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शनिवार, 22 अप्रैल 2017

एक युगल शिकायती गीत ---वरना क्या मैं------

FaceBook और  Whatsup के ज़माने में 
और 
U CHEAT.......U SHUT UP----UUUUUU SHUT UP के दौर में 

एक ’क्लासिकल’ युगल  शिकायती :   गीत 

कैसे कह दूँ कि अब तुम बदल सी गई
वरना क्या  मैं समझता नहीं  बात क्या !

एक पल का मिलन ,उम्र भर का सपन
रंग भरने का  करने  लगा  था जतन
कोई धूनी रमा , छोड़ कर चल गया
लकड़ियाँ कुछ हैं गीली बची कुछ अगन
कोई चाहत  बची  ही नहीं दिल में  अब
अब बिछड़ना भी  क्या ,फिर मुलाक़ात क्या !
वरना क्या मैं समझता----

यूँ जो नज़रें चुरा कर गुज़र जाते हों
सामने आने से तुम जो कतराते हो
’फ़ेसबुक’ पर की ’चैटिंग’ सुबह-शाम की
’आफ़-लाइन’- मुझे देख हो जाते हो
क्यूँ न कह दूँ कि तुम भी बदल से गए
वरना क्या मैं समझती नहीं राज़ क्या !

ये सुबह की हवा खुशबुओं से भरी
जो इधर आ गई याद आई तेरी
वो समय जाने कैसे कहाँ खो गया
नीली आंखों की तेरी वो जादूगरी
उम्र बढ़ती गई दिल वहीं रह गया
ज़िन्दगी से करूँ अब सवालात क्या !
वरना क्या मैं समझता नहीं-------

ये सही है कि होती हैं मज़बूरियाँ
मन में दूरी न हो तो नहीं  दूरियाँ
यूँ निगाहें अगर फेर लेते न तुम
कुछ तो मुझ में भी दिखती तुम्हें ख़ूबियाँ
तुमने समझा  मुझे ही नहींआजतक
ना ही समझोगे होती है जज्बात क्या !
वरना क्या मैं समझती नहीं--------

-आनन्द.पाठक-
088927181

गुरुवार, 20 अप्रैल 2017

चन्द माहिया : क़िस्त 37

चन्द माहिया : क़िस्त 37


:1:
सद ख़्वाब ,ख़यालों में
जब तक  है परदा
उलझा हूँ सवालों में 

;2:
शिकवा  न शिकायत है
मैं ही ग़लत ठहरा
ये कैसी रवायत है

:3:
तुम ने ही बनाया है 
ख़ाक से जब मुझ को 
फिर ऎब क्यूँ आया है ?

:4:
सच है इनकार नहीं
’तूर’ पे आए ,वो
लेकिन दीदार नहीं 

:5;

कहता है कहने दो
बात ज़हादत की
ज़ाहिद तक रहने दो

-आनन्द.पाठक-
08800927181

शब्दार्थ
ज़हादत की बातें  = जप-तप की बातें
तूर = उस पहाड़ का नाम जहाँ पर हज़रत
मूसा ने ख़ुदा से बात की थी



सोमवार, 17 अप्रैल 2017

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 30 [ बहर-ए-हज़ज सालिम -1]

उर्दू बह्र पर एक बातचीत :क़िस्त 30 [ बह्र-ए-हज़ज [ सालिम बह्र-1]

Discliamer clause -वही जो क़िस्त 1 में है 

फिछली क़िस्त में हमने बहर मुतक़ारिब और बहर मुतदारिक की सालिम , मुज़ाहिफ़ और इसकी  ’मुज़ाअफ़’  पर चर्चा कर चुके है । हालाँ कि उसके बाद भी  चर्चा की और भी गुंजाइश थी मगर ज़रूरी नहीं थी।
ये दोनो  बह्रें ’ख़म्मासी’ [5- हर्फ़ी] कहलाती है कारण कि इन की जो बुनियादी रुक्न ’फ़ऊलुन’ [122] और ’फ़ाइलुन’ [ 212] हैं वो 5- हर्फ़ी हैं यानी [ --फ़े--अलिफ़--ऐन--लाम--नून] से बनी है
अब हम बह्र-ए-हज़ज की चर्चा करेंगे । यह बह्र सुबाई बहर[7-हर्फ़ी] कहलाती है यानी इनके रिक्न में 7-हर्फ़ का वज़न होता है
इस बहर का बुनियादी रुक्न है --मुफ़ाईलुन [1 2 2 2] यानी [ --मीम --फ़े--अलिफ़---ऐन--ये--लाम ---नून]
यह बहर एक बतद [3 हर्फ़ी] और 2 सबब [2-हर्फ़ी] से मिलकर बना है

मुफ़ाईलुन [ 1222] = वतद+सबब+सबब
   = यानी वतद-ए-मज़्मुआ+ सबब-ए-ख़फ़ीफ़+सबब-ए-ख़फ़ीफ़
    मुफ़ा [1 2]                   + ई [2}                + लुन  [2]  
   =   1 2 2 2 = मुफ़ाईलुन

 आज हज़ज के सालिम बहर की चर्चा करेंगे । सालिम क्यों कहते है अब बताने की ज़रूरत नहीं है शायद। इस बहर में सिर्फ़  सालिम रुक्न  ’मुफ़ाईलुन’ का ही प्रयोग करेंगे कोई ज़िहाफ़ का प्रयोग नहीं करेंगे
[क] बहर-ए-हज़ज मुरब्ब: सालिम
मुफ़ाईलुन---मुफ़ाईलुन  [दो बार]
  1 2 2 2------1 2 2 2
यानी यह रुक्न अगर  किसी शे’र में 4-बार या मिसरा में 2-बार] प्रयुक्त हो तो उसे मुरब्ब: सालिम कहेंगे [ मुरब्ब: मानी ही 4-होता है]
एक ख़ुद साख़्ता [खुद की बनाई हुई] शे’र सुनाते हैं [पसन्द न आए कोई बात नहीं मयार भले न हों वज़न तो है ---हा हा हा ]

चले आओ मिरे दिल में
फ़ँसी है जान  मुश्किल में 

तक़्तीअ कर के देखते हैं
1  2   2  2  / 1  2  2  2 =1222--1222
चले आओ / मिरे दिल में
             1  2   2  2 / 1  2  2   2 =1222---1222
फ़ँसी है जा /न  मुश् किल में

 एक दूसरा शे’र भी सुन लें [कमाल अहमद सिद्दिक़ी साहब के हवाले से ]

कभी इक़रार की बाते
कभी इनकार की बातें
तक़्तीअ कर के देखते है
1 2   2   2   / 1  2  2  2 = 1222--1222
कभी इक़ रा /र की बाते
            1   2    2   2 / 1  2  2 2 =1222---1222
कभी इन का /र की बातें
जब तक अगली बहर पर जायें -एक खेल खलते हैं [ गुस्ताखी मुआफ़ी के तहत]
सिद्द्क़ी साहब के शे’र को आगे बढ़ाते हुए और अपने कलाम का पेबन्द लगाते हुए

कभी इक़रार की बातें
कभी इनकार की बातें

चले आओ मिरे दिल में 
नहीं कटती हैं अब रातें
[तक़्तीअ आप कर लीजियेगा] इसी तरह आप भी चन्द अश’आर [ क़ाफ़िया बरक़रार रखते हुए] जोड़ सकते हैं --मश्क़ [ प्रैक्टिस] भी हो जायेगी] ख़याल रखियेगा --- ’बातें ’ का क़फ़िया --गाते--- आते---जाते---खाते---नहीं होगा -कारण कि इन में हर्फ़ उल आखिर [आखिरी हर्फ़] में ;नून गुन्ना’ नहीं होगा।  सौगातें---मुलाक़ातें चलेगा। ख़ैर--
एक बात और--
मुरब्ब: बहर में सिर्फ़ सदर/इब्तिदा---अरूज़/जर्ब ही होता है। हस्व का मुक़ाम नहीं होता । होगा भी कैसे? एक मिसरा में 2-रुक्न है --तो जगह ही कहाँ बचा ’हस्व’ के लिए  ?

वैसे सालिम बहर में ग़ज़ल कहना आसान होता है - ज़िहाफ़ से मुक्त  होता है -- ज़िहाफ़ात की कोई झंझ्ट ही नहीं

[ख] बहर-ए-हज़ज मुसद्दस सालिम
    मुफ़ाईलुन----मुफ़ाईलुन----मुफ़ाईलुन
     1222--------1222---------1222
यानी एक मिसरा में 3-सालिम रुक्न या शे’र में 6-रुक्न] मुसद्दस मानी ही 6
[जनाब आरिफ़ हसन ख़ान साहब के हवाले से]

मआल-ए-इश्क़ ख़जलत के सिवा क्या है
कहो सब से न कोई दिल लगाये याँ

अब इसकी तक़्तीअ कर के देख लेते हैं
1  2  2   2 / 1     2    2    2  / 1 2  2   2   = 1222---1222---1222
मआले इश्/ क़  ख़ज लत के/ सिवा क्या है
1   2   2   2  / 1   2 2  2    / 1  2 2  2    = 1222----1222--1222
कहो सब से/  न को ई दिल /  लगाये याँ

इस बहर की ’मुज़ाअफ़’ शकल भी मुमकिन है। उदाहरण आप बताएं तो अच्छा होगा अभी तक मेरे ज़ेर-ए-नज़र गुज़रा नहीं । कभी कहीं मिलेगा तो यहाँ लगा देंगे।

[ग] बहर-ए-हज़ज मुसम्मन सालिम   यह वज़न  ही बहुत  मक़्बूल मानूस और मारूफ़ वज़न है  अमूमन हर शायर ने इस बहर में अपनी ग़ज़ल /अश’आर कहें है और कसरत [ प्राचुर्य, अधिकता से,बहुतायत ] से कहें हैं और कसरत से उदाहरण दस्तयाब [प्राप्य ] हैं
इसका वज़न है

    मुफ़ाईलुन----मुफ़ाईलुन----मुफ़ाईलुन---मुफ़ाईलुन
     1222--------1222---------1222-------1222
यानी सालिम रुक्न -मुफ़ाईलुन- मिसरा में 4-बार और शे’र मे 8-बार आता है । मुसम्मन मानी 8
अल्लामा इक़बाल की एक नज़्म है

जिन्हें मैं ढूँढता था आसमानों ज़मीनो में 
वो निकलें मेरे ज़ुल्मतखाना-ए-दिल के मक़ीनों में

ख़मोश ऎ दिल ! भरी महफ़िल में चिल्लाना नहीं अच्छा
अदब पहला क़रीना है मुहब्बत के क़रीनों  में

 एक शे’र की तक़्तीअ मैं कर देता हूँ ---एक की आप कर दें
1  2   2      2    / 1  2  2   2      / 1   2  2   2   / 1 2  2  2 =1222---1222---1222---1222 [यहाँ ख़मोश ए दिल --में ==ऐ - श के साथ वस्ल होकर ’शे’ का तलफ़्फ़ुज़ दे रहा है सो 2 का वज़न लिया
ख़मोश ऎ दिल /! भरी मह फ़िल /में चिल ला ना /न हीं अच् छा
1  2     2    2  / 1 2  2  2/ 1  2  2   2   / 1 2 2  2 = 1222---1222---1222---1222
अ दब पह ला /क़रीना है /मु हब बत के / क़रीनों  में

पहले शे’र की तक़्तीअ आप कर के मुतमय्यिन [निश्चिन्त] हो लें

अब एक मीर का एक शे’र लेते है

कभू ’मीर’ इस तरफ़ आकर जो छाती कूट जाता है
ख़ुदा शाहिद है , अपना तो  कलेजा टूट जाता  है

[ मीर -का यह ख़ास अन्दाज़ था -कभी-को -कभू -लिखना । वज़न में वैसे भी कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा]

इसकी तक़्तीअ भी कर के देख लेते है
1  2    2    2     / 1   2   2  2      / 1  2  2  2  / 1 2 2 2 = 1222----1222----1222----1222
कभू ’मीर’ इ स/  त रफ़ आ कर /जो छाती कू/ट जा ता है
1  2    2   2    / 1   2   2   2  / 1 2 2 2  / 1 2 2  2 =1222-----1222----1222---1222-
ख़ुदा शा हिद /है , अप ना तो / कलेजा टू /ट जा ता  है

[यहां ’मीर इस’ को 2 2 की वज़न पर क्यों लिया -एक खटका सा लगा होगा आप को। कारण कि मीर के ’र ’ के साथ सामने जो ’इस’ वस्ल हो कर    ---’मी रीस’-- का तलफ़्फ़ुज़ दे रहा है और यह 2- सबब है[सबब-ए-ख़फ़ीफ़ है]
यानी -कभू -12 -वतद-ए-मज़्मुआ -मुफ़ा [12] के वज़न पर
मी  [2]  सबब-ए-ख़फ़ीफ़ -ई-[2] के वज़न पर
रिस [2] सबब-ए-ख़फ़ीफ़ -लुन-[2] के वज़न पर

अब एक शे’र ग़ालिब का भी देख लेते हैं

न था कुछ तो ख़ुदा था ,कुछ न होता तो ख़ुदा होता
डुबोया मुझ को होने ने ,न होता मैं तो क्या  होता

हुई मुद्दत कि ’ग़ालिब’ मर गया पर याद आता है
वो इक हर बात पर कहना कि यों होता तो क्या होता

[यहाँ एक बात वाज़ेह [स्प्ष्ट] कर दें अगर आप मतला समझ गये होंगे  तो ज़िन्दगी के दर्शन भी समझ गए होंगे ।इस मतला का कोई सानी नहीं ,खुदा मग़फ़रत करें]

चलिए एक शे’र की तक़्तीअ मैं कर देता हूँ मतला की आप कर लें
1  2   2   2  / 1    2  2     2   / 1 2  2   2    / 12 2 2 = 1222---1222---1222---1222
हुई मुद् दत / कि ’ग़ालिब’ मर/ ग या पर या /द आता है
1   2    2   2   /  1 2   2  2   / 1   2   2  2 / 1 2    2 2 == 1222---1222---1222---1222
वो इक हर बा /त पर कहना  /कि यों होता /तो क्या होता
तो यह होते हैं मुस्तनद शो"अरा [प्रामाणिक और उस्ताद शायरों] के कलाम -- ऐब से पाक ,मयार में बुलन्द. तवाज़ुन में एक भी मज़ीद  ’हर्फ़’[ अतिरिक्त हर्फ़ ]की गुंजाईश  नहीं ----हमारे जैसे ग़रीब को तो बहुत और  बहुत कुछ सीखने के ज़रूरत है
उदाहरण तो बहुत है अज़ीम शो’अरा के है

अब चलते चलते एक शे’र इस हक़ीर का भी बर्दास्त कर ले[मेहरबानी होगी]

जो जागे हैं मगर जगते  नहीं उनको जगाना क्या
खुदी को ख़ुद जगाना है किसी के पास जाना क्या

इबारत है लिखी दीवार पर गर पढ़ सको ’आनन’
समझ जाओ इशारा क्या ,नताइज़ को बताना क्या

पहले शे’र की तक़्तीअ कर के देखते हैं--मतला की आप कर लें-आसान है
1   2  2  2/  1 2  2  2    / 1  2  2    2  / 1 2 2 2 =1222--1222--1222--1222
जो जागे हैं / म गर जगते  /नहीं उनको /जगाना क्या
1  2    2    2  / 1 2  2 2 / 12 2   2    / 1 2 2 2 =1222---1222----1222--1222
खुदी को ख़ुद/ जगाना है /किसी के पा /स जाना क्या

चलते चलते एक खूब सूरत दिलकश गाना सुनाते है --आप ने सुना भी होगा --यू ट्यूब- पर उपलब्ध है गीतकार राजेन्द्र कृष्ण जी है
फ़िल्म ’शहनाई’ [1964] का है जिसको  विश्व जीत और राजश्री पर फ़िल्माया गया है ।लिन्क नीचे लगा दिया हूँ आप भी सुने
https://www.youtube.com/watch?v=W_YckCpQAoY
गाने की इबारत लिख रहा हूँ

न झटको जुल्फ़ से पानी ,ये मोती फूट जायेंगे
तुम्हारा कुछ न बिगड़ेगा ,मगर दिल टूट जायेंगे

ये भींगी रात ये भींगा बदन ये हुस्न का आलम
ये सब अन्दाज़ मिल कर दो जहाँ को लूट जायेंगे

हमारी जान ले लेगा ,ये नीली आँख का जादू
चलो अच्छा हुआ मर कर जहाँ से छूट जायेंगे

ये नाज़ुक लब है या आपस में दो लिपटी हुई कलियाँ
ज़रा इनको अलग कर दो तरन्नुम फूट जायेंगे  
   
अब 1-2 शे’र की तक़्तीअ कर के देखते है बाक़ी का आप कर के तस्दीक कर लें
  1  2   2   2   / 1  2  2  2  / 1  2  2  2/ 1  2 2 2 1222-1222-1222-1222
न झटको जुल् /फ़ से पानी / ,ये मोती फू /ट जायेंगे
1   2  2   2   / 1  2   2   2  /  1 2    2    2  / 1  2 2 2 1222--1222-1222-1222
तुम्हारा कुछ / न बिग ड़े गा ,/ म गर दिल टू /ट जायेंगे
1    2  2 2 /1 2 2  2   / 1 2  2  2    / 1 2   2  2 1222-1222-1222-1222
ये भींगी रा/ त ये भींगा  /बदन ये हुस् / न का आलम
1   2    2    2   / 1  2     2   2   / 1  2  2  2  /1  2 2 2 1222-1222-1222-1222
ये सब अन् दा / ज  मिल कर दो /जहाँ को लू /ट जायेंगे

अरे ! यह तो बह्र-ए-हज़ज मुसम्मन सालिम की बहर आ गई। तो क्या यह गाना हज़ज मुसम्मन सालिम में लिखा गया है } जी हां

गाना लिख कर उदाहरण देने का मेरा मक़सद यही रहता है कि आप बहर/वज़न की ताक़त को पहचाने,  कितनी तर्न्नुम होती हैं ये बह्रें ,,,,कितनी दिल कश मौसिकी [संगीत] लय तान धुन सुर आरोह अवरोह से बाँधी जा सकती हैं ये ग़ज़लें । पुरानी पीढ़ी के गीतकार .शायर कितना पास [ख़याल] रखते थे अपनी शायरी में । ऊपर के शे’र मे एक भी हर्फ़ न ज़्यादा हुआ न कम हुआ-क्या ग़ज़ल कही है हर वज़न हर शे’र अपनी जगह मुकम्मल । यही कारण है कि ग़ज़ल लिखना आसान भले हो कहना आसान नहीं
आज के फ़िल्मी गीतों की क्या बात करे ---चार बोतल वोडका---काम है मेरा रोज़ का---हो गया गाना । अल्ला अल्ला ख़ैर सल्ला--भगवान ही मालिक है।
एक बात और
एक बात मेरे ज़ेहन में आ रही है ,आप के ज़ेहन में भी आ रही होगी?
 मुतक़ारिब और मुतदारिक के केस में  मुज़ाअफ़ [ 16-रुक्नी] बहर का ज़िक़्र किया था मगर अरूज़ की किताबों में बहर-ए-हज़ज मुसम्मन सालिम मुज़ाअफ़ का कहीं ज़िक़्र नही देखा और न कोई मिसाल [उदाहरण] ही देखी? न जाने क्यों ? पता नही? इस सवाल का जवाब तो कोई मुस्तनद व मारूफ़ अरूज़ी [प्रमाणित व प्रतिष्ठित ] ही दे सकते हैं आप में से भी शायद कोई दे सकता है। मैं तो नहीं दे सकता ,मेरी  बिसात कहाँ ।

हाँ लाल बुझक्कड़ की तरह कुछ बूझ सकता हूं सही भी हो सकता है ग़लत भी हो सकता है कॄपा कर के इसको प्रमाणिक नहीं मानियेगा } मैं तो ऐसे ही सोच रहा हूँ

मुतक़ारिब या मुतदारिक बहरें ख़म्मसी बहरें [5-हर्फ़ी]बहरें थी अगर इनकी ’मुसम्मन मुज़ाअ’फ़ बहर बनती है
तो  कुल मात्रा  122----122------------------122-  =   5 गुना 8 =40 हर्फ़
या 212---212-------------------------------212-=   5 गुना 8 = 40 हर्फ़

मगर जब सुबाई बह्रे [हज़ज------रमल----रजज़ ] की मुसम्मन मुज़ाअफ़ बनेगी तो क्या होगा  =56 हर्फ़ आ जायेंगे
इतनी लम्बी बहर क्या मौसिकी [संगीत] सपोर्ट कर पायेगी या नहीं ? मालूम नहीं?
मगर हाँ --जिस गज़ल को संगीत बद्ध या लय पूर्ण गाया न जा सके तो फिर वो ग़ज़ल क्या है । ’दाग़’ की ग़ज़लें कोठेवालियाँ यूँ ही तो नहीं गाती थी !

प की टिप्पणी का इन्तज़ार रहेगा

अब अगले क़िस्त में बहर-ए-हज़ज के मुज़ाहिफ़ बह्रों पे चर्चा करेंगे 
अस्तु
--इस मंच पर और भी कई साहिब-ए-आलिम मौज़ूद हैं उनसे मेरी दस्तबस्ता [ हाथ जोड़ कर] गुज़ारिश है कि अगर कहीं कोई ग़लत बयानी या ग़लत ख़यालबन्दी  हो गई हो तो निशान्दिही ज़रूर फ़र्मायें ताकि मैं ख़ुद को  दुरुस्त कर सकूं ।बा करम मेरी मज़ीद [अतिरिक्त] रहनुमाई फ़र्माये ।मम्नून-ओ-शुक्रगुज़ार रहूँगा।

अभी नस्र के कुछ बयां और भी हैं..........
ज़िहाफ़ात् के कुछ निशां और भी हैं.....

एक बात बड़े ही अदब से एतराफ़ [स्वीकार] करता हूँ कि इन तमाम अक़्सात ,तज़्क़िरात  और तहरीर के लिए अपने आलिम अरूज़ी साहिबान  कमाल अहमद सिद्द्क़ी साहब , डा0 शम्सुर्र्हमान फ़ारुक़ी साहब ,आलिम जनाब  सरवर आलम राज़ ’सरवर ’ साहब  , अजीज  दोस्त डा0 आरिफ़ हसन ख़ान साहब  का तह-ए-दिल  से मम्नून-ओ-शुक्र गुज़ार हूँ जिनकी किताबों से  कुछ पढ़ सका ,समझ सका और लिख सका ।वगरना इस हक़ीर इतनी  बिसात कहाँ  इतनी औक़ात कहां । इन तज़्क़िरात में  मेरा कुछ भी अपना नहीं है बस  आलिम साहिबान  के अरूज़ पर किए गए कामों का हिन्दी तर्जुमा समझिए........

[नोट् :- पिछले अक़सात  [क़िस्तों ]के आलेख [ मज़ामीन ]आप मेरे ब्लाग पर  भी देख सकते हैं 

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-आनन्द.पाठक-
0880092 7181

शनिवार, 15 अप्रैल 2017

मतदाताओं में ख़राबी है.
मुकंदी लाल जी को हम ने लाख समझाया पर इस बार उन्होंने हमारी एक न सुनी.
‘इस बार हम आपकी एक न सुनेंगे. हर बार हम अपना मन पक्का करते हैं और हर बार आप हमारा विश्वास डगमगा देते हैं. इस बार हम अवश्य ही मुनिसिपलिटी का चुनाव लड़ेंगे. कोई पार्टी हमें टिकट दे या न दे, हमारा निर्णय न बदलेगा. हम चुनाव में खड़े होंगे, चाहे निर्दलीय ही खड़े हों. आप समझ नहीं रहे, अगर आप-हम जैसे अच्छे लोग राजनीति में आयेंगे नहीं  तो राजनीति बदलेगी कैसे?’
उनकी बात सुन मन में गुदगुदी सी हुई. अनचाहे ही पर अपने साथ वह हमें भी अच्छा कह रहे थे.
‘मुकंदी लाल जी, कितने ही लोग पहले से राजनीति को बदलने में अपना सब कुछ दांव पार लगा कर बैठे हैं. अब आप भी राजनीति बदलने के अभियान में जुट जायेंगे तो राजनीति बेचारी तो पूरी तरह त्रस्त हो जायेगी. राजनीति पर इतना अत्याचार न करें. साठ वर्षों से हमारे राजनेता राजनीति की........’
‘आप जितना भी व्यंग्य करना चाहें करें पर हम अब रुकने वाले नहीं.’
और मुकंदी लाल जी नहीं रुके. किसी पार्टी से टिकट तो मिलना था नहीं, निर्दलीय के रूप में ही उन्होंने पर्चा भर दिया और चुनाव अभियान में कूद पड़े. घर-घर जाकर मतदाताओं के सामने उन्होंने अपने विचार रखे, राजनीति को बदलने का अपना निश्चय बताया. सबने सहयोग का विश्वास दिलाया.
“हमारा विश्वास करें. अभी तक सब राजनेताओं ने आपको ठगा है. हम आपको ठगने के विचार से राजनीति में नहीं आये हैं. इस देश के लिए, इस समाज के लिए कुछ करने का निश्चय किया है. इस राजनीति को बदल देंगे. चुनाव समाप्त होते ही सब राजनेता लोगों को भुला बैठते हैं. सब के सब सत्ता के पीछे दौड़ पड़ते हैं, अपने परिवार को राजनीति में लाने के प्रयास में लगे रहते हैं. हम ऐसा नहीं करेंगे. हमारे परिवार को कोई भी सदस्य हमारे आसपास भी न दिखेगा.” ऐसी ही कई बातें  मुकंदी लाल जी ने लोगों से कही.
चुनाव के बाद उन्हें पूरा विश्वास था कि वह जीत जायेंगे, ‘लोगों का उत्साह देखते ही बनता था. मुझे तो लगता है कि अन्य सभी उम्मीदवारों की ज़मानत ज़ब्त हो जाएगी. जीत पक्की है. अच्छा किया जो आपकी बातों में न आया और इस बार चुनाव में खड़ा हो ही गया. अब इस समाज को बदल कर रख दूंगा.’
यह डायलाग उन्होंने ऐसे कहा जैसे कह रहे हों, ‘पाप को जला कर राख कर दूंगा.’
चुनाव का नतीजा आया. मुकंदी लाल जी को कुल उन्नीस वोट मिले थे. जीतने वाले उम्मीदवार को चालीस हज़ार से अधिक वोट मिले थे. जो व्यक्ति दसवें स्थान पर आया था उसे एक सौ बीस मत मिले थे. मुकंदी लाल जी को सब से कम मत मिले थे.
‘क्या लगता है आपको, क्या मशीन में कोई गड़बड़ थी? आपके जानने- पहचानने वालों की संख्या ही पचास से ऊपर होगी. कम से कम पचास मत तो मिलने ही चाहिए थे?’  
‘नहीं भाई साहिब, मशीन में कोई गड़बड़ नहीं थी. मशीन में क्या खराबी होगी.  मुझे लगता है मतदाताओं में ही खराबी है, जानते हैं जो व्यक्ति चुनाव जीता है उसने पांचवीं बार पार्टी बदली है. हम नई राजनीति की बात कर रहे थे और लोग दल-बद्लूओं को वोट दे रहे थे. सुना है जितने लोग जीते हैं उन में से कईयों के विरुद्ध अपराधिक मामले भी चल रहे हैं. मशीन बेचारी क्या करे, जब मतदाता ही ऐसे लोगों को वोट दे देते हैं.’
‘पर दूसरी पार्टियों के नेता तो मशीन को ही दोष दे रहे हैं.’
‘मशीन उनकी बात का जवाब नहीं दे सकती इसलिए मशीन पर दोष लगाना सरल है. अपने को कोई दोषी मानता नहीं. एक-दूसरे को हार का दोषी ठहराएंगे तो आपस में ही कहा-सुनी हो सकती है.’
‘पर आप भी तो मतदाताओं को दोषी ठहरा रहे हैं?’
‘तो क्या गलत कर रहे हैं?’
हम चुप हो गए, मतदाता की भूमिका को नकारा तो नहीं जा सकता. आज की राजनीति के लिए क्या सिर्फ राजनेता ही दोषी हैं, यह प्रश्न हमारे समक्ष भी खड़ा हो गया.


  

शनिवार, 8 अप्रैल 2017

चन्द माहिया : क़िस्त 36

चन्द माहिया : क़िस्त 36

:1:
दुनिया को दिखाना क्या !
दिल से नहीं मिलना
फिर हाथ मिलाना क्या !

:2:
कुछ तुम को ख़बर भी है
मेरे भी दिल में
इक ज़ौक़-ए-नज़र भी है

:3:
गुरबत में हो जब दिल
दर्द अलग अपना
कहना भी है मुश्किल

:4;
जितनी  भी हो अनबन
तुम पे भरोसा है
रूठो न कभी , जानम !

:5:
मेरी भी तो सुन लेते
मैं जो ग़लत होती
फिर जो भी सज़ा देते

शब्दार्थ :
ज़ौक़-ए-नज़र = रसानुभूति वाली दॄष्टि
गुरबत   में        = विदेश में


-आनन्द.पाठक-
08800927181

मंगलवार, 28 मार्च 2017

चन्द माहिया : क़िस्त 35

चन्द माहिया : क़िस्त 35

:1:

सजदे में पड़े हैं हम
लेकिन जाने क्यूँ 
दिल है दरहम बरहम

;2;

जब से है तुम्हें देखा
दिल ने कब मानी
कोई लक्ष्मन  रेखा

:3:

क्या बात हुई ऐसी
तेरे दिल में अब
चाहत न रही वैसी

:4:
समझो न कि पानी है 
क़तरा आँसू का
ख़ुद एक कहानी है

:5:

वो शाम सुहानी है
जिसमें है शामिल
कुछ याद पुरानी है

शब्दार्थ   दरहम बरहम = तितर बितर ,अस्त व्यस्त ,व्यथित

-आनन्द.पाठक-
08800927181

बुधवार, 15 मार्च 2017

बीजेपी को मीडिया का आभार व्यक्त करना चाहिए?
जब हम किसी विशाल पेड़ को देखते हैं तब हमें यह समझ लेना चाहिये कि उस पेड़ का बीज वर्षों पहले किसी ने बोया होगा. किसी विशाल नदी को देख कर जान लेना चाहिए की धारा का स्रोत कहीं दूर, बहुत दूर होगा.
ऐसा ही मानव समाज में होता है. जो घटनाएं आज घट रही हैं उनके बीज वर्षों पहले ही किसी न किसी ने बोये होते हैं. जिस रूप में हम किसी को आज देखते हैं वैसा रूप वह एक दिन में नहीं पा लेता. कई लोग और  कई घटनाएं उसके जीवन की धारा को प्रभावित करती  हैं.
जिस मुकाम पर आज मोदी जी पहुंचें हैं वहां तक पहुचने के लिए उन्होंने एक लम्बी यात्रा की है. उस यात्रा में कई महत्वपूर्ण पड़ाव रहे होंगे. कई बातों ने, कई घटनाओं ने, कई लोगों ने उन्हें उत्साहित किया होगा या उन्हें चुनौती दी होगी. इन सब चुनौतियों को पार कर आज वह एक जुझारू नेता के रूप में हम सब के समक्ष हैं.
एक मायने में मोदी जी के लिए सबसे बड़ी चुनौती तो मीडिया और बुद्धजीवी वर्ग ही रहा है. यहाँ एक बात समझ लेनी होगी कि मीडिया के लिये बुद्धिजीवी वही हैं जो पूरे या आधा-अधूरे  वामपंथी हैं. अन्य बुद्धिजीवी किसी गिनती में नहीं आते.
गुजरात दंगो के बाद लगभग सारे मीडिया ने मोदी जी को  पूर्णरूप से दोषी करार दे दिया था. वर्षों तक उनके विरुद्ध लगाये गए हर आरोप को मीडिया ने जिस तरह बहस का मुद्दा बनाये रखा  ऐसा शायद ही कभी हुआ था. आज भी मीडिया और बुद्धिजीवियों के रुख में कोई खास परिवर्तन नहीं आया. अभी कल ही किसी चैनल पर कोई कह रहे थे कि मोदी जी कभी भी ‘हिन्दुस्तान’ शब्द का प्रयोग नहीं करते, अपने देश को या तो भारत कहते हैं या इंडिया.
इतनी बारीकी से किसी और नेता का बातों का विश्लेषण आपने किसी चैनल या किसी समाचार पत्र में होते हुए क्या देखा है? ऐसी कृपा सिर्फ मोदी जी पर होती है.
उत्तर प्रदेश में बीजेपी  को इतनी भारी सफलता मिली. पर क्या चुनावों के पहले या चुनावों के दौरान किसी चैनल या किसी समाचार पत्र में आपने देखा या पढ़ा कि उत्तर प्रदेश में बदलाव की लहर उठ रही है? मीडिया कि इस चुप्पी के दो ही कारण हो सकते हैं. एक, मीडिया के लोग न अधिक मेहनत करते हैं, न उनमें उतनी समझ जितने उनसे अपेक्षित है. (कई वर्ष पहले मुझे किसी ने बताया था कि जो लोग कश्मीर में हो रही घटनाओं पर रिपोर्टिंग करते है वह सब दिल्ली से श्रीनगर आ तो जाते हैं पर रेजीडेंसी रोड पर स्थित एक होटल से बाहर कभी नहीं जाते. उसी होटल में स्थापित हो घाटी में हो रही घटनाओं पर अपनी रिपोर्ट लिख देते हैं).  दो, मीडिया ने तय कर रखा है कि मोदी जी की हर उपलब्धि को जितना घटा कर बता सकते हैं उतना घटा कर ही बताएँगे.
पर इन सारी चुनौतियों ने मोदी जी को शक्तिवान ही बनाया है. जिस संकल्प से मोदी जी ने चुनावों में प्रचार किया वह अविश्वसनीय था. मीडिया चाहे कितना भी नकारे, आज परिणाम सबके सामने है. मीडिया और बुद्धिजीवी वर्ग को गलत साबित कर मोदी जी देश की राजनीति में एक नया मोड़ लाने में सफल हुए हैं.

ऐसे में  बीजेपी को मोदी जी के प्रति तो अपना आभार व्यक्त करना ही चाहिये परन्तु अच्छा होगा अगर बीजेपी के लोग मीडिया और बुद्धिजीवियों के प्रति भी अपना आभार व्यक्त करें.  

रविवार, 12 मार्च 2017

होली पर एक गीत : इस बार होली में ....

मंच के सभी सदस्यों /मित्रों को इस अकिंचन का होली की बहुत बहुत शुभकामनायें ---इस गीत के साथ


लगा दो प्रीति का चन्दन मुझे इस बार होली में 
महक जाए ये कोरा तन-बदन इस बार होली में 

ये बन्धन प्यार का है जो कभी तोड़े से ना टूटे
भले ही प्राण छूटे पर न रंगत प्यार की  छूटे
अकेले मन नहीं लगता प्रतीक्षारत खड़ा हूँ मैं
प्रिये ! अब मान भी जाओ हुई मुद्दत तुम्हे रूठे

कि स्वागत में सजा रखे  हैं बन्दनवार होली में 
जो आ जाओ महक जाए बदन इस बार होली में

सजाई हैं रंगोली  इन्द्रधनुषी रंग भर भर कर
मैं सँवरी हूँ तुम्हारी चाहतों को ध्यान में रख कर
कभी ना रंग फ़ीका हो सजी यूँ ही रहूँ हरदम
समय के साथ ना धुल जाए यही लगता हमेशा डर

निवेदन प्रणय का कर लो अगर स्वीकार होली में
महक जाए ये कोरा तन-बदन इस बार  होली  में

ये फागुन की हवाएं है जो छेड़ीं प्यार का सरगम
गुलाबी हो गया  है  मन ,शराबी  हो गया  मौसम
नशा ऐसा चढ़ा होली का ख़ुद से बेख़बर हूँ  मैं
कि अपने रंग में रँग लो मुझे भी ऎ मेरे ,हमदम !

मुझे दे दो जो अपने प्यार का उपहार होली में 
महक जाए ये कोरा तन-बदन इस बार होली में

-आनन्द,पाठक-
08800927181


मंगलवार, 7 मार्च 2017

"बिखरीं पड़ीं हैं"


                                                   "बिखरीं पड़ीं हैं"    
"बिखरीं पड़ीं हैं"


संवेदनाओं के शब्द भारित 
नेत्र में टिकतें नहीं हैं
आसमां के स्वप्न रंजित 
धूल में बिखरें पड़ें हैं,

विश्वास की पराकाष्ठा हो चली 
निराशा  दिखतें मुझको नहीं हैं 
फिर ये कैसी कलुषित भावना 
मन को यूँ ,घेरे हुयें  हैं,

उड़ने की हर पल मैं सोचूँ  
पंखों में साहस भरें हैं 
अम्बर में छाई है,बदली 
घेरे हुए क्यूँ ! जो मुझे हैं,

ऊँचा उड़ता जो कभी मैं 
पंखों के ताकत के बूते 
कड़ियाँ माया की बँधीं हैं 
पावों में जंजीरें पड़ीं हैं,

बस मैं चाहूँ पार जाना 
स्वप्नों से ना हार जाना 
अपनों ने घायल किया है,

उम्मीदें नईं धूमिल हुईं हैं 
धूल में बिखरीं पड़ीं हैं......... 



 ध्रुव सिंह  "एकलव्य"  
 "एकलव्य की प्यारी रचनायें" एक ह्रदयस्पर्शी हिंदी कविताओं एवं विचारों का संग्रह
 





उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 26 [बह्र-ए-मुतदारिक-1]

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 26 [बह्र-ए-मुतदारिक-1]

Discliamer clause -वही जो क़िस्त 1 में है 


बह्र-ए-मुतदारिक का बुनियादी रुक्न है -’फ़ा इलुन’ [ 2 12 ] =सबब-ए-ख़फ़ीफ़ [2 ]+वतद-ए-मज़्मुआ [1 2]

बहर-ए-मुतदारिक की सालिम बह्रें

1-बह्र-ए-मुतदारिक मुरब्ब: सालिम  [212 -212] 
फ़ाइलुन---फ़ाइलुन   [मिसरा में दो बार यानी  शे’र  में चार बार ]
बहुत छोटी बहर होने के कारण इस बहर में बहुत कम अश’आर कहे गये हैं , छोटे बहर में  मयार के ग़ज़ल/शे’र कहना बहुत मुश्किल काम होता है । फिर समझाने के लिए एक उदाहरण लेता हूँ

 ऎ   मेरे   हम नशीं 
चल कहीं और चल

इसकी तक़्तीअ कर के देखते है
 2 1 2       /   2  1 2    =212---212
ऎ मिरे       / हम नशीं
2    1   2  /  2 1  2    =212---212
चल कहीं / औ र चल

 दो मिसरा और सुने
 ढूँढते ढूँढते मैं
कहाँ आ गया
अब इसकी तक़्तीअ कर के देखते हैं

212 /212 =212---212
ढूँढते   ढूँढते
2 1 2   /  212 = 212-212
मैं कहां /आ गया

शे’र  मे अरूज़ और जर्ब के मुक़ाम पर ’ फ़ाइलान ’ यानी  2121 भी लाया जा सकता है
इस बात की चर्चा आगे करेंगे जब मुतदारिक बह्र पर ज़िहाफ़ात की चर्चा करेंगे

2- बह्र-ए-मुतदारिक मुसद्दस सालिम  [212-212--212] 
  फ़ाइलुन--फ़ाइलुन--फ़ाइलुन  [मिसरा में 3-बार और शे/र में 6-बार ]

उदाहरण -कमाल अहमद सिद्दिक़ी साहब के हवाले से

जब नज़र से नज़र मिल गई 
 दिल की गोया कली खिल गई

इसकी तक़्तीअ कर के देखते हैं
2    1  2   / 2  1  2   / 2  1  2 =212---212---212
जब नज़र / से नज़र  /मिल गई
2       1    2  / 2 1  2   /2   1  2 =212---212---212
 दिल कि गो / या कली / खिल गई

इस हक़ीर फ़क़ीर का भी इसी बहर में एक -दो ग़ैर मयारी शे’र बर्दाश्त कर लें ,गर नागवार न गुज़रे तो

मुठ्ठियां इन्क़लाबी रही
पाँव लेकिन फ़िसलता गया

जिससे ’आनन’ को उम्मीद थी
वो भरोसे  को छलता  गया

 बात स्पष्ट करने के लिए -एक शे’र की तक़्तीअ कर रहा हूँ
2    1   2   / 2  1    2/  2  1 2   =  212---212---212
मुठ् ठि या / इन क ला /बी रही
2  1  2 / 2     1    2     / 2 1 2  =   212---212--212
पाँ व ले/ किन फ़ि सल  /ता गया

एक शे’र और मुलाहिज़ा फ़र्माएं

अब तो उठिए  बहुत सो लिए
खिड़कियाँ तो ज़रा खोलिए

 जो मिला प्यार से हम मिले
बाद उस के ही हम हो लिए 

एक शे’र की तक़्तीअ कर रहा हूं~
 2     1    2 / 2 1   2   /  2 1 2 =212---212---212
अब त उठि/ ए  ब हुत / सो लिए
2      1   2  / 2   1 2  /  2 1 2 =212---212---212
खिड़ कि याँ /तो ज़रा   /खोलिए

शे’र  मे अरूज़ और जर्ब के मुक़ाम पर ’ फ़ाइलान ’ यानी  2121 भी लाया जा सकता है
इस बात की चर्चा आगे करेंगे जब मुतदारिक बह्र पर ज़िहाफ़ात की चर्चा करेंगे

दूसरे शे’र की तक़्तीअ आप खुद कर  मुतमुईन [निश्चिन्त] हो जाये
ख्याल रहे बहर की माँग के मुताबिक --के--से--है--तो--को---पर मात्रा गिराई जा सकती है

इस बहर की मुज़ाइफ़ शकल  भी हो सकती है यानी  बह्र-ए-मुतदारिक मुसद्दस सालिम मुज़ाइफ़  [ 212--212---212--212---212----212-] यानी एक मिसरा मे 6-रुक्न और शे’र मे 12 रुक्न]

3- बह्र-ए-मुतदारिक मुसम्मन सालिम [ 212--212--212---212 ]
फ़ाइलुन---फ़ाइलुन---फ़ाइलुन---फ़ाइलुन 

हम पहले भी कह चुके हैं कि ये दोनो बह्र .मुतक़ारिब और मुतदारिक जिन्हे 5-हर्फ़ी [ख़म्मासी ] रुक्न कहते है उर्दू शायरी में हिन्दी से बाद में आई [यानी रमल,रज़ज,हजज़,कामिल वाफ़िर-7-रुक्नी वज़न जिसे सुबाई रुक्न भी कहते है के बाद]
और इन दोनो में  भी मुतदारिक पहले आया  जब कि मुतक़ारिब वज़न बाद में आया । शायद इसका कारण ये हो कि हिन्दी गीतों में यह छन्द  संस्कॄत में [फिर बाद में हिन्दी में] उर्दू रुक्न से बहुत पहले से प्रचलन  में था। याद करे
हिन्दी छन्द शास्त्र में दशाक्षरी सूत्र -यमाताराजभानसलगा -[यगण--मगण--तगण--रगण---] पहले से था

यगण= यमाता = 1 2 2 = फ़ऊलुन
यमाता--यमाता--यमाता--यमाता
122--122----122----122
यगण----यगण---यगण----यगण

फ़ऊलुन--फ़ऊलुन--फ़ऊलुन--फ़ऊलुन = बहर-ए-मुतक़ारिब मुसम्मन का वज़न है

और यही बात
रगण  = राजभा = 212 = फ़ाइलुन
राजभा--राजभा---राजभा---राजभा
रगण---रगण---रगण--रगण
212---212---212---212--
फ़ाइलुन---फ़ाइलुन--फ़ाइलुन--फ़ाइलुन = बहर-ए-मुतदारिक मुसम्मन सालिम है

इसी तरह इसी दशाक्षरी सूत्र से हम बहर-ए-मुतदारिक मुसद्दस सालिम या मुरब्ब: सालिम भी परिभाषित कर सकते है जैसे

रगण---रगण--रगण
राजभा----राजभा---राजभा
212-------212------212-
इन दोनो में फ़र्क़ यही है कि एक ’मात्रिक छन्द’ पर आधारित है जब कि दूसरा ’वार्णिक छन्द’ पर आधारित है
उर्दू शायरी में तक़्तीअ ’तलफ़्फ़ुज़’ [उच्चारण] के आधार पर चलती है  यानी " मल्फ़ूज़ी ग़ैर मक़्तूबी ’[यानी उच्चारण में तो आये पर लिखने में न आये ] पर आधारित है ,न कि मक़्तूबी ग़ैर मल्फ़ूज़ी’ [यानी लिखने में लिखा तो जाये पर उच्चारण मे न आए ]
इन दोनो पर चर्चा कभी बाद में करेंगे

आ0 कवि कुँवर जी ’बेचैन’ जी ने अपनी किताब -ग़ज़ल का व्याकरण ’-में और हमारे कुछ  फ़ेसबुक के मित्र  इस दिशा में कार्य कर रहे हैं  और ग़ज़ल को गीतिका का नाम भी दिया है कि उर्दू की बहर और हिन्दी के छन्द को एक प्लेट फ़ार्म पर लाया जा सके
खैर हम यहाँ  अपनी बातचीत उर्दू के रुक्न तक ही महदूद [सीमित] रखेंगे

हम पहले भी कह चुके हैं कि यह दोनो बहूर [ मुतक़ारिब और मुतदारिक] बड़ी ही मानूस /लोकप्रिय बह्र है और उसमें भी ’मुसम्मन’ और मुसम्मन मुज़ाइफ़’ का तो जवाब ही नहीं \दौर-ए-क़दीम [पुराने समय ]का तो नहीं मालूम ,मगर दौर-ए-हाज़िर [वर्तमान काल ]
के अमूमन सभी शो;अरा  ने इस बहर में शायरी की है
बह्र-ए मुतदारिक मुसम्मन के चन्द उदाहरण पेश करते है

आज फिर से मुहब्बत की बातें करो
दिल है तनहा  रफ़ाकत की बाते करो

बाद मुद्दत के आए हो ’आनन’ के घर
पास बैठो न रुख़सत  की बाते करो

एक शे’र की तक़्तीअ कर के दिखा रहा हूँ
 2  1    2    /  2  1  2  / 2   1  2   / 2 1 2  = 212---212---212----212
आज फिर / से  मु ह्ब /बत क बा /तें क रो
2     1    2  /  2  1 2 / 2  1     2  / 2 1 2   =2 12---212---212---212
दिल है तन/ हा  र फ़ा/कत क बा /ते क रो

एक दूसरा उदाहरण लेते है -फ़ना कानपुरी साहब  का एक शे’र है

इन बुतों की मुहब्बत भी क्या चीज़ है
दिल्लगी दिल्लगी  में ख़ुदा  मिल गया

इसकी तक़्तीअ पेश करते है
2   1    2  /   2  1  2  / 2   1  2    /  2 1 2  =  212---212---212---212
इन बु तों /  की मु ह्ब /बत भी क्या /ची ज़ है
 2    1   2  /  2   1   2   / 2  1 2  / 2   1  2 =   212---212---212---212
दिल ल गी / दिल ल गी  /में ख़ु दा / मिल ग या

एक बात और
शे’र  मे अरूज़ और जर्ब के मुक़ाम पर ’ फ़ाइलान ’ यानी  2121 भी लाया जा सकता है
इस बात की चर्चा आगे करेंगे जब मुतदारिक बह्र पर ज़िहाफ़ात की चर्चा करेंगे

  212--212--2121
फ़ाइलुन---फ़ाइलुन--फ़ाइलान

 जाँ निसार अख्तर साहब का एक शे’र मुलाहिज़ा फ़र्माएं

और क्या है सियासत के बाज़ार में
कुछ खिलौने सजे हैं दुकानों के बीच

अब इस की तक़्तीअ देखते है
   2 1  2   / 2 1  2  / 2   1   2  / 2 1 2     = 212---212---212---212
औ र क्या /है सि या/ सत क बा /ज़ा र में
  2    1   2   / 2 1 2  / 2 1  2 / 2 1  2 1  = 212---212---212---2121
कुछ खि लौ/ने स जे /हैं दु का /नों के बीच

मुसम्मन सालिम  का मुज़ाइफ़ वज़न भी होता है

4- बह्र-ए-मुतदारिक मुसम्मन सालिम मुज़ाइफ़ [ 212--212--212--212---212---212--212--212 ] इसे 16-रुक्नी बहर भी कहते है
फ़ाइलुन---फ़ाइलुन----फ़ाइलुन---फ़ाइलुन---फ़ाइलुन---फ़ाइलुन----फ़ाइलुन---फ़ाइलुन
[यानी एक मिसरा में 8-रुक्न और पूरे शे’र मे 16-रुक्न ]

सरवर आलम राज़ ’सरवर’ के हवाले से राज़ इलाहाबादी का एक शे’र पेश करता हूँ

आशियाँ जल गया गुलिस्ताँ लुट गया ,हम क़फ़स से निकल कर किधर जायेंगे
इतने मानूस सैय्याद से हो गए  , अब रिहाई मिली भी तो  मर जायेंगे

[मानूस = परिचित]
अब इसकी तक्तीअ कर के देख लेते है कि यह शे’र कहाँ तक वज़न में या बह्र में है
 2 1    2   / 2   1   2 / 2    1   2  ’  2   1  2 / 2   1   2     / 2  1  2    / 2   1    2   / 2  1 2      =  212---212---212---212---212---212--212---212
आ शि याँ /जल ग या /गुल सि ताँ  /लुट ग या /,हम क़ फ़स /से नि कल /कर कि धर /जा ये गे
2     1  2  / 2 1 2/ 2 1 2 /  2  1 2 /   2  1    2  / 2 1 2/   2  1   2   /  2 1 2    =    212---212--212----212---212---212--212--212
इत ने मा/नू स सै/या  द से / हो ग ए  /, अब रि हा/ई मि ली /भी तो  मर/ जायेंगे

16-रुक्नी बहर के बारे में एक बात ध्यान देने की है कि मिसरा में हर चार रुक्न के बाद एक ’ठहराव’ होना ज़रूरी है जिसे अरूज़ की भाषा में ’अरूज़ी वक़्फ़ा’ कहते हैं हिन्दी में इसे आप ’मध्यान्तर ’ कह सकते हैं।कारण कि उर्दू शायरी का मिजाज़ ही ऐसा है इसका मतलब यह हुआ कि आप को जो बात कहनी है वह वक़्फ़ा के पहले हिस्से में [पूर्वार्ध मे] कह लीजिये और दूसरी बात वक़्फ़ा के दूसरे हिस्से [यानी उत्तरार्ध में] कहिए। यानी ये नही होगा कि आप की बात ”चौथे और पाँचवे’ रुक्न मिलाकर पूरी हो या
spill over हो जाये ।यदि ऐसा है तो बहर  ’शिकस्ता’ कहलायेगी और अगर ऐसा नहीं है तो बहर ’शिकस्ता ना-रवा’ कहलायेगी

इस क़िस्त मे हमने बहर-ए-मुतदारिक की सालिम वज़न और उनकी मुरब्ब: ,मुसद्दस मुसम्मन और मुज़ाइफ़ शकल पर चर्चा की है । आप को अगर मुरब्ब: की और मिसाल कहीं से दस्तयाब [प्राप्य] हो तो इस राक़िम उल हरूफ़ [लेखक] को ज़रूर बताइएगा कि मेरी डायरी में ऐसे अश’आर का इज़ाफ़ा हो सके
अब आप को कम अज कम मुतक़ारिब और  मुतदारिक बहर की पहचान करने में आसानी हो जायेगी
अगली किस्त में हम बहर--मुतदारिक की मुज़ाहिफ़ बहर यानी इस पर लगने वाले ज़िहाफ़ात की चर्चा करेंगे

मुझे उमीद है कि मुतदारिक के सालिम बहर से बाबस्ता कुछ हद तक मैं अपनी बात कह सका हूँ । बाक़ी आप की टिप्पणी का इन्तज़ार रहेगा

--इस मंच पर और भी कई साहिब-ए-आलिम मौज़ूद हैं उनसे मेरी दस्तबस्ता [ हाथ जोड़ कर] गुज़ारिश है कि अगर कहीं कोई ग़लत बयानी या ग़लत ख़यालबन्दी  हो गई हो तो निशान्दिही ज़रूर फ़र्मायें ताकि मैं ख़ुद को  दुरुस्त कर सकूं ।बा करम मेरी मज़ीद [अतिरिक्त] रहनुमाई फ़र्माये ।मम्नून-ओ-शुक्रगुज़ार रहूँगा।

अभी नस्र के कुछ बयां और भी हैं..........
ज़िहाफ़ात् के कुछ निशां और भी हैं.....

एक बात बड़े ही अदब से एतराफ़ [स्वीकार] करता हूँ कि इन तमाम अक़्सात ,तज़्क़िरात  और तहरीर के लिए अपने आलिम अरूज़ी साहिबान  कमाल अहमद सिद्द्क़ी साहब , डा0 शम्सुर्र्हमान फ़ारुक़ी साहब ,आलिम जनाब  सरवर आलम राज़ ’सरवर ’ साहब  , अजीज  दोस्त डा0 आरिफ़ हसन ख़ान साहब  का तह-ए-दिल  से मम्नून-ओ-शुक्र गुज़ार हूँ जिनकी किताबों से  कुछ पढ़ सका ,समझ सका और लिख सका ।वगरना इस हक़ीर इतनी  बिसात कहाँ  औक़ात कहां । इन तज़्क़िरात में  मेरा कुछ भी अपना नहीं है बस  आलिम साहिबान  के अरूज़ पर किए गए कामों का हिन्दी तर्जुमा समझिए........

[नोट् :- पिछले अक़सात  [क़िस्तों ]के आलेख [ मज़ामीन ]आप मेरे ब्लाग पर  भी देख सकते हैं 

www.urdu-se-hindi.blogspot.com
or
www.urdusehindi.blogspot.com
-आनन्द.पाठक-
0880092 7181

शनिवार, 4 मार्च 2017

उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 25 [मुतक़ारिब की मुज़ाहिफ़ बह्र-3]

 उर्दू बह्र पर एक बातचीत : क़िस्त 25 [ मुतक़ारिब की मुज़ाहिफ़ बह्र -3]

Discliamer clause -वही जो क़िस्त 1 में है ]

पिछली क़िस्त में हम मुतक़ारिब की इन बहूर पर चर्चा कर चुके हैं

1- बहर-ए-मुतक़ारिब मुरब्ब: सालिम    [122---122] 
2- बहर-ए-मुतक़ारिब मुसद्दस सालिम  [122---122---122]
3-बहर-ए-मुतक़ारिब  मुसम्मन  सालिम [122---122---122---122]
और इन की मुज़ाइफ़ शकलें भी
 साथ ही
4- बहर-ए-मुतक़ारिब मुसद्दस महज़ूफ़    122 --122--12.
5-  बहर-ए-मुतक़ारिब  मुसम्मन महज़ूफ़ 122--122--122--12
6-  बहर-ए-मुतक़ारिब  मुसद्दस मक़्सूर      122--122--121
7-  बहर--ए-मुतक़ारिब मुसम्मन मक़सूर  122--122--122--121
8-  बहर-ए-मुतक़ारिब मुसम्मन असलम मक़्बूज़ मुख़्नीक़ सालिम अल आख़िर   22-122--22-122

और साथ ही बहर मुतक़ारिब में असलम और असरम और मक़बूज़ की भी चर्चा कर चुके हैं
आप को जान कर आश्चर्य होगा कि ज़िहाफ़ सलम और सरम के अमल से बरामद मुज़ाहिफ़ बहर पर ’तख़नीक़’ के अमल से 1,2 नहीं बल्कि 250 से भी ज़्यादा  विभिन्न रंगा-रंगी वज़न बरामद हो सकती है । यहां पर उन तमाम सूरतों पर बहस करना न ज़रूरी है न मुनासिब है। वरना मौज़ू से हम भटक जायेंगे। डा0 आरिफ़ हसन ख़ान साहब ने अपनी किताब ’ मेराज-उल-अरूज़’ में बाक़ायदे इन तमाम मुतख़्नीक़ बहर की बरामदगी दिखाई भी है। सभी का यहाँ लिखना मुमकिन भी नहीं है।
आगे बढ़ने से एक दो बात पर चर्चा करना ज़रूरी समझता हूं।
’फ़ऊलुन [122] का  असरम है ------फ़अ लु   [ 2 1 ]
फ़ऊलुन [122 ] का असलम  है------फ़अ लुन [ 2 2 ]
फ़ऊलुन [122]  का मक़्बूज़ है   -----फ़ ऊ लु   [1 2 1 ]
फ़ऊलुन [122]  का मुसबीग़ है ------फ़ऊला न   [ 1221 ]
किसी क़िस्त में मैने एक बात कही थी -आप को याद हो कि न याद हो । मुझे याद है कुछ ज़रा ज़रा-----
वो बात थी कि 1 1 2 2 1 1 2 ---का जो गिर्दान या रुक्न समझने के लिए जो  अलामत हमने आप ने बना रखी है  वो शुरुआती दौर में   बहर सीखने/समझने के लिए   कुछ मदद तो करती है मगर गहराईयों में उतरने पर यह निज़ाम भी कारगर साबित नहीं होता कारण की उर्दू शायरी मे अर्कान का सारा खेल ;हरकत , साकिन , सबब ,वतद का है ।  हरकत और साकिन हर्फ़ को 1... 2 की अलामत से कभी कभी दिखाना मुश्किल होता है । उर्दू वाले तो फ़े’ल में ब सकून-ए-लाम ,ब सकून-ए-ऐन या लाम मय हरकत लिख कर काम चला लेते है मगर यह बात 1...  2.... 1 ....2  से नही दिखाई जा सकती कि फ़े’ल मे- लाम ब सकून हो या मय हरकत हो- दिखाते मगर हम -1- से ही है या रुक्न मे -ऐन - ब सकून हो या मय हरकत हो इसे भी दिखाते -1- से ही है
कहीं कहीं लाम अल आखिर को  -लु- [जैसे मफ़ऊलातु  मे  फ़ अलु में ] से दिखाना/लिखना पड़ता है कि लाम पर मैने ’पेश’ की हरकत लगा दी है महज इस लिए कि आप इस लाम को मय हरकत समझे। तो 1...2  मे क्या अलामत लगाए? उर्दू वाले तो रुक्न देख कर समझ जाते है कि रुक्न का आखिरी हर्फ़ मय हरकत है या ब सकून है? इस विषय में हमें सोचना चाहिए। कभी मौक़ा मिला तो इस पर भी विस्तार से चर्चा करेंगे।

1- मुतक़ारिब मुसम्मन असरम मक़्बूज़ सालिम अल आखिर 
 [ फ़अ लु---फ़ऊलु---फ़ऊलु---फ़ऊलुन
   21------ 121 ------121 ----122
इन पर ’तख़नीक़ ’ की अमल से 7 और अलग अलग रंगा-रंगी बहर बरामद हो सकती  है। अर्थात कुल मिला कर 8-बहर । और ख़ूबी यह कि तमाम आठों वज़न आपस में एक दूसरे से बदले जा सकते है यानी बाहम मुबादिल है और बहर के वज़न में कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता ।आप चाहे तो ख़ुद एक कोशिश कर सकते है
[ एक सुराग दे रहा हूं --- यहाँ -फ़-  ,-लु- और ऊ का अ’[ऐन] [दो रुक्न मिला कर एक साथ]  तीन मुतहर्रिक एक साथ आ गए तो इन पर  तख़नीक़ का अमल लग सकता है....]
 इन तमाम मुतख़्नीक़ बहर में एक बड़ी ही मक़्बूल और मानूस बहर  शामिल है जिसका मीर तक़ी ’मीर’ ने काफी प्रयोग किया है अपने अश’आर में । और वो वज़न है
22-22-22-22
2- मुतक़ारिब मुसम्मन असरम मक़्बूज़ मुस्बीग़
 [ फ़अ लु---फ़ऊलु---फ़ऊलु--- फ़ऊलान ]
   21------ 121 ------121 ----1221  
वैसे ही इन पर ’तख़नीक़ ’ की अमल से 7 और अलग अलग रंगा-रंगी बहर बरामद हो सकती  है ।अर्थात कुल मिला कर 8-बहर और ख़ूबी यह कि तमाम आठों वज़न आपस में एक दूसरे से बदले जा सकते है यानी बाहम मुबादिल है और बहर के वज़न में कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता ।
इस वज़न में भी एक बड़ी ही दिलकश वज़न बरामद होती है और वो वज़न है
22-22-22-221

3- मुतक़ारिब मुसम्मन असरम मक़्बूज़ महज़ूफ़ 
     फ़अ लु......फ़ऊलु.....फ़ऊलु.... फ़ अल
      21-----121------121----12
  इस बहर से भी तख़नीक़ की अमल से  7-और अलग अलग मुतख़्नीक़ बहर बरामद हो सकती है\अर्थात कुल मिला कर 8-बहर और ख़ूबी यह कि तमाम आठों वज़न आपस में एक दूसरे से बदले जा सकते है यानी बाहम मुबादिल है और बहर के वज़न में कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता ।
4-- मुतक़ारिब मुसम्मन असरम मक़्बूज़ मक़्सूर
     फ़अ लु......फ़ऊलु.....फ़ऊलु.... फ़ऊ लु
      21-----121------121----121
   इस बहर से भी तख़नीक़ के अमल से 7 और अलग अलग मुतख़्नीक़ बहर बरामद हो सकती है अर्थात कुल मिला कर 8-बहर और ख़ूबी यह कि तमाम आठों वज़न आपस में एक दूसरे से बदले जा सकते है यानी बाहम मुबादिल है और बहर के वज़न में कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता ।
अब हम 16- रुक्नी बहर [मुसम्मन मुज़ाइफ़] बहर पर कुछ चर्चा कर लेते हैं
5-  मुतक़ारिब मुसम्मन असरम मक़्बूज़ महज़ूफ़ मुज़ाइफ़ [16-रुक्नी ] इसका बुनियादी रुक्न है [यानी एक मिसरा मे 8-रुक्न]
फ़अ लु.....फ़ऊ लु ---फ़ऊ लु -----फ़ऊ लु -----फ़ऊ लु ---फ़ऊ लु ---फ़ऊ लु ----फ़ अल
21-------121------121----------121--------121------121--------121-----12
और इस वज़न पर तख़्नीक़ के अमल से एक नही ,दो नही कुल 127 और वज़न [यानी कुल मिला कर 128 वज़न] बरामद हो सकती है ।और ख़ूबी यह कि तमाम वज़न आपस में एक दूसरे से बदले जा सकते है यानी बाहम मुबादिल है और बहर के वज़न में कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता । डा0 आरिफ़ हसन ख़ान साहब ने अपनी किताब -’मेराज-उल-अरूज़’ में अलग अलग कर के दिखाया भी है और आप भी दिखा सकते है
इसी 16-रुक्नी बहर से एक मुत्ख़्नीक़ बहर यह भी बरमद होते है  22-22-22--22-- 22-22-22-2  और यह बह्र मीर तक़ी मीर को इतनी प्रिय थी कि उन्होने इसका काफी प्रयोग किया है । शम्सुर्र्हमान फ़ारुक़ी साहब ने इस को मीर का बह्र ही क़रार दे दिया ।बहरहाल मीर का आप ने वो मशहूर ग़ज़ल तो ज़रूर सुनी होगी

पत्ता पता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है
जाने न जाने वो ही न जाने बाग़ तो सारा जाने है

-यह ग़ज़ल इसी मानूस बहर में है

मीरे का ही एक दूसरा शेर इसी बहर में सुनाते है

उल्टी हो गईं सब तदबीरं कुछ न दवा ने काम किया
देखा इस बीमारी-ए-दिल ने आख़िर काम तमाम किया

6-    मुतक़ारिब मुसम्मन  असरम मक़्बूज़ मक़्सूर मुज़ाइफ़ [16-रुक्नी] इसका बुनियादी रुक्न है [ यानी एक मिसरा मे 8-रुक्न]
फ़अ लु.....फ़ऊ लु ---फ़ऊ लु -----फ़ऊ लु -----फ़ऊ लु ---फ़ऊ लु ---फ़ऊ लु ----फ़ऊ लु
21-------121------121----------121--------121------121--------121-----121

और इस वज़न पर तख़्नीक़ के अमल से एक नही ,दो नही कुल 127 और वज़न जैसा ऊपर देख चुके हैं [यानी कुल मिला कर 128 वज़न] बरामद हो सकती है । डा0 आरिफ़ हसन ख़ान साहब ने अपनी किताब -’मेराज-उल-अरूज़’ में अलग अलग कर के दिखाया भी है और आप भी दिखा सकते है
और चलते चलते
दो रुक्न 121-22 [यानी फ़ऊलु-फ़अ लुन] के मेल से  एक बड़ी ही दिलचस्प बहर भी बनती है

121-22 /121-22/121-22/121-22

देखने में तो एक मिसरा मे चार रुक्न दिखाई दे रहे है मगर दर हक़ीक़त यह 8-रुक्न है [यानी मुसम्मन मुज़ाइफ़] है  और इसका नाम  मुतक़ारिब मक़्बूज़ असलम मुसम्मन मुजाइफ़ है
इस बहर में शकील बदायूनी की एक ग़ज़ल का मतला और मक़ता पेश कर रहा हूँ  मुलाहिज़ा फ़र्माए

लतीफ़ पर्दो से थे नुमायां मकीं के जल्वे मकां से पहले
मुहब्बत आईना हो चुकी थी बुजूदे-बज़्म-ए-जहाँ से पहले

अज़ल से शायद लिखे हुए थे ’शकील’ क़िस्मत में जौर-ए-पैहम
खुली तो आंखे इस अन्जुमन में,नज़र मिली आस्मां से पहले

चलिए मतला की तक़्तीअ कर देता हूँ जिससे बात स्पष्ट हो जाये
  121-22      / 121 -22     / 12  1 - 2 2      / 1 2  1 -22       =121-22 /121-22//121-22/121-22
लतीफ़- पर्दो /से थे नु -मायां /मकीं के -जल् वे / मकां से -पहले
1  2   1-  2  2/1 2 1 -2  2   / 1 2 1-2   2/ 12  1-22 =121-22 /121-22//121-22/121-22
मु हब ब- ताई /ना हो चु-की थी/ बुजूद-बज़् मे/जहाँ से-पहले

एक बात ध्यान देने की है - उर्दू शायरी का मिजाज़ ऐसा है कि 16-रुक्नी बहर के mid मे यानी // एक ठहराव है और यह लाजिम भी है जिसे अरूज़ की भाषा में -’अरूज़ी वक़्फ़ा’ -कहते हैं
[ यहाँ  -से- ,-के-,-ना-  गो देखने में तो 2 का वज़न लग रहा है पर हम बहर की माँग पर इन सबकी मात्रा गिरा कर -1- की वज़न पर लेंगे और वैसे ही शे’र पढ़ेगे भी जो शायरी में जाइज़ है
’मुहब्बत आइना ’ में  अलिफ़ मद -यानी -आ- अपने सामने के लफ़्ज़ मुहब्बत के साथ मिल कर कर -’मुहब्बताइना’ की आवाज़ दे रही है जिसकी तक़्तीअ मु हब  ब ताई / ना [121-22] की वज़न पर ले लिया जिसको अरूज़ की भाषा में -अलिफ़ का वस्ल -कह्ते हैं यानी यहाँ अलिफ़ अपने सामने वाले हर्फ़ से वस्ल हो गया है [मिलन हो गया है] यही बात हिन्दी में भी है जिसे हम ’सन्धि’ कहते हैं।

मैं चाहूँगा कि मक़ता की तक़्तीअ आप खुद करें और मेरे कथनकी तस्दीक करें और गवाही दें
जब आप ने इतना कुछ बर्दास्त किया तो इस हक़ीर फ़क़ीर का भी  एक शे’र  बर्दास्त कर लें

बदल गई जो तेरी निगाहे    ,ग़ज़ल का उन्वा बदल गया है
जहाँ पे हर्फ़-ए-करम लिखा था ,वहीं पे हर्फ़-ए-सितम लिखा है

यहाँ पे एक बात ध्यान देने की है --जहाँ पे हर्फ़े-करम लिखा है - को अगर -जहाँ पर हर्फ़-ए-करम लिखा है - लिख दूँ तो क्या फ़र्क़ पड़ेगा ? यक़ीनन भाव और अर्थ में तो कोई फ़र्क़ नहीं पड़ेगा और बहुत से लोगो को पता भी नहीं चलेगा इस में कमी क्या है
लेकिन अरूज़ दाँ तुरन्त पकड़ लेंगे । अब तो आप ने भी पकड़ लिया होगा अगर आप ने इतना कुछ पढ़ लिया है तो
पे-और-पर- में वज़न का फ़र्क आ जायेगा और मिसरा बे-बह्र हो जायेगा। क्यो?
तक़्तीअ में जहाँ -पे-आ रहा है वहाँ -1- वज़न की माँग है -पे की मात्रा तो गिरा सकते है पर -’पर’-[2] का वज़्न रखता है और इस में -र- गिराने की सुविधा नहीं है

नौ-मश्क़ शायर को इन बारीकियों पर ध्यान देना चाहिए वरना तो ’फ़ेस-बुक’ पर कुछ भी चस्पा कर दीजिये क्या फ़र्क़ पड़ता है 100-50 तो ’लाइक’ और वाह वाह करने वाले तो हमेशा तैयार रहते हैं

चलते चले हिन्दी फ़िल्म-" दो बदन’ का एक गाना सुनाते है आप ने भी सुना होगा जिसमे मनोज कुमार जीऔर आशा पारीख जी थी । लिन्क नीचे दे दिया हूँ ।यू ट्यूब पर उपलब्ध है सुनिए और लुत्फ़ अन्दोज़ होइए [आनन्द उठाइए] बहुत ही मार्मिक और दिलकश गाना है- और बताइएगा कि यह गाना किस ’बहर’ में है ।अगर आप को पसन्द आए तो इसी बहर में कोई अपना एक मिसरा भी गुनगुना सकते है

नसीब में जिसको जो लिखा था , वो तेरी महफ़िल में काम आया
किसी के हिस्से में प्यास आई ,किसी के हिस्से में जाम आया

मैं इक फ़साना हूँ बेकसी का ,ये हाल है मेरी ज़िन्दगी का
न हुस्न ही मुझको रास आया ,न इश्क़ ही मेरे काम आया
https://www.youtube.com/watch?v=mXQqmU4ds54

ख़ुदा ख़ुदा कर के बहर-ए-मुतक़ारिब की मानूस और राइज़ बहूर का बयान खत्म हुआ

मुझे उमीद है कि मुतक़ारिब बहर से बाबस्ता कुछ हद तक मैं अपनी बात कह सका हूँ । बाक़ी आप की टिप्पणी का इन्तज़ार रहेगा

--इस मंच पर और भी कई साहिब-ए-आलिम मौज़ूद हैं उनसे मेरी दस्तबस्ता [ हाथ जोड़ कर] गुज़ारिश है कि अगर कहीं कोई ग़लत बयानी या ग़लत ख़यालबन्दी  हो गई हो तो निशान्दिही ज़रूर फ़र्मायें ताकि मैं ख़ुद को  दुरुस्त कर सकूं ।बा करम मेरी मज़ीद [अतिरिक्त] रहनुमाई फ़र्माये ।मम्नून-ओ-शुक्रगुज़ार रहूँगा।

अभी नस्र के कुछ बयां और भी हैं..........
ज़िहाफ़ात् के कुछ निशां और भी हैं.....

एक बात बड़े ही अदब से एतराफ़ [स्वीकार] करता हूँ कि इन तमाम अक़्सात ,तज़्क़िरात  और तहरीर के लिए अपने आलिम अरूज़ी साहिबान  कमाल अहमद सिद्द्क़ी साहब , डा0 शम्सुर्र्हमान फ़ारुक़ी साहब ,आलिम जनाब  सरवर आलम राज़ ’सरवर ’ साहब  , अजीज  दोस्त डा0 आरिफ़ हसन ख़ान साहब  का तह-ए-दिल  से मम्नून-ओ-शुक्र गुज़ार हूँ जिनकी किताबों से  कुछ पढ़ सका ,समझ सका और लिख सका ।वगरना इस हक़ीर इतनी  बिसात कहाँ  औक़ात कहां । इन तज़्क़िरात में  मेरा कुछ भी अपना नहीं है बस  आलिम साहिबान  के अरूज़ पर किए गए कामों का हिन्दी तर्जुमा समझिए........

[नोट् :- पिछले अक़सात  [क़िस्तों ]के आलेख [ मज़ामीन ]आप मेरे ब्लाग पर  भी देख सकते हैं 

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-आनन्द.पाठक-
0880092 7181



शुक्रवार, 3 मार्च 2017

अभिव्यक्ति की आज़ादी और हम
जेएनयू से ‘आज़ादी’ को जो लहर उठ डीयू की ओर जा रही थी उस लहर से हम कैसे अछूते रहते. जो रास्ता जेएनयू से डीयू की ओर जाता है उस रास्ते पर हमारा आना-जाना लगा ही रहता है. इस कारण, धूएँ सामान, वातावरण में फैलते आज़ादी के नारों ने हमें भी उत्साहित किया.  पर अब हमारी समस्या हम स्वयं नहीं, हमारा कुत्ता है.
हमें तो परिवार के सभी सदस्यों ने साफ़ चेता दिया था, ‘अपने के इस बढ़ते प्रदूषण से बचा कर रखियेगा. इस उम्र में अभिव्यक्ति की आज़ादी के ख्वाब देखना सेहत के लिए हानिकारक हो सकता है.’
सत्य तो यह है कि जब से हम सेवा-निर्वृत्त हुए हैं तब से हम सब परिवारजनों की सुविधा का साधन हो गए हैं. हम बाथरूम जाने लगते हैं तो पत्नी कहती है, ‘इतनी जल्दी क्या है, सारा दिन घर में ही तो रहना है. अभी यूवी को बाथरूम जाना है. वह आज जल्दी ऑफिस जाएगा.’ हम अख़बार लेकर बैठते हैं तो बहु आकर कहती है, ‘आप के पास तो पूरा दिन है, अभी मुझे हेड लाइन्स देख लेने दीजिये’. हम कोई किताब खोल कर बैठते हैं तो मिंटू बोलता है, ‘पहले ज़रा यह मेरे  इनकम-टैक्स के पेपर देख लें, कितना टैक्स भरना है, कितनी बचत और करनी होगी, चेक कर के बता दें. आज ही ऑफिस में डिक्लेरेशन देनी है.’ धूप सेंकने का मन होता है तो आवाज़ आती है, ‘यूँ निठ्ठले बैठने से तो अच्छा होगा यह पुराने अख़बार ठीक से तह करके ऊपर रख दो. फिर यह किचन की चिम्मनी भी बहुत गंदी हो रही है और बाथरूम का .........’
बस ऐसे ही ‘मज़े’ में दिन कट रहे थे की ‘आज़ादी’ की लहर हमें छू कर आगे डीयू की ओर चल दी. पर इससे पहले कि मन में किसी तरह की कोई उमंग उठती और हम कोई नारा लगाते हमें सावधान कर दिया गया.
हम तो समझ गए पर हमारा कुत्ता न समझा. वैसे हमारा कुत्ता भी हम पर ही अपना रौब दिखाता है. वह दबंग कुत्तों को देख कर हमारी टांगो में छिप जाता है पर नन्हें बच्चों, बुज़ुर्ग महिलाओं और मरियल कुत्तों को देख कर अपने आत्मविश्वास का पूरा प्रदर्शन करता है. इस कारण कई बार हमें अड़ोसियों-पड़ोसियों से उलटी-सीधी बातें सुननी पड़ती हैं.
हमारे कुत्ते ने भी जाना कि अभिव्यक्ति की आज़ादी का जीवन में बहुत महत्व है. टीवी डिबेट्स देखने का जितना चस्का हमें है उससे अधिक हमारे कुत्ते को है.  जितना हम अ गोस्वामी की कमी महसूस कर रहे हैं उतनी कमी वह (अ गोस्वामी नहीं, हमारा कुत्ता) भी महसूस कर रहा है. टीवी पर चलती अनंत चर्चाओं को देख और सुन उसने भी आज़ादी के ख्वाब  देखने शुरू कर दिए हैं.
उसे भी अभिव्यक्ति की आज़ादी चाहिए है, ऐसा उसने अपने व्यवहार से स्पष्ट कर दिया है. वह दबंग कुत्तों और नौजवान युवकों और युवतियों पर दिल खोल कर भौंकना चाहता है. पर यह कार्य हमारी देख-रेख और हमारे संरक्षण में ही करना चाहता है. 

अवसर मिलते ही हमारी टांगों की आढ़ लेकर एक दिन वह एक जर्मन शेफर्ड पर बुलंद आवाज़ से भौंकने लगा.
जर्मन शेफर्ड हमारे कुत्ते की इस बेअदबी पर इतना नाराज़ हुआ की पलक झपकते ही हम पर टूट पड़ा. हम ऐसे भागे जैसे कभी मिल्खा सिंह भी न भागे होंगे और  जैसे-तैसे कर हम जान बचा कर घर पहुंचे.
पर हमारे कुत्ते को तो ऐसा लगा कि जैसे उसने एवेरस्ट पर विजय पा ली है. अपनी अभिव्यक्ति की आज़ादी का भरपूर आनंद उठाने का उसने तो पक्का निर्णय कर लिया है. समस्या हमारी है. पहले सिर्फ लोगों की बातें सुननी  पड़ती थीं, अब दबंग कुत्तों से बच कर रहना पड़ता है.    

गुरुवार, 2 मार्च 2017

यह गुरमेहर कौन है?
मुकंदीलाल जी ने हमारे सामने आज का समाचार पत्र फैंकते हुए पुछा, ‘यह गुरमेहर कौन है?
हम ने समाचार पत्र के ऊपर एक फिसलती हुई नज़र डाली. मोटे-मोटे अक्षरों में छपा था, ‘गुरमेहर का कमाल, दिल्ली में बवाल.’
हम ने सर खुजलाते हुए कहा, ‘भई, बात ऐसी है कि मैं समाचार पत्र लेता अवश्य हूँ, और एक नहीं तीन-तीन. पर पढ़ता एक भी नहीं हूँ. कोई भी समाचार पत्र अच्छे से छानबीन करके समाचार छापता नहीं, और अगर कोई छानबीन करता भी है तो छानबीन करने से पहले ही तय कर लेता है कि छानबीन का निष्कर्ष क्या होगा.’
‘क्या आप टीवी भी नहीं देखते? हर न्यूज़ चैनल पर इस लड़की की चर्चा हो रही है.’
‘अब मेरी बात सुन आपको हंसी आयेगी पर सत्य तो यही है कि मैं टीवी न्यूज़ चैनलों को मनोरंजन का साधन ही मानता हूँ.’
‘अच्छा यह बताइये कि टू-मिनट फेम क्या होती है?’ सदा की भांति मुकंदीलाल जी ने एक नया प्रश्न दाग दिया.
‘अरे मुकंदीलाल जी आप भी किस उलझन में फंस रहे हैं. यह टू-मिनट फेम टीवी वालों का आविष्कार है. टीवी किसी को भी चंद मिनटों के लिए हीरो बना देता है. चंद मिनट बीत जाने पर न कोई उस हीरो को पूछता है न ही उस मुद्दे को जिस के कारण उस व्यक्ति को हीरो बनाया जाता है.’
‘भाई साहब, मन तो हमारा भी करता है कि हमारा भी नाम हो, चाहे चंद मिनटों के लिए हो. ईमानदारी के साथ तीस-पैंतीस साल कलम घिसते रहे. दफ्तर से एक पेंसिल भी उठा कर कभी घर नहीं लाये. पर हुआ क्या? दो प्रमोशन भी नहीं मिले. जिस आदमी ने लाखों रुपयों का घपला किया था उसे चार प्रमोशन मिले, उसका नाम तो पदमश्री के लिए भी भेजा गया था.’
‘इसमें आश्चर्य की क्या बात है?’
‘भई, आप कोई सुझाव दें, हम भी चंद मिनटों के हीरो बनना चाहते हैं’
‘विलेन भी बन सकते हैं.’
‘आप कोई तरीका सुझायें, बस.’
‘किसी नेता पर जूता फैंक दें,’
‘नहीं, ऐसा नहीं कर सकते. ऐसे संस्कार माता-पिता से नहीं मिले.’
‘किसी नेता के कुत्ते को काट खाएं.’
‘इतना साहस नहीं है.’
‘कोई अवार्ड वापस कर दें.’
‘अवार्ड कभी मिला ही नहीं तो वापस क्या करें.’
‘चारों ओर फैलती असहिष्णुता को लेकर को ब्यान दें’
‘पर हमारी समझ में आम आदमी आज भी उतना ही सहिष्णु है जितना कल था. असहिष्णुता तो राजनेताओं में बढ़ीं है देश में नहीं.’
‘कश्मीर की समस्या पर कोई ब्यान दें.’
‘हमें कश्मीर समस्या का कोई ज्ञान नहीं.’
‘जो लोग ब्यान देते हैं उन्हें कौन सा ज्ञान होता है. चलिये इस गुरमेहर के पक्ष में ही ब्यान दे दें.’
‘पर यह गुरमेहर कौन है? यही तो आपसे पूछने आये थे.’

हमने अपने हाथ  खड़े कर दिए. हम सच में नहीं जानते कि यह गुरमेहर कौन है.