Laxmirangam: नन्हीं चिड़िया.: नन्हीं चिड़िया. बहुत अरसे बाद देखा , पिछले कुछ समय से बाग में एक नई चिड़िया , चीं - चीं, चूँ - चूँ करती फुदक रही है , फ...
नन्हीं चिड़िया.
नन्हीं चिड़िया.
बहुत अरसे बाद देखा,
पिछले कुछ समय से बाग में
एक नई चिड़िया ,
चीं - चीं, चूँ - चूँ करती
फुदक रही है,
फुनगी से फुनगी.
पता नहीं कब आई,
कहाँ से आई,
कब से फिरती है बाग में,
उड़ते - उड़ते राह में यहाँ रुक गई,
या बहक कर भटक कर
पहुँच गई यहाँ,
इतने दिनों से देखते - देखते
महसूस कर रहा हूँ कि
उसे यहाँ रहना अच्छा लग रहा है
उसे बाग रास आ रहा है,
भा रहा है,
पसंद आ रहा है,
शायद अब यहीं रहेगी ताउम्र या
जब तक चमन आबाद रहे ।
कुछ समय से दूर से देख ही रहा हूँ
आज देखा करीब से,
जब मेरे बिखेरे दाना चुगने आई,
छोटी सी चोंच लिए,
चीं- चीं, चूँ - चूँ करती,
और पक्षियों के संग,
फुदकती, यहाँ से वहाँ
दाना चुगती हुई,
बिखरे हुए भी और
मेरे हाथ पर के भी।
वह निर्भीक है,
वह डरती नहीं है,
मुझसे भी,
बैठ जाती है.
कभी कंधे पर तो
कभी हथेली पर।
जब हथेली पर दाना चुगती है,
तो कभी - कभी उसकी
छोटी नुकीली चोंच चुभती है,
इस चुभन में दर्द कम
पर मिठास ज्यादा है,
एक अजब सा एहसास है,
पता नहीं क्यों?
ऐसा आभास होता है कि
कुछ बकाया है,
विधि के लिखे
मेरे खाते के कुछ क्षण
पता नहीं पिछले या
किसी और जनम के,
जो उनके हिसाब से
बच गए थे शायद,
उन्हें ही देने आई है
ये नन्हीं फुदकती चिड़िया,
चूँ - चूँ, चीं - चीं करती हुई
ये नन्हीं फुदकती चिड़िया,
एक नई चिड़िया ,
मेरे बाग में।
मित्रों! आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं। बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए। |
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शुक्रवार, 25 नवंबर 2016
Laxmirangam: नन्हीं चिड़िया.
Andhra born. mother toungue Telugu. writing language Hindi. Other languages known - Gujarati, Punjabi, Bengali, English.Published 13 books in Hindi and one in English.
Can manage with Kannada, Tamil, assamese, Marathi .
Published 10 books in Hindi containing Poetry, Short stories, Currect topics, Essays, analysis etc. All are available on www.Amazon.in/books with names Rangraj Iyengar & रंगराज अयंगर
Both my english books are adopeted by FLAME university Pune for MBA (HR) Final year STUDENTS.
Laxmirangam: चिड़िया, राक्षस और फरिश्ता.
Laxmirangam: चिड़िया, राक्षस और फरिश्ता.: चिड़िया, राक्षस और फरिश्ता. एक थी चिड़िया, जैसे गुड़िया, चूँ-चूँ, चीं-चीं करने वाली, गाने और फुदकने वाली, यहाँ से वहाँ, वहाँ से यहाँ...

चिड़िया, राक्षस और फरिश्ता.
चिड़िया, राक्षस और फरिश्ता.
एक थी चिड़िया,
जैसे गुड़िया,
चूँ-चूँ, चीं-चीं करने वाली,
गाने और फुदकने वाली,
यहाँ से वहाँ, वहाँ से यहाँ,
डाल-डाल, अंगना, बगिया...
एक थी चिड़िया...
कहीं से इक दिन राक्षस आया,
चिड़िया को उसने धमकाया,
बस !!! बस!!!बस!!!
बस, बहुत हुआ ये गाना-वाना
बंद करो अपना चिल्लाना
अब से मेरा मानो कहना,
जैसा बोलूँ वैसा करना !
लाल-लाल आँखें दिखलाई,
चिड़िया सहमी, काँपी, घबराई ...
गुड़िया जैसे जान गँवाई
क्या कर पाऊँ समझ न पाई।।
.
पकड़ के उसको फिर राक्षस ने
बंद कर दिया एक महल में ,
जब मन चाहे उसे निकाले,
जो जी चाहे वह कर डाले,
कभी लाल आँखें दिखलाकर,
और कभी बहला-फुसलाकर,
उसका गाना बंद कराया
चूँ-चूँ करना बंद कराया...
जो मन चाहा वही कराया
खूब डराया और धमकाया।।
गुड़िया से छिन गया बचपना,
चिड़िया से छिन गया चहकना...
भूल गई वह गाना - वाना
कारण ? राक्षस का चिल्लाना.
इक दिन एक फरिश्ता आया,
उसने चिड़िया को छुड़वाया,
आखिर कैद से छूटी चिड़िया,
अपने घर को लौटी चिड़िया...
जीवन तो जीना ही था,
जख्मों को सीना ही था,
हिम्मत करके बड़ी हुई,
अपने पैरों खड़ी हुई....
वे अतीत के काले साए,
चिड़िया के दिल को दहलाएँ,
लाल-लाल आँखें राक्षस की,
याद करे गुड़िया घबराए
अब तो वे दिन बीत गए हैं,
दुख के साए रीत गए हैं,
बीतों से अब क्यों घबराएँ ,
आगे क्यों ना बढ़ते जाएँ.
पिछली बातों से क्यों परेशां हो,
बीती बातों से दिल उदास न हो,
भले ही जिंदगी में आस न हो,
बीते कल की सड़ी भड़ास लिए,
आता कल तो कभी खराब न हो।
बीती बातों से दिल उदास न हो।
रात काली हो, स्याह हो कितनी,
एक स्वर्णिम सुबह तो आएगी,
रात को कोसती रही तुम जो,
सुबह की स्वर्णिम छटा भी जाएगी।
स्याह रातों से यूँ हताश न हो,
बीती बातों से दिल उदास न हो।
मनको मत बनाओ डिब्बा कचरे का,
उसे भी रोज़ खाली करती हो,
धोती हो रोज नहीं तो दूसरे दिन,
मन को खाली नहीं क्यों करती हो।
इन तुच्छ बातों से निराश न हो
बीती बातों से दिल उदास न हो।
गर नहीं खाली करोगी, महकेगा,
पूरा आहाता बदबू-मय होगा,
एक मन को खाली करने से,
खुद के संग सारा घर भी चहकेगा।
मन को तू मार के संत्रास न हो,
बीती बातों से दिल उदास न हो
सोचती हो हमेशा दूजे का, कुछ
तो अपने लिए भी सोचो तुम,
त्यागकर 'स्व' को तुम स्वजन के लिए,
सोच किसको जताना चाहो तुम।
भूलो जाओ खुद अपनी प्यास न हो,
बीती बातों से दिल उदास न हो।
आज का यह जमाना गैर सा है,
पंछी खाकर के दाना उड़ जाएं,
बूढ़े मां बाप की फिकर है कहां,
हसीं रात की बाहों में वो सुकूं पाएं।
इनको बसाने का कुछ प्रयास न हो,
बीती बातों से दिल उदास न हो।
मेरी मानो तो एक हँसी जीवन,
खुद भी अपने लिए सँजो लो तुम,
दूसरों के लिए तो करती हो,
कुछ तो खुद के लिए भी कर लो तुम।
आते कल यूँ कभी खलास न हों
बीती बातों से दिल उदास न हो।।
बीती बातों से दिल उदास न हो
-----------------------------------
संकलक : एम आर अयंगर.
चिड़िया, राक्षस और फरिश्ता.
चिड़िया, राक्षस और फरिश्ता.
एक थी चिड़िया,
जैसे गुड़िया,
चूँ-चूँ, चीं-चीं करने वाली,
गाने और फुदकने वाली,
यहाँ से वहाँ, वहाँ से यहाँ,
डाल-डाल, अंगना, बगिया...
एक थी चिड़िया...
कहीं से इक दिन राक्षस आया,
चिड़िया को उसने धमकाया,
बस !!! बस!!!बस!!!
बस, बहुत हुआ ये गाना-वाना
बंद करो अपना चिल्लाना
अब से मेरा मानो कहना,
जैसा बोलूँ वैसा करना !
लाल-लाल आँखें दिखलाई,
चिड़िया सहमी, काँपी, घबराई ...
गुड़िया जैसे जान गँवाई
क्या कर पाऊँ समझ न पाई।।
.
पकड़ के उसको फिर राक्षस ने
बंद कर दिया एक महल में ,
जब मन चाहे उसे निकाले,
जो जी चाहे वह कर डाले,
कभी लाल आँखें दिखलाकर,
और कभी बहला-फुसलाकर,
उसका गाना बंद कराया
चूँ-चूँ करना बंद कराया...
जो मन चाहा वही कराया
खूब डराया और धमकाया।।
गुड़िया से छिन गया बचपना,
चिड़िया से छिन गया चहकना...
भूल गई वह गाना - वाना
कारण ? राक्षस का चिल्लाना.
इक दिन एक फरिश्ता आया,
उसने चिड़िया को छुड़वाया,
आखिर कैद से छूटी चिड़िया,
अपने घर को लौटी चिड़िया...
जीवन तो जीना ही था,
जख्मों को सीना ही था,
हिम्मत करके बड़ी हुई,
अपने पैरों खड़ी हुई....
वे अतीत के काले साए,
चिड़िया के दिल को दहलाएँ,
लाल-लाल आँखें राक्षस की,
याद करे गुड़िया घबराए
अब तो वे दिन बीत गए हैं,
दुख के साए रीत गए हैं,
बीतों से अब क्यों घबराएँ ,
आगे क्यों ना बढ़ते जाएँ.
पिछली बातों से क्यों परेशां हो,
बीती बातों से दिल उदास न हो,
भले ही जिंदगी में आस न हो,
बीते कल की सड़ी भड़ास लिए,
आता कल तो कभी खराब न हो।
बीती बातों से दिल उदास न हो।
रात काली हो, स्याह हो कितनी,
एक स्वर्णिम सुबह तो आएगी,
रात को कोसती रही तुम जो,
सुबह की स्वर्णिम छटा भी जाएगी।
स्याह रातों से यूँ हताश न हो,
बीती बातों से दिल उदास न हो।
मनको मत बनाओ डिब्बा कचरे का,
उसे भी रोज़ खाली करती हो,
धोती हो रोज नहीं तो दूसरे दिन,
मन को खाली नहीं क्यों करती हो।
इन तुच्छ बातों से निराश न हो
बीती बातों से दिल उदास न हो।
गर नहीं खाली करोगी, महकेगा,
पूरा आहाता बदबू-मय होगा,
एक मन को खाली करने से,
खुद के संग सारा घर भी चहकेगा।
मन को तू मार के संत्रास न हो,
बीती बातों से दिल उदास न हो
सोचती हो हमेशा दूजे का, कुछ
तो अपने लिए भी सोचो तुम,
त्यागकर 'स्व' को तुम स्वजन के लिए,
सोच किसको जताना चाहो तुम।
भूलो जाओ खुद अपनी प्यास न हो,
बीती बातों से दिल उदास न हो।
आज का यह जमाना गैर सा है,
पंछी खाकर के दाना उड़ जाएं,
बूढ़े मां बाप की फिकर है कहां,
हसीं रात की बाहों में वो सुकूं पाएं।
इनको बसाने का कुछ प्रयास न हो,
बीती बातों से दिल उदास न हो।
मेरी मानो तो एक हँसी जीवन,
खुद भी अपने लिए सँजो लो तुम,
दूसरों के लिए तो करती हो,
कुछ तो खुद के लिए भी कर लो तुम।
आते कल यूँ कभी खलास न हों
बीती बातों से दिल उदास न हो।।
बीती बातों से दिल उदास न हो
-----------------------------------
संकलक : एम आर अयंगर.
Andhra born. mother toungue Telugu. writing language Hindi. Other languages known - Gujarati, Punjabi, Bengali, English.Published 13 books in Hindi and one in English.
Can manage with Kannada, Tamil, assamese, Marathi .
Published 10 books in Hindi containing Poetry, Short stories, Currect topics, Essays, analysis etc. All are available on www.Amazon.in/books with names Rangraj Iyengar & रंगराज अयंगर
Both my english books are adopeted by FLAME university Pune for MBA (HR) Final year STUDENTS.
मंगलवार, 25 अक्टूबर 2016
Laxmirangam: अनुवाद
Laxmirangam: अनुवाद: अनुवाद अनुवाद का शाब्दिक अर्थ – किसी कही हुई बात को (उसी तरह) पुनः कहा जाना – को अनुवाद माना जा सकता है. “ उसी तरह ” - के बहुत मतलब ...
Andhra born. mother toungue Telugu. writing language Hindi. Other languages known - Gujarati, Punjabi, Bengali, English.Published 13 books in Hindi and one in English.
Can manage with Kannada, Tamil, assamese, Marathi .
Published 10 books in Hindi containing Poetry, Short stories, Currect topics, Essays, analysis etc. All are available on www.Amazon.in/books with names Rangraj Iyengar & रंगराज अयंगर
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रविवार, 23 अक्टूबर 2016
एक लघुव्यथा : अन्तरात्मा की पुकार......[व्यंग्य]
एक लघु व्यथा: अन्तरात्मा की पुकार ...[व्यंग्य]
--’अलाना सिंह’ अपनी पार्टी छोड़ ’ ’फ़लाना पार्टी में शामिल हो गए।
बीती रात जब वो सो रहे थे तो उनकी अन्तरात्मा एकाएक जाग गई । ऐसी ही अन्तरात्मा एक बार बाबू जगजीवन राम जी की भी जगी थी कि कांग्रेस छोड़ दिया था और तब से ’आया राम ,गया राम, चल पड़ा।तत्पश्चात कई लोगों की अन्तरात्मा जगने लगीऔर वोअपना दल छोड़ सामने वाले दल में जाने लगे इस उम्मीद से कि वहाँ उनकी अन्तरात्मा को कोई पद मिल जाये...कुर्सी मिल जाए तो आत्मा को शान्ति मिल जाए। एक मित्र ने पूछा -जब कोई पुरुष दल-बदल करता है तो ’आया राम गया राम’ कहते हैं परन्तु जब एक महिला नेत्री दल बदल करती है तो उसे क्या कहते हैं ? मैने कहा "--आई रीता,गई गीता । रीता माने ’खाली’, हाथ कुछ भी नहीं ।-कई वर्षों तक पार्टी की अथक सेवा करने के बाद भी कोई लाभकारी पद न मिले ...मुख्यमंत्री की कुर्सी न मिले ...किसी संस्था का अध्यक्ष पद न मिले तो ’आत्मा’ बेचैन हो जाती है और जग जाती है । उनकी आधी रात को जग गई । कोसने लगी ’-हे मूढ़ पुरुष ! । एक ही पार्टी की विचारधारा वर्षों से धारण करते करते तेरे वस्त्र मैले हो गए ..जीर्ण-शीर्ण हो गए -यत्र तत्र से फट फटा गए हैं जिस समाजवाद को तू सीने से चिपकाए फिरता है वो तो छ्द्म समाजवाद है .तेरा समाजवाद तेरे घर से उठ कर तेरे भाई ,तेरे पुत्र ,तेरी पुत्र-वधू ,तेरे भतीजे ,तेरे भांजे तेर साले से घूम फिर कर तेरे नाती पोतो तक आ जाता है ।क्या तेरा ’सेक्यूलिरजम’ झूठा नहीं है? छद्म नहीं है ? रोज़ा में इफ़्तार पार्टी देता है , अयोध्या में ’हनुमान गढ़ी जाता है..... गुरुद्वारा में सरोपा ग्रहण करता है .... वोट बैंक में सेंध लगाता है ...किसलिए ..कुर्सी के लिए न .।क्या ..तेरा सर्वधर्म समभाव ..... का नारा कुर्सी के लिए नही है ? वोट के लिए नहीं होता ....।वोट के लिए ..जालीदार टोपी लगा लेता है ...तिलक भी लगा लेता है...तराजू भी तौल लेता है ...तलवार वालों को जूते भी मार देता है । क्या वर्षों से तू अपने आप को नहीं छल रहा है ? उठ ! छोड़ यह पार्टी ..तेरी दाल अब तक नहीं गली तो आगे भी नहीं गलेगी। हाशिये पर आ गया है तू । पार्टी का झंडा अपनी साईकिल पर लगाए कब तक चलेगा ।कब तक पार्टी अधिवेशन में जाजिम बिछायेगा...दरी उठायेगा ..पानी पिलायेगा ,,,खाली पेट सेवा करता रहेगा ।जब फल मिलने का समय आता है तो हाइ-कमान ’बाहर’ से भेज देता है किसी ग़ैर को पार्टी की सेवा करने का और तू ठगा ठ्गा सा रह जाता है ।उतिष्ठ मूढ़ ! उतिष्ठ ! छोड़ यह पार्टी ...यहीं सड़ेगा क्या....
अब उनकी अन्तरात्मा जग चुकी हैअब सब कुछ साफ़ साफ़ दिखाई देने लगा है । आत्मा निर्मल हो चुकी है । पुरानी पार्टी में छिद्र ही छिद्र था । कितनी मैली-कुचैली थी पुरानी पार्टी -कितनी दुर्गन्ध भर गई है वहां । कैसे रहा इतने दिन तक इस सड़न्ध में कि जानवर भी न रहे ।कितनी संवेदनहीन थे वे लोग ...मेरे खून को खून न समझ सके....मेरे पसीने को पसीना न समझा । हाई कमान से मिलने का समय माँगो तो समय नहीं मिलता राजकुमार जी से मिलने का तो सवाल ही नहीं। घुटन थी उधर .......अपने नेतॄत्व तो करते नहीं ...हमें करने नहीं देते ....बस जाजिम बिछाते रहो,,,दरी उठाते रहो...पानी पिलाते रहो...
अटकले लगती है ।खबर चलती है ,नाटक चलता है ।नहीं नहीं... मैं नहीं जा रहा हूँ ...मैं कहीं नहीं जा रहा हूँ ....सब मीडिया की साजिश है,,,,मैं तो पार्टी का अनुशासित सिपाही हूं ....पार्टी जो दायित्व सौपेंगी निष्ठा के साथ निभाऊँगा...मुझे मुख्यमंत्री बनने की कोई इच्छा नहीं ...मैं तो पार्टी की सेवा के लिए पैदा हुआ हूँ ..वफ़ादार सेवक हूँ ....पार्टी की ऐसे ही सेवा करते करते मर जाऊँगा ...मेरी हर एक साँस देश के लिए है... पार्टी के लिए है...गरीबों के लिए है ..दलितों के लिए हैं..मज़दूरों के लिए है ...किसानों के लिए ......मै तो बस देश हित के लिए साँस धारण किए हुए हूं।
उनकी साँस तो जवाब नहीं देती हैं ,अनुशासन जवाब दे जाता है और एक दिन सुबह उठ कर किसी अधो वस्त्र की तरह विचारधारा बदल देते है !’वासांसि जीर्णानि यथा विहाय ,नवानि गृहणाति नरोपराणि.....
और फिर अचानक , अलाना पार्टी का ’हाथ’ छोड ’फ़लाना’ पार्टी का ’फूल’ थाम लेते हैं ......रात-ओ-रात विचारधारा बदल लेते हैं ..सोच बदल लेते है ... संस्कार बदल लेते है... स्वयं हित के लिए नहीं ..परिवार हित के लिए ...कुर्सी के लिए ...सत्ता सुख के लिए.
चुनाव काल में ऐसे ’आया राम गया राम ’को लालू जी ’मौसम वैज्ञानिक’ की संज्ञा देते है । वह ’राम’ समझदार है जो चुनाव काल में मौसम का ,हवा का रुख देख कर पाला बदल लेता है।
कुर्सी में गुन बहुत है ,सदा राखियो ध्यान
उड़ो हवा के संग सदा ,यह मौसम विज्ञान
ये मौसम विज्ञान , ’विचार’ की ऐसी तैसी
अपने ’राम’ चले जिधर मिल जाए ’कुर्सी’
जनता को छकने-छकाने के बाद ,अन्तत: घोषणा हो गई -अलाना सिंह’ अपनी पार्टी छोड़ ’फ़लाना’ पार्टी में शामिल हो गए।
मंच सजाए जाने लगे ,स्वागत की तैयारियां की जाने लगी ...माला फूल मँगाए जाने लगे... इत्र-फुलेल छिड़के जाने लगे ,...केवड़ा जल का छिड़काव जारी है .हाथ में ’कमल’ का फूल थमाना है .....’अलाना सिंह’ कह चुके हैं कि पुरानी पार्टी में काफी दुर्गन्ध है ।अगर पुरानी पार्टी से वह कोई ’दुर्गन्ध’ साथ लाते हैं तो नई पार्टी में न फ़ैले। ।पुरानी पार्टी को ज़ोरदार झटका दिया है तो स्वागत भी ज़ोरदार होना चाहिए।
प्रेस कान्फ़्रेन्स में ’ए बिग कैच मछली " प्रस्तुत किया गया --देखो प्रेस वालों ... अन्य पार्टी वालों -क्या तीर मारा है मैने
पत्रकार - अलाना सिंह जी ! आप ने नई पार्टी क्यूँ ’ज्वाईन’ की। क्या देखा इस में ऐसा कि रात-ओ-रात ...?
अलाना सिंह- ’ देखो भई ! मेरे रग रग में देश भक्ति कूट कूट कर भरी है। हम खानदानी ’देशभक्त हैं ...जिधर देश भक्ति उधर मैं....देश पहले है ,पार्टी बाद में ,विचारधारा उसके बाद में और मैं तो सबसे बाद में । मुझ से किसान भाईयों का दर्द देखा नहीं जा रहा था -जिन ग़रीब किसान भाईयों के हाथ में ’ सिंहासन ’ सौपना था, आप ने ’’खाट’ सौंप दिया और वह भी ’झिलंगी’ --यह किसान भाईयों का ही नहीं बल्कि ’खाट" का भी अपमान है ।मुझ से यह अपमान देखा नहीं जा सका सो इधर चला आया।मेरे देश के जवान सीमा पर अपने प्राण न्योछावर कर रहे हैं... हमारी बहने विधवा हो रही है ..कलाईयां सूनी हो रही है ...और कोई कहे कि ’खून’ की दलाली है ..मैं आहत हो गया...सो इधर चला आया....
पत्रकार - मगर यह बयान तो महीना भर पहले आया था...तब तो आप ने पार्टी नहीं छोड़ी
अलाना सिंह -- तो क्या हुआ ? जब समझ में आया तब छोड़ी ,..
पत्रकार - मगर आप के पुराने साथी तो कह रहे हैं कि आप ’दगाबाज’ है?
-ठीक ही कह रहे होंगे।दगाबाजी -का मतलब उनसे ज़्यादा और कौन समझता होगा । जब वो साईकिल के पीछे पीछे दौड़ रहे थे और पीछे कैरियर पर बैठने की जगह नहीं मिली तो ’हाथ’ पर आकर बैठ गए तब दगाबाजी नहीं दिखी
लोग कहते हैं कि मैं हाशिए पर आ गया था । भईए ! पार्टी का सच्चा सिपाही तो हाशिए पर ही रहता है ....पार्टी के मुख्य में तो जुगाड़ी ...दरबारी...चमचे ..चरणस्पर्शी ...दण्डवती ..रहते है --उन्होने एक दीर्घ उच्छवास छोड़ते हुए अपना दर्द उडेला ।
तमाम उम्र कटी पार्टी की सेवा करते
आखिरी वक़्त में क्या खाक ’जुगाड़ी’ बनते
-अलाना भईया की जय ...फलाना पार्टी की जय ...जिन्दाबाद ..जिन्दाबाद ...भईया जी संघर्ष करो....हम तुम्हारे साथ हैं--वन्दे मातरम -समर्थको ने नारा लगाया
अलाना सिंह मुस्करा दिए--डूबते को तिनके का सहा्रा न सही ....तो ’कमल’ का डंठल ही सही।
अस्तु
-आनन्द.पाठक-
--’अलाना सिंह’ अपनी पार्टी छोड़ ’ ’फ़लाना पार्टी में शामिल हो गए।
बीती रात जब वो सो रहे थे तो उनकी अन्तरात्मा एकाएक जाग गई । ऐसी ही अन्तरात्मा एक बार बाबू जगजीवन राम जी की भी जगी थी कि कांग्रेस छोड़ दिया था और तब से ’आया राम ,गया राम, चल पड़ा।तत्पश्चात कई लोगों की अन्तरात्मा जगने लगीऔर वोअपना दल छोड़ सामने वाले दल में जाने लगे इस उम्मीद से कि वहाँ उनकी अन्तरात्मा को कोई पद मिल जाये...कुर्सी मिल जाए तो आत्मा को शान्ति मिल जाए। एक मित्र ने पूछा -जब कोई पुरुष दल-बदल करता है तो ’आया राम गया राम’ कहते हैं परन्तु जब एक महिला नेत्री दल बदल करती है तो उसे क्या कहते हैं ? मैने कहा "--आई रीता,गई गीता । रीता माने ’खाली’, हाथ कुछ भी नहीं ।-कई वर्षों तक पार्टी की अथक सेवा करने के बाद भी कोई लाभकारी पद न मिले ...मुख्यमंत्री की कुर्सी न मिले ...किसी संस्था का अध्यक्ष पद न मिले तो ’आत्मा’ बेचैन हो जाती है और जग जाती है । उनकी आधी रात को जग गई । कोसने लगी ’-हे मूढ़ पुरुष ! । एक ही पार्टी की विचारधारा वर्षों से धारण करते करते तेरे वस्त्र मैले हो गए ..जीर्ण-शीर्ण हो गए -यत्र तत्र से फट फटा गए हैं जिस समाजवाद को तू सीने से चिपकाए फिरता है वो तो छ्द्म समाजवाद है .तेरा समाजवाद तेरे घर से उठ कर तेरे भाई ,तेरे पुत्र ,तेरी पुत्र-वधू ,तेरे भतीजे ,तेरे भांजे तेर साले से घूम फिर कर तेरे नाती पोतो तक आ जाता है ।क्या तेरा ’सेक्यूलिरजम’ झूठा नहीं है? छद्म नहीं है ? रोज़ा में इफ़्तार पार्टी देता है , अयोध्या में ’हनुमान गढ़ी जाता है..... गुरुद्वारा में सरोपा ग्रहण करता है .... वोट बैंक में सेंध लगाता है ...किसलिए ..कुर्सी के लिए न .।क्या ..तेरा सर्वधर्म समभाव ..... का नारा कुर्सी के लिए नही है ? वोट के लिए नहीं होता ....।वोट के लिए ..जालीदार टोपी लगा लेता है ...तिलक भी लगा लेता है...तराजू भी तौल लेता है ...तलवार वालों को जूते भी मार देता है । क्या वर्षों से तू अपने आप को नहीं छल रहा है ? उठ ! छोड़ यह पार्टी ..तेरी दाल अब तक नहीं गली तो आगे भी नहीं गलेगी। हाशिये पर आ गया है तू । पार्टी का झंडा अपनी साईकिल पर लगाए कब तक चलेगा ।कब तक पार्टी अधिवेशन में जाजिम बिछायेगा...दरी उठायेगा ..पानी पिलायेगा ,,,खाली पेट सेवा करता रहेगा ।जब फल मिलने का समय आता है तो हाइ-कमान ’बाहर’ से भेज देता है किसी ग़ैर को पार्टी की सेवा करने का और तू ठगा ठ्गा सा रह जाता है ।उतिष्ठ मूढ़ ! उतिष्ठ ! छोड़ यह पार्टी ...यहीं सड़ेगा क्या....
अब उनकी अन्तरात्मा जग चुकी हैअब सब कुछ साफ़ साफ़ दिखाई देने लगा है । आत्मा निर्मल हो चुकी है । पुरानी पार्टी में छिद्र ही छिद्र था । कितनी मैली-कुचैली थी पुरानी पार्टी -कितनी दुर्गन्ध भर गई है वहां । कैसे रहा इतने दिन तक इस सड़न्ध में कि जानवर भी न रहे ।कितनी संवेदनहीन थे वे लोग ...मेरे खून को खून न समझ सके....मेरे पसीने को पसीना न समझा । हाई कमान से मिलने का समय माँगो तो समय नहीं मिलता राजकुमार जी से मिलने का तो सवाल ही नहीं। घुटन थी उधर .......अपने नेतॄत्व तो करते नहीं ...हमें करने नहीं देते ....बस जाजिम बिछाते रहो,,,दरी उठाते रहो...पानी पिलाते रहो...
अटकले लगती है ।खबर चलती है ,नाटक चलता है ।नहीं नहीं... मैं नहीं जा रहा हूँ ...मैं कहीं नहीं जा रहा हूँ ....सब मीडिया की साजिश है,,,,मैं तो पार्टी का अनुशासित सिपाही हूं ....पार्टी जो दायित्व सौपेंगी निष्ठा के साथ निभाऊँगा...मुझे मुख्यमंत्री बनने की कोई इच्छा नहीं ...मैं तो पार्टी की सेवा के लिए पैदा हुआ हूँ ..वफ़ादार सेवक हूँ ....पार्टी की ऐसे ही सेवा करते करते मर जाऊँगा ...मेरी हर एक साँस देश के लिए है... पार्टी के लिए है...गरीबों के लिए है ..दलितों के लिए हैं..मज़दूरों के लिए है ...किसानों के लिए ......मै तो बस देश हित के लिए साँस धारण किए हुए हूं।
उनकी साँस तो जवाब नहीं देती हैं ,अनुशासन जवाब दे जाता है और एक दिन सुबह उठ कर किसी अधो वस्त्र की तरह विचारधारा बदल देते है !’वासांसि जीर्णानि यथा विहाय ,नवानि गृहणाति नरोपराणि.....
और फिर अचानक , अलाना पार्टी का ’हाथ’ छोड ’फ़लाना’ पार्टी का ’फूल’ थाम लेते हैं ......रात-ओ-रात विचारधारा बदल लेते हैं ..सोच बदल लेते है ... संस्कार बदल लेते है... स्वयं हित के लिए नहीं ..परिवार हित के लिए ...कुर्सी के लिए ...सत्ता सुख के लिए.
चुनाव काल में ऐसे ’आया राम गया राम ’को लालू जी ’मौसम वैज्ञानिक’ की संज्ञा देते है । वह ’राम’ समझदार है जो चुनाव काल में मौसम का ,हवा का रुख देख कर पाला बदल लेता है।
कुर्सी में गुन बहुत है ,सदा राखियो ध्यान
उड़ो हवा के संग सदा ,यह मौसम विज्ञान
ये मौसम विज्ञान , ’विचार’ की ऐसी तैसी
अपने ’राम’ चले जिधर मिल जाए ’कुर्सी’
जनता को छकने-छकाने के बाद ,अन्तत: घोषणा हो गई -अलाना सिंह’ अपनी पार्टी छोड़ ’फ़लाना’ पार्टी में शामिल हो गए।
मंच सजाए जाने लगे ,स्वागत की तैयारियां की जाने लगी ...माला फूल मँगाए जाने लगे... इत्र-फुलेल छिड़के जाने लगे ,...केवड़ा जल का छिड़काव जारी है .हाथ में ’कमल’ का फूल थमाना है .....’अलाना सिंह’ कह चुके हैं कि पुरानी पार्टी में काफी दुर्गन्ध है ।अगर पुरानी पार्टी से वह कोई ’दुर्गन्ध’ साथ लाते हैं तो नई पार्टी में न फ़ैले। ।पुरानी पार्टी को ज़ोरदार झटका दिया है तो स्वागत भी ज़ोरदार होना चाहिए।
प्रेस कान्फ़्रेन्स में ’ए बिग कैच मछली " प्रस्तुत किया गया --देखो प्रेस वालों ... अन्य पार्टी वालों -क्या तीर मारा है मैने
पत्रकार - अलाना सिंह जी ! आप ने नई पार्टी क्यूँ ’ज्वाईन’ की। क्या देखा इस में ऐसा कि रात-ओ-रात ...?
अलाना सिंह- ’ देखो भई ! मेरे रग रग में देश भक्ति कूट कूट कर भरी है। हम खानदानी ’देशभक्त हैं ...जिधर देश भक्ति उधर मैं....देश पहले है ,पार्टी बाद में ,विचारधारा उसके बाद में और मैं तो सबसे बाद में । मुझ से किसान भाईयों का दर्द देखा नहीं जा रहा था -जिन ग़रीब किसान भाईयों के हाथ में ’ सिंहासन ’ सौपना था, आप ने ’’खाट’ सौंप दिया और वह भी ’झिलंगी’ --यह किसान भाईयों का ही नहीं बल्कि ’खाट" का भी अपमान है ।मुझ से यह अपमान देखा नहीं जा सका सो इधर चला आया।मेरे देश के जवान सीमा पर अपने प्राण न्योछावर कर रहे हैं... हमारी बहने विधवा हो रही है ..कलाईयां सूनी हो रही है ...और कोई कहे कि ’खून’ की दलाली है ..मैं आहत हो गया...सो इधर चला आया....
पत्रकार - मगर यह बयान तो महीना भर पहले आया था...तब तो आप ने पार्टी नहीं छोड़ी
अलाना सिंह -- तो क्या हुआ ? जब समझ में आया तब छोड़ी ,..
पत्रकार - मगर आप के पुराने साथी तो कह रहे हैं कि आप ’दगाबाज’ है?
-ठीक ही कह रहे होंगे।दगाबाजी -का मतलब उनसे ज़्यादा और कौन समझता होगा । जब वो साईकिल के पीछे पीछे दौड़ रहे थे और पीछे कैरियर पर बैठने की जगह नहीं मिली तो ’हाथ’ पर आकर बैठ गए तब दगाबाजी नहीं दिखी
लोग कहते हैं कि मैं हाशिए पर आ गया था । भईए ! पार्टी का सच्चा सिपाही तो हाशिए पर ही रहता है ....पार्टी के मुख्य में तो जुगाड़ी ...दरबारी...चमचे ..चरणस्पर्शी ...दण्डवती ..रहते है --उन्होने एक दीर्घ उच्छवास छोड़ते हुए अपना दर्द उडेला ।
तमाम उम्र कटी पार्टी की सेवा करते
आखिरी वक़्त में क्या खाक ’जुगाड़ी’ बनते
-अलाना भईया की जय ...फलाना पार्टी की जय ...जिन्दाबाद ..जिन्दाबाद ...भईया जी संघर्ष करो....हम तुम्हारे साथ हैं--वन्दे मातरम -समर्थको ने नारा लगाया
अलाना सिंह मुस्करा दिए--डूबते को तिनके का सहा्रा न सही ....तो ’कमल’ का डंठल ही सही।
अस्तु
-आनन्द.पाठक-
गुरुवार, 20 अक्टूबर 2016
एक लघु व्यथा : खाट...खटमल...खून..[व्यंग्य]
एक लघु व्यथा : खाट...खटमल....खून...[व्यंग्य]
[नोट -आप ने ’बेताल-पच्चीसी’ की कहानियाँ ज़रूर पढ़ी होंगी जिसमें राजा विक्रमादित्य जंगल में , बेताल को डाल से उतार कर,और कंधे पर लाद कर चलते हैं और बेताल रास्ते भर एक कहानी सुनाते रहता है ।बेताल शर्त रखता है कि अगर राजा ने रास्ते कुछ बोला तो वह उड़ कर डाल पर जा कर लटक जायेगा.....
------------------------------------
......................राजा विक्रमादित्य ,बेताल को डाल से उतार कर चलने लगे ।
-बेताल ने कहा-हे विक्रम !- रास्ता लम्बा है तू थक जायेगा .चलो मैं तुझे एक कहानी सुनाता हूँ..
राजन चुप रहे
’तो सुन ’
राजन चुप रहे
प्राचीन काल में एक राजा थे जिसकी कई पीढ़ियों ने राज्य पर शासन किया } अभी राजकुमार का राज्याभिषेक भी नहीं हुआ था कि राजा के हाथ से सत्ता निकल गई ।और वह सत्ता विहीन हो गए। ।राजा के पुराने वफ़ादार और दरबारी चाहते थे कि किसी प्रकार राजकुमार जी का राज्याभिषेक हो जाए ...सत्ता सम्भाल लें तो हम सब भी वैतरणी पार कर लें। वे हर प्रकार से उन्हें आगे ठेलने की कोशिश कर रहे थे कि राजकुमार जी आगे बढ़े गद्दीनशीन हो जायें परन्तु राज कुमार जी ऐसे कि आगे बढ़ ही नहीं पा रहे हैं।वह कोशिश तो बहुत कर रहे थे ।समर्थकों ने नारा भी लगाया कि भईया जी आप आगे बढ़ो हम तुम्हारे साथ है .जब तक सूरज चाँद रहेगा ,भईया जी का नाम रहेगा ,सबका साथ ..भईया जी का हाथ .,.परन्तु भईया जी वहीं के वहीं रह जाते ...जब लोग ज़्यादे ज़ोर लगा कर ठेलते थे तो राजकुमार जी 2-3 महीने के लिए ’गुप्तवास " में चले जाते थे फिर उनके समर्थक उन्हें खोजते फिरते थे । किसी ने अगर भईया जी से आगे निकल कर नेतॄत्व करना चाहा तो कुछ दरबारी लोग उसे पीछे ठकेल देते थे राजकुमार जी के रहते तुम्हारी ये मजाल .....जिसने कोशिश की उसको पीछे ठकेल दिया .गया ....भईया जी के पीछे ..।और इस प्रकार राजकुमार जी आगे -आगे चलते रहे...बस चलते ही रहे ...
.
कुछ सलाहकारों ने सलाह दिया कि राजकुमार जी को अगर फ़र्श से अर्श तक उठाना है ..सिंहासन पर बैठाना है तो पहले "खाट’ पर बैठाना होगा...
-’विक्रम ! खाट तो समझता है न ।खाट को ’खटिया’ चारपाई ,,शैय्या भी कहते हैं हैं । ’फ़ेसबुक’..वाली पीढ़ी संभवत: ’खटिया ’नाम से परिचित न हो ,मगर -’सरकाय लो खटिया जाड़ा लगे’- से ज़रूर परिचित होती है ।जाड़े में खटिया की उपयोगिता ज़रूर समझती है ,’सरकाने के काम आती है --’सरकाने’ की सुविधा सिर्फ़ खटिया में ही है --’किंग साइज़’.और .क्वीन साइज़ बेड में नहीं । क्वीन साइज़ बेड को ’सरकाने’ की सुविधा नहीं होती है- खुद ’सरकाने”की सुविधा होती है
खाट का हमारे जीवन से क्या संबन्ध है तू तो जानता ही होगा। जन्म से लेकर कर मॄत्यु तक . ..जीवन के साथ भी..जीवन के बाद भी...बिल्कुल जीवन बीमा निगम की तरह ..जीवन के बाद . दान करते है खाट --किसी महापात्र को।खाप पंचायत के ताऊ जी इसी खटिया पर बैठ कर हुक्का गुड़गुड़ाते है ..... हुकुम सुनाते है और समाज की इज्जत बचाते हैं...।
खाट है तो खटमल भी होगा । खटमल न देखा हो तो देवानन्द की फ़िल्म ,’छुपा रुस्तम’ देख लेना -"धीरे से जाना ’खटियन’ में ..ओ खटमल ...धीरे से जाना खटियन में । जिसमे देवानन्द जी खटमल को उकसा रहे हैं जा बेटा जा खटियन में और हीरोइन का खून चूस ..मेरी तो वो सुनती नहीं है , तू ही जा सुना ।
अब खटमल है तो खून चूसेगा ही ...धीरे धीरे चूसे , जोर से चूसे...बार बार चूसे. या 5-साल में एक बार चूसे . छुप छुप के चूसे या सरेआम चूसे ...मगर चूसेगा ज़रूर खून। ज़रूरी नहीं कि ’गाँधी-टोपी’ लगा कर ही चूसे । राजनीति में भी बहुत खटमल पैदा हो गए हैं और हमारी खाटो में घुस गए हैं ..चैन से सोने भी नहीं देते
सलाहकारों ने सलाह दिया कि राजकुमार जी को अगर सिंहासन पर बैठना है तो पहले "खाट’ पर बैठना होगा...पी0के0 साहब इस रहस्य को जानते हैं । सलाह दे दिया ’खाट पंचायत: करो..खाट पर चर्चा करो ..यही ’खाट’- विरोधी पार्टी की नाक काटेगी। अब तो खाट पर ही भरोसा रह गया । जनता का क्या है ...खटिया बिछा दी तो बिछा दी..नहीं तो खड़ी कर दी ....दिल्ली में एक पार्टी के लिए बिछा दिया तो बिहार में दूसरी पार्टी की खड़ी कर दी। जनता का क्या है --’किसी को तख्त देती है ,किसी को ताज देत्ती है ..बहुत खुश हो गई जिस पर उसी को राज देती है "वरना खाज देती है । इसी से चुनाव वैतरणी पार हो जाये शायद ,अब तो इसी खाट का भरोसा है ,जनता पर भरोसा नहीं ।
घोषणा हो गई ’खाट’ पर चर्चा की ।..जगह जगह खाट बिछाए जाने लगे ...जहां जहाँ चुनाव है वहीं खाट बिछाना है ..फ़ालतू में खाट तुड़वाने का नहीं। खाट का टेन्डर होने लगा ..सप्लाई ली जाने लगी..सप्लायर्स गदगद हो गए ...खाट पहुँचाए जाने लगे विधान सभा क्षेत्रों में.... जनता आयेगी ..... खाट पर बैठेगी--हम. सपने बेचेंगे....मुफ़्त में पानी ...मुफ़्त में बिजली ... किसानो का कर्ज माफ़ करेंगे.... हम जानते है कि जनता ’मुफ़्त खोर’ हो गई है ..यही भुनाना है...जनता ग्राहक है और हम सौदागर । ग्राहक देवता होता है ...देवता को आसन देना है ,,,सो खाट का आसन दे दिया ..आप आओ ...हमारे वादे सुनो ...आराम से.खाट पर बैठ कर ...आधे घंटे में हमें सुनना है आप का दर्द ...आप की समस्या ..आप के कष्ट... फिर 5-साल के लिए आप निश्चिन्त हो जायें .हम आप की सेवा करेंगे अगले 5-साल तक . ...बस समझें कि आप का कष्ट हमारा कष्ट ..हमारा ’हाथ’-आप के साथ...न हो तो दिल्ली वालों से पूछ लें,,,,हो सकता है कि आप को मुफ़्त में कोई भाई साहब साइकिल दे.दे..मोबाईल फ़ोन दे,दे,,,लैप टाप दे दे .कोई बहन जी हाथी भी दे दें ... कुछ टट्पूजिया पार्टी मुफ़्त में दवा दारू की बोतल भी दे.दें......विरोधी कम्पनी के झाँसे में न आइएगा . नकली माल बेचते है सब के सब ,नक्कालों से सावधान ... नकली माल से बचें.....और आगामी चुनाव में ’हमारा ’ खयाल’ रखें ...
खाट पंचायत पूरी हुई । नेता जी उड़ कर दूसरी जगह खाट बिछाने चले गए } जनता मुँह देखती रह गई फिर वही खाट उठा कर घर ले गई ।कुछ लोग तो खाट तोड़ कर पाटी पाया भी साथ ले गए।
-----------------------------------
तो हे विक्रम ! अब तू मेरे सवाल का जवाब दे कि जनता खाट लूट कर क्यों ले गई और कुछ लोग खाट तोड़ तोड़ कर क्यों ले गए । बता ..तू तो बड़ा ज्ञानी है.. न्याय करता है... न्यायी बने फिरता है ,,,
राजा विक्रमादित्य चुप रहे
;बता कि जनता ने खाट क्यों लूटी ???? ,...जवाब दे नहीं तो तेरे सर के टुकड़े टुकड़े कर दूँगा....
राजन सहम गए . बेताल का क्या भरोसा ...कही सचमुच ही न सर के टुकड़े कर दे ।
अत: बोल उठे-"हे बेताल ! तो सुन ! जनता भोली थी मगर हुशियार थी ..हर बार "पितृ-पक्ष में कौआ-पूजन"..देखती है ...राजकुमार की बातों का भरोसा नहीं .पता नहीं राज्याभिषेक होगा भी कि नहीं ..अत: नौ नगद ,न तेरह उधार ,,,जो हाथ लगा वहीं नगद...सो जनता ने खाट लूट ली और घर चलते बनी .एक बात और , 5-साल ये खटमल धीरे धीरे खटियन में घुस जायेंगे और धीरे धीरे खून चूसेंगे।चैन से सोने भी नहीं देंगे अत: ...’न रहेगी खाट ,न रहेगा खटमल ,न चूसेंगे खून" -न रहेगा बाँस ,न बाजेगी बँसुरी ....
-तो फिर कुछ लोगो ने खाट क्यों तोड़ा ? -बेताल ने पूछा
-हे बेताल ! कुछ गरीब किसानों के घरों में कई दिनों से ’चूल्हा नहीं जला था ,सो उसे लकड़ी की ज़रूरत थी कि पेट की आग बुझाने के लिए ..चूल्हा जला सकें । भाषण से ...वादों से...नारों से .. पेट की आग नहीं बुझती ,,...चूल्हे का जलते रहना ज़रूरी है अत: उसने खाट को तोड़ कर लकड़ी की व्यवस्था....
-हे विक्रम !तू तो बड़ा ज्ञानी है ,परन्तु तूने एक ग़लती कर दी.... शर्त तोड़ दी,,,तू बोल उठा...और .यह ले... मैं चला उड़ कर..
..... और एक बार फिर बैताल डाल पर जा कर उल्टा लटक गया
-आनन्द.पाठक-
08800927181
[नोट -आप ने ’बेताल-पच्चीसी’ की कहानियाँ ज़रूर पढ़ी होंगी जिसमें राजा विक्रमादित्य जंगल में , बेताल को डाल से उतार कर,और कंधे पर लाद कर चलते हैं और बेताल रास्ते भर एक कहानी सुनाते रहता है ।बेताल शर्त रखता है कि अगर राजा ने रास्ते कुछ बोला तो वह उड़ कर डाल पर जा कर लटक जायेगा.....
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......................राजा विक्रमादित्य ,बेताल को डाल से उतार कर चलने लगे ।
-बेताल ने कहा-हे विक्रम !- रास्ता लम्बा है तू थक जायेगा .चलो मैं तुझे एक कहानी सुनाता हूँ..
राजन चुप रहे
’तो सुन ’
राजन चुप रहे
प्राचीन काल में एक राजा थे जिसकी कई पीढ़ियों ने राज्य पर शासन किया } अभी राजकुमार का राज्याभिषेक भी नहीं हुआ था कि राजा के हाथ से सत्ता निकल गई ।और वह सत्ता विहीन हो गए। ।राजा के पुराने वफ़ादार और दरबारी चाहते थे कि किसी प्रकार राजकुमार जी का राज्याभिषेक हो जाए ...सत्ता सम्भाल लें तो हम सब भी वैतरणी पार कर लें। वे हर प्रकार से उन्हें आगे ठेलने की कोशिश कर रहे थे कि राजकुमार जी आगे बढ़े गद्दीनशीन हो जायें परन्तु राज कुमार जी ऐसे कि आगे बढ़ ही नहीं पा रहे हैं।वह कोशिश तो बहुत कर रहे थे ।समर्थकों ने नारा भी लगाया कि भईया जी आप आगे बढ़ो हम तुम्हारे साथ है .जब तक सूरज चाँद रहेगा ,भईया जी का नाम रहेगा ,सबका साथ ..भईया जी का हाथ .,.परन्तु भईया जी वहीं के वहीं रह जाते ...जब लोग ज़्यादे ज़ोर लगा कर ठेलते थे तो राजकुमार जी 2-3 महीने के लिए ’गुप्तवास " में चले जाते थे फिर उनके समर्थक उन्हें खोजते फिरते थे । किसी ने अगर भईया जी से आगे निकल कर नेतॄत्व करना चाहा तो कुछ दरबारी लोग उसे पीछे ठकेल देते थे राजकुमार जी के रहते तुम्हारी ये मजाल .....जिसने कोशिश की उसको पीछे ठकेल दिया .गया ....भईया जी के पीछे ..।और इस प्रकार राजकुमार जी आगे -आगे चलते रहे...बस चलते ही रहे ...
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कुछ सलाहकारों ने सलाह दिया कि राजकुमार जी को अगर फ़र्श से अर्श तक उठाना है ..सिंहासन पर बैठाना है तो पहले "खाट’ पर बैठाना होगा...
-’विक्रम ! खाट तो समझता है न ।खाट को ’खटिया’ चारपाई ,,शैय्या भी कहते हैं हैं । ’फ़ेसबुक’..वाली पीढ़ी संभवत: ’खटिया ’नाम से परिचित न हो ,मगर -’सरकाय लो खटिया जाड़ा लगे’- से ज़रूर परिचित होती है ।जाड़े में खटिया की उपयोगिता ज़रूर समझती है ,’सरकाने के काम आती है --’सरकाने’ की सुविधा सिर्फ़ खटिया में ही है --’किंग साइज़’.और .क्वीन साइज़ बेड में नहीं । क्वीन साइज़ बेड को ’सरकाने’ की सुविधा नहीं होती है- खुद ’सरकाने”की सुविधा होती है
खाट का हमारे जीवन से क्या संबन्ध है तू तो जानता ही होगा। जन्म से लेकर कर मॄत्यु तक . ..जीवन के साथ भी..जीवन के बाद भी...बिल्कुल जीवन बीमा निगम की तरह ..जीवन के बाद . दान करते है खाट --किसी महापात्र को।खाप पंचायत के ताऊ जी इसी खटिया पर बैठ कर हुक्का गुड़गुड़ाते है ..... हुकुम सुनाते है और समाज की इज्जत बचाते हैं...।
खाट है तो खटमल भी होगा । खटमल न देखा हो तो देवानन्द की फ़िल्म ,’छुपा रुस्तम’ देख लेना -"धीरे से जाना ’खटियन’ में ..ओ खटमल ...धीरे से जाना खटियन में । जिसमे देवानन्द जी खटमल को उकसा रहे हैं जा बेटा जा खटियन में और हीरोइन का खून चूस ..मेरी तो वो सुनती नहीं है , तू ही जा सुना ।
अब खटमल है तो खून चूसेगा ही ...धीरे धीरे चूसे , जोर से चूसे...बार बार चूसे. या 5-साल में एक बार चूसे . छुप छुप के चूसे या सरेआम चूसे ...मगर चूसेगा ज़रूर खून। ज़रूरी नहीं कि ’गाँधी-टोपी’ लगा कर ही चूसे । राजनीति में भी बहुत खटमल पैदा हो गए हैं और हमारी खाटो में घुस गए हैं ..चैन से सोने भी नहीं देते
सलाहकारों ने सलाह दिया कि राजकुमार जी को अगर सिंहासन पर बैठना है तो पहले "खाट’ पर बैठना होगा...पी0के0 साहब इस रहस्य को जानते हैं । सलाह दे दिया ’खाट पंचायत: करो..खाट पर चर्चा करो ..यही ’खाट’- विरोधी पार्टी की नाक काटेगी। अब तो खाट पर ही भरोसा रह गया । जनता का क्या है ...खटिया बिछा दी तो बिछा दी..नहीं तो खड़ी कर दी ....दिल्ली में एक पार्टी के लिए बिछा दिया तो बिहार में दूसरी पार्टी की खड़ी कर दी। जनता का क्या है --’किसी को तख्त देती है ,किसी को ताज देत्ती है ..बहुत खुश हो गई जिस पर उसी को राज देती है "वरना खाज देती है । इसी से चुनाव वैतरणी पार हो जाये शायद ,अब तो इसी खाट का भरोसा है ,जनता पर भरोसा नहीं ।
घोषणा हो गई ’खाट’ पर चर्चा की ।..जगह जगह खाट बिछाए जाने लगे ...जहां जहाँ चुनाव है वहीं खाट बिछाना है ..फ़ालतू में खाट तुड़वाने का नहीं। खाट का टेन्डर होने लगा ..सप्लाई ली जाने लगी..सप्लायर्स गदगद हो गए ...खाट पहुँचाए जाने लगे विधान सभा क्षेत्रों में.... जनता आयेगी ..... खाट पर बैठेगी--हम. सपने बेचेंगे....मुफ़्त में पानी ...मुफ़्त में बिजली ... किसानो का कर्ज माफ़ करेंगे.... हम जानते है कि जनता ’मुफ़्त खोर’ हो गई है ..यही भुनाना है...जनता ग्राहक है और हम सौदागर । ग्राहक देवता होता है ...देवता को आसन देना है ,,,सो खाट का आसन दे दिया ..आप आओ ...हमारे वादे सुनो ...आराम से.खाट पर बैठ कर ...आधे घंटे में हमें सुनना है आप का दर्द ...आप की समस्या ..आप के कष्ट... फिर 5-साल के लिए आप निश्चिन्त हो जायें .हम आप की सेवा करेंगे अगले 5-साल तक . ...बस समझें कि आप का कष्ट हमारा कष्ट ..हमारा ’हाथ’-आप के साथ...न हो तो दिल्ली वालों से पूछ लें,,,,हो सकता है कि आप को मुफ़्त में कोई भाई साहब साइकिल दे.दे..मोबाईल फ़ोन दे,दे,,,लैप टाप दे दे .कोई बहन जी हाथी भी दे दें ... कुछ टट्पूजिया पार्टी मुफ़्त में दवा दारू की बोतल भी दे.दें......विरोधी कम्पनी के झाँसे में न आइएगा . नकली माल बेचते है सब के सब ,नक्कालों से सावधान ... नकली माल से बचें.....और आगामी चुनाव में ’हमारा ’ खयाल’ रखें ...
खाट पंचायत पूरी हुई । नेता जी उड़ कर दूसरी जगह खाट बिछाने चले गए } जनता मुँह देखती रह गई फिर वही खाट उठा कर घर ले गई ।कुछ लोग तो खाट तोड़ कर पाटी पाया भी साथ ले गए।
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तो हे विक्रम ! अब तू मेरे सवाल का जवाब दे कि जनता खाट लूट कर क्यों ले गई और कुछ लोग खाट तोड़ तोड़ कर क्यों ले गए । बता ..तू तो बड़ा ज्ञानी है.. न्याय करता है... न्यायी बने फिरता है ,,,
राजा विक्रमादित्य चुप रहे
;बता कि जनता ने खाट क्यों लूटी ???? ,...जवाब दे नहीं तो तेरे सर के टुकड़े टुकड़े कर दूँगा....
राजन सहम गए . बेताल का क्या भरोसा ...कही सचमुच ही न सर के टुकड़े कर दे ।
अत: बोल उठे-"हे बेताल ! तो सुन ! जनता भोली थी मगर हुशियार थी ..हर बार "पितृ-पक्ष में कौआ-पूजन"..देखती है ...राजकुमार की बातों का भरोसा नहीं .पता नहीं राज्याभिषेक होगा भी कि नहीं ..अत: नौ नगद ,न तेरह उधार ,,,जो हाथ लगा वहीं नगद...सो जनता ने खाट लूट ली और घर चलते बनी .एक बात और , 5-साल ये खटमल धीरे धीरे खटियन में घुस जायेंगे और धीरे धीरे खून चूसेंगे।चैन से सोने भी नहीं देंगे अत: ...’न रहेगी खाट ,न रहेगा खटमल ,न चूसेंगे खून" -न रहेगा बाँस ,न बाजेगी बँसुरी ....
-तो फिर कुछ लोगो ने खाट क्यों तोड़ा ? -बेताल ने पूछा
-हे बेताल ! कुछ गरीब किसानों के घरों में कई दिनों से ’चूल्हा नहीं जला था ,सो उसे लकड़ी की ज़रूरत थी कि पेट की आग बुझाने के लिए ..चूल्हा जला सकें । भाषण से ...वादों से...नारों से .. पेट की आग नहीं बुझती ,,...चूल्हे का जलते रहना ज़रूरी है अत: उसने खाट को तोड़ कर लकड़ी की व्यवस्था....
-हे विक्रम !तू तो बड़ा ज्ञानी है ,परन्तु तूने एक ग़लती कर दी.... शर्त तोड़ दी,,,तू बोल उठा...और .यह ले... मैं चला उड़ कर..
..... और एक बार फिर बैताल डाल पर जा कर उल्टा लटक गया
-आनन्द.पाठक-
08800927181
बुधवार, 19 अक्टूबर 2016
राजा
"मम्मा, आज की दाल बहुत गाढ़ी है , मगर टेस्टी है " अनुज ने कहा।
ठीक है , ठीक है । कितनी बाते करते हो खाते वक़्त " इरा ने प्यार से झिड़क दिया अनुज को।
इरा खा चुकी थी, रागेश और अनुज अभी ही खा रहे थे।
रात सवा दस बजे थे उस वक़्त।
तनीषा और अनुज के स्कूल में उन दिनों दशहरे की छुटिया चल रही थी, इसलिए खाने पर देर हो ही जाती थी।
अचानक रागेश का फ़ोन बज उठा। रागेश ने फ़ोन उठाया।
- ओह ...... ! अच्छा ..... ,
- कैसे ??? .........
- कब ? .........
- कहाँ ?
-अच्छा ठीक है , ढूंढ लो फिर बताना " यह कहकर रागेश ने फ़ोन रखा और खाना खाने लगे।
"किसका फ़ोन था ? , इरा ने पूछा।
" वरुण का !"
"क्या खो गया , क्या उनकी स्कूटी चोरी हो गयी ? " इरा ने एक ही सांस पूछ डाला।
वरुण, इरा का भतीजा था १९ साल का। इरा की ननद अलका, अपने दो बेटों के साथ इरा के घर से थोड़ी दूर एक सोसाइटी में रहते थे।
अलका दीदी, रागेश से एक साल बड़ी थी। दीदी , रागेश और इरा के ससुर इस शहर में करीब १९९७ में बिहार से आये थे और फिर यहीं बस गए थे। दीदी ने हालाँकि अंतरजातीय विवाह किया था मगर यहीं इस शहर में आकर किया था । ये इरा की शादी के बहुत पहले की बात है।
जब इरा और रागेश की शादी हुई तब तक तो ससुर जी भी नहीं रहे थे और दीदी के गोद में वरुण था - करीब तीन साल का। वरुण बहुत जुड़ा हुआ था इरा से।
फिर तो इतने सालो में बहुत कुछ हो गया था - दीदी और जीजा जी ने घर खरीद लिया था - और जीजा जी वरुण से आठ साल छोटा अंकित दीदी की गोद में छोड़ कर जाने कहाँ चले गए - हमेशा के लिए। कभी लौट कर नहीं आये। आज उस बात को करीब ९ साल हो गए थे।
और छोड़ा भी तो क्या - लाखो का क़र्ज़ , घर की किश्ते न भरकर डिफाल्टर बना गए थे दीदी को ! ये कहाँ कम था - अंकित, जो इरा की तनीषा से एक साल बड़ा था - severely autistic था। कितने नाज़ से लाई थी वो अंकित को इस दुनिया में। बहुत पैसा था जीजाजी के पास, उन दिनों! इसीलिए तो अंकित को घर में प्यार से राजा बुलाने लगे थे सब। करोडो का मालिक - राजा !
वक़्त ने विवश कर दिया था - अब दीदी को भी काम करना पड़ रहा था। महज १०००० की नौकरी। खैर खर्च निकलने लगा। फिर तो वरुण ने भी १२वी के बाद पढाई छोड़ घर का खर्च संभल लिया था। नौकरी पर लग गया था वो भी।
हालॉकि राजेश और इरा के कहने पर distance learning से BBA कर रहा था।
करोडो में खेले हुए जब पाई पाई मोहताज हो जाते हो - ऐसे कितने घर देखे थे इरा ने और ये तो खुद रागेश की बहन का घर था। जब बन पड़ता , हर संभव मदद करते थे इरा और रागेश।
और अभी कुछ महीनो पहले ही तो दीदी ने ऑफिस जाने के लिए स्कूटी खरीदी थी और "वो स्कूटी चोरी हो गई! " - ये सोच के इरा का कालेज मुह को आ गया था।
रागेश की आवाज़ उसे वर्तमान में ले आई थी।
-" नहीं !"
- "तो ??"
- 'राजा खो गया !"
" WHAT !!!!!" इरा का मुह खुला का खुला रह गया !
- राजा खो गया ?
- कब ?
-कहाँ?
-कैसे ??
-"गोल बाजार में खो गया," रागेश झल्लाते हुए कहा !
-तो पुलिस में रिपोर्ट लिखाई की नहीं ? और खोया कब ?
- " दोपहर साढ़े तीन बजे !"
- और अभी सवा दस बज रहे है !! वो लड़का कहाँ होगा ! ओह माय गॉड ! वो भूखा प्यासा होगा !
- और हमें अभी बताया !! रुआंसी हो गई !
इरा को समझ नहीं आ रहा था वो गुस्सा करे या रोये !
"क्या हुआ मम्मा" अनुज ने पूछा !
"बेटा, राजा खो गया और सात घंटे हो गए , पुलिस में रिपोर्ट नहीं लिखाई , और तो और हमको भी नहीं बताया !, इरा बोली।
अंकित बोल नहीं सकता था।
उसे तो अपना नाम भी बोलना नहीं आता था , दीदी या वरुण का नाम क्या ख़ाक बताता! उसमे संवेदनाये भी नहीं थी। इमोशन्स भी तो नहीं जैसे थे उसमे ! उसे तो शायद अहसास भी नहीं रहा होगा की वो खो गया है !
इस सब में साढ़े दस बज चुके थे !
" रागेश, वरुण से पूछो वो कहाँ है ? हम जा रहे है अभी - चलो तुम अभी के अभी "
" वरुण बहुत गुस्से में है, इरा ! वो बात नहीं कर रहा ! "
-"वो साढ़े नौ बजे जब ऑफिस लौट कर आया तब अलका ने बताया की राजा ग़ुम हो गया है !"
- "मतलब किसी को नहीं ही पता की राजा गुम हुआ है अब तक ! और, वरुण और देर से आता तो ?? "
-"ओह माय गॉड - दीदी पागल हो गई है या उसे जान बुझ के छोड़ कर, खो कर आई है!!" इरा का गुस्सा फूट पड़ा, " वैसे भी वो कहती रहती है की उसे किसी ऐसे बोर्डिंग में दे आये जहाँ ऐसे बच्चे पालते है "
" चुप रहो तुम! - पागल तुम हो गई हो ! - जब डिस्टर्ब होती हो तो कुछ भी बकने लगती हो " रागेश का पारा चढ़ गया। बहुत परेशां थे रागेश, उन्हें अलका दीदी पर बहुत गुस्सा आ रहा था - वो इतनी बोडम कैसे हो सकती थी!
चलो अभी ! रागेश दहाड़े ,
- बेटा अनुज तुम दरवाजा बंद कर लो , पता नहीं कितनी देर लग जाए !"
- रुको , मैं दीदी को फ़ोन करती हूँ ,
-वरुण , उन्हें पुलिस स्टेशन ले गया है। हम वहीँ जा रहे है।
रागेश ने गाडी उठाई और दोनों चल दिए। रास्ते भर इरा के आँसू बहते रहे - ये सोच कर की अंकित जाने किस हाल में होगा। कहीं गलत हाथो में तो नहीं पड़ गया ?? आये दिन सावधान इंडिया में दिखाते थे की बच्चो को किस तरह गलत धंधो में धकेल जा रहा था - और ये तो कितना लाचार , कितना निरीह सा था !
- पूछो कौन से पुलिस स्टेशन आना है ? रागेश ने इरा से कहा।
- हाँ
-दीदी को फ़ोन जोड़ने पर उन्होंने पुलिस स्टेशन का पता बताया। अगले १५ मिनट में इरा और रागेश पुलिस स्टेशन के बहार थे।
गाडी के रुकते ही इरा पुलिस स्टेशन की ओर लपकी।
चौक में था ये स्टेशन। ११०० वर्ग स्क्वायर फ़ीट में फैला था . सामने ही बड़ा हॉल था। इरा ने नज़र दौड़ाई - दीदी या वरुण दिखे नहीं उसे। रागेश भी पीछे आ गए थे अब तक।
अचानक दाहिने तरफ के कमरे नुमा जगह में दीदी पुलिस वाले को शायद रेपर्ट लिखा रही थी।
इरा ने अलका दीदी को देखा। उससे करीब तीन साल बड़ी थीं वो। थकी हुई , टूटी हुई सी , चेहरे पर आँसुओ की धार से लकीरे बनी थी। अस्त - व्यस्त सी।
वरुण आया अचानक दूसरे कमरे से ,
- मिला ?? कुछ पता चला राजा का ?
- नहीं मामाजी , मम्मी रिपोर्ट लिखवा रही है ! - वरुण बोला।
सामने से एक PSI आया , बोला - क्या बच्चा ९ साल के करीब का है , दुबला सा ??
- हाँ हाँ ! तीनो एक बोले !
-उसे गाल पर एक बड़ा सा दाग है ?
- हाँ वही है , इस्पेक्टर साहब ! वरुण बोला !
-कहाँ है वो ? राजेश बेसब्री से पूछा।
- वो लाल गेट पुलिस चौकी में है अभी - आप लोग वहीँ चले जाइये।
इरा दौड़ी , "दीदी , राजा मिल गया है !! चलिए - लाल गेट पुलिस चौकी में है।, चलिए !!"
-वरुण तुम अलका को लेकर आओ, मैं और मामीजी पहुँचते है - राजेश ने कहा।
वरुण अपनी स्कूटी से गलत गली में ले मुडा। राजेश चिल्लाये - वहां नहीं , इस तरफ जाना है ! लाल गेट पुलिस चौकी इधर है वरुण!
- इट्स ओके रागेश , राजा मिल गया है ! इरा धीरे से बोली थी।
छोटी सी पुलिस चौकी थी - कंजस्टेड सी। एक पतला सा दालान था L आकर का - पुराने शहर में थी ये चौकी इसलिए।
सीधी लपक कर चढ़े सभी। वरुण सबसे पहले दौड़ा !
एक बहुत ही पुराने , धँसे हुए से गंदे मटमैले सोफे पर राजा बैठा था।
वरुण लिपट गया राजा से
राजा - कैसा है ?
इरा भर सी गई थी। कुछ बोल नहीं पाई। सब के सामने रोना नहीं चाहती थी , मुठिया भींच ली अपनी , और राजा का सर सहलाया।
दीदी नहीं गई राजा के पास। एक भी बार गले नहीं लगाया उसे। एक भी बार नहीं कहा - कैसा राजा , और तो और हाथ भी नहीं फेरा सर पर !
वो पुलिस स्टेशन खस्ता हाल में था - दो टेबल थे। पीछे के टेबल के सामने डी तीन कुर्सियां रखी थी। दो ढाढ़ी सी रखे हुए (मुसलमान से जान पड़ते आदमी थे ) दो तीन कांस्टेबल (कौन जाने किस पोस्ट पर थे ) बैठे थे।
राजा के पास एक औरत और एक आदमी भी थे।
इरा ने पूछा कुछ खाया इसने ?
- हाँ , हम लोग इसे खिला पिला रहे है शाम से , पुलिस वालो ने कहा।
शायद पीछे और साइड में और कमरे थे , वहां से शायद इंस्पेक्टर थे वो , तीन सितारे लगे थे वर्दी में , आया।
इरा और राजेश को देख कर बोला -" कैसे माँ बाप है आप? आप का लड़का ४ बजे से है यहाँ है , आप अब आ रहे हो ? शर्म नहीं आती आप लोगो को ! "
रागेश भड़क गए - मैं नहीं हूँ इसका पिता , ये मेरी बहन का बेटा है !
दीदी सामने आई , बोली - इंस्पेक्टर साहब इनको कुछ मत कहो , मैं माँ हूँ इसकी - मुझे डाँटिए !
- ऐसे कैसे खो गया बच्चा ? अभी तक आपको याद भी नहीं आया था। हमने तो चार बजे ही पुलिस कण्ट्रोल रूम में मैसेज भेज दिया था की कोई ऐसा बच्चा मिला है।
- मैं अपने तरीके से खोज रही थी इंस्पेक्टर साहब , मैं उसे गोल बाजार में दूकान दूकान ढूंढती रही , जब नहीं मिला तो मैं घर लौट गई। " दीदी ने थकी, टूटी आवाज़ में जवाब दिया।
-इधर आइये आप। प्रूफ क्या है की आप ही उसकी माँ है ?
- प्रूफ इलेक्शन कार्ड है , ड्राइविंग लाइसेंस है साहब !
- नहीं , ये नहीं , आपका ही बेटा है उसका प्रूफ दीजिये।
- एक मिनट इंस्पेक्टर साहब , मेरे पास फॅमिली pic है - वरुण ने अपना फ़ोन दिखाया।
हाँ , मेरे पास भी रक्षाबंधन के pics है सर , इरा ने अपने फ़ोन में अंकित के साथ के फोटो दिखाए।
और फिर तो अगले दो -तीन घंटे , दीदी से बयां लिया , वरुण गया घर कागज़ात लाने , मगर इस दौरान राजा घूमता रहा पुलिस वालो की फाइलो के बीच , कुर्सियों के बीच, बीच बीच में ख़ुशी से चिल्लाता हुआ, दौड़ता रहा।
वो पिछेले ८ घंटो से इन पुलिस वालो के साथ रहा , उसे तो अहसास भी नहीं था , की वो खो गया था , बिछड़ गया था अपनी माँ से ,भाई से और सब से। अहसास नहीं था की किस्मत उस पर कितनी मेहरबान थी की वो किसी नेक आदमी को मिला था। वो फरिश्ता जो उसे पुलिस स्टेशन तक छोड़ गया था। उसे कहाँ अहसास था की वो गुजरात में था इसलिए गलत हाथो में शायद जाने से बच गया था।
बस वो तो वरुण को देख खुश हो गया था। उसे तो यह भी अहसास नहीं था - की मिलने के बाद उसकी माँ ने उसे न गले लगाया न सर पे हाथ फेरा था।
वो तो पुरे वक़्त बस सुज़ुका - नोबिता - डोरेमोन जैसे टूटे फूटे शादाब दोहराता रहा था।
उसे शायद नहीं पता था किसी नोबिता, डोरेमोन और सुज़ुका ने उसको एक नई ज़िन्दगी दी थी।
सब कुछ ख़त्म होते होते रात के १-३० जितने हो गए थे। इरा ,रागेश ,वरुण और अलका दीदी अंकित को ले घर जा रहे थे। वरुण ने अंकित को स्कूटी पर अपनी सीट की आगे बिठाया था। दीदी से बहुत नाराज़ था वो - अंकित को फिर दीदी के पास नहीं छोड़ना चाहता था।
इरा सोचती रही रास्ते भर - शायद नवरात्री के दिनों में भरे बाजार में राजा का हाथ छूट जाना संजोग था , शायद दीदी का सात घंटे तक राजा का गुम होना किसी को न बताना संजोग ही था ! राजा के मिलने के बाद उसे देख न लिपटना , न सर पर हाथ फेरना शायद एक संजोग ही था।
- राजा मिल गया था अब ! कोई मायने नहीं थे अब इन खयालो के !!
ठीक है , ठीक है । कितनी बाते करते हो खाते वक़्त " इरा ने प्यार से झिड़क दिया अनुज को।
इरा खा चुकी थी, रागेश और अनुज अभी ही खा रहे थे।
रात सवा दस बजे थे उस वक़्त।
तनीषा और अनुज के स्कूल में उन दिनों दशहरे की छुटिया चल रही थी, इसलिए खाने पर देर हो ही जाती थी।
अचानक रागेश का फ़ोन बज उठा। रागेश ने फ़ोन उठाया।
- ओह ...... ! अच्छा ..... ,
- कैसे ??? .........
- कब ? .........
- कहाँ ?
-अच्छा ठीक है , ढूंढ लो फिर बताना " यह कहकर रागेश ने फ़ोन रखा और खाना खाने लगे।
"किसका फ़ोन था ? , इरा ने पूछा।
" वरुण का !"
"क्या खो गया , क्या उनकी स्कूटी चोरी हो गयी ? " इरा ने एक ही सांस पूछ डाला।
वरुण, इरा का भतीजा था १९ साल का। इरा की ननद अलका, अपने दो बेटों के साथ इरा के घर से थोड़ी दूर एक सोसाइटी में रहते थे।
अलका दीदी, रागेश से एक साल बड़ी थी। दीदी , रागेश और इरा के ससुर इस शहर में करीब १९९७ में बिहार से आये थे और फिर यहीं बस गए थे। दीदी ने हालाँकि अंतरजातीय विवाह किया था मगर यहीं इस शहर में आकर किया था । ये इरा की शादी के बहुत पहले की बात है।
जब इरा और रागेश की शादी हुई तब तक तो ससुर जी भी नहीं रहे थे और दीदी के गोद में वरुण था - करीब तीन साल का। वरुण बहुत जुड़ा हुआ था इरा से।
फिर तो इतने सालो में बहुत कुछ हो गया था - दीदी और जीजा जी ने घर खरीद लिया था - और जीजा जी वरुण से आठ साल छोटा अंकित दीदी की गोद में छोड़ कर जाने कहाँ चले गए - हमेशा के लिए। कभी लौट कर नहीं आये। आज उस बात को करीब ९ साल हो गए थे।
और छोड़ा भी तो क्या - लाखो का क़र्ज़ , घर की किश्ते न भरकर डिफाल्टर बना गए थे दीदी को ! ये कहाँ कम था - अंकित, जो इरा की तनीषा से एक साल बड़ा था - severely autistic था। कितने नाज़ से लाई थी वो अंकित को इस दुनिया में। बहुत पैसा था जीजाजी के पास, उन दिनों! इसीलिए तो अंकित को घर में प्यार से राजा बुलाने लगे थे सब। करोडो का मालिक - राजा !
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हालॉकि राजेश और इरा के कहने पर distance learning से BBA कर रहा था।
करोडो में खेले हुए जब पाई पाई मोहताज हो जाते हो - ऐसे कितने घर देखे थे इरा ने और ये तो खुद रागेश की बहन का घर था। जब बन पड़ता , हर संभव मदद करते थे इरा और रागेश।
और अभी कुछ महीनो पहले ही तो दीदी ने ऑफिस जाने के लिए स्कूटी खरीदी थी और "वो स्कूटी चोरी हो गई! " - ये सोच के इरा का कालेज मुह को आ गया था।
रागेश की आवाज़ उसे वर्तमान में ले आई थी।
-" नहीं !"
- "तो ??"
- 'राजा खो गया !"
" WHAT !!!!!" इरा का मुह खुला का खुला रह गया !
- राजा खो गया ?
- कब ?
-कहाँ?
-कैसे ??
-"गोल बाजार में खो गया," रागेश झल्लाते हुए कहा !
-तो पुलिस में रिपोर्ट लिखाई की नहीं ? और खोया कब ?
- " दोपहर साढ़े तीन बजे !"
- और अभी सवा दस बज रहे है !! वो लड़का कहाँ होगा ! ओह माय गॉड ! वो भूखा प्यासा होगा !
- और हमें अभी बताया !! रुआंसी हो गई !
इरा को समझ नहीं आ रहा था वो गुस्सा करे या रोये !
"क्या हुआ मम्मा" अनुज ने पूछा !
"बेटा, राजा खो गया और सात घंटे हो गए , पुलिस में रिपोर्ट नहीं लिखाई , और तो और हमको भी नहीं बताया !, इरा बोली।
अंकित बोल नहीं सकता था।
उसे तो अपना नाम भी बोलना नहीं आता था , दीदी या वरुण का नाम क्या ख़ाक बताता! उसमे संवेदनाये भी नहीं थी। इमोशन्स भी तो नहीं जैसे थे उसमे ! उसे तो शायद अहसास भी नहीं रहा होगा की वो खो गया है !
इस सब में साढ़े दस बज चुके थे !
" रागेश, वरुण से पूछो वो कहाँ है ? हम जा रहे है अभी - चलो तुम अभी के अभी "
" वरुण बहुत गुस्से में है, इरा ! वो बात नहीं कर रहा ! "
-"वो साढ़े नौ बजे जब ऑफिस लौट कर आया तब अलका ने बताया की राजा ग़ुम हो गया है !"
- "मतलब किसी को नहीं ही पता की राजा गुम हुआ है अब तक ! और, वरुण और देर से आता तो ?? "
-"ओह माय गॉड - दीदी पागल हो गई है या उसे जान बुझ के छोड़ कर, खो कर आई है!!" इरा का गुस्सा फूट पड़ा, " वैसे भी वो कहती रहती है की उसे किसी ऐसे बोर्डिंग में दे आये जहाँ ऐसे बच्चे पालते है "
" चुप रहो तुम! - पागल तुम हो गई हो ! - जब डिस्टर्ब होती हो तो कुछ भी बकने लगती हो " रागेश का पारा चढ़ गया। बहुत परेशां थे रागेश, उन्हें अलका दीदी पर बहुत गुस्सा आ रहा था - वो इतनी बोडम कैसे हो सकती थी!
चलो अभी ! रागेश दहाड़े ,
- बेटा अनुज तुम दरवाजा बंद कर लो , पता नहीं कितनी देर लग जाए !"
- रुको , मैं दीदी को फ़ोन करती हूँ ,
-वरुण , उन्हें पुलिस स्टेशन ले गया है। हम वहीँ जा रहे है।
रागेश ने गाडी उठाई और दोनों चल दिए। रास्ते भर इरा के आँसू बहते रहे - ये सोच कर की अंकित जाने किस हाल में होगा। कहीं गलत हाथो में तो नहीं पड़ गया ?? आये दिन सावधान इंडिया में दिखाते थे की बच्चो को किस तरह गलत धंधो में धकेल जा रहा था - और ये तो कितना लाचार , कितना निरीह सा था !
- पूछो कौन से पुलिस स्टेशन आना है ? रागेश ने इरा से कहा।
- हाँ
-दीदी को फ़ोन जोड़ने पर उन्होंने पुलिस स्टेशन का पता बताया। अगले १५ मिनट में इरा और रागेश पुलिस स्टेशन के बहार थे।
गाडी के रुकते ही इरा पुलिस स्टेशन की ओर लपकी।
चौक में था ये स्टेशन। ११०० वर्ग स्क्वायर फ़ीट में फैला था . सामने ही बड़ा हॉल था। इरा ने नज़र दौड़ाई - दीदी या वरुण दिखे नहीं उसे। रागेश भी पीछे आ गए थे अब तक।
अचानक दाहिने तरफ के कमरे नुमा जगह में दीदी पुलिस वाले को शायद रेपर्ट लिखा रही थी।
इरा ने अलका दीदी को देखा। उससे करीब तीन साल बड़ी थीं वो। थकी हुई , टूटी हुई सी , चेहरे पर आँसुओ की धार से लकीरे बनी थी। अस्त - व्यस्त सी।
वरुण आया अचानक दूसरे कमरे से ,
- मिला ?? कुछ पता चला राजा का ?
- नहीं मामाजी , मम्मी रिपोर्ट लिखवा रही है ! - वरुण बोला।
सामने से एक PSI आया , बोला - क्या बच्चा ९ साल के करीब का है , दुबला सा ??
- हाँ हाँ ! तीनो एक बोले !
-उसे गाल पर एक बड़ा सा दाग है ?
- हाँ वही है , इस्पेक्टर साहब ! वरुण बोला !
-कहाँ है वो ? राजेश बेसब्री से पूछा।
- वो लाल गेट पुलिस चौकी में है अभी - आप लोग वहीँ चले जाइये।
इरा दौड़ी , "दीदी , राजा मिल गया है !! चलिए - लाल गेट पुलिस चौकी में है।, चलिए !!"
-वरुण तुम अलका को लेकर आओ, मैं और मामीजी पहुँचते है - राजेश ने कहा।
वरुण अपनी स्कूटी से गलत गली में ले मुडा। राजेश चिल्लाये - वहां नहीं , इस तरफ जाना है ! लाल गेट पुलिस चौकी इधर है वरुण!
- इट्स ओके रागेश , राजा मिल गया है ! इरा धीरे से बोली थी।
छोटी सी पुलिस चौकी थी - कंजस्टेड सी। एक पतला सा दालान था L आकर का - पुराने शहर में थी ये चौकी इसलिए।
सीधी लपक कर चढ़े सभी। वरुण सबसे पहले दौड़ा !
एक बहुत ही पुराने , धँसे हुए से गंदे मटमैले सोफे पर राजा बैठा था।
वरुण लिपट गया राजा से
राजा - कैसा है ?
इरा भर सी गई थी। कुछ बोल नहीं पाई। सब के सामने रोना नहीं चाहती थी , मुठिया भींच ली अपनी , और राजा का सर सहलाया।
दीदी नहीं गई राजा के पास। एक भी बार गले नहीं लगाया उसे। एक भी बार नहीं कहा - कैसा राजा , और तो और हाथ भी नहीं फेरा सर पर !
वो पुलिस स्टेशन खस्ता हाल में था - दो टेबल थे। पीछे के टेबल के सामने डी तीन कुर्सियां रखी थी। दो ढाढ़ी सी रखे हुए (मुसलमान से जान पड़ते आदमी थे ) दो तीन कांस्टेबल (कौन जाने किस पोस्ट पर थे ) बैठे थे।
राजा के पास एक औरत और एक आदमी भी थे।
इरा ने पूछा कुछ खाया इसने ?
- हाँ , हम लोग इसे खिला पिला रहे है शाम से , पुलिस वालो ने कहा।
शायद पीछे और साइड में और कमरे थे , वहां से शायद इंस्पेक्टर थे वो , तीन सितारे लगे थे वर्दी में , आया।
इरा और राजेश को देख कर बोला -" कैसे माँ बाप है आप? आप का लड़का ४ बजे से है यहाँ है , आप अब आ रहे हो ? शर्म नहीं आती आप लोगो को ! "
रागेश भड़क गए - मैं नहीं हूँ इसका पिता , ये मेरी बहन का बेटा है !
दीदी सामने आई , बोली - इंस्पेक्टर साहब इनको कुछ मत कहो , मैं माँ हूँ इसकी - मुझे डाँटिए !
- ऐसे कैसे खो गया बच्चा ? अभी तक आपको याद भी नहीं आया था। हमने तो चार बजे ही पुलिस कण्ट्रोल रूम में मैसेज भेज दिया था की कोई ऐसा बच्चा मिला है।
- मैं अपने तरीके से खोज रही थी इंस्पेक्टर साहब , मैं उसे गोल बाजार में दूकान दूकान ढूंढती रही , जब नहीं मिला तो मैं घर लौट गई। " दीदी ने थकी, टूटी आवाज़ में जवाब दिया।
-इधर आइये आप। प्रूफ क्या है की आप ही उसकी माँ है ?
- प्रूफ इलेक्शन कार्ड है , ड्राइविंग लाइसेंस है साहब !
- नहीं , ये नहीं , आपका ही बेटा है उसका प्रूफ दीजिये।
- एक मिनट इंस्पेक्टर साहब , मेरे पास फॅमिली pic है - वरुण ने अपना फ़ोन दिखाया।
हाँ , मेरे पास भी रक्षाबंधन के pics है सर , इरा ने अपने फ़ोन में अंकित के साथ के फोटो दिखाए।
और फिर तो अगले दो -तीन घंटे , दीदी से बयां लिया , वरुण गया घर कागज़ात लाने , मगर इस दौरान राजा घूमता रहा पुलिस वालो की फाइलो के बीच , कुर्सियों के बीच, बीच बीच में ख़ुशी से चिल्लाता हुआ, दौड़ता रहा।
वो पिछेले ८ घंटो से इन पुलिस वालो के साथ रहा , उसे तो अहसास भी नहीं था , की वो खो गया था , बिछड़ गया था अपनी माँ से ,भाई से और सब से। अहसास नहीं था की किस्मत उस पर कितनी मेहरबान थी की वो किसी नेक आदमी को मिला था। वो फरिश्ता जो उसे पुलिस स्टेशन तक छोड़ गया था। उसे कहाँ अहसास था की वो गुजरात में था इसलिए गलत हाथो में शायद जाने से बच गया था।
बस वो तो वरुण को देख खुश हो गया था। उसे तो यह भी अहसास नहीं था - की मिलने के बाद उसकी माँ ने उसे न गले लगाया न सर पे हाथ फेरा था।
वो तो पुरे वक़्त बस सुज़ुका - नोबिता - डोरेमोन जैसे टूटे फूटे शादाब दोहराता रहा था।
उसे शायद नहीं पता था किसी नोबिता, डोरेमोन और सुज़ुका ने उसको एक नई ज़िन्दगी दी थी।
सब कुछ ख़त्म होते होते रात के १-३० जितने हो गए थे। इरा ,रागेश ,वरुण और अलका दीदी अंकित को ले घर जा रहे थे। वरुण ने अंकित को स्कूटी पर अपनी सीट की आगे बिठाया था। दीदी से बहुत नाराज़ था वो - अंकित को फिर दीदी के पास नहीं छोड़ना चाहता था।
इरा सोचती रही रास्ते भर - शायद नवरात्री के दिनों में भरे बाजार में राजा का हाथ छूट जाना संजोग था , शायद दीदी का सात घंटे तक राजा का गुम होना किसी को न बताना संजोग ही था ! राजा के मिलने के बाद उसे देख न लिपटना , न सर पर हाथ फेरना शायद एक संजोग ही था।
- राजा मिल गया था अब ! कोई मायने नहीं थे अब इन खयालो के !!
शुक्रवार, 14 अक्टूबर 2016
एक ग़ज़ल : जो जागे हैं...
जो जागे हैं मगर उठते नहीं उनको जगाना क्या
खुदी को ख़ुद जगाना है किसी के पास जाना क्या
निज़ाम-ए-दौर-ए-हाज़िर का बदलने को चले थे तुम
बिके कुर्सी की खातिर तुम तो ,फिर झ्ण्डा उठाना क्या
ज़माने को ख़बर है सब तुम्हारी लन्तरानी की
दिखे मासूम से चेहरे ,असल चेहरा छुपाना क्या
न चेहरे पे शिकन उसके ,न आँखों में नदामत है
न लानत ही समझता है तो फिर दरपन दिखाना क्या
तुम्हारी बन्द मुठ्ठी को समझ बैठे थे लाखों की
खुली तो खाक थी फिर खाक कोअब आजमाना क्या
वही चेहरे ,वही मुद्दे ,वही फ़ित्ना-परस्ती है
सभी दल एक जैसे है ,नया दल क्या,पुराना क्या
इबारत है लिखी दीवार पर गर पढ़ सको ’आनन’
समझ जाओ इशारा क्या ,नताइज को बताना क्या
शब्दार्थ
निज़ाम-ए-दौर-ए-हाज़िर = वर्तमान काल की शासन व्यवस्था
लन्तरानी = झूटी डींगे/शेखी
नदामत = पश्चाताप/पछतावा
लानत = धिक्कार
फ़ित्ना परस्ती = दंगा/फ़साद को प्रश्रय देना
नताइज़ = नतीजे परिणाम
-आनन्द.पाठक-
08800927181
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