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शनिवार, 6 जुलाई 2019

एक ग़ज़ल : सलामत पाँव हैं जिनके--

एक ग़ज़ल


सलामत पाँव है जिनके वो कन्धों पर टिके हैं
जो चल सकते थे अपने दम ,अपाहिज से दिखे है

कि जिनके कद से भी ऊँचे "कट-आउट’ हैं नगर में
जो भीतर झाँक कर देखा बहुत नीचे गिरे हैं

बुलन्दी आप की माना कि सर चढ़  बोलती  है
मगर ये क्या कि हम सब  आप को बौने  दिखे हैं

ये "टुकड़े गैंग" वाले हैं फ़क़त मोहरे  किसी के
सियासी चाल है जिनकी वो पर्दे में छुपे  हैं

कहीं नफ़रत,कहीं दंगे ,कहीं अंधड़ ,हवादिस
मुहब्बत के चरागों को बुझाने  पर अड़े  हैं

हमारे साथ जो भी थे चले पहुँचे कहाँ तक
हमें भी सोचना होगा, कहाँ पर हम रुके हैं

समझते थे जिन्हे ’आनन’ धुले हैं दूध के सब
बिके हैं लोग वो भी अपने दामों  पर  बिके  हैं


-आनन्द.पाठक-

शुक्रवार, 28 जून 2019

चन्द माहिया :क़िस्त 60

चन्द माहिया : क़िस्त 60

:1:
हूरों की जीनत में
डूबा है ज़ाहिद
कुछ ख़्वाब-ए-जन्नत में

:2:
घिर घिर आए बदरा
बादल बरसा भी
भींगा न मेरा अँचरा

:3:
ग़ैरों की बातों को
मान लिया तूने
सच,झूठी बातों को

:4:
इतना ही फ़साना है
फ़ानी दुनिया मे
जाना और आना है

:5:
तुम कहती, हम सुनते
बीत गए वो दिन
जब साथ सपन बुनते

-आनन्द.पाठक-

मंगलवार, 25 जून 2019

मैं बीज




कल जो मैं सोया

बंद कमरा देख बहुत रोया ।

आंखें ना खुलती थी

 गर्मी भी कुछ भिगोती थी ।

हवा की थी आस

 लगती थी बहुत प्यास ।

ना आवाज़ ना शोर

थी शांति चहुँ ओर ।

हाथ कहीं बंधे से थे

पैर भी खुलते न थे ।

थी बहुत निराशा

मिली ना कोई आशा।

 एक कतरा अमृत का

कुछ जीवन सा दे गया

आंखें तो खुली नहीं

पर खुश्क लबों को

  भिगो गया।

 लंबे समय की

खुश्की का  साथ

प्रतिदिन रहती बस

उस क्षण  की याद

 उसी बंदीगृह में  सुनी

 एक धीमी सी आवाज़

कुछ तो था उसमें  जो जगा

मुझमें नये जीवन का अहसास

फिर एक अविरल धारा बही

मैं झारोझार नहाया

हाथ कुछ खुलने लगे थे

पैर ज़मीं में धंसने लगे थे

एक स्पर्श से मैं  चौंक  गया

किसी  ने मेरे तन को छुआ

मैं मदमस्त  लहराने  लगा

मेरा मन गीत गाने लगा

गुनगुनाहट ने दी  शक्ति नयी

जोर लगाया तभी  आँखें खुली

चौंधियाई आँखें न

 सह पाईं यह वार

सामने  था अनोखा

  सुंदर सपनीला  संसार।

काश कि उस अँधेरे में

मैं यह समझ पाता

हर दुख के बाद

 सुख अवश्य आता।

सुख का प्रकाश

सबको है लुभाता।

पर सच यह है -

सुख- दुख का परचम

सिक्कों के दो

पहलू  सा लहराता।

पल्लवी गोयल
चित्र गूगल से साभार

शुक्रवार, 21 जून 2019

मासूम बच्चे
साहब बिहार में नन्हें और मासूम बच्चों की मरने की संख्या दिनों दिन बढ़ती ही जा रही है ,आप कहें तो कल आप का एक दौरा बिहार में बच्चों को देखने का फिक्स कर डायरी में नोट कर लूं ,असिस्टेंट ने मंत्री जी से पूछा ।
मंत्री : अरे पगला गए हो का ,कल विश्व योग दिवस है , लाखों लोग कल योग करने सुबह इंडिया गेट पर आयेगा ,सबसे मिलना जुलना भी होगा और इससे हमरा वोट बेंक भी बढ़ेगा ,कल योग में शामिल होने जाना है।सुबह जल्दी जगा देना I
और फिर नेता जी खांसते और हांफते हुए अपने बेड रूम में सोने चल दिये ।
संजय कुमार गिरि

एक ग़ज़ल : हुस्न हर उम्र में जवाँ देखा---

एक ग़ज़ल : हुस्न हर उम्र में  जवां देखा---

हुस्न हर उम्र में जवाँ देखा
इश्क़ हर मोड़ पे अयाँ  देखा

एक चेहरा जो दिल में उतरा है
वो ही दिखता रहा जहाँ देखा

इश्क़ तो शै नहीं तिजारत की
आप ने क्यों नफ़ा ज़ियाँ  देखा ?

और क्या देखना रहा बाक़ी
तेरी आँखों में दो जहाँ देखा

बज़्म में थे सभी ,मगर किसने
दिल का उठता हुआ धुआँ देखा ?

हुस्न वालों की बेरुख़ी  देखी
इश्क़ वालों  को लामकां देखा

सर ब सजदा हुआ वहीं’आनन’
दूर से उनका आस्ताँ देखा 

-आनन्द पाठक-

शनिवार, 15 जून 2019

चन्द माहिया : क़िस्त 59

चन्द माहिया : क़िस्त 59

:1:
सब क़स्में खाते हैं
कौन निभाता है
कहने की बाते हैं

:2:

क्या हुस्न निखारा है
जब से डूबा मन
उबरा न दुबारा है

:3:
इतना न सता माहिया
क्या थी ख़ता मेरी
सच,कुछ तो बता माहिया

:4:
बेदाग़ चुनरिया में
दाग़ लगा बैठे
आकर इस दुनिया में

:5:

धरती रह रह तरसी
बदली आई तो
आ कर भी नहीं बरसी

-आनन्द.पाठक-

रविवार, 9 जून 2019

मत्त सवैया मुक्तकमाला (2019 चुनाव)

मत्त सवैया मुक्तकमाला (2019 चुनाव)

हर दल जो टुकड़ा टुकड़ा था, इस बार चुनावों ने छाँटा;
बाहर निकाल उसको फेंका, ज्यों चुभा हुआ हो वो काँटा;
जो अपनी अपनी डफली पर, बस राग स्वार्थ का गाते थे;
उस भ्रष्ट तंत्र के गालों पर, जनता ने मारा कस चाँटा।

इस बार विरोधी हर दल ने, ऐसा भारी झेला घाटा;
चित चारों खाने सभी हुए, हर ओर गया छा सन्नाटा।
जन-तंत्र-यज्ञ की वेदी में, उन सबकी आहुति आज लगी;
वे राजनीति को हाथ हिला, जल्दी करने वाले टा टा।

भारत में नव-उत्साह जगा, रिपु के घर में क्रंदन होगा;
बन विश्व-शक्ति उभरेंगे हम, जग भर में अब वंदन होगा;
हे मोदी! तुम कर्मठ नरवर, गांधी की पुण्य धरा के हो;
अब ओजपूर्ण नेतृत्व तले, भारत का अभिनंदन होगा।

तुम राष्ट्र-प्रेरणा के नायक, तुम एक सूत्र के दायक हो;
जो सकल विश्व को बेध सके, वैसे अमोघ तुम सायक हो;
भारत भू पर अवतरित हुये, ये भाग्य हमारा आज प्रबल;
तुम धीर वीर तुम शक्ति-पुंज, तुम जन जन के अधिनायक हो।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया
25-05-19

शनिवार, 8 जून 2019

एक ग़ज़ल : जब भी ये प्राण निकले--

एक ग़ज़ल : जब भी ये प्राण निकले---

जब भी ये प्राण निकलें ,पीड़ा मेरी  घनी हो
इक हाथ पुस्तिका  हो .इक हाथ  लेखनी हो

सूली पे रोज़ चढ़ कर ,ज़िन्दा रहा हूँ कैसे
आएँ कभी जो घर पर,यह रीति  सीखनी हो

हर दौर में रही है ,सच-झूठ की लड़ाई
तुम ’सच’ का साथ देना,जब झूठ से ठनी हो

बेचैनियाँ हों दिल में ,दुनिया के हों मसाइल
याँ मैकदे में  आना .खुद से न जब बनी  हो

नफ़रत से क्या मिला है, बस तीरगी  मिली है
दिल में हो प्यार सबसे , राहों में रोशनी हो

चाहत यही रहेगी ,घर घर में  हो दिवाली
जुल्मत न हो कहीं पर ,न अपनों से दुश्मनी हो

माना कि है फ़क़ीरी ,फिर भी बहुत है दिल में
’आनन’ से बाँट  लेना , उल्फ़त जो बाँटनी हो

-आनन्द.पाठक-

बुधवार, 5 जून 2019


मुफ्त,मुफ्त,मुफ्त......
अब दिल्ली में औरतें  मेट्रो और बसों में मुफ्त यात्रा कर पायेंगी.
कल टीवी में कुछ लोगों के उद्गार सुन समझ आया कि इस देश में  पढ़े-लिखे लोगों को भी सरलता से बहकाया जा सकता है.
केजरीवाल जी स्वयं इनकम-टैक्स विभाग में काम कर चुके हैं और भली-भांति जानते हैं कि सरकार अगर एक पैसा भी कहीं खर्च करती है तो अंततः वह खर्च देश को लोगों को ही उठाना पड़ता है.
अब चूँकि मुफ्त यात्रा सच में मुफ्त नहीं होगी तो इस व्यय का बोझ कौन उठाएगा? निश्चय ही केजरीवाल और उनके सहयोगी तो नहीं उठाएंगे. यह बोझ देश की जनता को ही उठाना पडेगा. या तो टैक्स बढ़ाए जायेंगे या फिर कर्जा लिया जायेगा. टैक्स हर व्यक्ति को देना पड़ेगा, उस गरीब को भी जो भीख मांग कर गुज़ारा करता है. कर्जा आने वाली पीढ़ियाँ अदा करेंगी, निश्चय ही टैक्स भर कर.
यह बात तो सब राजनेता और टैक्स अधिकारी जानते हैं कि  धनी लोगों को टैक्स की मार से कोई फर्क नहीं पड़ता. जितना टैक्स बढ़ता है उतना ही टैक्स चोरी करने में वह सब माहिर हो जाते हैं.
अंततः बढ़े हुए टैक्स का बोझ तो मध्य वर्ग और गरीब लोगों को ही झेलना पड़ता है.  ऐसा अब भी होगा. मुफ्त यात्रा का खर्च आम लोग ही उठाएंगे, वह लोग भी जो कभी मेट्रो में यात्रा नहीं करेंगे. एक तरह से इस कानूनी प्रपंच द्वारा ग़रीबों का पैसा उनसे लेकर संपन्न वर्ग को हस्तांतरित कर दिया जाता है.
जिस दिन हम लोग यह बात समझ जायेंगे, उस दिन राजनेता हमें मुफ्त पानी, मुफ्त बिजली, मुफ्त मेट्रो यात्रा, मुफ्त, मुफ्त, मुफ्त............ का लालच देकर मूर्ख नहीं बना पायेंगे.

गुरुवार, 30 मई 2019

प्रेम शाश्वत है

प्रेम एक शब्द -
एक नाद है
एक ऊर्जा है
उसे माध्यम चाहिए
पृथ्वी पे
पनपने  के लिए ...
जैसे मैं और तुम !

 प्रेम का
आह्लाद का
कोई स्वरूप नहीं होता
ये निर्गुण निराकार होता  है
ॐ के उस शब्द की तरह
शुद्ध और . सात्विक !

सुनो....
हमारा प्रेम ...
हमारा नेह आह्लाद  ..
शाश्वत है
परमब्रह्म की तरह ...

ये प्रेम हुआ है
 बेसाख़्ता ही  ...
और ये तुमसे
प्बातें करता है
आँखो के ज़रिए
मन के रास्ते ....
और
जुड़  जाते  है तंतु
तुम्हारे मन के ..
मेरे अवचेतन मन से
बिना किसी डोर  के ...
बंधन के ...

जानते हो ?
ये जो अनश्वर
शाश्वत प्रेम है न ?
ये मौन में गुंजायमान है ..
और नाद में ख़ामोश !
चेतना में निष्क्रिय
और
निष्क्रियता में चेतना
का आभास है  !
ये यत्र तत्र सर्वत्र है
व्योम में ..समस्त ब्रह्मांड में ...
आदि से और अनादि तक !

ये मौन नेह तुम्हारा
ये शाब्दिक प्रेम तुम्हारा
प्रतिध्वनित होता  है ...
और रह रह टकराता है
ईश्वर के  हृदय से ...
उनके अंतःकरण से ...

और फिर वो नाद
और वो आह्लाद ...
और दशों दिशाएँ से
प्रेम में तल्लीन में
मुझे ख़ुद में तलाशता
और रह रह पुकारता है  ..
......  ऐ लड़की!
चली आओ ...
उस ऊष्मा को
उस ऊर्जा को
ख़ुद  में प्रवाहित कर
एक नए युग
एक ने ब्रह्मांड का
निर्माण करो तुम !!
निर्वाण करो तुम !

बुधवार, 29 मई 2019

चन्द माहिया : क़िस्त 58

चन्द माहिया : क़िस्त 58

:1:
सदचाक हुआ दामन
तेरी उलफ़त में
बरबाद हुआ ’आनन’

:2:
क्यों रूठी है ,हमदम
कैसे मनाना है
कुछ तो सिखा जानम

:3:
दिल ले ही लिया तुमने
जाँ भी ले लेते
क्यों छोड़ दिया तुमने ?

:4:
गिर जाती है बिजली
रह रह कर दिल पर
लहरा के न चल पगली

:5:
क्या पाना क्या खोना
जब से गए हो तुम
दिल का खाली कोना



-आनन्द.पाठक--

शनिवार, 25 मई 2019


मोदी जी की जीत-एक विश्लेषण
 मोदी जी की चुनावों में प्रचंड जीत का कई बुद्धिमान लोग अब प्रचंड विश्लेषण कर रहे हैं. पर आश्चर्य है कि कोई भी विश्लेषक उन मुद्दों की ओर संकेत नहीं कर रहा जो मेरी समझ उतने  महत्वपूर्ण रहे जितने महत्वपूर्ण अन्य मुद्दे थे जिन पर बुद्धिजीवी  ज़ोर दे रहे हैं.
मोदी जी को लगभग सब राज्यों में पचास प्रतिशत से अधिक मत मिले जो एक असामान्य  घटना है. विचार करने वाली बात है कि इतने अधिक लोग मोदी जी के पक्ष में क्यों खड़े हो गये?
मुख्य कारण है कि (कांग्रेस के प्रचार के बावजूद) अधिकतर लोग महसूस करते हैं कि मोदी जी पूरी तरह ईमानदार व्यक्ति हैं. भारत अधिकांश राजनेता भ्रष्ट हैं, यह बात जनता से छिपी नहीं है. ऐसे वातावरण में मोदी जी की ईमानदारी ने लोगों को बहुत प्रभावित किया है. लोगों को इस बात का भी अहसास है  कि जितने भी नेता मोदी जी के विरूद्ध लामबंद हुए हैं  उन में से कई  भ्रष्टाचार में पूरी तरह लिप्त हैं.
दूसरी बात, लोगों को महसूस हो रहा था कि यह पहली सरकार थी जो सब लोगों के साथ बराबरी का व्यवहार कर रही थी. अब तक सिर्फ बराबरी का एक प्रपंच था जिसके सहारे तुष्टिकरण की राजनीति की जाती थी. इस तुष्टिकरण की राजनीति से गरीब अल्पसंख्यकों का कितना लाभ हुआ वह एक अलग बहस का विषय है.
तीसरा कारण था कई योजनाओं को कार्यान्वित करने में मोदी जी की सफलता. जो लोग सिस्टम के बाहर हैं उन्हें इस बात का ज़रा भी अहसास नहीं है कि पिछले चालीस-पचास वर्षों में सिस्टम इतना बिगड़ चुका है कि इस सिस्टम से कोई काम लेना एक चुनौती होता है. ऐसी पृष्ठभूमि में अगर मोदी जी कुछ योजनाओं को सफलतापूर्वक लागू कर पाए तो वह एक प्रशंसा की बात है. लोगों ने चुनाव में उन्हें वोट देकर अपना आभार व्यक्त किया है.
अगला कारण रहा विरोधियों का मोदी जी को लगातार अपशब्द कहना. जितने भद्दे अपशब्द मोदी जी को कहे गये, उतने शायद शिशुपाल ने श्री कृष्ण को न कहे होंगे. पर जो राजनेता यह अपशब्द कह रहे थे उन्हें इस बात का बिलकुल ज्ञान नहीं था कि वह सिर्फ मोदी जी को अपमानित न कर रहे थे. वह उन सब लोगों को भी अपमानित कर रहे थे जिन्होंने मोदी जी को चुना था, जो उनसे प्रभावित थे, जो उन्हें फिर से चुनना चाहते थे. इन मतदाताओं को बार-बार अपमानित कर के कांग्रेस और दूसरे दलों के नेताओं ने सुनिश्चित कर दिया कि वोटिंग के दिन वह सामान्य जन वोट देने अवश्य जाएँ और मोदी जी को वोट देकर अपने अपमान का बदला लें. इतना ही नहीं इन में से कई मतदाताओं ने यह भी सुनिश्चित किया होगा कि उनके घर-परिवार के सब लोग मत-दान करें.
लोक सभा और राज्य सभा में जिस प्रकार का व्यवहार विपक्षी दलों ने किया उससे भी कई मत-दाता पूरी तरह निराश थे. आप अपनी सुख-सुविधाओं को तो त्यागना नहीं चाहते, पर सरकार को चलने नहीं देंगे, ऐसी राजनीति कम से कम नई पीढ़ी को तो पसंद नहीं है.
अन्य  कारणों के विषय में टीवी पर खूब चर्चा हो रही है. इस लिए उन पर कुछ लिखना आवश्यक नहीं है.
मेरा तो यह मानना है कि जब तक विपक्ष में मोदी जी जैसा ईमानदार नेता नहीं उभरता, जो सिर्फ और सिर्फ देश के विषय में सोचे और जिसके पास भविष्य की अपनी कोई परिकल्पना हो, तब तक मोदी जी  का सामना करना किसी विपक्षी नेता के लिए संभव नहीं  है.


शनिवार, 18 मई 2019

एक ग़ज़ल : सपनों को रखा गिरवी--

ग़ज़ल   :  सपनों को रखा गिरवी--


सपनों को रखा  गिरवी, साँसों पे उधारी है
क़िस्तों में सदा हमने ,यह उम्र  गुज़ारी  है

हर सुब्ह रहे ज़िन्दा , हर शाम रहे मरते
जितनी है मिली क़िस्मत ,उतनी ही हमारी है

अबतक है कटी जैसे, बाक़ी भी कटे वैसे
सदचाक रही हस्ती ,सौ बार सँवारी  है

जब से है उन्हें देखा, मदहोश हुआ तब से
उतरा न नशा अबतक, ये कैसी ख़ुमारी  है

दावा तो नहीं करता, पर झूठ नहीं यह भी
जब प्यार न हो दिल में, हर शख़्स भिखारी है

देखा तो नहीं लेकिन, सब ज़ेर-ए-नज़र उसकी
जो सबको नचाता है, वो कौन मदारी  है ?

जैसा भी रहा मौसम, बिन्दास जिया ’आनन’
दिन और बचे कितने, उठने को सवारी है

-आनन्द.पाठक- 

सोमवार, 13 मई 2019

एक ग़ज़ल : वो रोशनी के नाम से --

एक ग़ज़ल : वो रोशनी के नाम से --

वो रोशनी के नाम से डरता है आजतक
जुल्मत की हर गली से जो गुज़रा है आजतक

बढ़ने को बढ़ गया है किसी ताड़ की तरह
बौना हर एक शख़्स को समझा है आजतक

सब लोग हैं कि भीड़ का हिस्सा बने हुए
"इन्सानियत’ ही भीड़ में तनहा है आजतक

हर पाँच साल पे वो नया ख़्वाब बेचता
जनता को बेवक़ूफ़ समझता है आजतक

वो रोशनी में तीरगी ही ढूँढता रहा
सच को हमेशा झूठ ही माना है आजतक

वैसे तमाम और मसाइल थे सामने
’कुर्सी’ की बात सिर्फ़ वो करता है आजतक

हर रोज़ हर मुक़ाम पे खंज़र के वार थे
’आनन’ ख़ुदा की मेह्र से ज़िन्दा है आजतक

-आनन्द.पाठक-

मंगलवार, 7 मई 2019

लक्ष्मीरंगम - Laxmirangam: अंतस के मोती

लक्ष्मीरंगम - Laxmirangam: अंतस के मोती: पुस्तक ऑर्डर करने के लिए निचली लाइन पर क्लिक करें. पूरा लिंक खुलेगा. उस पर क्लिक कीजिए तो खरीदने का पोर्टल खुल जाएगा फिर View cart, Go to c...

एक ग़ज़ल : झूठ का जो है फैला---

एक ग़ज़ल : झूठ का है जो फैला धुआँ---

झूठ का है जो  फैला  धुआँ
साँस लेना भी मुश्किल यहाँ

सच की उड़ती रहीं धज्जियाँ
झूठ का दबदबा  था जहाँ

चढ़ के औरों के कंधों पे वो
आज छूने चला  आसमाँ

तू इधर की उधर की न सुन
तू अकेला ही  है  कारवाँ

जिन्दगी आजतक ले रही
हर क़दम पर कड़ा इम्तिहाँ

बेज़ुबाँ की ज़ुबाँ  है ग़ज़ल
हर सुखन है मेरी दास्ताँ

एक ’आनन’ ही तनहा नहीं
जिसके दिल में है सोज़-ए-निहाँ

-आनन्द.पाठक-

बुधवार, 1 मई 2019

एक व्यंग्य :बड़ा शोर सुनते थे ---

एक व्यंग्य : बड़ा शोर सुनते थे---

--’बड़ा शोर सुनते थे पहलू में दिल का ’ ।ख़बर गर्म थी ।उनकी नाक उनकी दादी जैसी है। वह आँधी हैं ’आँधी"। अगर बनारस से उठ गई तो ’कमल’ की तमाम पँखुड़ियां उड़ जाएँगी ।हाथी साथी सब हवा हो जायेगे। उनके कार्यकर्ताओं मे गजब का उत्साह था जब वो बार बार पूछती थीं --उठ जाऊं क्या --? खड़ी हो  जाऊँ क्या ’बनारस’ से ।कार्यकर्ता भी सब अभिभूत हो जाते थे   ,झूमने लगते थे , नाचने लगते थे  ।अब आयेगा मज़ा जब आयेगा ऊँट पहाड़ के नीचे---
"अबे ! किसको ऊँट बता रहा है बे !"--एक कार्यकर्ता ने आपत्ति जताई
’कमल आयेगा पहाड़ के नीचे, भाई साहब !’ -पहले ने सफ़ाई दी ।
’अच्छा ! मैं समझा कि---। दूसरे ने सन्तोष की साँस ली --" अरे वो हम कार्यकर्ताऒं का कितना सम्मान करती हैं ।  ,उन्हे क्या ज़रूरत आन पड़ी है हम जैसे कार्यकर्ताओं से पूछ्ने की । वह  तो "स्वयं प्रभा समुज्ज्वला" हैं--उन्होने पार्टी से नहीं ,पहले हम से पूछा, हम समर्पित कार्यकर्ताओं से पूछा-- हम सब से पूछा -- हम सब ही तो पार्टी हैं- हम सबकी ’अनुमति’ के बग़ैर वो कैसे उठ सकती हैं भला । हमारी पार्टी अन्य पार्टियों की तरह नहीं  कि बाहर से उम्मीदवार लाया और  ’थोप’ दिया हम कार्यकर्ताओं पर .कि उतार दिया ’पैराशूट’ से ।-30 साल से झंडा उठा रहे है हम निर्विकार भाव से बिना किसी पद की इच्छा के बिना टिकट की  लालसा के ---। वो तो स्वयं ही पार्टी है
पहले भाई साहब ने बात काटी--’नहीं भाई साहब ! ऐसा नहीं । वो खुद पार्टी नहीं है। वो पार्टी की एक विनम्र कार्यकर्ता है, एक सिपाही हैं --बिल्कुल हमारे-आप जैसे । हमारी पार्टी में लोकतन्त्र है अनुशासन है-जब तक पार्टी नहीं कहेगी तब तक  वो  अपने आप कैसे चुनाव में खड़ी हो जायेंगी ?पार्टी प्रेसिडेन्ट नाम की  कोई चीज होती है कि नहीं । पार्टी में ऐसे ही कोई प्रेसिडेन्ट बन जाता है क्या ? ---कार्यकर्ता भाई साहब ने अपना "पार्टी-ज्ञान’ बघारा।

--चीरा तो क़तरा-ए-खूं न निकला ।हाय अफ़सोस कि पार्टी ने उन्हें टिकट नहीं दिया ।

यह होता है पार्टी का संविधान ।कोई कितना भी बड़ा क्यों न हो ,अपनी बहन ही क्यों न हो, अपना जीजा ही क्यों न हो , पार्टी के संविधान से बड़ा कोई नहीं ,बहन भी नहीं ।विरोधी पार्टी झूठे आरोप लगाती है  कियह  एक परिवार की पार्टी है । भईया आप ही बताओ उन्होने  बहन को  टिकट दिया क्या ?नहीं दिया न । यह होता है ’न्याय’। वो और भी ’न्याय’ करेंगे  -चुनाव के बाद।

पार्टी प्रवक्ताओं ने बताया उन्हे देश देखना है ।ग़रीबों को देखना है, बेरोज़गारों को देखना है नौजवानों को देखना है हिन्दू को देखना है मुसलमान को देखना है।समय कम है,इसी चुनाव काल में देखना है  ।समस्यायें असीमित है  ,एक ही लोकसभा क्षेत्र में ’सीमित’ नहीं करना है उन्हें ।
-------
कुछ दिन पहले मैं भी बनारस गया था । नामांकन करने नहीं ।घूमने। बनारस के दशाश्वमेध घाट की सीढ़ियों पर बैठे बैठे सोच रहा था -गंगा मईया की बेटी थी आने को कह रही थी ,इसी गंगा मईया के जल से आचमन किया था मगर अफ़सोस।
ख़ुदा क़सम , अल्लामा साहब याद आ गए

न आते ,हमें इसमें तक़रार क्या थी
मगर वादा करते हुए  आर क्या थी?

[आर=लाज ,लज्जा]
प्रवक्ता ने बताया कि उन्होने ख़ुद ही मना कर दिया ।

 मैने पूछा। इक़बाल साहब ने पूछा

तअम्मुल तो था उनके आने में क़ासिद
मगर ये बता तर्ज़-ए-इनकार क्या थी ?
[ तअम्मुल=संकोच}

न उन्होने बताया,न  प्रवक्ता ने बताया  कि -तर्ज़-ए-इनकार क्या थी।
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कुछ दिनों बाद
किसी चुनाव रैली में ,उसी कार्यकर्ता ने दादी की नाक से  पूछ लिया--बहन जी !---
"ऎं ! मैं बहन जी जैसी दिखती हूँ क्या ? भईए ! ’बहन जी" तो ’बबुआ’ के साथ घूम रहीं है----
-’ नहीं मैडम ! मेरा मतलब यह था कि आप बनारस से क्यों नहीं उठी---हम लोग कितनी उत्सुकता से आप की प्रतीक्षा कर रहे थे कि आप आतीं तो पार्टी को एक संजीवनी मिल जाती।जान फूँक देती । अन्य  पार्टियाँ "फुँक" जाती, विरोधी पस्त हो जाते ,हाथी बैठ जाता, साइकिल पंचर हो जाती --आप उठती  तो नोट बन्दी का ,जी0एस0टी0  का बेरोजगारी का , सब एक साथ बदला ले लेते --आप समझिए कि इस एरिया का 15-20 सीट तो कहींयों नहीं गया था---

’नहीं रे ! दिल छोटा न कर । पार्टी ने टिकट ही नहीं दिया वरना तो हम--"
-’मैडम ! आप लोग कितने महान है । औरों को पिलाते रहते है और खुद प्यासे रह जाते है। कितना बड़ा त्याग करते रहते  है आप लोग देश के लिए।खुद को कुर्बान कर देते हैं पार्टी के लिए----
-सही पकड़ा । बनारस से बड़ा चुनाव और चुनाव से बड़ा देश --हमें पूरा देश देखना है ।बनारस में क्या रखा है ? यहाँ तो मेरा पुराना वाला उम्मीदवार ही काफी है  हिसाब किताब करने के लिए  । तू चिन्ता न कर।चुनाव के बाद तू बस हमी को देखेगा---बम्पर मेजारिटी से वापस आ रहे हैं --मैं देख रही हूँ --मुझे दिख रहा है --तू भी देख---।

इसी बीच किसी ने शे’र पढ़ा--
थी ख़बर गर्म कि ’ग़ालिब’ के उड़ेंगे पुर्ज़े
देखने हम भी गए थे तमाशा न हुआ

"ऎं यह शे’र किस ने पढ़ा  ?"---मैडम ने त्योरी चढ़ाते हुए पूछा
कार्यकर्ता ने हकलाते , घबराते और  मिमियाते हुए बोला--- मैं नहीं मैडम ! ग़ालिब ने--
-’अच्छा ग़ालिब मियां  का ? उन्हे सलाम भेजना। उनकी भी बिरादरी का ’वोट’ लेना है।
------
-आनन्द-पाठक-

शुक्रवार, 19 अप्रैल 2019

एक ग़ज़ल : कहाँ आवाज़ होती है--

एक ग़ज़ल : कहाँ आवाज़ होती है--


कहाँ आवाज़ होती है कभी जब टूटता है दिल
अरे ! रोता है क्य़ूँ प्यारे ! मुहब्बत का यही हासिल

मुहब्बत के समन्दर का सफ़र काग़ज़ की कश्ती में
फ़ना ही इसकी क़िस्मत है, नहीं इसका कोई साहिल

मुहब्बत का सफ़र आसान है तुम ही तो कहते थे
अभी तो इब्तिदा है ये ,सफ़र आगे का है मुश्किल

समझ कर क्या चले आए, हसीनों की गली में तुम
गिरेबाँ चाक है सबके ,यहाँ हर शख़्स है  साइल

तरस आता है ज़ाहिद के तक़ारीर-ओ-दलाइल पर
वो जन्नत की कहानी में खुद अपने आप से गाफ़िल

कलीसा हो कि बुतख़ाना कि मस्जिद हो कि मयख़ाना
जहाँ दिल को सुकूँ हासिल हो अपनी तो वही मंज़िल

न जाने क्या समझते हो तुम अपने आप को ’आनन’
जहाँ में है सभी नाक़िस यहाँ कोई नहीं कामिल


-आनन्द.पाठक-

शनिवार, 13 अप्रैल 2019

एक ग़ज़ल : जब भी शीशे का ---

एक ग़ज़ल : जब भी शीशे का इक मकां देखा---

जब भी शीशे का इक मकां देखा
पास पत्थर की थी दुकां,  देखा

दूर कुर्सी पे  है नज़र जिसकी
 उसको बिकते जहाँ तहाँ  देखा

वादा करता वो कस्में खाता है
पर निभाते हुए कहाँ   देखा

जब कभी ’रथ’ उधर से गुज़रा है
बाद  बस देर तक धुआँ  देखा

कल तलक जो भी ताजदार रहा
मैने उसका नहीं निशां  देखा

आदमी यूँ तमाम  देखे  हैं
’आदमीयत’ नहीं  अयाँ  देखा

सच को ढूँढें कहाँ, किधर ’आनन’
झूठ का बह्र-ए-बेकराँ  देखा

=आनन्द.पाठक-

[बह्र-ए-बेकरां = अथाह सागर]

चिड़िया: मानव, तुम्हारा धर्म क्या है ?

चिड़िया: मानव, तुम्हारा धर्म क्या है ?: धर्म चिड़िया का, खुशी के गीत गाना  ! धर्म नदिया का, तृषा सबकी बुझाना । धर्म दीपक का, हवाओं से ना डरना ! धर्म चंदा का, सभी का ताप हरना...

शुक्रवार, 12 अप्रैल 2019

एक व्यंग्य : आम चुनाव और नाक

एक व्यंग्य :आम चुनाव और नाक

2019। चुनाव का मौसम और मौसम का अपना मिजाज।

आजकल चर्चा मुद्दों पर नहीं, नाक पर चल रही है । मुद्दे तो अनन्त है --हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता -जैसा ।
कुछ मुद्दे तो शाश्वत हैं,-जैसे ग़रीबी,बेरोज़गारी,महंगाई,भ्रष्टाचार,महिला सुरक्षा,कानून-व्यवस्था। ये तो हर चुनाव में नाक घुसेड़ देते हैं। पर इस चुनाव में किसी और की नाक घुस गई।
उनकी नाक उनकी दादी जैसी है ।अच्छी बात है। होनी भी चाहिए। खानदानी नाक है -खानदान पे ही होनी चाहिए। भई ,गर दादी जैसी नहीं होगी तो क्या माओत्सेतुंग जैसी होगी ?
जनता आत्म विभोर है। दादी की छवि दिख रही है। उनको भी दिख रही  है जो दादी को कभी देखा नहीं होगा ।सुना ही सुना होगा । सुन रहे हैं तो सुना रहे हैं ।आख़िर पार्टी के कार्यकर्ता हैं । अरे भई ,नाक की बारीकियाँ वो न देखेंगे तो क्या बीजेपी वाले देखेंगे?
अब नाक का नख-शिख वर्णन हो रहा है। नाक ऐसी है ,नाक वैसी है। किसी ने अति उत्साह में यह भी पता लगा लिया कि राजनीति में आने से पहले ये नाक वैसी नहीं थी ,सर्जरी कराई है छवि दिखाने के लिए । भगवान जाने क्या सच है।
जो लोग अपनी नाक पर मख्खी नहीं बैठने देते थे  , अब वही नाक पर वोट माँगने निकले हैं
 यूपी के दो युवा थे । कल तक नाक के बाल थे आज वही नाको चने चबवा रहे है ।  चुनाव का मौसम जो न करा दे ।
 सुपुत्र ने तो अपने ही पिता जी की नाक कटवा दी और पार्टी से धकिया दिया। व्यक्ति से बड़ी पार्टी -और पार्टी से बड़ी नाक। लोग गठबन्धन किए घूम रहे है- अब तो कई पार्टियों के नाक का सवाल है - एक पार्टी का नाक काटने के लिए।
नाक कटे बला से, सामने वाले का शगुन तो बिगड़ा।
और जनता ?
जनता का क्या है ? उसी के हित के लिए तो सब पार्टिया लड़ ही रही है । उसे क्या करना है ।राम झरोखे बैठ , सब का मुज़रा देख । उसे तो तमाशा देखना है उसे तो वोट देना है ।  ग़रीबी,बेरोज़गारी,महंगाई,भ्रष्टाचार,महिला सुरक्षा,कानून-व्यवस्था से क्या लेना देना ?। वोट दिया तो था । किसने हल कर दिया? न 70-साल वालों ने ,न 5-साल वालों ने।चुनाव में यह सब चलता ही रहेगा।ये सब  "चुनावी रेसिपी" है ,बनाते हैं, पकाते हैं, परोसते हैं --मज़दूर का, किसान का ,,,बेरोज़गार का,अली का ,बजरंग बली का, नाम लेकर । पार्टियों की मज़बूरी है ।उनकी मज़बूरी अलग ,हमारी मज़बूरी अलग । हमें तो  देखना है ---जाति की नाक न कट जाए -बिरादरी  की नाक ऊँची रहे ।  जाति है तो हम हैं -अपनी ही जाति  का बन्दा खड़ा  है । हिन्दू की नाक नीचे नहीं होनी चाहिए---अली  की नाक ऊपर नहीं होनी चाहिए---शोषित की नाक अलग--दलित की नाक अलग --सब पार्टियां अपने अपने ’वोट बैंक’ की नाक लेकर खड़ी हैं चुनाव मैदान में।

गाँव का ’बुधना’ सोचता है । । हाथ वाले भईया का हाथ हमारे ऊपर है । कर्ज़ा माफ़ हो ही गया । अब काहे का काम करना ,काहे की ग़रीबी ।72000/- रुपया खाते में आ ही जायेगा --बोल गए हैं । खानदानी आदमी हैं -ज़बान के पक्के ही होंगे
हमें तो जिसने "प्यार से पिला दिया ,हम उसी के हो गए" और मस्त हो कर गा रहा है
"अरे हथवा कS वोटवा लेई भागा
ई बुधना अभागा  नहीं  जागा "
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यह चुनाव देश की नाक का सवाल है--कोई नहीं सोचता।

-आनन्द.पाठक-

बुधवार, 27 मार्च 2019

एक व्यंग्य : हिन्दी-सेवा उर्फ़ फ़ेसबुक- सेवा

एक व्यंग्य : हिन्दी सेवा उर्फ़ फ़ेसबुक सेवा

- भाई साहब ! सोचता हूँ कि अब मैं भी कुछ हिन्दी की सेवा कर लूँ।" -मिश्रा जी ने चाय की चुस्की लेते हुए कहा
-" क्यों ? अब कितनी सेवा करोगे हिन्दी की ? सरकारी नौकरी में 30-साल तक ’हिन्दी-पखवारा" में हिन्दी की सेवा ही तो की है ।हर साल बड़े साहब की ’स्तुति-गान ’ करते रहे और बजट लेते रहे । आप उन्हें ’शाल-श्रीफल" से सम्मानित करते रहे, उद्घाटन के लिए चाँदी की तश्तरी, कैंची लाते रहे और वो लेते रहे । कितना मनोयोग से शुद्ध संस्कृत निष्ठ शब्दों से आप उनका स्वागत भाषण लिखते थे ।हिन्दी की उपल्ब्धियाँ गिनाते थे ,हिन्दी कैसे आगे बढ़े, रास्ते बतलाते थे। पूरा विभाग हिन्दीमय हो जाता था उन दिनों । आप ने विभागीय हिन्दी मैगज़ीन का सम्पादन किया,स्मारिका छपवाई ,मुद्रक-प्रकाशक से दान-दक्षिणा ली।अपनो को रेवड़िया बाँटी । बड़े साहब की मिसेज को वरिष्ठ कवयित्री बताया । भाई मिश्रा जी ! अब हिन्दी की कितनी सेवा करोगे?
मिश्रा जी का रिटायर्मेन्ट के बाद 30 साल का ’ हिन्दी-अधिकारी’ का दर्द छलक आया --" एक हिन्दी अधिकारी का दर्द तुम क्या समझ सकोगे आनन्द बाबू ! जाके पैर न फटी बिवाई, सो क्या जाने पीर पराई। हिन्दी अधिकारी का दर्द,किसी हिन्दी अधिकारी से पूछो, बुद्धिनाथ मिश्र जी से पूछो-

पीर बवर्ची भिश्ती खर हैं ,कहने को हम भी अफ़सर हैं
सौ सौ प्रश्नों की बौछारें,एक अकेले हम उत्तर है
इसके आगे, उसके आगे,दफ़्तर में जिस तिस के आगे
क़दमताल करते रहने को ,आदेशित हैं हमी अभागे
तन कर खड़ा नहीं हो पाए,सजदे में कट गई उमर है
पीर बवर्ची भिश्ती खर हैं-----


अब रिटायर हो गया हूँ ,सेवा निवृत हो गया हूँ,मुक्त हो गया हूँ सरकारी झंझटों से ,कलम आज़ाद हो गई है । सोच रहा हूँ अब कुछ मुक्त लेखनी से हिन्दी की मुक्त सेवा ही कर लूँ --माँ भारती बुला रही है -हिन्दी मुझे पुकार रही है।
" हिन्दी की ही सेवा क्यों ?"-मैने अपनी जिज्ञासा का समाधान किया-" सेवा-निवॄत के पश्चात तो और भी बहुत सी चीज़ें है सेवा करने के लिए --समाजसेवा--गो सेवा--जन सेवा--पर्यावरण सेवा---कार सेवा -मन्दिर सेवा--। बहुत से अधिकारी यही सब करते है रिटायर्मेन्ट के बाद और ’फोटू’ खिंचवाते रहते है ’फ़ेसबुक’ पर चढ़ाते रहते है --सेवा की सेवा--प्रचार का प्रचार ।
"-भई पाठक जी ! जन सेवा करने निकला था पर किसी पार्टी ने चुनाव का टिकट ही नहीं दिया तो हम जन सेवा कैसे करते? आप ही बताइए । पर्यावरण सेवा करने निकला तो कमेटी वालों ने ’एक पेड़ में बारह हाथ" लगा दिए । फोटू में तो सबके चेहरे खिले खिले थे बस पेड़ ही ’मुरझा’ गया था--और उसमें भी मेरा चेहरा कट गया था -सो पर्यावरण की सेवा छोड़ दी।
-’तो गो सेवा ही कर लेते’
-वो भी किया ।

घर से है गोशाला बहुत दूर चलो यूँ कर ले
सड़क पे किसी गाय को घास खिलाया जाए

मगर आने जाने के लफ़ड़े से अच्छा है कि हिन्दी की ही सेवा की जाए। घर में बैठे रहो और कुछ अल्लम गल्लम अगड़म-बगड़म फ़ेसबुक पे रोज़ रोज़ चिपकाते रहो। न हर्रे लगे न फिटकरी और रंग बने चोखा।
मैने कहा -’भाई मिश्रा जी !बहुत से लोग हैं हिन्दी की सेवा करने के लिए आजकल । फ़ेसबुक पर ,इन्टरनेट पर,व्हाट्स अप पर ,मंच पर ,ब्लाग पर हर दूसरा व्यक्ति ’सेवा ’ कर रहा है हिन्दी का --आप उसमे और क्या कर लोगे?
मिश्रा जी -’भाई साहब !आप के साथ यही ’प्रोब्लम’ है --प्रथम ग्रासे मच्छिका पात : -कर देते हों। आप जैसे लोगों के कारण ही, हिन्दी का स्तर दिन-प्रति दिन नीचे गिरता जा रहा है--भाषा का स्तर नहीं --वर्तनी का ख़याल नहीं --भाव किधर भाग रहा है -ध्यान नहीं ,बस फोटू पर फोटू लगाए जा रहे हैं लोग। यहाँ सम्मानित हुए--वहाँ सम्मानित हुए। यहाँ छपे--वहाँ छपे । यह प्रमाण पत्र --वह प्रमाण पत्र । इस मंच की अध्यक्षता की--उस मंच की अध्यक्षता की। यही सब है हिन्दी सेवा के नाम पर---
--तो आप क्या कर लोगे ?
---मैं संघर्ष करूँगा -आन्दोलन करूँगा --ज्योति जलाऊँगा----हिन्दी भाषा का विकास करूँगा ---स्तर ऊँचा करूँगा -लोगों को अपने साथ जोडूँगा -- ।फोटू खिंचवाऊँगा-- फोटू लगाऊँगा--
--कैसे?
-- ’फ़ेसबुक पर एक ग्रुप बनाऊँगा--
---फ़ेसबुक ही क्यों?
---उस में पैसा नहीं लगता -- और ’एडमिनिस्ट्रेटर बनूँगा ’फ़्री’ में सो अलग से ।
--अच्छा ’जब तोप का मुक़ाबिल हो ,अख़बार निकालो’-’मंच पे ही कुछ जुगाड़ लगा लो । मगर एड्मिनिस्ट्रेटर’ ही क्यों ?
--यार मज़े हैं -एड्मिनिस्ट्रेटर-बनने में --जब चाहे किसी को जोड़ लो ग्रुप में ,जब चाहे किसी को लतिया दो ग्रुप से -धकिया दो मंच से-अहम तुष्टी होती रहती है -और मुफ़्त में ब्लाग "प्रबन्धक" बनने का सुख अलग से --साहित्यकार होने का सुख भी मिलता रहता है।जिसको चाहो ’वरिष्ठ साहित्यकार- मूर्धन्य साहित्यकार ---हिन्दी के सशक्त हस्ताक्षर -- -राष्ट्र कवि -बता दो ।-कौन पूछता है-?--जिसको चाहो ’अज़ीमुश्शान शायर’- क़रार कर दो-- तगमा बाँटते चलो- ।-बुला बुला कर सम्मानित करूँगा- शाल उढ़ा दो ---दो चार दस पैसे तो बच ही जायेंगे ।
--आप कौन होते हैं ’रेवड़ी बाँटने वाले" ?-मैने विरोध किया
---भाई साहब ! हम न बाँटेंगे ,तो वो खुद ही बाँट लेंगे---शायर अमुक फ़लानवी--- कवयित्री ढेकानवी-- वरिष्ठ कवि अलानवी----कौन है रोकने वाला ? अब तो लोग अपने प्रोफ़ाइल में के पेशा/व्यवसाय कालम मे लिखते है कवि --शायर--साहित्यकार --सब ’स्वयंभू" के "स्वयंभू"। मानो कविता शायरी साधना न हो कर पेशा हो गई ,धंधा हो गई---

-एक बात कहूँ मिश्रा जी ?एक सुझाव दूँ ?
--हाँ हाँ ज़रूर कहें - मिश्रा जी ने चहकते हुए कहा
-"आप कुछ भी न लिखे तो हिन्दी की यही "सबसे बड़ी सेवा" होगी।

मिश्रा जी मुँह बनाते हुए, उठ कर चल दिए ।
अस्तु।



-आनन्द पाठक-

शनिवार, 23 मार्च 2019


जागो मतदाता, जागो
दो एक वर्षों से कई राजनेता सेना के जवानों का अपमान करने की होड़ में लगे हैं.
इन में से एक भी राजनेता ऐसा नहीं है जो सियाचिन की ठंड या रेगिस्तान की चिलचिलाती धूप में आधा घंटा भी रह पाए. जिन कठिनायों का सामना सीमा पर तैनात एक जवान करता है उसका इन्हें रत्ती भर भी अहसास नहीं है.
और आश्चर्य की बात तो यह कि इन सब लोगों को एक्स या वाई या जेड केटेगरी की सुरक्षा मिल हुई है. इनकी जीवन शैली मुगलिया सल्तनत के नवाबों जैसी है. सब का खर्च हम लोग उठाते हैं, वह भी जो दो वक्त की रोटी भी मुश्किल से जुटा पाते हैं.  
यह सम्मानित लोग एक सैनिक का अपमान करने में कभी हिचकते नहीं हैं, क्योंकि हम लोग उन्हें ऐसा करने देते हैं. हम लोग उनकी अभद्र और अपमानजनक बातें सुन कर तालियाँ बजाते हैं और वोट देकर उन्हें विधान सभा या लोकसभा पहुंचाते हैं.
किसी भी देश में ऐसा व्यक्ति जो सेना का अपमान करता है राजनीति में टिक नहीं सकता. पर हमारे देश में ऐसे नेता वर्षों तक राजनीति में फलते-फूलते हैं और खूब उन्नति करते हैं.
दोष हमारा है, इन नेताओं का नहीं. अगर हमें अपनी सेना पर गर्व होता, अगर हमें अपने सैनिकों पर अभिमान होता, अगर सैनिकों और उनके परिवारों के बलिदान के महत्व को हम समझते तो ऐसे नेताओं को हम एक पल के लिए भी राजनीति में सहन न करते. दोष हमारा है कि ऐसे लोगों को हम ने अपना सिरमौर बना कर रखा है.
लेकिन शीघ्र ही हमें अवसर मिलने वाला है. इन नेताओं को स्पष्ट जता देना होगा कि हमें अपनी सेना पर विश्वास है, अपनी सेना पर अभिमान है और उनके बलिदान को हम अपमानित न होने देंगे. इस अवसर हाथ से न जाने दें.
और आइये मिलकर एक मुहीम शुरू करें, और अपनी सेना के सम्मान की रक्षा करें.


गुरुवार, 21 मार्च 2019


छतिसिंहपोरा  नरसंहार
क्या कल आपने किसी मीडिया चैनल पर या किसी समाचार पत्र में छतिसिंहपोरा  नरसंहार के विषय में एक शब्द भी सुना या पढ़ा?
क्या किसी ह्यूमन-राइट्स वाले को इस नरसंहार की बात करते सुना?
वह लोग जो आज़ादी के नारे लगाते है या वह नेता जो उनके समर्थन में खड़े हो जाते हैं या वह जो आये दिन नक्सालियों के लिए आवाज़ उठाते हैं या वह जो फर्जी मुठभेड़ों के लेकर न्यायालयों और ह्यूमन-राइट्स कमीशन के दरवाज़े बार-बार खटखटाते हैं, इनमें से किसी को भी आपने इस नरसंहार में मारे गये लोगों के और उनके अभागे परिवारों के लिए अपने संवेदना प्रकट करते सुना?
किसी ने दिखावटी संवेदना भी प्रकट नहीं की.
शायद इस लेख के अधिकतर पाठक भी न जानते होंगे कि 20 मार्च 2000 के दिन कश्मीर के एक गाँव में 35 सिखों को आतंकवादियों ने घेर कर उनकी निर्मम हत्या कर दी थी. जिनकी हत्या की गई  उन में किशोर भी थे और वृद्ध भी.
वैसे कश्मीर में हत्याओं का सिलसिला तो बहुत पहले शुरू हो गया था. कश्मीरी हिन्दुओं की निर्मम हत्याओं के साथ ही जिहाद की शुरुआत हुई थी. पर छतिसिंहपोरा  नरसंहार एक बहुत ही वीभत्स कांड था, जिसकी न कोई जांच हुई और न ही किसी दोषी को सज़ा मिली.
पर खेद तो इस बात का है कि मीडिया और बुद्दिजीवी और सोशल एक्टिविस्ट और कलाकार और राजनेता जो दुनिया भर में इस बात का ढिंढोरा पीटते हैं की वह मानवाधिकारों के लिए भारत में एक जंग लड़ रहे हैं वह सब छतिसिंहपोरा  नरसंहार को लेकर कितने तटस्थ हैं.
दुर्भाग्य है इस देश का कि ऐसा फर्ज़ी मीडिया और ऐसे फर्ज़ी बुद्दिजीवी यहाँ कितनी सरलता से सफल हो रहे हैं. दोष तो हमारा भी है. हम इस बात को स्वीकार करें या न करें, ऐसे सब नरसंहारों के लिए हम भी थोड़े-बहुत दोषी हैं, क्योंकी हम ने कभी किसी को उत्तरदायी नहीं समझा, चाहे वह सरकार हो या मीडिया या फर्ज़ी बुद्धिजीवी.

मंगलवार, 19 मार्च 2019


गालियाँ ही गालियाँ
गालियों की हो रही है
आजकल खूब बौछार,
देश में आ गया है चुनाव
फिर इक बार,
शिशुपाल भी लगा है
थोड़ा घबराने,
उसका कीर्तिमान तोड़ेंगे
नेता नये-पुराने,
सब नेताओं में लगी है
इक होड़,
गली-गली में हो रही
अपशब्दों की दौड़,
एक बुद्धिजीवी को लगा
यह है सुनहरा अवसर,
रातों-रात  विज्ञापन चिपका दिए
हर सड़क पर,
“गालियाँ ही गालियाँ
बस एक बार मिल तो लें,
प्रोफेसर जी. ‘अपशब्द’ से
सब नेता आज ही मिलें”,
पर प्रोफेसर जी. को
इस बात का न था अहसास,
गालियों का अनमोल खज़ाना था
हर नेता के पास,
फिर प्रोफेसर जी. थे
बंधे मर्यादाओं से अब तक,
लेकिन किस नेता ने फ़िक्र की
मर्यादों की आजतक,
बेचारे नेता भी क्या करें
राजनीति भी एक धंधा है,
पापी पेट के लिए सब करना पड़ता
नोट-बंदी के चलते पहले ही सब मंदा है.