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रविवार, 25 अक्तूबर 2020

एक व्यंग्य व्यथा : रावण का पुतला

 सभी सुधी पाठकों को,मित्रों को ’विजय दशमी" पर्व पर हार्दिक शुभकामनाएँ--।

विजय --’असत्य’ पर ’सत्य ’ की--”पाप’ पर ’पुण्य’ की --’अधर्म ’ पर ’धर्म ’ की "रावणत्व" पर "रामत्व की । परन्तु आज ---?
[ डायरी के पन्नों से---]
एक व्यंग्य व्यथा : ----रावण का पुतला
---- आज रावण-वध है ।
आज 40 फुट का पुतला जलाया जायेगा । विगत वर्ष 30 फुट का जलाया गया था। इस साल रावण का कद बढ़ गया है । पिछ्ले साल से इस साल बलात्कार अत्याचार ,अपहरण ,हत्या की घटनायें बढ़ गई तो ’रावण’ का कद भी बढ गया।रामलीला की तैयारियाँ पूरी हो चुकी हैं। मैदान में भीड़ इकठ्ठी हो रही है । बाल बच्चे, महिलायें , वॄद्ध, नौजवान धीरे धीरे आ रहे हैं ।आज रावण वध देखना है । मंच सजाया रहा है । इस साल मंच भी कुछ बड़ा बनाया जा रहा है । इस साल वी0आई0पी0 -लोग ज़्यादा आयेंगे। सरकार में कई पार्टियों का योगदान है अभी - सभी पार्टियों के नेताओं को जगह देना है मंच पर । पिछली साल ’अमुक’ पार्टी के नेता जी बिफ़र गये थे मंच पर ही -धमकी देकर गए थे---’हिन्दुत्व ’ पर ,आप का ही खाली ’कापी -राइट’ नही है है ? --हमारा भी है। इसी लिए तो ’काँग्रेस’ छोड़ कर इधर आये वरना हम उधर क्या बुरे थे? इस बार कोई दूसरा नेता न बिदक जाये -इस लिए मंच को बड़ा रखना ज़रूरी है ।सबको जगह देना है॥सबका साथ -सबका विकास। ’राम-सीता-लक्षमण-हनुमान जी ’ के लिए मंच पर जगह कम पड़ गई -तो क्या हुआ ?-} उन्हें जगह की क्या ज़रूरत ।वो तो सबके दिल में है, परन्तु वी0आई0पी0 लोगो को मंच पर जगह कम न पड़ जाये-सब कई दल के हैं ।
रावण वध देखने नेता आयेंगे,अधिकारी गण आयेंगे। । मंच पर वो भी आयेंगे जिन पर ’बलात्कार’ का आरोप है ।वो भी आयेंगे जिनपर ’घोटाला’ का आरोप है।वो भी आयेंगे जो ’बाहुबली’ है जिन्होने आम जनता के ’ खून’ का बूँद बूँद इकट्ठा कर अपना अपना ’घट’ भरा है । रावण ने भी भरा था। वो भी आयेंगे जो कई ’लड़कियों’ का अपहरण कर चुके है -वो भी आयेंगे जिन पर ’रिश्वत’ का आरोप है ।’भारत तेरे टुकड़े होंगे’’ टुकड़े होंगे’- वाले भी आयेंगे ।कहते है_ आरोप से क्या होता है ? सिद्ध भी तो होना चाहिये। सब भगवान को माला पहनायेंगे। मंच के कोने में सिमटे ’भगवान’ जी सब सुन रहे हैं। उन्हे ’रावण वध’ करना है --इधर वाले का नहीं --सामनेवाले का --पुतले का।
उधर रावण का पुतला खड़ा किया जा रहा है -भारी है । अपने पापों से भारी हो गया है ।सेठ जी बड़ा चन्दा दे कर खड़ा करवा रहे है। कमेटी वालों ने येन केन प्रकारेण ’पुतला’ खड़ा कर के सीना चौड़ा किया और चैन की साँस ली । पुतला खड़ा हो गया मैदान में उपस्थित सभी लोगों ने तालियाँ बजाई । सब की नज़र में आ गया रावण का पुतला --उसका पाप --उसका ’अहंकार’ --उसका ’लोभ--उसका रूप ’ । यही तो देखने आए हैं इस मेला में। ऐसे पापियों का नाश अवश्य होना चाहिए। वध में अभी विलम्ब है। राम- लक्ष्मण जी अपना तीर धनुष लेकर पहुँच चुके हैं मगर रावण को अभी नहीं मार सकते ।भगवान को इन्तज़ार करना पड़ेगा। मुख्य अतिथि महोदय अभी नहीं पहुँचे हैं।
क्या करें तब तक। मैदान में लोग आपस में बातचीत कर रहे हैं --समय काटना है।
कान्वेन्ट के एक बच्चे ने रावण के पुतले को देख कर अपनी जिज्ञासा ज़ाहिर किया-"मम्मा हू इस दैट अंकल"?
"बेटा ! ही इस ’रावना’ --लाइक योर डैडू । रामा विल किल ’रावना’-थोड़ी देर में
बच्चे को -’डैडू’ वाली बात तो समझ में नहीं आई ,पर ’रामा’ किल ’रावना’ वाली समझ में आ गई
उधर "हरहुआ’ अपने काका को बता रहा था --’काका ! ई अब की बार का पुतला न बड़ा जानदार बनाया है। महँगा होगा?
काका ने अपने अर्थ शास्त्र का ज्ञान बताया--- हाँ ! रे ! बड़े आदमी का पुतला भी मँहगा होता है । हम गरीबन का थोड़े ही है कि एक मुठ्टी घास लिया और फूंक दिया ---
रमनथवा की बीबी अपने मरद ने कान में कुछ कहती है -"सुनते हो जी ! हमें तो आजकल महेन्दरा की नीयत ठीक नहीं लगती---बोली-ठोली करता रहता है ।--हमें तो उसकी नज़र में खोट नज़र आ रहा है-।--"
’अच्छा ! स्साले को ठीक करना पड़ेगा"-रामनाथ ने बोला--"बहुत चर्बी चढ़ गई है ।उसे छोड़ , तू इधर का रावण देख---"
उधर शर्मा जी ने माथुर साहब से कहा -" या पुतला इस वेरी नाइस ! --बट इट लैक्स ए ’टाई’
माथुर साहब ने हामी भरी ---यस सर ! हम लोग ’टाई ’ में कितना ’नाइस" लगता है न--बेटर दैन ’रावना’
भीड़ बेचैन हो रही थी । मुख्य अतिथि महोदय अभी तक पहुँचे नही ।मोबाईल से खबर ले रहे हैं --अरे कितनी भीड़ पहुँची है मैदान में अभी ?---नेता जी के चेला-चापड़ खबर दे रहे हैं कि बस सर आधा घंटा और ।पहुँचिए रहें हैं लोग । नेता जी तो भीड़ से ही जीते हैं ---रावण को क्या मारना ...?जल्दी क्या है ?---रावण तो हर साल मरता है । चुनाव तो इस साल है। राम जी उधर अपना डायलाग’ याद कर रहे हैं।
--अब रावण भी बेचैन होने लगा। एक तो मरना और उस पर खड़ा होने की सज़ा ।पता नहीं ये मुख्य अतिथि का बच्चा कब आयेगा उसका धैर्य अब जवाब देने लगा ।
अन्त में बोल उठा---"हा ! हा ! हा! हा! मैं ’रावण’ हूं
भीड़ उस की तरफ़ मुड़ गई । ये कौन बोला ?--रावण कहां है ?--ये तो पुतला है । सभी एक दूसरे को आश्चर्य भरी दॄष्टि से देखने लगे- ये पुतला कहाँ से बोल रहा है?
"हा ! हा! हा! हा!’ -पुतले से पुन: आवाज़ आई-- मैं पुतला नहीं ,रावण बोल रहा हूँ ,! अरे भीड़ के हिस्सों ! मूढ़ों ! तुम लोग क्या समझते हो कि तुम लोग मुझे मार दोगे? वाल्मीकि से लेकर तुलसी तक सभी ने मुझे मारा । क्या मैं मरा? हर साल तुम ने मुझे मारा । क्या मैं मरा? तुम कहते हो कि मैने ’सीता का अपहरण किया ? क्या मेरे मरने के बाद सीता का अपहरण बन्द हो गया । क्या तुम्हारे ’बाहुबली’ लोग अब सीता का ’अपहरण’ नही करते?--उन्हें ’फ़ाइव स्टार’ होटेल में क़ैद कर नहीं रखते? मैने छल किया --क्या तुम लोग छल नहीं करते ?
हा हा ! हा! हा! ------मैं मरता नही अपितु ज़िन्दा हो जाता हूँ हर साल -----तुम्हारे अन्दर --- लोभ बन कर ,,,,हवस बन कर,,,, , छल बन कर ...अहंकार बन कर ---ईर्ष्या बन कर--परमाणु बम्ब बन कर --हाईड्रोजन बम्ब बन कर ।हर देश में ..हर काल में मैं ज़िन्दा रहा हूँ मैं । कभी---- हर युद्ध में -- हर मार काट में --कभी सीरिया में ----कभी लेबनान मे--- । तुम विभीषण’ को पालते हो क्यों कि वह तुम्हे ’सूट’ करता है ----तुमने कभी अपने अन्दर झांक कर नही देखा ---तुम झाँक भी नहीं सकते --देख भी नही सकते -तुम देखना चाहते भी नही -तुम्हे मात्र मुझ पर पत्थर फ़ेकना आता है --क्यों कि तुम्हे यह आसान लगता है --तुम अपने आप पर ’पत्थर नहीं फ़ेंक सकते----- - मुझे जलाना तुम्हे आसान लगता है -तुम अपने अन्दर का लोभ नहीं जला सकते -मुझे मारना तुम्हे आसान लगता है ---तुम अपने आप का ’अहंकार नही मार सकते । - मेरा अहंकार स्वरूप दिखता है ---।तुम्हें मेरे नाम से नफ़रत है---कोई अपने बेटे का नाम ’रावण’ नही रखना चाहता ----सब ’राम’ का ही नाम रखना चाहते हैं परन्तु ’राम के नाम की आड़ में क्या खेल नहीं चलता---ऐसा ही चलता रहा तो भविष्य में लोग ’राम’ का नाम भी रखने में 2-बार सोचेंगे । मैने तो राम के नाम का सहारा नहीं लिया -। रावण एक प्रवॄत्ति है--उसे कोई नही मार सकता--अगर कोई मार सकता है बस--तुम्हारे दिल के अन्दर का ’रामत्व’ ही मुझे मार सकता है --और तुम राम नही ----अपने अन्दर ’रामत्व’ जगाऒ ---क्षमा जगाओ----करुणा जगाओ--प्यार जगाओ -- मैं खुद ही मर जाऊँगा----
’या ही इज टाकिंग समथिंग नाइस’-- शर्मा जी ने कहा
माथुर साहब ने हुंकारी भरी--’ जब मौत सामने दिखाई देती है तो ज्ञान निकलता है सर --दैट इज व्हाट एक्ज़ैक्टली ही इज टाकिंग’ सर !
--- माइक से उद्घोषणा हुई --- भाइयो और बहनो ! आप के प्यारे दुलारे चहेते मुख्य अतिथि महोदय अब हमारे बीच पधार चुके है ---जोरदार तालियों से उनका स्वागत कीजिए। थोड़ी देर में ’रावण वध’ का आयोजन किया जायेगा
सब ने अपने अपने हाथ में पत्थर उठा लिए।
अस्तु

-आनन्द.पाठक-

8 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर व्यंग्य।
    विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनाएँ।

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (28-10-2020) को   "स्वच्छ रहे आँगन-गलियारा"    (चर्चा अंक- 3868)   पर भी होगी। 
    -- 
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है। 
    -- 
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।  
    सादर...! 
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 
    --

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  3. आदरणीय आनंद पाठक जी, नमस्ते 🙏! आपका व्यंग्य सटीक और तीखा है। रावण के प्रतीक के द्वारा आपने आज की सारी कुप्रवृत्तियों के फैलते जाल को रेखांकित किया है। हार्दिक साधुवाद!
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    सादर!--ब्रजेन्द्रनाथ

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  4. धारदार लेखन । प्रभावी एवं प्रशंसनीय । आभार ।

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