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रविवार, 20 जनवरी 2019


एक लघु कथा
यह तीसरी लड़की है जो तुमने पैदा की है.  इस बार तो कम से कम एक लड़का जन्मती,’ उसकी आवाज़ बेहद सख्त थी.
एक कठोर, गंदी अंगुली शिशु को टटोलने लगी; यहाँ, वहां. भय  की नन्ही तरंग शिशु के नन्हें हृदय में उठी और उसे आतंकित करती हुई कहीं भीतर ही समा गई. अपने-आप से संतुष्ट अंगुली हंस दी.
सब जानते हुए भी, अपने में सिकुड़ी हुई, माँ मुंह फेर कर लेटी रही. ऐसा हर बार हुआ था. अपनी सिसकियाँ दबाने के अतिरिक्त उसके पास कोई विकल्प नहीं था.
दिन बीते और हर बीते दिन के साथ घृणा और आतंक की लहरें भी बढ़ती गईं. हर दिन बच्ची को लगता कि वह प्राणहीन होती जा रही थी. पर अंगुली की कामुकता थी कि बढ़ती ही जा रही थी.
आज बच्ची का सोलहवाँ जन्मदिन था, वह सहमी हुई थी. उसने माँ की ओर देखा. माँ की आँखें शुष्क और सूनी थीं. उसके आंसू तो कब के खत्म हो चुके थे, सिसकियाँ निर्जीव हो चुकीं थीं.
जैसे ही क़दमों की आहट बच्ची की ओर आने लगी, भयभीत सी  वह अपने में सिमट गई. उसे लगा की उसकी बहनें कितनी भाग्शाली थीं, उन्हें इतने जन्मदिन सहने न पड़े थे.

गुरुवार, 17 जनवरी 2019


मृत्युदंड
वह एक निर्मम हत्या करने का दोषी था. पुलिस ने उसके विरुद्ध पक्के सबूत भी इकट्ठे कर लिए थे.
पहले दिन ही जज साहब को इस बात का आभास हो गया था कि अपराधी को मृत्यदंड देने के अतिरिक्त उनके पास कोई दूसरा विकल्प न होगा. लेकिन जिस दिन उन्हें दंड की घोषणा करनी थी वह थोड़ा विचलित हो गये थे. उन्होंने आज तक किसी अपराधी को मृत्युदंड नहीं दिया था. इतने दिन मन ही मन वह कामना कर रहे थे कि मामले में अचानक कोई नया मोड़ आ जाएगा और स्थिति पलट जायेगी. लेकिन ऐसा हुआ. हर नया सबूत उनके विकल्पों को सीमित कर उन्हें उस विकल्प तक ले जा रहा था जिसकी कल्पना भी वह नहीं करना चाहते थे. वह अच्छी तरह समझते थे कि अपराधी को मृत्युदंड दे कर ही इस मामले में उचित न्याय हो पायेगा.
मृत्युदंड की घोषणा करते समय जज भावावेश से कांप रहे थे.
आजतक कभी भी अदालत से एकाएक उठ कर वह नहीं गये थे. लेकिन आज वह इतने उद्वेलित हो गये थे कि कोई और केस सुनने का साहस उन में नहीं रहा था. घर पहुंचे तो वह बिलकुल दयनीय, विकल और निस्तेज दिख रहे थे.
हत्यारे को पुलिस अदालत से बाहर ले आई. उसकी चाल में ज़रा सी भी हिचकिचाहट न थी और उसकी निर्मम आँखें बिलकुल भावनाशून्य थीं.
*************
(सलीम अली की आत्मकथा, ‘दि  फॉल ऑफ़ ए स्पैरो’ में  लिखी एक घटना से प्रेरित.)

बुधवार, 16 जनवरी 2019

एक व्यंग्य : आँख दिखाना-----

एक व्यंग्य : आँख दिखाना

--आज उन्होने फिर आँख दिखाई

और आँख के डा0 ने अपनी व्यथा सुनाई--" पाठक जी !यहाँ जो मरीज़ आता है ’आँख दिखाता है " - फीस माँगने पर ’आँख दिखाता है ’। क्या मुसीबत है ---।

--" यह समस्या मात्र आप की नहीं ,राजनीति में भी है डा0 साहब " मैने ढाँढस बँधाते हुए कहा-"जब कोई अपना गठबन्धन छोड़ कर सत्तारूढ़ ’गठ बन्धन ’में आता है तो ’आँखें झुकाते’--नज़रे मिलाते हुए आता है और जाता है तो ’आँख दिखाते" हुए जाता है।
-आज उसने फिर आंख दिखाई
उन दिनों, जब मैं जवान हुआ करता था और आँखें मिलाने की स्थिति में था ।और जब मैने " उस से"आँख मिलाई तो उसने ’आँखे झुकाई’ । इसी मिलाई- झुकाई में पता नहीं कहाँ से उसका मुआ बाप आ गया और लगा आँखें दिखाने । वो तो भला हुआ कि पिटते-पिटते बचा।
मगर राजनीति में ’आँख दिखाना ’ का मतलब घटक दल का सत्तारूढ़ पार्टी को ’संदेश’ देना । ।वहाँ ’संदेशों’ का आदान-प्रदान ऐसे ही होता है।
विरोधी पार्टी आपस में कभी आँख नहीं दिखाते --बस आँखे मिलाते है और ’गठबन्धन’ बनाते है ।जब ज़रा और ’आंख दिखाना हुआ तो ’महागठबन्धन ’ बताते है -भले ही 2-आदमियों का गठबन्धन क्यों न हो। इससे जनता पर प्रभाव पड़ता है।
आँख दिखाने का काम सत्ता-पक्ष वाली पार्टियाँ करती रहती है -समय समय पर । अपने को ज़िन्दा समझवाने का एहसास कराने के लिए ।
--आज नेता जी ने फिर आँख दिखाई
अध्यक्ष जी ने पूछ ही लिया-
-"इशारों इशारों में धमक देने वाले ,बता ये हुनर तूने सीखा कहाँ से ?
तो नेता जी ने भी तुर्की ब तुर्की जवाब दिया -
’ जुमलों ही जुमलों सब को चराना ,मेरे सर जी! सीखा है तुम ने जहाँ से

कारण ? कारण कुछ भी नहीं । कारण बहुत कुछ । इतने साल ’सत्ता से चिपके रहे .मलाई खाते रहे । जब चुनाव नज़दीक आया तो अचानक ख़याल आया अरे मेरा तो ’सम्मान’ ही नहीं है इस पार्टी में ।आँख उठा कर देख भी नहीं रहे हैं ये लोग हमे तो । अरे भाई ,हम दलित हैं तो क्या--हम शोषित है तो क्या---हम वंचित है तो क्या ---मेरा असम्मान देश के समस्त दलित--शोषित पीड़ित --वंचित लोगों का अपमान है --हम अपने भाईयों का अपमान सहन नहीं-- देश हित का अपमान सहन नहीं कर सकते --
"-- भाई साहब ! दलितों शोषितों वंचितों के लिए तो बहन जी है न देख भाल के लिए"
"-अरे ऊ कब से दलितों की नेता बन गईं--दलितों - वंचितों का सबसे बड़ा नेता ’मैं ’।कल तक हम आप की "आँखों के तारे थे ,--आँखों की पुतली थे --अब --आँखों की किरकिरी बन गए ? अगर मुझे सम्मान जनक ढंग से सीटें न मिली तो गठबन्धन से अलग भी हो सकता हूँ।विकल्प खुले हुए हैं -- मैं ’पद’ का भूखा नहीं ,मैं कुर्सी का भूखा नहीं [शायद मलाई ख़तम हो रही है ] -मैं देश की ग़रीब भाईयों के बारे में सोचता हूँ --बेरोज़गार नौजवानों भाईयों के बारे में सोचता हूँ --किसान भाईयों के बारे में सोचता हूँ । देश हित के बारे में सोचता हूँ ---मेरी पार्टी को 2-सीट दे रहें है-। इतना चिल्लर तो भीखमंगा भी नहीं लेता आजकल ----मात्र 2-सीट ? अगर आप ने 10-15 सीट नहीं दे तो हम आप की आँखों से काजल भी चुरा सकते है ।10-20 एम0एल0ए0 हैं सम्पर्क में मेरे ।हम लोकसभा में ’आँखे नहीं मारते ।--हम आँख मूँद कर सपोर्ट भी नहीं करते -----फिर मेरे मजदूर किसान भाइयॊं का क्या होगा ? मेरी माताओं बहनों का क्या होगा? देश की सेवा का क्या होगा ? ---’ -नेता जी ’आखें दिखा रहे थे और सत्ता पक्ष रहस्य समझ रहा थ।
’--अरे भाई साहब ! देश हित सोचने के लिए और नेता है न -शहर की चिन्ता में काज़ी क्यॊं दुबला
" नेता ? कोन नेता ? मेरे सिवा और कौन नेता ? ---सब झूठ के नेता है --कहते है कि हमें राज्यसभा की सीट दिलवा दो।हमें राजपाल बना दो --हमें उस समिति का अध्यक्ष बना दो ---अरे वो क्या भला करेंगे देश का--??
----
ख़ैर सत्ता-पक्ष के गठबन्धन ने उन्हें 3- सीट दे दिया
1-सीट और मिलने से , नेता जी का सम्मान लौट आया -पगड़ी -ऊँची हो गई --उनकी जाति भाईयों का सम्मान लौट आया । समझदार थे-पता था दूसरे दल के गठ बन्धन में जायें --चुनाव के बाद ’मलाई’ मिले न मिले }यहाँ जितना मिल रहा है -उतना तो चाट लें-डकार लें --चमचों में उत्साह दौड़ आया- कार्यकर्ताओं ने नारा लगाया ---" भईया जी अमर रहें-अमर रहें -जब तक सूरज चांद रहेगा--भईया जी का नाम रहेगा---भईया जी आगे बढ़ो--हम तुम्हारे साथ हैं"--देश का नेता कैसा हो? भईया जी जैसा हो ।-वातावरण ’महक’ उठा।
और नेता जी ने सुबह बयान दे दिया----देश का विकास --देश तोड़क शक्तियों का विनाश कोई कर सकता है -तो हमारा गठबन्धन ही कर सकता है_ सत्तारूढ़ पार्टी ही कर सकती है ---"हम सीटों की संख्या पर नहीं रिश्ते पर विश्वास रखते हैं --- निभाते हैं --हम अपने ग़रीब भाइयों के लिए ऐसी सीटों को दस बार लात मार सकता हूँ -----भारत माता की जय--वन्दे मातरम ---

इधर ’बुधना’ मन ही मन मुस्कराता है

बेख़ुदी बेसबब नहीं ग़ालिब’
कुछ तो है जिसकी पर्दादारी है

===
-सुना -कल साधु-सन्तों नें ’आँखें दिखाईं- । अगर ’राम मन्दिर’ नहीं बना तो आगामी चुनाव में क्या मुँह लेकर जायेंगे आप ?
---सत्ता पक्ष का गठ बन्धन व्यस्त हैं -"आँखे दिखाने " में
विरोधी पक्ष की पार्टियाँ मस्त हैं - ’आंखे मिलाने में। भले ही उनकी आँखों का पानी मर रहा हो ।
गाँव का ’बुधना’ त्रस्त है --अपनी आँख के मोतिया बिन्द से-।सोच रहा है कर्जा उतरे तो आपरेशन कराएँ।
"जनता तो पिछले कई दशक से एक ही चेहरा देखते आ रही है--झूट का चेहरा- ।

जब तवक़्को ही उठ गई ’ ग़ालिब’
क्यों किसी का गिला करे कोई


क्या मन्दिर-क्या मस्जिद ? मन्दिर बने न बने --बनते हुए प्रतीत होना चाहिए -- आग जलती रहनी चाहिए।
भारत का लोकतन्त्र आगे बढ़ रहा है इन्हीं ’आँख मिलाने से , आँख -दिखाने से-आँख मारने से --आँख चुराने से ।
अस्तु



-आनन्द.पाठक-

रविवार, 13 जनवरी 2019

मेरी सद्य प्रकाशित ग़ज़ल संग्रह------पीर ज़माने की -----डा श्याम गुप्त ---

डा श्याम गुप्त की  सद्य प्रकाशित ग़ज़ल संग्रह------पीर ज़माने की -----





अनुशंसा
         महाकवि डा श्यामगुप्त का नया ग़ज़ल-संग्रह ‘पीर ज़माने की’ प्रकाशित होरहा है जिसमें उन्होंने उनके मन-लुभावनी, उत्साहवर्धक एवं तनाव को खुशी में, दुःख को शांति में बदलने की क्षमता रखने वाली अपनी सोच का एक अनूठा दर्पण शायरी के रूप में प्रस्तुत करके शायरी के खजाने को मालामाल किया है | उनकी नवीन उद्भावनाओं को देखकर आत्मचिंतन, आत्ममंथन एवं एकाग्रता का एहसास खुद ब खुद पैदा होजाता है |
         डा श्यामगुप्त का नवीन संग्रह ‘पीर ज़माने की ‘ उनके द्वारा लिखित अनेक लोकप्रिय ग़ज़ल संग्रहों की परम्परा में एक नया अध्याय आपके समक्ष प्रस्तुत है, जिसमें एक संपन्न कवि की प्रतिभा, वैभव एवं चिन्तन को ग़ज़ल के धरातल पर शिद्दत से महसूस किया जा सकता है | डा श्यामगुप्त ने शुरू में ही ‘ग़ज़ल की बात’ में स्पष्ट रूप से लिखा है की काफिया, रदीफ़, गैर–रदीफ़ ग़ज़ल, कसीदा और ग़ज़ल का  अर्थ क्या होता है | ग़ज़ल की परम्परा और इतिहास पर उनका ये तुलनात्मक लेख उनकी विद्वता का परिचायक है | वह लिखते हैं---
‘मतला बगैर हो ग़ज़ल, हो रदीफ़ भी नहीं ,
यह तो ग़ज़ल नहीं, ये कोइ वाकया नहीं |
      इसी तरह डा श्यामगुप्त अन्य ख़ूबसूरत शेर पेश करते हुए लिखते हैं—
‘उसमें घुसने की मुझको ही मनाही है,
दरो-दीवार जो मैंने ही बनाई है |’

‘इस सूरतो रंग का क्या फ़ायदा’ श्याम,
जो मन नहीं पीर जमाने की समाई है |’
   इसी तरह वह छोटी बहर में बहुत आसान ग़ज़ल ‘खुशी लुटाकर खुश ‘ में इस तरह के शेर प्रस्तुत करते हैं जो दिलों को मोह लेने का दम रखते हैं, जैसे ---
देख मुझको जला होगा,
वो कोइ दिलजला होगा |

गज़ब हैं श्याम की गज़लें,
कोइ तो मामिला होगा |  ----तथा----

‘कोई गले लगा कर खुश,
कोई हमें सताकर खुश |

कोई सबकुछ पाकर खुश,
श्याम तो खुशी लुटाकर खुश |’
         गजल ‘आज आदमी ‘ में वह इस तरह मुखर होते हैं जैसे वक्त की सचाई बयां कर रहे हों ----
‘अब आदमी के सर पे बैठा आज आदमी,
छत अपने सर की ढूंढता आज आदमी |

हर आदमी है त्रस्त मगर होंठ बंद हैं,
अपने ही मकड़जाल बंधा आज आदमी |
२.
       चूंकि डा श्यामगुप्त स्वयं में कलम व कलाम के एक महत्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं इसलिए वह ‘कविता–कामिनी’ में लिखते हैं---
‘किस दिल में कविता-कामिनी का राज नहीं है |
है बात और काव्य जो दिलसाज नहीं है |’

कवि बादशाह है सदा अपने कलाम का ,
है बात और उसके सर पे ताज नहीं है |’

    डा श्यामगुप्त को उर्दू ग़ज़ल के बुनियादी उसूल अच्छी तरह मालूम हैं तभी वह मतला और मख्ता भी जानते हैं और काफिया रदीफ़ भी | उन्होंने अपनी शायरी में जिन्हें अच्छी तरह बरता भी है | वह कहते हैं---
शेर मतले का न हो तो कुंवारी ग़ज़ल होती है ,
हो काफिया ही जो नहीं, बेचारी ग़ज़ल होती है |

हर शेर एक भाव हो वो जारी गजल होती है,
हर शेर नया अंदाज़ हो वो भारी ग़ज़ल होती है ||         ----एवं—

कुछ तुम रुको कुछ हम रुकें चलती रहे ये ज़िंदगी |
कुझ तुम झुको कुछ हम झुकें ढलती रहे ये ज़िंदगी |

कुछ तुम कहो कुछ हम कहें सुनती रहे ये ज़िंदगी ,|
कुछ तुम सुनो कुछ हम सुनें कहती रहे ये ज़िंदगी |

          इसी तरह डा श्यामगुप्त के इस नए ग़ज़ल संग्रह ‘पीर ज़माने की; में ऐसी बेशुमार गज़लें मौजूद हैं जिसमें दो पंक्तियों की शायरी के नियमों में बंधी हुई जो गज़लें देखी हैं वह भाव और विचारों से परिपूर्ण हैं, बल्कि एसी ही शायरी को ग़ज़ल कहते हैं और शायरी में गजलों को मालिका कहा जाता है | वह शायरी जिसमें सुन्दरता हो, तुकांत, लय, गति, भाव, विषय और प्रवाह हो जिसे पढ़ते पढ़ते शायरी के सागर में डूबने का ऐहसास, वादियों में घूमने का पुरमस्त कैफ, जवान और वयान की नुदरत साफ़ व शफ्फाफ़ नज़र आती हो | डा श्यामगुप्त ऐसी ही शायरी के लिए जाने जाते हैं | मैं उनके उज्जवल भविष्य की कामना करता हूँ और इस नए संग्रह के लिए अपनी शुभकामनाएं प्रस्तुत करता हूँ |
                                               डा सुलतान शाकिर हाशमी
                                    पूर्व सलाहकार सदस्य, योजना आयोग, भारत सरकार
                                            मो. ८०९०३०१४७१ ..






शनिवार, 12 जनवरी 2019


लघुकथा-सात
1 जनवरी 20..
आतंकवादियों ने सेना की एक बस पर अचानक हमला कर दिया. बस में एक भी सैनिक नहीं था. बस में स्कूल के कुछ बच्चे पिकनिक से लौट रहे थे. एक बच्चा मारा गया, पाँच घायल हुए.
सारा नगर आक्रोश और उत्तेजना से उबल पड़ा. लोग सड़कों पर उतर आये; पहले एक नगर में, फिर कई नगरों में. हर कोई सरकार को कोस रहा था. हर समाचार पत्र और हर न्यूज़ चैनल भड़का हुआ था.
1 फरवरी 20..
उसी नगर में एक स्कूल बस बहुत तेज़ गति से चल रही थी. ट्रैफिक सिग्नल लाल हो गया. पर ड्राईवर ने बस को ज़रा भी धीमे नहीं किया और ट्रैफिक सिग्नल की अनदेखी कर बस चलाता रहा. बस दुर्घटनाग्रस्त हो गई. छह बच्चे मारे गये, पन्द्रह घायल हुए.
न लोग उत्तेजित हुए, न भड़के. समाचार पत्रों और न्यूज़ चैनलों के लिए तो यह कोई समाचार ही न था.
ऐसा कुछ होता भी क्यों? जिस देश में चार सौ से अधिक लोग हर दिन सड़कों पर मरते हैं, वहां सड़क-दुर्घटना में मरे छह बच्चों के लिये कौन रोये?
(एक रिपोर्ट के अनुसार अधिकतर सड़क दुर्घटनाएं वाहन-चालकों की गलती के कारण होती हैं)

शनिवार, 5 जनवरी 2019

एक ग़ज़ल : लोग क्या क्या नहीं --

एक ग़ज़ल : लोग क्या क्या नहीं --

लोग क्या क्या नहीं कहा करते
जब कभी तुमसे हम मिला करते

इश्क़ क्या है ? फ़रेब खा कर भी
बारहा इश्क़ की दुआ करते

ज़िन्दगी क्या तुम्हे शिकायत है
कब नहीं तुम से हम वफ़ा करते

दर्द अपना हो या जमाने का
दर्द सब एक सा लगा करते

हाथ औरों का थाम ले बढ़ कर
लोग ऐसे कहाँ मिला करते

इश्क़ उनके लिए नहीं होता
जो कि अन्जाम से डरा करते

दर्द अपना छुपा के रख ’आनन’
लोग सुनते है बस,हँसा करते

-आनन्द पाठक-

शुक्रवार, 4 जनवरी 2019


लघुकथा-छह
‘बच्चे, उस बाड़ से दूर रहना, उसे छूना नहीं. उसमें बिजली चल रही है.’
‘लेकिन यह बाड़ यहाँ क्यों है? इसमें बिजली क्यों चल रही है.’
‘यह सब हमारी सुरक्षा के लिये है.’
‘हमारी सुरक्षा? किस से?’
वृद्ध एकदम कोई उत्तर ने दे पाए. कुछ सोच कर बोले, ‘बच्चे, यह बात तो मैं भी समझ नहीं पाया.’
‘वह हमें मूर्ख बना रहे हैं.’
‘शायद तुम सही कह रहे हो.’
तभी तीन आदमी आ पहुंचे. तीनों एक जैसे दिख रहे थे.
‘दादाजी, रोबोट आ गये!’
‘आपने कर देने में फिर देरी कर दी?’ एक आदमी बोला.
‘मुझे थोड़ा समय और चाहिये.’
‘आपका समय तो कब का समाप्त हो चुका है,’ दूसरे ने कहा.
तीसरे ने वृद्ध को उठा कर बाड़ की ओर धकेलना शुरू कर दिया.