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शनिवार, 11 जनवरी 2020

एक ग़ज़ल : आदमी का कोई अब---



आदमी का कोई अब भरोसा नहीं
वह कहाँ तक गिरेगा ये सोचा नहीं

’रामनामी’ भले ओढ़ कर घूमता
कौन कहता है देगा वो धोखा नहीं

प्यार की रोशनी से वो महरूम है
खोलता अपना दर या दरीचा नहीं

उनके वादें है कुछ और उस्लूब कुछ
यह सियासी शगल है अनोखा नहीं

या तो सर दे झुका या तो सर ले कटा
उनका फ़रमान शाही सुना या नहीं ?

मुठ्ठियाँ इन्क़लाबी उठीं जब कभी
ताज सबके मिले ख़ाक में क्या नहीं ?

जुल्म पर आज ’आनन’ अगर चुप रहा
फिर तेरे हक़ में कोई उठेगा नहीं

-आनन्द.पाठक--
उस्लूब = तर्ज-ए-अमल, आचरण

3 टिप्‍पणियां:


  1. जी नमस्ते,
    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चार्च आज सोमवार  (13-01-2020) को  "उड़ने लगीं पतंग"  (चर्चा अंक - 3579)  पर भी होगी।
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट अक्सर नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    आप भी सादर आमंत्रित है 

    जवाब देंहटाएं
  2. वाह!!!!
    लाजवाब गजल
    एक से बढकर एक शेर...

    जवाब देंहटाएं
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