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शनिवार, 18 जनवरी 2014

परिस्थितियों से विवश ---पथिक अनजाना --४५७ वीं पोस्ट



       बुजुर्गान भांप लेते दिल में तुम्हारे जो छिपा हैं
       बनावट चेहरे या जुबान की बेनकाब हो जाती हैं
       निगाहें हावभाव खुद तुम्हारेख्वाब जाहिर करते हैं
       नही जरूरत उन्हें पूछने की कर्म हाजरी भरते हैं
       ढोंग कितने करो ताड लेने वाले कहने से डरते हैं
       परिस्थितियों से विवश हो भीष्मजी जैसे करते हैं

         पथिक  अनजाना