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शुक्रवार, 19 अप्रैल 2019

एक ग़ज़ल : कहाँ आवाज़ होती है--

एक ग़ज़ल : कहाँ आवाज़ होती है--


कहाँ आवाज़ होती है कभी जब टूटता है दिल
अरे ! रोता है क्य़ूँ प्यारे ! मुहब्बत का यही हासिल

मुहब्बत के समन्दर का सफ़र काग़ज़ की कश्ती में
फ़ना ही इसकी क़िस्मत है, नहीं इसका कोई साहिल

मुहब्बत का सफ़र आसान है तुम ही तो कहते थे
अभी तो इब्तिदा है ये ,सफ़र आगे का है मुश्किल

समझ कर क्या चले आए, हसीनों की गली में तुम
गिरेबाँ चाक है सबके ,यहाँ हर शख़्स है  साइल

तरस आता है ज़ाहिद के तक़ारीर-ओ-दलाइल पर
वो जन्नत की कहानी में खुद अपने आप से गाफ़िल

कलीसा हो कि बुतख़ाना कि मस्जिद हो कि मयख़ाना
जहाँ दिल को सुकूँ हासिल हो अपनी तो वही मंज़िल

न जाने क्या समझते हो तुम अपने आप को ’आनन’
जहाँ में है सभी नाक़िस यहाँ कोई नहीं कामिल


-आनन्द.पाठक-

शनिवार, 13 अप्रैल 2019

एक ग़ज़ल : जब भी शीशे का ---

एक ग़ज़ल : जब भी शीशे का इक मकां देखा---

जब भी शीशे का इक मकां देखा
पास पत्थर की थी दुकां,  देखा

दूर कुर्सी पे  है नज़र जिसकी
 उसको बिकते जहाँ तहाँ  देखा

वादा करता वो कस्में खाता है
पर निभाते हुए कहाँ   देखा

जब कभी ’रथ’ उधर से गुज़रा है
बाद  बस देर तक धुआँ  देखा

कल तलक जो भी ताजदार रहा
मैने उसका नहीं निशां  देखा

आदमी यूँ तमाम  देखे  हैं
’आदमीयत’ नहीं  अयाँ  देखा

सच को ढूँढें कहाँ, किधर ’आनन’
झूठ का बह्र-ए-बेकराँ  देखा

=आनन्द.पाठक-

[बह्र-ए-बेकरां = अथाह सागर]

चिड़िया: मानव, तुम्हारा धर्म क्या है ?

चिड़िया: मानव, तुम्हारा धर्म क्या है ?: धर्म चिड़िया का, खुशी के गीत गाना  ! धर्म नदिया का, तृषा सबकी बुझाना । धर्म दीपक का, हवाओं से ना डरना ! धर्म चंदा का, सभी का ताप हरना...

शुक्रवार, 12 अप्रैल 2019

एक व्यंग्य : आम चुनाव और नाक

एक व्यंग्य :आम चुनाव और नाक

2019। चुनाव का मौसम और मौसम का अपना मिजाज।

आजकल चर्चा मुद्दों पर नहीं, नाक पर चल रही है । मुद्दे तो अनन्त है --हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता -जैसा ।
कुछ मुद्दे तो शाश्वत हैं,-जैसे ग़रीबी,बेरोज़गारी,महंगाई,भ्रष्टाचार,महिला सुरक्षा,कानून-व्यवस्था। ये तो हर चुनाव में नाक घुसेड़ देते हैं। पर इस चुनाव में किसी और की नाक घुस गई।
उनकी नाक उनकी दादी जैसी है ।अच्छी बात है। होनी भी चाहिए। खानदानी नाक है -खानदान पे ही होनी चाहिए। भई ,गर दादी जैसी नहीं होगी तो क्या माओत्सेतुंग जैसी होगी ?
जनता आत्म विभोर है। दादी की छवि दिख रही है। उनको भी दिख रही  है जो दादी को कभी देखा नहीं होगा ।सुना ही सुना होगा । सुन रहे हैं तो सुना रहे हैं ।आख़िर पार्टी के कार्यकर्ता हैं । अरे भई ,नाक की बारीकियाँ वो न देखेंगे तो क्या बीजेपी वाले देखेंगे?
अब नाक का नख-शिख वर्णन हो रहा है। नाक ऐसी है ,नाक वैसी है। किसी ने अति उत्साह में यह भी पता लगा लिया कि राजनीति में आने से पहले ये नाक वैसी नहीं थी ,सर्जरी कराई है छवि दिखाने के लिए । भगवान जाने क्या सच है।
जो लोग अपनी नाक पर मख्खी नहीं बैठने देते थे  , अब वही नाक पर वोट माँगने निकले हैं
 यूपी के दो युवा थे । कल तक नाक के बाल थे आज वही नाको चने चबवा रहे है ।  चुनाव का मौसम जो न करा दे ।
 सुपुत्र ने तो अपने ही पिता जी की नाक कटवा दी और पार्टी से धकिया दिया। व्यक्ति से बड़ी पार्टी -और पार्टी से बड़ी नाक। लोग गठबन्धन किए घूम रहे है- अब तो कई पार्टियों के नाक का सवाल है - एक पार्टी का नाक काटने के लिए।
नाक कटे बला से, सामने वाले का शगुन तो बिगड़ा।
और जनता ?
जनता का क्या है ? उसी के हित के लिए तो सब पार्टिया लड़ ही रही है । उसे क्या करना है ।राम झरोखे बैठ , सब का मुज़रा देख । उसे तो तमाशा देखना है उसे तो वोट देना है ।  ग़रीबी,बेरोज़गारी,महंगाई,भ्रष्टाचार,महिला सुरक्षा,कानून-व्यवस्था से क्या लेना देना ?। वोट दिया तो था । किसने हल कर दिया? न 70-साल वालों ने ,न 5-साल वालों ने।चुनाव में यह सब चलता ही रहेगा।ये सब  "चुनावी रेसिपी" है ,बनाते हैं, पकाते हैं, परोसते हैं --मज़दूर का, किसान का ,,,बेरोज़गार का,अली का ,बजरंग बली का, नाम लेकर । पार्टियों की मज़बूरी है ।उनकी मज़बूरी अलग ,हमारी मज़बूरी अलग । हमें तो  देखना है ---जाति की नाक न कट जाए -बिरादरी  की नाक ऊँची रहे ।  जाति है तो हम हैं -अपनी ही जाति  का बन्दा खड़ा  है । हिन्दू की नाक नीचे नहीं होनी चाहिए---अली  की नाक ऊपर नहीं होनी चाहिए---शोषित की नाक अलग--दलित की नाक अलग --सब पार्टियां अपने अपने ’वोट बैंक’ की नाक लेकर खड़ी हैं चुनाव मैदान में।

गाँव का ’बुधना’ सोचता है । । हाथ वाले भईया का हाथ हमारे ऊपर है । कर्ज़ा माफ़ हो ही गया । अब काहे का काम करना ,काहे की ग़रीबी ।72000/- रुपया खाते में आ ही जायेगा --बोल गए हैं । खानदानी आदमी हैं -ज़बान के पक्के ही होंगे
हमें तो जिसने "प्यार से पिला दिया ,हम उसी के हो गए" और मस्त हो कर गा रहा है
"अरे हथवा कS वोटवा लेई भागा
ई बुधना अभागा  नहीं  जागा "
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यह चुनाव देश की नाक का सवाल है--कोई नहीं सोचता।

-आनन्द.पाठक-