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शनिवार, 28 नवंबर 2020

एक गीत : मेरी देहरी को ठुकरा कर जब---

 [डायरी के पन्नों से----]


एक गीत : मेरी देहरी को ....

मेरी देहरी को ठुकरा कर जब जाना है
फिर बोलो वन्दनवार सजा कर क्या होगा ?

आँखों के नेह निमन्त्रण की प्रत्याशा में
आँचल के शीतल छाँवों की अभिलाषा में
हर बार गईं ठुकराई मेरी मनुहारें-
हर बार ज़िन्दगी कटी शर्त की भाषा में

जब अँधियारों की ही केवल सुनवाई हो
फिर ज्योति-पुंज की बात चला कर क्या होगा ?

तुम निष्ठुर हो ,तुम प्रणय समर्पण क्या जानो !
दो अधरों की चिर-प्यास भला तुम क्या जानो !
क्यों लगता मेरा पूजन तुमको आडम्बर ?
हर पत्थर में देवत्व छुपा तुम क्या जानो !

जब पूजा के थाल छोड़ उठ जाना ,प्रियतम !
फिर अक्षत-चन्दन ,दीप जला कर क्या होगा ?

मेरी गीता के श्लोक तुम्हें क्यों व्यर्थ लगे ?
मेरे गीतों के दर्द तुम्हें असमर्थ लगे
जीवन-वेदी माटी की है पत्थर की नहीं
क्यों तुमको ठोकर लगे ,तुम्हें अभिशप्त लगे?

जब हवन-कुण्ड की ज्योति जली बुझ जानी है
फिर ऋचा मन्त्र का पाठ सुना कर क्या होगा !

मेरी देहरी को ठुकरा कर .............

-आनन्द पाठक-

5 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (29-11-2020) को  "असम्भव कुछ भी नहीं"  (चर्चा अंक-3900)   पर भी होगी। 
    -- 
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है। 
    --   
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।  
    --
    सादर...! 
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 
    --

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  2. बहुत मधुर रचना...
    हार्दिक बधाई !!!

    जवाब देंहटाएं