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शुक्रवार, 20 नवंबर 2015

Rangraj: SWACHH BHARAT

Rangraj: SWACHH BHARAT: SWACHH BHARAT During my service period about 15 years back I have constructed a house in a remote locality with my house being the las...

रविवार, 15 नवंबर 2015

देश के भविष्य




बच्चो,
तुम इस देश के भविष्य हो,
तुम दिखते हो कभी,
भूखे, नंगे ||

कभी पेट की क्षुधा से,
बिलखते-रोते.
एक हाथ से पैंट को पकड़े,
दूजा रोटी को फैलाये ||

कभी मिल जाता है निवाला
तो कभी पेट पकड़ जाते लेट,
होली हो या दिवाली,
हो तिरस्कृत मिलता खाना ||

जब बच्चे ऐसे है,
तो देश का भविष्य कैसा होगा,
फिर भीबच्चो,
तुम ही इस देश के भविष्य हो ||


नोट :- सभी चित्र गूगल से लिए गए है |

चन्द माहिया :क़िस्त 22

चन्द माहिया  :  क़िस्त २२


:१:
एहसास रहे ज़िन्दा
तेरे होने की
इक प्यास रहे ज़िन्दा

:२:

आना हो न गर मुमकिन
जब दिल में मेरे
फिर क्या जीना तुम बिन

:३:

आँखों में समाए वो
अब क्या मैं देखूँ
आ कर भी न आए वो

:४:

जिस दिल में न हो राधा
साँसे तो पूरी
पर जीवन है आधा

:५:

पा कर भी जब खोना
टूटे सपनों का
फिर क्या रोना-धोना !

आनन्द.पाठक
०९४१३३९५५९२


सोमवार, 9 नवंबर 2015

आरएसएस प्रमुख मोदी से नाराज है?


बिहार चुनाव परिणाम आने के बाद भारतीय जनता पार्टी सबसे अधिक बेचैन है। सबसे अधिक दुखी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी दिख रहे हैं। प्रधानमंत्री के अथक प्रयास के बाद भी मतदाताओं ने उनके ऊपर भरोसा नहीं किया। इसके पीछे दो कारण हो सकते हैं। पहल यह कि मतदाताओं को व्यक्तिगत रूप से मोदी की कार्यशैली पसंद नहीं आ रही है। दूसरा यह कि प्रधानमंत्री मोदी के ऊपर आरएसएस अपना वर्चस्व कायम करना चाहता है, जिसे उन्होंने मंजूर नहीं किया तो चुनाव के दौरान अनाप शनाप बयानबाजी करके माहौल खराब कर दिया। इन दोनों बातों पर गौर करने लायक है। पहली बात की पुष्टि तो खुद भारतीय जनता पार्टी के ही नेता किया करते हैं। जैसा कि परिणाम आने के बाद बिहार के कद्दावर भाजपा नेता शत्रुघ्न सिन्हा का बयान आया है कि ‘डीएनए’ और ‘शैतान’ जैसी भाषा ने पार्टी को नुकसान पहुंचाया है। साथ ही उन्होंने यह भी कहा है कि पूरे चुनाव में प्रचार अभियान के अन्तर्गत भाजपा ने बिहार में जंगलराज होने की दुहाई दी। ऐसी भाषाओं के प्रयोग से भाजपा को नुकसान पहुंचा। दूसरे बिन्दु पर गौर करें तो यह बात समझ में नहीं आती कि आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने बिहार चुनाव प्रचार के दौरान ही आरक्षण खत्म किए जाने की मांग का राग क्यों अलापा। क्या मोहन भागवत के पास इसका कोई सम्यक तर्क है। अब तो बिहार से पार्टी सांसद हुकुमदेव नारायण ने इस चुनावी नतीजे के लिए आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत पर निशाना साधा है। नारायण का कहना है कि मोहन भागवत के आरक्षण पर दिए गए बयान से पार्टी को काफी नुकसान पहुंचा। उन्होंने कहा कि ऐसे समय में मोहन भागवत का बयान आया, जिससे पिछड़ा, दलित समाज हिल गया। उन्होंने आगे यह भी कहा, पीएम के प्रति दलित समाज की आस्था है, लेकिन लोगों के मन से डर नहीं निकाल सके। मोहन भागवत के बयान पर पिछड़ी जाति उत्तेजित हुईं। उन्होने तो यहां तक कह डाला कि बीजेपी को इतनी सीटें आ गईं वो ही बहुत है। इन गतिविधियों से साफ है कि मोदी और आरएसएस प्रमुख के बीच जरूर कोई अन्तर्द्वन्द चल रहा है। हलांकि लोकसभा चुनाव परिणाम आने के बाद देश में मोदी की जिस तरह से लोकप्रियता बढ़ी थी, उससे आरएसएस का कद बौना दिखने लगा था। अब शायद आरएसएस इसी कारण से मोदी को चुनाव जीत को श्रेय न मिले, इसके लिए हर संभव चाल चल रही है। अगर ऐसा कुछ है तो मोदी को अपने रास्ते अलग करना होगा और जनता के बीच तक इस सच्चाई को पहुंचाना होगा। 

देश का मूड समझें मोदी

2014 में जब देश में लोकसभा का चुनाव चल रहा था, हर ओर लोगों के दिलो दिमाग पर एक ही नेता के नाम की धूम थी। वह नाम था गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र भाई मोदी का। देश के मतदाताओं ने किसी की बात नहीं सुनी, नरेन्द्र मोदी की बात पर भरोसा किया और उन्हें प्रधानमंत्री पद के लिए प्रचंड बहुमत से चुना। शायद लोगों को इस बात का विश्वास था कि नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनते ही देश में आमूलचूल परिवर्तन हो जाएगा। पर प्रधानमंत्री बनने के 18 माह बाद भी देश में कोई परिवर्तन नहीं नजर आया। न गुड गवर्नेंस दिखा, न ही महंगाई कम हुई, न ही भ्रष्ट्राचार कम हुआ और न ही देश में बलात्कार जैसी अपराध की घटनाएं कम हुर्इं। उल्टे देश को कुछ नई घटनाओं का सामना करना पड़ा। मसलन ह्यलव जिहादह्ण, ह्यघर वापसीह्ण, आरक्षण खत्म करने की वकालत जैसे नए मुद्दे गढ़े जाने लगे। प्रधानमंत्री बनने के बाद भी नरेन्द्र मोदी के तेवर विपक्षी नेता जैसा ही दिखता रहा। पूरे देश में भाजपा के शीर्ष नेताओं पर भी एकाधिकार कायम करने की कोशिश शुरू हो गयी। हर मुद्दे पर अपनी अलग राय रखने में महारत हासिल करने वाले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इन समस्याओं का समाधान ढूंढने के बजाय विपक्ष की आवाज को दबाने के लिए उस पर एक नई तोहमत लगानी शुरू कर दी। दिल्ली में चुनाव आया तो उन्होंने अरविन्द केजरीवाल को निशाने पर ले लिया और उनके गोत्र पर सवाल खड़ा दिया। बिहार का चुनाव आया तो उन्होंने नीतीश कुमार के डीएनए पर सवाल खड़ा कर दिया। दिल्ली की तरह बिहार के चुनाव में भी पूरा प्रचार अभियान खुद पर केन्द्रित कर लिया। नतीजा यह निकला कि पब्लिक का मूड बदल गया। जो पब्लिक लोकसभा चुनाव में नरेन्द्र मोदी के नाम की माला जप रही थी, उसी पब्लिक ने दूसरा विकल्प ढूंढना शुरू कर दिया। दिल्ली में भारी परायज मिलने के बाद भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देश की जनता का मूड नहीं समझा और बिहार के चुनाव में फिर वही राग अलापना शुरू कर दिया। अब बिहार के परिणाम सामने हैं। यहां भी मोदी के गठबंधन को महा हार का सामना करना पड़ा है। प्रधानमंत्री को यह समझना चाहिए कि देश की जनता कभी किसी के पीछे चलने की आदी नहीं है। उसे विकास के साथ ही भरपूर स्नेह, प्यार और आपसी भाईचारे की भावना भी चाहिए। उसे बगैर स्नेह, प्यार और भाईचारे के कोरा विकास की बात सहज मंजूर नहीं है।

रविवार, 1 नवंबर 2015

अस्पताल

अस्पताल
क्या अजब जगह है
बिखरी पड़ी है
वेदना दुःख दर्द 
जीवन मृत्यु के प्रश्न
इसी अस्पताल के 
किसी वार्ड के बिस्तर पर
तड़फती रहती है 
जिजीविषा
दवाइयों 
और सिरंज में 
ढूंढती रहती है जीवन
समीप के बिस्तर से 
गुम होती साँसों को देख
सोचती है 
जिजिबिषा 
कल का सूरज 
कैसा होगा .......

शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2015

रंग-ए-जिंदगानी: लघु-कथा - मजबूरी या समझदारी

रंग-ए-जिंदगानी: लघु-कथा - मजबूरी या समझदारी: शर्मा जी ने जब अपने बेटे राजेश से अपने खर्चे के सिए कुछ पैसे मांगे, तो राजेश नाक-भौं सिकोड़ने हुए बोला, “ पिताजी आपका क्या हैं ? आप तो ...