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रविवार, 13 मई 2018

गीत - जीवन है या दण्ड मिला है


जीवन है या दण्ड मिला है
पग-पग पर प्रतिबंध लगा है
कारागारों में साँसों का
आना-जाना बहुत खला है।
जीवन है या
दण्ड मिला है।।
हूँ सौभाग्यवती
वरदानित,
सृष्टि मुझी से है
अनुप्राणित।
मंदिर में महिमा मंडन पर
देहरी भीतर हूँ
अभिशापित ।
देवी सम्बोधित कर जग ने
औरत का हर
रूप छला है।।
बेमन कितनी बार झुकी हूँ
आदेशों को,
मान रुकी हूँ ।
आत्म-कथानक हैं ये आँसू
ख़ुद से लड़कर
बहुत थकी हूँ।
कितनी बार समर्पित होकर
मन में पश्चाताप चला है ।।
अपमानित सम्मान-पत्र हूँ,
परकोटों में
क़ैद इत्र हूँ ।
जिसका कोई समय नहीं है,
विषय हीन
सम्वाद-सत्र हूँ।
अनुचित है वर्णन शूलों का
फूलों से भी
दंश मिला है ।।

1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल सोमवार (14-05-2017) को "माँ है अनुपम" (चर्चा अंक-2970) ) पर भी होगी।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    --
    मातृ दिवस की हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    राधा तिवारी

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