफ्त...यह सब वोटरों को लुभाने के तरीकें हैं. नेता अपनी जेब से पैसे तो खर्च कर नहीं रहे...ऐसा नहीं है कि उनके पुरखे कुबेर का खज़ाना छोड़ गये थे जो यह लोगों में मुफ्त में बाँट रहे हैं.... आपका ही पैसा जिसे यह बाँट कर वोटरों को रिझाते हैं. टैक्स देते जाइए और मुफ्त बिजली लेते रहिये.”

“पर लोगों के आत्मसम्मान को चोट नहीं पहुँचती? खासकर वह जो सम्पन्न हैं?”

“इसका उत्तर तो आप स्वयं दे सकते हैं. क्यों, दे सकते हैं या नहीं?” मैंने घूर कर उन्हें देखते हुए कहा.

मुकन्दी लाल में मेरी बात सुन कर झेंप गये.

 

गुरुवार, 2 दिसंबर 2021

 

           कौन भर रहा है आपका बिजली का बिल?

“इस माह का बिजली का बिल आज आ गया,” मुकंदी लाल जी चहकते हुए बोले.

“कितना है?”

“बिल तो 833.58 रूपये का है पर मुझे तो एक पैसा भी नहीं देना.”

“क्यों?”
“क्यों क्या अर्थ?
828.72 रुपये की सब्सिडी दी है हमारी कृपानिधान सरकार ने. बाकी रकम दस से कम है तो बस इसलिए जीरो बिल है. पर आप तो ऐसे कह रहे हैं कि आपको सब्सिडी नहीं मिलती?”

“भई, मैं भी तो यहीं रहता हूँ. मुझे भी मिलती है. पर आपने कभी सोचा है कि आपका बिजली का बिल कौन भर रहा है?”

“इससे मुझे क्या लेना-देना? यह काम सरकार का है. वह सब्सिडी दे रही है तो वह भर रही होगी.”

“हाँ, भर तो रही है पर जानते हैं कि इस सब्सिडी का पैसा जुटाने के लिए सरकार जो टैक्स लगाती है वो टैक्स गरीब से गरीब आदमी को भी देना पड़ता है. यह समझ लीजिये कि रास्ते में भीख मांगता भिखारी भी जब अपनी भीख के पैसे से कुछ खरीदता है तो वह भी टैक्स अदा करता है. उसी टैक्स से आपको सब्सिडी मिलती है.”

“अर्थात उसकी भीख का कुछ अंश मुझे मिल रहा है?’

“एक मायने में ऐसा ही है.”

“अगर सरकार ने पैसे उधार लिए हों तो?”

“वह रकम चुकाने के लिए भी टैक्स लगाना पड़ेगा, कभी न कभी.”

मुकन्दी लाल जी मेरी बात सुन कर खामोश हो गये. मैं समझ रहा था कि वह क्या सोच रहे थे. वह बहुत स्वाभिमानी व्यक्ति हैं पर आज उनके स्वाभिमान को थोड़ी ठेस लग गयी थी.