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रविवार, 13 जून 2021

एक गीत : ज़िन्दगी से लड़ रहा हूँ --

 एक गीत : ज़िन्दगी से लड़ रहा हूँ ---


ज़िन्दगी से लड़ रहा हूँ ,मैं अभी हारा नहीं हूँ ,

बिन लड़े ही हार मानू ? यह नहीं स्वीकार मुझको ।


जो कहेंगे वो, लिखूँ मैं ,शर्त मेरी लेखनी पर,

और मेरे ओठ पर ताला लगाना चाहते हैं ।

जो सुनाएँ वो सुनूँ मैं, ’हाँ’ में ’हाँ’ उनकी मिलाऊँ

बादलों के पंख पर वो घर बनाना चाहते हैं॥


स्वर्ण-मुद्रा थाल लेकर आ गए वो द्वार मेरे,

बेच दूँ मैं लेखनी यह ? है सतत धिक्कार मुझको।


ज़िन्दगी आसां नहीं तुम सोच कर जितनी चली हो,

कौन सीधी राह चल कर पा गया अपन ठिकाना ।

हर क़दम, हर मोड़ पर अब राह में रहजन खड़े हैं

यह सफ़र यूँ ही चलेगा, ख़ुद ही बचना  या बचाना ।


जानता हूँ  तुम नहीं मानोगी  मेरी बात कोई-

और तुम को रोक लूँ मैं, यह नहीं अधिकार मुझको।


लोग अन्दर से जलें हैं, ज्यों हलाहल से बुझे हों,

आइने में वक़्त के ख़ुद को नहीं पहचानते हैं।

नम्रता की क्यों कमी है, क्यों ”अहम’  इतना भरा है

सामने वाले को वो अपने से कमतर मानते हैं।


एक ढूँढो, सौ मिलेंगे हर शहर में ,हर गली में ,

रूप बदले हर जगह मिलते वही हर बार मुझको।


-आनन्द.पाठक- 


10 टिप्‍पणियां:

  1. सादर नमस्कार ,

    आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल .मंगलवार (15 -6-21) को "ख़ुद में ख़ुद को तलाशने की प्यास है"(चर्चा अंक 4096) पर भी होगी।
    आप भी सादर आमंत्रित है,आपकी उपस्थिति मंच की शोभा बढ़ायेगी।
    --
    कामिनी सिन्हा

    जवाब देंहटाएं
  2. बहुत बहुत सार्थक रचना।

    लोग अन्दर से जलें हैं, ज्यों हलाहल से बुझे हों,

    आइने में वक़्त के ख़ुद को नहीं पहचानते हैं।
    खूब!!

    जवाब देंहटाएं
  3. ्जी बहुत बहुत धन्यवाद आप का
    सादर

    जवाब देंहटाएं