(चक्रवर्ती सम्राट )राजा परीक्षित को इसी गर्भावधि में उत्तरा के गर्भ में अपनी योगमाया से प्रविष्ठ हो श्रीकृष्ण ने बचाया था।
कृष्णद्वैपायन व्यास जी के पुत्र माँ के गर्भ से बाहर ही नहीं आना चाहते थे।
शुक रूप में स्वयं शिवजी के मुख से इन्होनें भागवत कथा सुनी थी जबकि माता पार्वती को कथा सुनते सुनते नींद आ गई थी उस समय हुंकारा इसी शुक ने भरा था। क्योंकि शंकर भगवान यही चाहते थे कि पार्वती कथा के दरमियान लगातार बीच बीच में हुंकारा भर्ती रहें। जब शिवजी को पता चला की एक अपात्र कथा का श्रवण कर वहां से चला गया तब शिव के गणों ने इस माया शुक का पीछा किया जो सत्यवती (व्यास जी की पत्नी )के मुख में घुस गया।जो उस वक्त मुंह खोले सो रहीं थीं।
गर्भकाल गर्भस्थ की पहली पाठशाला है इस दरमियान एकताकपूराना धारावाहिक सुनने देखने के क्या परिणाम सामने आयेंगे इसका क्या सही सही अनुमान लगाया जा सकता है ?
पूछा जा सकता है फिर गर्भिणी क्या पढ़े और सुने ,तुलसीकृत विनयपत्रिका और रामचरितमानस का श्रवण और पारायण करे। विनयशील संतानें ही पैदा होवेंगी क्योंकि हमारी शख्शियत केवल हमारे जीवन खण्डों ,जींस का जमा जोड़ ही नहीं गर्भ के अंदर और बाहर का परिवेश भी है।
संदर्भ :
https://www.youtube.com/watch?v=V0_umGOCHUk
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