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रविवार, 13 दिसंबर 2020

मैं कोरोना... कुछ कहूं .. सुनो ना

 मैं कोरोनो 

कुछ कहूं...

 सुनो ना !!


ठुमक ठुमक 

और लचक मटक 

मैं आऊं !!

छींक खांस कर 

सांस सांस भर 

थूक पीक से 

इधर उधर 

लहराऊं!


दो गज दूरी 

अगर रहे न 

जो तुम सब  में  तो ...

तुम्हारी ओर खिंची

चली  मैं आऊं !!

तुम सब के 

हर अंग अंग  में 

रोम रोम में 

रच बस  जाऊं !

 

तुम बड़े सयाने 

पर  बात न माने 

और फिर 

मास्क न पहनो !

हाथ न धोना  जानो

सैनिटाइजर को  

धता बताओ !!

फिर मैं कहूं - अरे!!

 रुको रुको... मैं आऊं !!


और 

मैं कोरोनो 

एक रोग सलोना

तुम्हारी रग रग में 

समाऊं !!

स्वस्थ जीवन से  

अस्पताल की राह 

की राह तुम्हे मैं 

दिखलाऊं ...


सुध बुध सब 

जीवन की बिसरे ..

साथी परिजन 

सब कौउ छूटे 

इस जीवन से 

तुम्हरा रिश्ता नाता टूटे ...

न्योता दे दो 

कुछ ही दिनों में 

परम ब्रह्म से  तुम्हे 

 मैं ही मिलवाऊं ... 

इस लोक से 

उस लोक की 

सैर  जल्द करवाऊं ...


सुनो ... रुको ...

खैर जो चाहो 

इस जीवन की ...

दो गज दूरी 

हमेशा ही बनाओ

और तुम चेहरे पे अपने 

 सदा मास्क लगाओ 

 और रहो सदा तुम

स्वस्थ सुखी 

ऐसी मैं आस

लगाऊं !!







शुक्रवार, 11 दिसंबर 2020

एक व्यंग्य : मुजरिम हाज़िर हो

  एक व्यंग्य : मुज़रिम हाज़िर हो....


’आनन्द.पाठक पुत्र [स्व0] श्री रमेश चन्द्र पाठक साकिन अमुक परगना अलाना जिला फ़लाना वर्तमान निवासी गुड़गाँव.....हाज़िर हो"- अर्दली ने अदालत के बाहर जोर से आवाज़ लगाई ।
-’अबे ! शार्ट में नहीं बोल सकता  क्या..? पूरे खानदान को लपेटना ज़रूरी था ?-मैने विरोध जताया
’-आप ने 10-रुपया दिया था क्या ? भला मनाइए कि मैने 4-पुरखों तक नहीं लपेटा-
मैने 10-का एक नोट थमाया और बोला-" बेटा आगे से ध्यान रखना’
’ठीक है स्साब ! ’सलाम स्साब !

और मैं अदालत कक्ष में बने कठघरे में जा कर खड़ा हो गया
-आप का कोई वकील ?--जज ने पूछा
-नहीं, मैं ही काफी हूँ। सच को झूठ की क्या ज़रूरत, जज साहब!?
’ठीक है।ठीक है। सरकारी वकील ज़िरह शुरु कर सकते है ।
सरकारी वकील -’हाँ ! तो आप का नाम ?
-आनन्द पाठक-
-पिता का नाम?
-उस अर्दली से पूछ लो जो अभी अभी आवाज़ लगा रहा था’
मै निश्चिन्त था। मेरा 10-रुपए का नोट अर्दली का मुँह नहीं खुलने देगा।
 सरकारी वकील ने कहा-’मैं आप से पूछ रहा हूँ । यह आप की कोई साहित्यिक मंच मंडली नहीं है कि जो चाहे बोल दें। अल्लम गल्लम लिख दे.और सब वाह वाह कर दें ।.यह अदालत है अदालत ।यहाँ कुछ भी बोलने की स्वतन्त्रता नहीं ।
- आप का पेशा ?
-व्यंग्य लिखना-
-मैं आप का पेशा पूछ रहा हूं रोग नहीं’- सरकारी वकील ने कुटिल मुस्कान लाते हुए पूछा
-तो आप डाक्टर हैं क्या ?-
-अच्छा ! तो आप व्यंग्य लिखते हैं?- तो आप व्यंग्य क्यों लिखते है ?
-कि समाज को आईना दिखाना है ।
- समाज को आईना क्यों दिखाना है?समाज से बिना पूछे “आईना दिखाना”- अनधिकॄति ’ट्रेसपासिंग’ अतिक्रमण का केस बनता है। जज साहब नोट किया जाए ।
- इसलिए दिखाता हूँ कि उसको अपना चेहरा नज़र आए-
-तुम्हें मालूम है? समाज अपना विभत्स और कुरूप चेहरा देख कर डर भी सकता है,?.अत: तुम समाज में डर फैला रहे हो ? -इस प्रकार अनावश्यक आतंक फैलाने से तुम्हारे ऊपर ’आतंक’ फ़ैलाने का भी केस बन सकता है-जज साहब नोट किया जाए ।
-नहीं । समाज डरता नहीं है, हँसता है।वो समझता है कि इस आईने में उसका चेहरा नही ,किसी और का चेहरा देख रहा है।
-अच्छा , इस तरह आईना चमकाने से कुछ लोगों की आँखे चौधियाँ भी सकती है । लोग अन्धे भी हो सकते है । .जमीर धुँधला भी सकता है ।जब जमीर अंधा हो जाएगा तब उन्हें कुछ भी नहीं दिखाई देगा,।,न भ्रष्टाचार..न बेईमानी..न भाई ,,न भतीजावाद, न सदाचार,न कदाचार ,न ’सदाचार की तावीज” ’,न अपना कुरूप चेहरा...इस तरह से तुम समाज को नुकसान पहुँचा रहे हो? अन्धों को भी आईना दिखाते हो क्या ?? --सरकारी वकील ने अपना जिरह जारी रखते हुए पूछा ।
-नहीं । अन्धी क़ौम को आईना दिखाने का कोई लाभ नहीं ।
-तो इस का मतलब, तुम ’हानि-लाभ’ देख कर लिखने का व्यापार करते हो ?-जज साहब नोट किया जाए ।यह आदमी  बिना ’लाईसेन्स’ का व्यापार करता है -इस पर "अवैध व्यापार’ का केस बनता है।
-नहीं मैं लिखता हूं~

सिर्फ़ हंगामा खड़ा करना  मेरा मक़सद नहीं
मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए
न हो तो , दुष्यन्त कुमार जी से पूछ लीजिए।
-इस हंगामा फ़ित्ना से सूरत बदली क्या ? -वकील साहब ने पूछा --तुम्हारे लेखन से समाज का भला हुआ क्या ? .लोग पढ़ते है और कहते हैं ’मज़ा आ गया ’....क्या बखिया उधेड़ी है....क्या जम कर धुलाई की है...क्या ’लतियाया है ? पानी पिला दिया .मज़ा आ गया .. बस यही न ? तुम्हारे लिखने से समाज से  भ्रष्टाचार मिट गया क्या...?? समाज सुधर गया.क्या .?? नहीं न ,तो फिर क्यों लिखते हो....?.
मैने कहा -वकील साहब !

दस्तकों का अब किवाड़ों पर असर होगा ज़रूर
हर हथेली खून से तर और ज़्यादा  बेक़रार

वकील साहब ने लगभग चीखते हुए कहा -’ जज साहब ! यह आदमी ’खून-ख़राबे’ की बात कर रहा है ।नोट किया जाय।
हाँ तो -और कौन कौन से लोग हैं तुम्हारे ’गिरोह’ में जिस से तुम्हें इस प्रकार के ’आतंकी ’कामों में मदद मिलती है ?
-गिरोह नहीं है ,’वर्ग’ कहिए वकील साहब ’वर्ग’। ..प्रेरणा  मिलती है। ,. बहुतेरे हैं । हम अकेले नहीं है ---हरिशंकर परसाई जी है...शरद जोशी जी है ..गोपाल चतुर्वेदी ..लतीफ़ घोंघी.. ...ज्ञान  चतुर्वेदी ...... शौक़त थानवी-- कृशन चन्दर.. फ़्रिंक तौंसवी --किन किन का नाम गिनाउँ..कहाँ तक गिनाऊँ ?...और गिनाऊँ क्या....
-अरे भूतिए ! इन विभूतियों के नाम अपने नाम के साथ क्यों घसीट रहा है ? ये महान विभूतियां है ..सम्मानित विभूतियाँ है ...पुरस्कॄति विभूतियां है ..ये समाज सुधारते है ..ये तुम्हारी जैसी गंदगी नहीं फैलाते.।
-तो क्या हुआ ? दर्द तो एक जैसा है ....प्यास तो एक जैसी है...
- हा हा हा ! ’ प्यास’ एक जैसी है ? अच्छा तो पैसे के मामले में तुम्हारी ’प्यास’ और अदानी -अंबानी माल्या...बियानी की ’ प्यास’ एक जैसी है क्या ???
--आर्डर आर्डर आर्डर...जज साहब ने 3-4 बार अपना हथौड़ा ठक ठकाया ।आप सिर्फ़ काम की ही बातें पूछें । फ़ालतू बातों से अदालत का वक़्त ज़ाया न करे॥--जज साहब ने हिदायत की ।
-अरे वकील स्साब ! यह मुजरिम टटपूंजिया ही सही ।पर है व्यंग्य लेखक वकील स्साब ...व्यंग्य लेखक। -आप बहस में इस से नहीं जीत पायेंगे"--- वादी पक्ष के लोगो ने अलग से नसीहत की ।
आर्डर आर्डर आर्डर...जज साहब ने 3-4 बार अपना हथौड़ा फिर ठक ठकाया --जज साहब ने कहा -हो गया ,हो गया । बहस पूरी हो गई।
--------    --------
जज साहब ने अपना फ़ैसला सुनाया-- ’तमाम गवाहों के बयानात को मद्दे नज़र रखते हुए और मुज़रिम के बयानात को दरकिनार करते हुए अदालत इस नतीज़े पर पहुँची है कि मुज़रिम अपने लेखन से समाज में चेतना फैलाने की कोशिश कर रहा है। इस चेतना से जनता में क्रान्ति के बीज पड़ सकते है ।..जनता आन्दोलन कर सकती है। ,,बगावत कर सकती है अत: ऐसे लेखकों का ’बाहर ’रहना या ’रखना ’ जनहित में उचित नहीं है।समाज के लिए ठीक नहीं है । साथ ही यह अदालत इस लेखक के व्यंग्य लेखन की ’नौसिखुआपन्ती’ और ’ कच्चापना’  के देखते हुए  और सहानुभूतिपूर्वक  विचार करते हुए ताज़िरात-ए-हिन्द की दफ़ा  अलाना..फलाना...चिलाना--ढिकाना और .धारा अमुक अमुक अमुक ......में इसे ’अन्दर’ करती है और 3-महीने की क़ैद-ए-बा मशक्कत  की सज़ा देती है ।
-तुम्हें इस सज़ा के बारे में कुछ कहना है ?- जज साहब ने पूछा ।
"हुज़ूर ..जेल में मुझे कुछ सादे पन्ने मुहैय्या कराने की इज़ाजत दी जाये-मैने  गुज़ारिश की
-मंज़ूर है
-और एक अदद ’कलम’ भी
-नहींईईईईईई........ जज साहब की अचानक चीख निकल गई ...."नहीं ,’कलम’ की इज़ाजत नहीं दी जा सकती ...’कलम’ लेखक का घातक हथियार होता है और जेल में ’घातक हथियार’ रखने की इज़ाजत नही है।
------------------
वादी पक्ष ने तालियाँ बजाई ।.जज साहब की जय हो. ।.एक और आईनादार ’अन्दर ’ गया ।.साहब ने सज़ा नहीं , सज़ा-ए-मौत सुनाई है ।---अगर सच्चा लेखक होगा तो 3-महीने में बिना "क़लम’ के  यूँ ही मर जायेगा वरना तो ये भी कोई ’टाइम-पासू"-लेखक होगा ।
अस्तु

शुक्रवार, 4 दिसंबर 2020

एक ग़ज़ल : तुम्हारे हुस्न से --

 एक ग़ज़ल : तुम्हारे हुस्न से ---



तुम्हारे हुस्न से जलतीं हैं ,कुछ हूरें  भी जन्नत  में ,

ये रश्क़-ए-माह-ए-कामिल है,फ़लक जलता अदावत में ।


तेरी उल्फ़त ज़ियादा तो मेरी उलफ़त है क्या कमतर ?

ज़ियादा कम का मसला तो नहीं होता है उल्फ़त में ।


पहाडों से चली नदियाँ बना कर रास्ता अपना ,

तो डरना क्या  ,फ़ना होना है जब राह-ए-मुहब्बत में ।


वही आदत पुरानी है तुम्हारी आज तक ,जानम !

गँवाया वक़्त मिलने का ,गिला शिकवा शिकायत में ।


चिराग़ों को मिला करती हवाओं से सदा धमकी ,

नहीं डरते, नहीं बुझते, ये शामिल उनकी आदत में ।


उन्हें भी रोशनी देगी जो थक कर हार कर बैठे ,

मेरा जब ज़िक्र आयेगा ज़माने की हिकायत में ।


जहाँ सर झुक गया ’आनन’ वहीं काबा,वहीं काशी ,

वो खुद ही आएँगे चलकर बड़ी ताक़त मुहब्बत में ।


-आनन्द.पाठक-

शनिवार, 28 नवंबर 2020

एक गीत : मेरी देहरी को ठुकरा कर जब---

 [डायरी के पन्नों से----]


एक गीत : मेरी देहरी को ....

मेरी देहरी को ठुकरा कर जब जाना है
फिर बोलो वन्दनवार सजा कर क्या होगा ?

आँखों के नेह निमन्त्रण की प्रत्याशा में
आँचल के शीतल छाँवों की अभिलाषा में
हर बार गईं ठुकराई मेरी मनुहारें-
हर बार ज़िन्दगी कटी शर्त की भाषा में

जब अँधियारों की ही केवल सुनवाई हो
फिर ज्योति-पुंज की बात चला कर क्या होगा ?

तुम निष्ठुर हो ,तुम प्रणय समर्पण क्या जानो !
दो अधरों की चिर-प्यास भला तुम क्या जानो !
क्यों लगता मेरा पूजन तुमको आडम्बर ?
हर पत्थर में देवत्व छुपा तुम क्या जानो !

जब पूजा के थाल छोड़ उठ जाना ,प्रियतम !
फिर अक्षत-चन्दन ,दीप जला कर क्या होगा ?

मेरी गीता के श्लोक तुम्हें क्यों व्यर्थ लगे ?
मेरे गीतों के दर्द तुम्हें असमर्थ लगे
जीवन-वेदी माटी की है पत्थर की नहीं
क्यों तुमको ठोकर लगे ,तुम्हें अभिशप्त लगे?

जब हवन-कुण्ड की ज्योति जली बुझ जानी है
फिर ऋचा मन्त्र का पाठ सुना कर क्या होगा !

मेरी देहरी को ठुकरा कर .............

-आनन्द पाठक-

बुधवार, 25 नवंबर 2020

एक व्यंग्य- साहित्यिक खोमचा

 एक व्यंग्य :साहित्यिक खोमचा

"यार मिश्रा ! सोच रहा हूँ ,एक खोमचा मैं भी लगा लूँ ’।
’खोsssमचा ?? क्या ?क्या ? क्यों?’-अंधे को अँधेरे में बड़ी दूर की सूझी ? -मिश्रा जी अचानक मेरे इस अप्रत्याशित प्रस्ताव से चौंक गए -"पेन्शन बन्द हो गई क्या?’ खोमचा किसका ? दही-भल्ले का?, ’चनाजोर गरम का"?
साहित्य का ,’साहित्यिक खोमचा ’- ।मैने समझाया-"रिटायर होने के बाद खाली बैठा था सोचा टाइम पास हो जायेगा और हिन्दी की कुछ सेवा भी हो जाएगी ।
आम का आम गुठलियों का दा्म भी हो जायेगा । -
-गुठलियों का दाम ?? अच्छा तो हिन्दी की सेवा में भी ’दाम ’? व्यापार ?-मिश्राजी ने कहा-’ वैसे ही कम लोग हैं क्या हिंदी के सेवा करने को ,जो अब तुम चले हो।
ग्राहक कहाँ मिलेंगे ? पानी-पूरी के ,भेल पूरी के तो शायद मिल भी जाय । साहित्यिक ’खोमचे’ के लिए कहाँ मिलेंगे ?
-मिलेंगे मिश्रा ,,खूब मिलेंगे ! फ़ेसबुक,व्हाटसअप पर हर दिन कोई न कोई मंच ,महफ़िल ,ग्रुप बना रहा है । कभी कविता के नाम पर ,कभी ग़ज़ल के नाम पर ,कभी अदब के नाम पर ,कभी साहित्य के नाम पर ।
मेरे उस्ताद ने कहा था बेटा ! तू जहाँ भी खोमचा लगा देगा ,वहीं 2-4-10 ग्राहक मिल जायेंगे। फ़ेसबुक पर ,ह्वाट्स पर,ट्विटर पर ,ब्लाग पर हर दूसरा आदमी ग़ज़ल कह रहा है , शायरी कर रहा है ,दोहा लिख रहा है ,सबको ’चाट’ की तलब है,छपने की ललक है।लिखने की ठनक है। वाह वाह सुनने की ठसक है। मैं भी फ़ेसबुक पर ,’व्हाट्स ’ पर एक मंच बनाऊँगा ।
-तो उससे क्या होगा ?
हिन्दी की सेवा होगी और क्या ? ग्रुप और मंच बनाने में कौन सा पैसा लगता है । मैं ’ऎडमिन’ बन जाऊँगा बैठे बैठाए ।शान-ओ-शौकत ऊपर से । न हर्रे लगे न फिटकरी, रंग बने चोखा ।
-तो उससे क्या होगा ?
हिन्दी की सेवा होगी और क्या ? जिसको चाहे ग्रुप में जोड़ लो --जिसको चाहे ग्रुप से लतिया दो --आत्मसुख मिलता है । जिसको चाहे सम्मनित कर दो , जिसकी
चाहे टाँग खिंचाई कर लो --
-तो उससे क्या होगा ?
हिंदी की सेवा होगी और क्या । जिसको चाहे उसको ’वरिष्ठ कवि’ कह दो --अज़ीमुश्शान शायर कह दो ।उत्साहवर्धन के नाम पर सबके कलाम को वाह वाह करते रहो । उम्दा कलाम । लाजवाब कविता । यह सब करने का समय न मिले तो एक ही झाड़ू से -सबका कलाम उम्दा’- कर दो जैसे पंडित लोग एक ही मन्त्र से -" सर्व देवेभ्यो नम: स्वाहा - कर देते हैं। अपने सदस्यों का सम्मान करूँगा तो ग्रुप का सम्मान होगा। ग्राहक भागेंगे नहीं । उनकी पुस्तकों का विमोचन करवाएँगे -- सहयोग राशि लेकर साझा-संग्रह प्रकाशित करवाएँगे--सम्मान समारोह करवाएँगे- ग़ज़ल सम्राट की उपाधि देंगे--काव्य चेतना शिरोमणि पुरस्कार देंगे---हिंदी सेवा का प्रमाण-पत्र बेंचेंगे -दो-चार पैसे तो बच ही जाएँगे ।
-अच्छा ! तो आप इसी गुठलियों के दाम की बात कर रहे थे ? तो हिंदी की सेवा ?? ऎसे मंचों पर किसी को भाषा की शुद्धता की चिन्ता नहीं ।,वर्तनी का खयाल नहीं--वाक्य विन्यास पर ध्यान नहीं । जो बोल दिया वही हिंदी, जो लिख दिया वही साहित्य । छपने की प्यास है। सभी जल्दी में है ।-मिश्रा जी ने अपनी व्यथा उड़ेली
भई मिश्रा !पहले दाम फिर काम । हिंदी की सेवा तो भारत सरकार कर रही है न पिछले 65-70 साल से । 14-सितम्बर है न इस काम के लिए।हाथी के पाँव में सबका पाँव।
भई पाठक ! एक सलाह दूँ ? हिंदी पर बड़ी कृपा होगी -मिश्रा जी ने कहा
हाँ हाँ !-मैने चहकते हुए कहा-"कहो मित्रवर !कहो ! नि:संकोच कहो !
-तुम तो बस खोपचे में एक खोमचा लगा ही लो । हिंदी सेवा का नही , ’चनाजोर’ गरम का ।गाते हुए बेचोगे तो ज़्यादा बिक्री होगी ज़्यादा फ़ायदा होगा।
चनाजोर गरम बाबू मैं
लाया मजेदार -चना जोर गरम
मेरा चना बना है आला
मैने डाला गरम मसाला
मेरा चना बना चुटकुल्ला
जिसको खाए हाजी मुल्ला--चना जोर गरम ।
इससे पहले कि मैं अपनी "चरण-पादुका " ढूँढता , उससे पहले ही मिश्रा जी नौ दो ग्यारह हो गए ।
-अस्तु-

-आनन्द.पाठक-

शुक्रवार, 20 नवंबर 2020

चन्द माहिए

 चन्द माहिए --

:1:
तुम से गर जुड़ना है
मतलब है इस का
बस ख़ुद से बिछुड़ना है
:2:
आने को आ जाऊँ
रोक रहा कोई
कैसे मैं ठुकराऊँ ?
:3:
इक लफ़्ज़-ए-मुहब्बत है
जिस के लिए मेरी
दुनिया से अदावत है
:4;
दीदार हुआ जब से
जो भी रहा बाक़ी
ईमान गया तब से
5
जब तू ही मेरे दिल में
ढूँढ रहा हूँ मैं
फिर किस को महफ़िल में ?

-आनन्द.पाठक-

शुक्रवार, 13 नवंबर 2020

एक गीत : दीपावली पर

 एक गीत : दीपावली पर-2020


आज दीपावली की है पावन घड़ी

प्रेम का दीप जलता  रहे उम्र भर


दिल में खुशियाँ हैं,उल्लास है,प्यार है

रात भी रोशनी  से नहाई  हुई

और तारे गगन में परेशान हैं

 चाँद -सी कौन है,छत पे आई हुई ?


लौ लगी है तो बुझने न पाए कभी

मैं भी  रख्खूँ नज़र,तुम भी रखना नज़र


दीप महलों में या झोपड़ी में जले

एक सी रोशनी सबको मिलती सदा

एक दीपक जला कर रखो राह में

सब को मिलता रहे रोशनी का पता


हो अँधेरा जहाँ ,दीप रखना वहीं

हर गली मोड़ पर हर नगर हर डगर


द्वेष ,नफ़रत की दिल में लगी आग हो

तो जलाती रहेगी तुम्हे उम्र भर 

यह अँधेरा मिटेगा क्षमा प्यार से -

प्रीति की ज्योति दिल में जला लो अगर


प्रेम,करुणा, दया दिल में ज़िन्दा रहे

और चलता रहे रोशनी का सफ़र


 आज दीपावली की है पावन घड़ी, प्रेम का दीप जलता  रहे उम्र भर


-आनन्द.पाठक-