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शनिवार, 24 अप्रैल 2021

एक ग़ज़ल

 

एक ग़ज़ल

सच कभी जब फ़लकसे उतरा है,
झूठ को नागवार  गुज़रा है।


बाँटता कौन है चिराग़ों को ,
रोशनी पर लगा के पहरा  है?


ख़ौफ़ आँखों के हैं गवाही में,
हर्फ़-ए-नफ़रत हवा में बिखरा है।


आग लगती कहाँ, धुआँ है कहाँ !
राज़ यह भी अजीब  गहरा है ।


खिड़कियाँ बन्द हैं, नहीं खुलतीं,
जख़्म फिर से तमाम उभरा है ।


दौर-ए-हाज़िर की यह हवा कैसी?
सच  भी बोलूँ तो जाँ पे ख़तरा है ।


आज किस पर यकीं करे ’आनन’
कौन है क़ौल पर जो ठहरा है ?

 


-
आनन्द.पाठक- 

 

9 टिप्‍पणियां:

  1. वाह बहुत ही मनमोहक रचना! 🙏

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  2. आग लगती कहाँ, धुआँ है कहाँ !
    राज़ यह भी अजीब गहरा है ।
    खिड़कियाँ बन्द हैं, नहीं खुलतीं,
    जख़्म फिर से तमाम उभरा है । समय को उकेरना भी बहुत आसान नहीं होता...। आपने बखूबी ये कार्य किया है अपनी पंक्तियों में।

    जवाब देंहटाएं
  3. आपका लेख बहुत अच्छा लगा
    Anybody interested in DREAM MEANING


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