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सोमवार, 11 नवंबर 2019

एक ग़ज़ल : भले ज़िन्दगी से हज़ारों शिकायत---

एक ग़ज़ल : भले ज़िन्दगी से हज़ारों ---

भले ज़िन्दगी से  हज़ारों शिकायत
जो कुछ मिला है उसी की इनायत

ये हस्ती न होती ,तो होते  कहाँ सब
फ़राइज़ , शराइत ,ये रस्म-ओ-रिवायत

कहाँ तक मैं समझूँ ,कहाँ तक मैं मानू
ये वाइज़ की बातें  वो हर्फ़-ए-हिदायत

न पंडित ,न मुल्ला ,न राजा ,न गुरबा
रह-ए-मर्ग में ना किसी को रिआयत

मेरी ज़िन्दगी ,मत मुझे छोड़ तनहा
किसे मैं सुनाऊँगा अपनी हिकायत

बुरा मानने की नहीं बात ,जानम
है जिससे मुहब्बत ,उसी से शिकायत

निगाहों में उनके लिखा था जो ’आनन’
झुका सर समझ कर मुहब्बत की आयत

-आनन्द.पाठक--

शब्दार्थ
फ़राइज़ = फ़र्ज़ का ब0व0
शराइत = शर्तें [ शर्त का ब0व0]
रह-ए-मर्ग = मृत्यु पथ पर [ मौत की राह में ]
अपनी हिकायत  = अपनी कथा कहानी
आयत = कलमा-ए-क़ुरान [ की तरह पाक] -

बुधवार, 6 नवंबर 2019

हरसिंगार

हे हरसिंगार
ओ शेफाली
अरी ओ प्राजक्ता !
सुना है
तू सीधे स्वर्ग से
उतर आई थी
कहते है
सत्यभामा की जलन
देवलोक से
पृथ्वी लोक पर
तुझे खींच लाई थी
तू ही बता
है ये चन्द्र का प्रेम
या सूर्य से विरक्ति
कि बरस में
फ़कत एक मास
सिर्फ रात को
देह तेरी
हरसिंगार के फूलों से
भरभराई थी !

रविवार, 3 नवंबर 2019

एक ग़ज़ल : दुश्मनी कब तक निभाओगे---

एक ग़ज़ल : दुश्मनी कब तक-----

दुश्मनी कब तक निभाओगे कहाँ तक  ?
आग में खुद को जलाओगे  कहाँ  तक  ?

है किसे फ़ुरसत  तुम्हारा ग़म सुने जो
रंज-ओ-ग़म अपना सुनाओगे कहाँ तक ?

नफ़रतों की आग से तुम खेलते हो
पैरहन अपना बचाओगे  कहाँ  तक ?

रोशनी से रोशनी का सिलसिला है
इन चरागों को बुझाओगे कहाँ  तक ?

ताब-ए-उलफ़त से पिघल जाते हैं पत्थर
अहल-ए-दुनिया को बताओगे कहाँ  तक ?

झूठ की तलवार से क्या खौफ़ खाना
राह-ए-हक़ हूँ ,आजमाओगे  कहाँ तक ?

सब गए हैं ,छोड़ कर जाओगे तुम भी
महल अपना ले के जाओगे कहाँ  तक ?

जाग कर भी सो रहे हैं लोग , कस्दन
तुम उन्हें ’आनन’ जगाओगे कहाँ  तक ?

-आनन्द.पाठक-

शब्दार्थ
पैरहन = लिबास ,वस्त्र
ताब-ए-उलफ़त से = प्रेम की तपिश से
अहल-ए-दुनिया को = दुनिया के लोगों को
राह-ए-हक़ हूँ    = सत्य के मार्ग पर हूँ
क़सदन            = जानबूझ कर

शनिवार, 2 नवंबर 2019

क्या मैं कयामत हूं

तुम ही कहो न 
क्या मैं ख्वाहिश को
देर तक याद में तेरी ....
जागने की ...
इजाज़त दूं ?

तुम ही कहो न
क्या मैं यादों को
खुदा के सजदे सा
नाम  और दर्ज़ा
इबादत दूं ?

तुम ही कहो न
क्यों इन  हवाओं ने
तुझसे लिपटने की 
बदमाशियां की और 
शरारत क्यूं ?

तुम ही कहो न
क्या ग़ज़ल मैं हूं ?
इक नज़्म सी मैं हूं
रूबाइयों की सी
 क़यामत हूं ?

शनिवार, 26 अक्तूबर 2019

एक गीत : आओ कुछ दीप हम जलाएँ--

दीपावली पर विशेष-------

एक गीत : आओ कुछ दीप हम जलाएँ---

एक अमा और हम मिटाएँ
आओ कुछ दीप हम जलाएँ

खुशियाँ उल्लास साथ लेकर
युग युग से आ रही दिवाली
कितना है मिट सका अँधेरा
कितनी दीपावली  मना  ली
अन्तस में हो घना अँधेरा ,आशा की किरण हम जगाएँ,
आओ कुछ दीप हम जलाएँ

नफ़रत की हवा बह रही है
और इधर दीप जल रहा है
रिश्तों पर धूल जम रही है
मन में दुर्भाव पल रहा  है
शान्ति के प्रतीक हैं कबूतर ,आसमान में चलो उड़ाएँ
आओ कुछ दीप हम जलाएँ

जगमग हो दीपमालिका से
हर घर का आँगन ,चौबारा
ज्योति कलश छलक छलक जाए
मिट जाए मन का अँधियारा
आया है पर्व रोशनी का   ,ज्योति-पर्व प्रेम से मनाएँ
एक अमा और हम मिटाएँ ,आओ कुछ दीप हम जलाएँ

-आनन्द.पाठक-

रविवार, 20 अक्तूबर 2019

माहिया (कुड़िये)

कुड़िये कर कुड़माई,
बहना चाहे हैं,
प्यारी सी भौजाई।

धो आ मुख को पहले,
बीच तलैया में,
फिर जो मन में कहले।।

गोरी चल लुधियाना,
मौज मनाएँगे,
होटल में खा खाना।

नखरे भारी मेरे,
रे बिक जाएँगे,
कपड़े लत्ते तेरे।।

ले जाऊँ अमृतसर,
सैर कराऊँगा,
बग्गी में बैठा कर।

तुम तो छेड़ो कुड़ियाँ,
पंछी बिणजारा,
अब चलता बन मुँडियाँ।।

नखरे हँस सह लूँगा,
हाथ पकड़ देखो,
मैं आँख बिछा दूँगा।

दिलवाले तो लगते,
चल हट लाज नहीं,
पहले घर में कहते।।

**************
प्रथम और तृतीय पंक्ति तुकांत (222222)
द्वितीय पंक्ति अतुकांत (22222)
**************
बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया

आल्हा छंद "समय"

कौन समय को रख सकता है, अपनी मुट्ठी में कर बंद।
समय-धार नित बहती रहती, कभी न ये पड़ती है मंद।।
साथ समय के चलना सीखें, मिला सभी से अपना हाथ।
ढल जातें जो समय देख के, देता समय उन्हीं का साथ।।

काल-चक्र बलवान बड़ा है, उस पर टिकी हुई ये सृष्टि।
नियत समय पर फसलें उगती, और बादलों से भी वृष्टि।।
वसुधा घूर्णन, ऋतु परिवर्तन, पतझड़ या मौसम शालीन।
धूप छाँव अरु रात दिवस भी, सभी समय के हैं आधीन।।

वापस कभी नहीं आता है, एक बार जो छूटा तीर।
तल को देख सदा बढ़ता है, उल्टा कभी न बहता नीर।।
तीर नीर सम चाल समय की, कभी समय की करें न चूक।
एक बार जो चूक गये तो, रहती जीवन भर फिर हूक।।

नव आशा, विश्वास हृदय में, सदा रखें जो हो गंभीर।
निज कामों में मग्न रहें जो, बाधाओं से हो न अधीर।।
ऐसे नर विचलित नहिं होते, देख समय की टेढ़ी चाल।
एक समान लगे उनको तो, भला बुरा दोनों ही काल।।

मोल समय का जो पहचानें, दृढ़ संकल्प हृदय में धार।
सत्य मार्ग पर आगे बढ़ते, हार कभी न करें स्वीकार।।
हर संकट में अटल रहें जो, कछु न प्रलोभन उन्हें लुभाय।
जग के ही हित में रहतें जो, कालजयी नर वे कहलाय।।

समय कभी आहट नहिं देता, यह तो आता है चुपचाप।
सफल जगत में वे नर होते, लेते इसको पहले भाँप।।
काल बन्धनों से ऊपर उठ, नेकी के जो करतें काम।
समय लिखे ऐसों की गाथा, अमर करें वे जग में नाम।।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया

रविवार, 6 अक्तूबर 2019

एक व्यंग्य : रावण का पुतला

[ विजय दशमी के पर्व पर विशेष----
एक व्यंग्य ----रावण का पुतला

 ---- आज रावण वध है । 40 फुट का पुतला जलाया जायेगा । विगत वर्ष 30 फुट का पुतला जलाया गया था। इस साल रावण का कद बढ़ गया । पिछ्ले साल से इस साल लूट-पाट ,अत्याचार ,अपहरण ,हत्या की घटनायें बढ़ गई तो ’रावण’ का  कद भी बढ गया।रावण बलात्कार नहीं करता था क्योंकि वह ’रावण’ था । रामलीला की  तैयारियाँ पूरी हो चुकी हैं  मैदान में भीड़ इकठ्ठी हो रही है । बाल-बच्चे,  महिलायें , वॄद्ध,  नौजवान सब धीरे धीरे ’राम लीला’ मैदान में आ रहे हैं ।आज रावण वध देखना है  । मंच सजाया रहा है । इस साल मंच बड़ा बनाया जा रहा है ।  इस साल वी0आई0पी0 -लोग ज़्यादा आयेंगे। सरकार में कई पार्टियों का योगदान है- सभी पार्टी के नेताओं को जगह देना  है मंच पर । पिछली साल ’अमुक’ पार्टी के नेता जी को मंच पर जगह नहीं मिली थी तो बिफ़र गये थे मंच पर ही ।-धमकी देकर गए थे---’हिन्दुत्व ’ पर ,आप का ही मात्र ’कापी -राईट’ नही है  है ? --हमारा भी है। इसी लिए तो ’काँग्रेस’  छोड़ कर इधर आये  वरना उधर क्या बुरे थे?  इस बार कोई दूसरा नेता न बिदक जाये -इस लिए मंच बड़ा रखना ज़रूरी है सबको जगह देना है --सबका साथ -सबका विकास और अब तो सबका विश्वास लेना ज़रूरी है । पता नहीं कब टाँग खींच दे । ’राम-सीता-लक्षमण-हनुमान ’ की जगह कम पड़ गई  -तो क्या हुआ ?-} उन्हें  जगह की क्या ज़रूरत ।वो तो सबके दिल में है  परन्तु वी0आई0पी0 लोगो को मंच पर जगह कम न पड़ जाये।
नेता आयेंगे।अधिकारी गण आयेंगे। रावण वध देखने। मंच पर वो भी आयेंगे जिन पर ’बलात्कार’ के आरोप हैं ---वो भी आयेंगे जिनपर  ’घोटाले’ का आरोप हैं ---वो भी आयेंगे जो ’बाहुबली’ हैं जिन्होने आम जनता के ’ खून’ का बूँद बूँद चूस कर अपने ’घट’ भरे हैं---रावण ने भी भरा था। वो भी आयेंगे जो कई ’लड़कियों’ का अपहरण कर चुके है -वो भी आयेंगे जिन पर ’रिश्वत’ का आरोप है ।’भारत तेरे टुकड़े होंगे’ वाले भी आयेंगे ।कहते है- आरोप से क्या होता है ? सिद्ध भी तो होना चाहिये। सब भगवान को माला पहनायेंगे--बगल में कोने में सिमटे ’राम’ जी सब सुन रहे हैं -उन्हे ’रावण वध’ करना है --इधर वाले का नहीं --सामनेवाले  का --पुतले का।
उधर रावण का पुतला खड़ा किया जा रहा है -भारी है । अपने पापों से भारी है ।सेठ जी ने बड़ा चन्दा  देख कर खड़ा करवाया  है।  कमेटी वालों ने येन केन प्रकारेण ’पुतला’ खड़ा कर के सीना चौड़ा किया और चैन की साँस ली । पुतला खड़ा हो गया मैदान में उपस्थित सभी लोगों ने तालिया बजाई । सब की नज़र में आ गया रावण का पुतला --उसका पाप --उसका ’अहंकार’ --उसका ’लोभ--उसका रूप ’ । यही तो देखने आए हैं इस मेला में। ऐसे पापियों का नाश अवश्य होना चाहिए} वध में अभी विलम्ब है। राम- लक्ष्मण जी अपना तीर धनुष लेकर पहुँच चुके हैं --मगर रावण को अभी नहीं मार सकते ।भगवान को इन्तज़ार करना पड़ेगा। मुख्य अतिथि महोदय अभी नहीं पहुँचे हैं।
मैदान में लोग आपस में बात चीत कर रहे हैं --समय  काटना है।
कान्वेन्ट के एक बच्चे ने रावण के पुतले को देख कर अपनी जिज्ञासा ज़ाहिर किया-"मम्मा हू इस दैट अंकल"?
"बेटा ! ही इज ’रावना’ --लाइक योर डैडू । रामा विल किल ’रावना’-थोड़ी देर में
बच्चे को -’डैडू’ वाली बात तो  समझ में नहीं आई ,पर ’रामा’ किल ’रावना’ वाली बात समझ में आ गई
उधर "हरहुआ’ अपने काका को बता रहा था  --’काका ! ई अब की बार का पुतला न बड़ा जानदार बनाया है } महँगा होगा?
काका ने अपना अर्थ शास्त्र का ज्ञान बताया--- हाँ  ,अरे ! बड़े आदमी का पुतला भी मँहगा होता है रे । हम गरीबन का थोड़े ही है कि एक मुठ्टी घास ले कर फूंक  दिया ---
रमनथवा की बीबी ने कान में अपने मरद से कुछ कहा -"सुनते हो जी ! हमें तो आजकल महेन्दरा की नीयत ठीक नहीं लगती---बोली-ठोली करता रहता है  --हमें तो उसकी नज़र में खोट नज़र आ रहा है---"
’अच्छा ! स्साले को ठीक करना पड़ेगा"-रामनाथ ने बोला--"बहुत चर्बी चढ़ गई है उस को . बड़ा ’रावण’ बने फिर रहा है ।छोड़ , तू रावण देख---"
उधर शर्मा जी ने माथुर साहब से कहा -" या या पुतला इज वेरी नाइस --बट  इट लैक ए ’टाई’
माथुर साहब ने हामी भरी ---यस सर ! हम लोग ’टाई ’ में कितना ’नाइस" लगता है--बेटर दैन ’रावना’
 भीड़ बेचैन हो रही थी । मुख्य अतिथि महोदय अभी तक पहुँचे नही ।मोबाइल से खबर ले रहे हैं --अरे  कितनी  भीड़ पहुँची  है मैदान में  अभी ?---नेता जी के चेला-चापड़ खबर दे रहे हैं - बस सर आधा घंटा और ।पहुँचिए रहें हैं लोग । नेता जी तो भीड़ से ही जीते हैं  ---रावण को क्या मारना ...?जल्दी क्या है ?--- रावण तो यूँ ही हर साल मरता है । चुनाव तो इस साल है।   राम जी उधर अपना डायलाग’ याद कर रहे हैं
--अब रावण भी बेचैन होने लगा। एक तो मरना और उस पर धूप में खड़ा होने की सज़ा ।पता नहीं ये मुख्य अतिथि का बच्चा कब आयेगा  उसका धैर्य अब जवाब देने लगा । अन्त में बोल उठा---
"हा ! हा ! हा! हा! मैं ’रावण’ हूं
भीड़ उस की तरफ़ मुड़ गई । ये कौन बोला --रावण कहां है --ये तो पुतला है । सभी एक दूसरे को आश्चर्य भरी दॄष्टि से देखने लगे- ये पुतला कहां से बोल रहा है?
"हा ! हा! हा! हा!’ -पुतले से पुन: आवाज़ आई-- मैं पुतला नहीं ,रावण बोल रहा हूँ ,! अरे भीड़ के हिस्सों ! मूढ़ों   तुम लोग क्या समझते हो कि तुम लोग मुझे मार दोगे? वाल्मीकि से लेकर तुलसी तक,राधेश्याम से लेकर नन्ह्कू हलवाई तक सभी ने मुझे मारा । क्या मैं मरा?  हर साल तुम ने मुझे मारा । क्या मैं मरा? तुम कहते हो कि मैने ’सीता का अपहरण किया ? क्या मेरे मरने  के बाद सीता का अपहरण बन्द हो गया । क्या तुम्हारे ’बाहुबली’ लोग अब सीता का  ’अपहरण’ नही करते?--उन्हें ’फ़ाइव स्टार’ होटल में क़ैद कर के नही रखते? कहते हो कि मैने छल किया --क्या तुम लोग छल नहीं करते ?मैं ’अहंकारी’ था .क्या तुम लोग सत्ता के नशे में ’अहंकारी’ नहीं हो?
हा हा ! हा! हा!
-----मैं मरता नही  अपितु ज़िन्दा हो जाता हूँ हर साल -----तुम्हारे अन्दर --- लोभ बन कर ,,,,हवस बन कर,,,, , छल बन कर ...अहंकार बन कर ---ईर्ष्या बन कर--परमाणु बम्ब बन कर --हाईड्रोजन बम्ब बन कर ।हर देश में ..हर काल में मैं ज़िन्दा रहा हूँ मैं । हर युद्ध में  ,हर मार काट में --कभी सीरिया में ----कभी लेबनान मे--- । तुम विभीषण’  को पालते हो क्यों कि वह तुम्हे ’सूट’ करता है ----तुमने कभी अपने अन्दर झांक कर नही देखा ---तुम देख  भी नही सकते -तुम देखना चाहते भी नही -तुम्हे मात्र मुझ  पर पत्थर फ़ेकना आता है --क्योंकि तुम्हे आसान लगता है --तुम अपने आप पर ’पत्थर नहीं  फ़ेंक सकते----- - मुझे जलाना तुम्हे आसान लगता है -तुम अपने अन्दर का लोभ नहीं जला सकते -मुझे मारना तुम्हे आसान लगता है ---तुम अपने आप का ’अहंकार नही मार सकते । - मेरा अहंकार स्वरूप दिखता है ---।तुम्हे मेरे नाम से नफ़रत है--तुम्हें अपने अन्दर की नफ़रत नहीं दिखती -कोई  अपने बेटे का नाम ’रावण’ नही रखना चाहता ----सब ’राम’ का ही नाम रखना चाहते हैं ---कई ढोंगी बाबा लोग तो राम के नाम की आड़ में क्या क्या कुकर्म नहीं करते ---ऐसा ही चलता रहा तो भविष्य में लोग ’राम’ का नाम  भी रखने में 2-बार सोचेंगे  । मैने  तो राम के नाम का सहारा नहीं लिया  -।  रावण एक प्रवॄत्ति है--उसे कोई नही मार सकता--अगर कोई मार सकता है बस--तुम्हारे दिल के अन्दर का ’रामत्व’ ही मुझे मार सकता है --- तुम राम नही ----अपने अन्दर का ’रामत्व’ जगाऒ ---क्षमा जगाओ----करुणा जगाओ--प्यार जगाओ -- मैं खुद ही मर जाऊँगा----

’या ही इज टाकिंग समथिंग नाइस’-- शर्मा जी ने कहा

माथुर साहब ने हुंकारी भरी--’ जब मौत सामने दिखाई देती है तो ज्ञान निकलता है  सर --दैट इज व्हाट एक्ज़ैक्टली ही इज टाकिंग’ सर !
कथावाचक ने जैसे ही अपने हारमोनियम पर तान छेड़ी---’रावन रथी ,विरथ रघुबीरा-----उसी समय मुख्य अतिथि महोदय अपने "रथ’ मर्सीडीज़ कार से पधारते भए।
माईक से घोषणा हुई --- भाइयो और बहनो ! आप के दुलारे और हम सब के चहेते मुख्य अतिथि महोदय अब  हमारे बीच पधार चुके है ---जोरदार तालियों से उनका स्वागत कीजिए। थोड़ी देर में ’रावण वध’ का आयोजन किया जायेगा
सब ने अपने अपने हाथ में पत्थर  उठा  लिए।
अस्तु
-आनन्द.पाठक

मंगलवार, 1 अक्तूबर 2019

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 हिंदी पर राजनीति


आज हमारे देश भारत में किसी भी मुद्दे पर राजनीति संभव है। चाहे वह क्षेत्र हो , भाषा हो, सवर्ण या दलित संबंधी हो, सेना हो या कोई व्यक्ति विशेष ही क्यों न हो। यहाँ तो मुद्दे बनाए ही जाते हैं राजनीति के लिए । किसी भी मुद्दे का कभी भी राजनीतिकरण किया जा सकता है। हमारे राजनेता चाहे वो किसी भी पार्टी के हों, इसमें विलक्षण प्रतिभा रखते हैं। यहाँ तक कि भारत भू-भाग के दिशाखंड – पश्चिमी भारत, दक्षिणी भारत या अंचल - विदर्भ, सौराष्ट्र, रॉयलासीमा, मराठवाड़ा जैसे क्षेत्रों के साथ भी राजनीति जुड़ी हुई है। किसी भी मुद्दे पर जनता को बाँटकर उसे वोट में परिवर्तित करने की राजनीति यहाँ प्रबल है। मैं न विदेश गया न जाने की तमन्ना है इसलिए वहाँ के हालातों को बयाँ करना या उनसे तुलना करना मेरे लिए संभव नहीं है।

इस देश में राजनीतिक मुद्दे कुरेद - कुरेद कर निकाले व बनाए जाते हैं। इतिहास को कुरेदकर मुद्दे निकालना और उनका ढिंढोरा पीट - पीटकर जनता को पुनः - पुनः जगाना, फिर उससे जनता को बाँटकर वोट में तब्दील करना - राजनीतिज्ञों का विशोष काम रह गया है। दल कोई भी हो, नेता कोई भी हो, काम यही है। लोगों को वोटों के लिए बरगलाने के सिवा नेताओं का कोई काम नहीं रह गया है, न ही राजनीति का मकसद कुछ और है। यही उनका जीवन यापन है, यही उनका धंधा है। इसी मकसद के कारण यहाँ मुद्दे सुलझाए नहीं जाते, उलझाए जाते हैं और सड़ने की लिए रखे जाते हैं और चुनाव – दर - चुनाव उन्हें बार - बार भुनाया जाता है - वोटों के लिए. भारत की ज्यादातर जनता बेचारी इस विषय में या  तो मूर्ख है या मतलब के लिए मूर्ख ही बनना पसंद करती है. जब नेता और जनता एक मत हों तो कुछ और कैसे होगा इसलिए मुद्दे तो बनते हैं, पर कभी सुलझते नहीं, उनको उलझाने का काम नेताओं ने ले रखा है. साथ में उलझती है जनता और नेता वोट बटोर लेते हैं. मुद्दा सुलझा मतलब एक वोट बैंक मृत.

बोफोर्स, गोधरा, भोपाल गैस, 1984 के दंगे, राष्ट्रभाषा का मुद्दा, आरक्षण का मुद्दा (विशेषकर नारी आरक्षण) व सुविधाएँ  ये सब ऐसे ही वोटदायक मुद्दे हैं जिन पर राजनेताओं की श्वास चलती है. राममंदिर, बेरोजगारी, गरीबी, गंगा (नदियों) की सफाई ऐसे बहुत गिनाए जा सकते हैं. इतिहास से कुरेदकर नए मुद्दे भी जोड़े जा रहे हैं. गाँधी हत्या ऐसा ही नया जीता 

रविवार, 29 सितंबर 2019

चिड़िया: कहो ना, कौनसे सुर में गाऊँ ?

चिड़िया: कहो ना, कौनसे सुर में गाऊँ ?: कहो ना, कौनसे सुर में गाऊँ ? जिससे पहुँचे भाव हृदय तक, मैं वह गीत कहाँ से लाऊँ ? इस जग के ताने-बाने में अपना नाता बुना ना जाए ना जाने...

शनिवार, 21 सितंबर 2019

पिंजरे का पंछी

मैं जीना चाहूं बचपन अपना,
पर कैसे उसको फिर जी पाऊं!
मैं उड़ना चाहूं ऊंचे आकाश,
पर कैसे उड़ान मैं भर पाऊं!
मैं चाहूं दिल से हंसना,
पर जख्म न दिल के छिपा पाऊं।
मैं चाहूं सबको खुश रखना,
पर खुद को खुश न रख पाऊं।
न जाने कैसी प्यास है जीवन में,
कोशिश करके भी न बुझा पाऊं।
इस चक्रव्यूह से जीवन में,
मैं उलझी और उलझती ही गई।
खुशियों को दर पर आते देखा,
पर वो भी राह बदलती गई।
बनकर इक पिंजरे का पंछी,
मैं बंधन में नित बंधती गई।
आंखों के सपने ,सपने ही रहे,
औरों के पूरे करती रही।
हर मोड़ पर सबका साथ दिया,
अपने ग़म में बस अकेली रही।
मेरे मन की बस मन में रही,
पल-पल बस मैं घुटती रही।
नित नई परीक्षा जीवन की,
बस जीवन को ही पढ़ती रही।

अभिलाषा चौहान
स्वरचित मौलिक

शुक्रवार, 20 सितंबर 2019

एक ग़ज़ल

एक ग़ज़ल

जान-ए-जानाँ  से  क्या  माँगू ?
दर्द-ए-दिल की दवा माँगू

हुस्न उनका क़यामत है
दाइमी की  दुआ  माँगू

क़ैद हूँ जुर्म-ए-उल्फ़त में
उम्र भर की सज़ा  माँगू

ज़िन्दगी भर नहीं  उतरे
इश्क़ का वह नशा माँगू

सादगी  से  मुझे  लूटा
वो ही तर्ज-ए-अदा माँगू

आप की बस इनायत हो
आप से और क्या माँगू

हमसफ़र आप सा ’आनन’
साथ मैं  आप का माँगू

-आनन्द.पाठक-

दाइमी = स्थायी,मुस्तकिल

शुक्रवार, 13 सितंबर 2019

लक्ष्मीरंगम - Laxmirangam: ऐसे सिखाएँ हिंदी

लक्ष्मीरंगम - Laxmirangam: ऐसे सिखाएँ हिंदी: कृपया टिप्पणियाँ ब्लॉग पर करें. G+ की टिप्पणियाँ अस्वीकार्य कर दी गई हैं. ऐसे सिखाएँ हिंदी मैं, मेरे हिंदी की शिक्षिका के सा...


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ऐसे
सिखाएँ हिंदी
किसी भी भाषा को
सीखने  का पहला चरण होता है बोलना। और
बोलना  सीखने के लिए उस भाषा का अक्षरज्ञान
जरूरी नहीं होता। किसी को बोलते हुए देखकर सुनकर
, वैसे
उच्चारण का प्रयास कर किसी भी भाषा को बोलना सीखा जा सकता है। बहुत से लोग तो
विभिन्न भाषाओं के सिनेमा देखकर ध्वनि व चित्र के समागम से ही शब्द का उच्चारण और
अर्थ सीख लेते हैं। दोस्तों व परिवारजनों के साथ बात करते करते नए शब्दों को सीखना
और उनका सही उच्चारण करना आसान हो जाता है। इस तरह समाज में रहकर समाज की भाषा
बोलना सीखना एक बहुत ही आसान जरिया है। पर ऐसे में इस बोली में कुछ गलतियों का
समावेश सहजता से हो जाता है।
अगला कदम होता है
लिखना – पढ़ना, जो बोलने के साथ - साथ भी सीखा जा सकता है। वैसे केवल पढ़ना भी कुछ
अतिरिक्त मेहनत करके सीखा जा सकता है। इसी दौरान बोलने की प्रक्रिया के उच्चारण
दोष सही किए जा सकते हैं। अन्यथा ये हमेशा - हमेशा के लिए घर कर जाते हैं। इसलिए
शिक्षकों को चाहिए कि लिखने - पढ़ने की प्रक्रिया के दौरान शिक्षार्थियों के
उच्चारण पर विशेष ध्यान देकर उनमें आवश्यक सुधार करना चाहिए। गलत उच्चारण के कारण ही
लेखन में वर्तनी की गलतियाँ होती हैं और भाषा में अशुद्धता आ जाती है।
अक्षर
और मात्राओँ को सिखाने - सीखने के दौरान शिक्षकों 
को निम्न विषयों पर ध्यान देना चाहिए –

1.     
म और भ  में शिरोरेखा (मस्तक रेखा) की गलती से भ्रम हो
जाता है किंतु इस पर ध्यान नहीं जाता कि म और भ में एक घुंडी का भी फर्क है। इस
घुंडी का ख्याल करने से शिरोरेखा की गलती का कोई असर नहीं होगा।
2.     
घ और ध में भी शिरोरेखा
(मस्तक रेखा) की गलती से भ्रम हो जाता है किंतु इस पर ध्यान नहीं जाता कि घ और ध
में भी एक घुंडी का भी फर्क है। इस घुंडी का ख्याल करने से शिरोरेखा की गलती का
कोई असर नहीं होगा।
3.     
क और फ में भी समानता
होते हुए भी फर्क है। यदि क की गोलाई शिरोरेखा से जुड़ जाए तो फर्क मिट जाता है।
इसलिए क की गोलाई को शिरोरेखा को बचाकर ही लिखा जाना चाहिए।
4.     
प, य और थ – प की गोलाई
में थोड़ी सी वक्रता से वह य का आकार ले लेता है। इस पर ध्यान दिया जाना चाहिए। उस
पर य में घुंडी मात्र के फर्क से यह थ का रूप ले लेता है।
इसी तरह ङ और ड़
में नुक्ता की स्थिति पर गौर करना जरूरी है।
शिक्षकों को
चाहिए कि वे शिक्षार्थियों को इन फर्कों से अवगत कराएँ एवं सुनिश्चित करें कि वे
इन गलतियों को करने से बचें।
इसी तरह मात्राओं
ए (के) और  ऐ (कै) में फर्क भलीभाँति
समझाया जाए। आज भी बच्चे एक में ए पर मात्रा लगाते पाए जाते हैं। उन्हें शायद इस
बात का ज्ञान नहीं होता कि ए में ही मात्रा निहित है, इसके बदले ही मात्रा लगाई
जाती है। ऐ में एक मात्रा अक्षर की है और दूसरी लगाई गई है। किसी अन्य वर्ण में ए
के लिए एक मात्रा और ऐ के लिए दो मात्राएँ लगती हैं ( जैसे के और कै)।
इनके अलावा
मात्राओँ के प्रयोग में विशेषकर सिखाया जाना चाहिए कि निम्न वर्णों में मात्राएँ
सामान्य वर्णों से भिन्न तरीके से लगाई जाती है। यह वर्ण विशेष रूप में लिखे जाते
हैं।
जैसे रु, रू, हृ।
साधारणतः उ और ऊ  की मात्राएँ वर्ण के नीचे
लगाई जाती है, पर र में यह पीठ पर लगती है। वैसे ही ऋ की मात्रा साधारणतः पैरों पर
लगती है, पर ह वर्ण में कमर पर लगाई जाती है। ह वर्ण के साथ जुड़ने वाला हर वर्ण
कमर पर ही जुड़ता है. जैसे आह्लाद, आह्वान, असह्य , चिह्न, अल्हड़, दूल्हा,
कान्हा, और उन्होंने। आप चाहें तो इन्हें अपवाद कह सकते हैं और इसीलिए इन पर विशेष
ध्यान देना जरूरी है। रु और रू पर विशेष ध्यान देना इसलिए भी जरूरी है कि र पर ऊ
की मात्रा पीठ से सटी नहीं होती, बीच में एक छोटी लकीर होती है जिसे अक्सर नजरंदाज
किया जाता है। वैसे ही श पर र की टँगड़ी लगने पर उसका रूप बदल कर श्र हो जाता है।
मात्राओँ में एक
और मात्रा है जिस पर विशेष ध्यानाकर्षण की आवश्यकता है। वह है र की मात्रा। निम्न
शब्दों पर गौर करें।
प्रथम,  पर्यटन, ट्रक।
क्रम, कर्म,
ट्रेन।
अब इनके विस्तार
देखिए –
प्रथम – प्
++ +    - (र पूरा है)
पर्यटन – प
+ र् + + + - ( र आधा है)
ट्रक -  ट् +
+   - (र पूरा है)
क्रम
– क्

+ +   - (र पूरा है)
कर्म – क
+ र् +   - ( र आधा है)
ट्रेन – ट्
+ रे +       - (र पूरा है)
इनमें आप देखेँगे
कि सभी शब्दों में र आधा नहीं है, जैसे कि आभास होता है।
जहाँ र की मात्रा
पैरों पर है वहाँ अक्षर आधा है, पर र पूरा है।
इसे (क्र) र की
टँगड़ी कहते हैं, जो गोलाकार वर्णों में ट्र जैसी हो जाती है।
र की जो मात्रा
सर पर टोपी जैसे लिखी जाती है उसे र का रेफ कहा जाता है और उसमें र आधी होती है।
ध्यान
दीजिए कि अन्य भारतीय भाषाओं की तरह हिंदी में भी मस्तक पर लगने वाली व्यंजन
मात्रा का (शिरोमात्रा) उच्चारण अक्षर से पहले होता है और पैरों पर लगने वाली
मात्राओं का (पदमात्रा) उच्चारण अक्षर के बाद होता है।
पर इसमें एक
अपवाद भी है – अनुस्वार।
देखिए शब्द चंदन
को – अनुस्वार को हटाकर लिखें तो पंचमाक्षर नियमानुसार चन्दन लिखा जाना चाहिए।
यानी अनुस्वार को हटाकर उसकी जगह अगले वर्ण वर्ग के पंचमाक्षर स्थित अनुस्वार वर्ण
का प्रयोग करना चाहिए। इस तरह देखा जा सकता है कि अनुस्वार मस्तक पर लगते हुए भी
अक्षर के बाद उच्चरित होता है। इसी तरह कंगन (कङ्गन), मुंडन (मुण्डन), बंधन (बन्धन),
चंबल (चम्बल) लिखे जाते हैं। ऐसा देखा गया है कि हिंदी में स्नात्तकोत्तर
विद्यार्थी भी पंचांग शब्द को बिना अनुस्वार के लिखने से कतराते हैं । इसे सही में
पञ्चाङ्ग लिखा जाना चाहिए। यहाँ एक बात ध्यान देने योग्य है कि वैयाकरणों ने
पंचमाक्षर नियम बनाकर वर्गों के अनुस्वार की समस्या तो हल कर दिया, पर वर्गेतर
वर्णों की समस्या तो जस की तस है। हिमाँशु या हिमांशु - इसे अनुस्वार बिना कैसे
लिखें हिमान्शु या हिमाम्शु तय नहीं है। सारा दारोमदार निर्भर करता है कि आप शब्द
को कैसे उच्चरित करते है। अब यह तो वैयक्तिक समस्या हो गई न कि व्याकरणिक। इसीलिए
शायद वर्गेतर वर्ण वाले शब्दों  में
अनुस्वार को पंचमाक्षर से विस्थापित करने का प्रावधान नहीं है।
¶ÆÉÞगार

अब कुछ वर्तनी की
ओर –
1.      आधा श –
गोलाकार वर्णों के साथ आधा श – विश्व सा लिखा जाता है, पर कोनों वाले वर्णों के
साथ काश्मीर सा लिखा जाता है। कुछ शब्द हैं जिनमें दोनों तरह की लिपि मानी जा रही
है - जैसे पश्चात, आश्वासन, कश्ती इत्यादि।

2.      ऐसा ही
एक शब्द है  -  (
¶ÆÉÞगार )  शृंगार , यहाँ आधे श पर ऋ की मात्रा लगाई जा
रही है, जो अपवाद है (ऐसा कहा जाता है कि मात्रा लगने पर हर वर्ण व्यंजन का रूप ले
लेता है। इस अर्थ में शृ में भी श आधा ही है)। लेकिन अक्सर लोग इसे श्रृंगार लिखते
हैं, जो एकदम ही गलत है। शृंगार मे श पर ऋ की मात्रा है, जबकि श्रृंगार में श के
साथ आधा र भी जुड़ा है और उस पर ऋ की मात्रा है।

कुछ दक्षिण
भारतीय  भाषाओं के वर्ग में दो ही अत्क्षर
होते हैं. जौसे क और ङ।  इसलिए उन्हें ख,
घ, छ झ के उच्चारण में तकलीफ होती है. संभव है कि वे
खाना खाया और गाना गाया का उच्चारण काना काया की
तरह ही करें। इसी तरह वर्ग का तीसरा अक्षर न होने के कारण वे ग, ज,ब,द का भी सही
उच्चारण नहीं कर पाते। वे गजेंद्रन को कजेंद्रन कहेंगे। कमला व गमला की वर्तनी एक
सा लिखेंगे, फिर पढ़ने में अदला
- बदली हो जाएगी। ऐसी
जटिलताओँ पर शिक्षकों का ध्यानाकर्षण आवश्यक है ताकि वे समय पर विद्यार्थी के उच्चारण
में सुधार कर सकें। शिक्षकों को चाहिए कि इस तरह की त्रुटियों को बालपन में सुधार
दिया जाए। उम्र के बढ़ने पर सुधार में बहुत कठिनाई होती है। उच्चारण की गलतियाँ
अक्सर वर्तनी में देखी जाती हैं। शब्द विद्यार्थी में द और य का मिश्रण है और
संयुक्ताक्षर द्य बना है. अक्सर लोग ध्य को द्य समझने की गलती करते हैं। इस पर विशेष
ध्यान दिया जाना चाहिए। पता नहीं क्यों भाषाविदों ने श्र को तो संयुक्ताक्षर माना
पर द्य को नहीं। इसी तरह दिल्ली व उत्तरी राज्यों में राजेंद्र को राजेंदर उच्चरित
किया जाता है क्योंकि गुरुमुखी लिपि में अक्षरों को आधा करने का प्रावधान नहीं है,
पर द्वयत्व का प्रावधान है। शिक्षकों को इस पर विशेष गौर करते हुए उचित सलाह देकर
त्रुटियों का निवारण करना चाहिए।
अब आईए अनुनासिक
व अनुस्वार के प्रयोग पर। वैसे वर्तनी के आद्यतन नियमों के अनुसार तो जहाँ शब्दों
या तात्पर्यों का हेर - फेर न हो, वहाँ अनुनासिक की जगह अनुस्वार का प्रयोग हो
सकता है। पर जिसे पता होगा वह गलती करेगा ही क्यों
? सबसे उत्कृष्ट उदाहरण
हैं -  हँस (हँसने की क्रिया) और हंस ( एक
जलचर पक्षी)। अब सवाल आता है कि किसका कहाँ प्रयोग उचित है। एक  नियम जो जानने में आया है वह यह कि जहाँ
अनुस्वार या अनुनासिक वाले शब्द को वर्ग के अंतिम अनुस्वार के साथ लिखा जा सकता है,
वहाँ अनुस्वार लगेगा, वर्ना अनुनासिक। जैसे मंगल ( मङ्गल), चाँद ( इसे चान्द लिखने
से उच्चारण बदल जाता है, अतः यहाँ अनुनासिक ही लगेगा)।
जब किसी शब्द में
वर्ग के पंचमाक्षर का ही द्वयत्व हो, या पंचमाक्षरों का ही समन्वय है तो उसे
अनुस्वार से विस्थापित नहीं किया जा सकता । 
उसे आधे अक्षर के साथ ही लिखा जाना चाहिए। जैसे हिम्मत, उन्नति, जन्म,
कण्णन इत्यादि। इनको हिंमत, उंनति, जंम, कंणन नहीं लिखा जा सकता।
अनुनासिक का
प्रयोग अक्सर वहाँ होता है जहाँ मात्राएँ शिरोरेखा पर न लगी हों – जैसे बाँध,
फँसना, गूँज इत्यादि। जहाँ शिरोरेखा पर मात्राएँ हों तो वहाँ अनुनासिक की  जगह अनुस्वार का ही प्रयोग होता है। जैसे में, मैं,
चोंच, भौंकना इत्यादि। याद रहे कि पहले में और मैं में भी अनुनासिक लगाया जाता था।
अब आते है कुछ
शब्दों के विशिष्ट उच्चारण पर –
 ब्राम्हण
उच्चरित होता है पर लिखा जाता है
ब्राह्मण।वैसे ही आल्हाद कहा जाता है पर आह्लाद लिखा जाता है.
वैसे ही आर्द्र,
सौहार्द्र इत्यादि । शिक्षकों को चाहिए कि ऐसे विशेष शब्दों के उच्चारण व वर्तनी
पर विशेष ध्यान देते हुए विद्यार्थियों को लभान्वित करें।
इन सबसे हटकर एक
और समस्या जो मुख्य तौर पर देखी गई है कि प्रादेशिक भाषा का उच्चारण - जो
विद्यार्थियों के हिंदी उच्चारण में आ जाता है. शिक्षकों को चाहिए कि वे बालपन से
ही इस त्रुटि का निवारण करने का प्रयत्न करें। सही उच्चारण से लिपि में वर्तनी की
शुद्धता बढ़ती है।
आशा है कि शिक्षक
गण, इसमें से जो भी स्वीकार्य हो, उससे बच्चों को लाभान्वित करेंगे।




एक ग़ज़ल : मैं अपना ग़म सुनाता हूँ--

एक ग़ज़ल

मैं अपना ग़म सुनाता हूँ ,वो सुन कर मुस्कराते हैं
वो मेरी दास्तान-ए-ग़म को ही नाक़िस बताते हैं

बड़े मासूम नादाँ हैं  ,खुदा कुछ अक़्ल दे उनको
किसी ने कह दिया "लव यू" ,उसी पर जाँ लुटाते हैं

ख़ुशी अपनी जताते हैं ,हमें किन किन अदाओं से
हमारी ही ग़ज़ल खुद की बता, हमको सुनाते हैं

तुम्हारे सामने हूँ मैं , हटा लो यह निक़ाब-ए-रुख
कि ऐसे प्यार के मौसम कहाँ हर रोज़ आते हैं

गिला करते भला किस से ,तुम्हारी बेनियाज़ी का
यहाँ पर कौन सुनता है ,सभी अपनी सुनाते हैं

तसव्वुर में हमेशा ही तेरी तस्वीर रहती है
हज़ारों रंग भरते हैं, बनाते हैं , सजाते हैं

दिल-ए-सदचाक पर मेरे सितम कुछ और कर लेते
समझ जाते वफ़ा क्या चीज है , कैसे निभाते हैं

मुहब्बत का दिया रख दर पे उनके आ गया ’आनन’
कि अब यह देखना है वो बचाते  या बुझाते हैं

-आनन्द.पाठक--

शब्दार्थ
नाक़िस = बेकार ,व्यर्थ
दिल-ए-सद चाक = विदीर्ण हृदय

मंगलवार, 10 सितंबर 2019

एक व्यंग्य : हिंदी पखवारा और मुख्य अतिथि

14-सितम्बर , हिंदी दिवस के अवसर पर विशेष-----]

एक व्यंग्य : हिंदी पखवारा और मुख्य अतिथि

"अरे भाई मिश्रा जी ! कहाँ भागे जा रहे हो ? " ---आफिस की सीढ़ियों पर मिश्रा जी टकरा गए
’भई पाठक ! तुम में यही बुरी आदत है है । प्रथमग्रासे मच्छिका पात:। तुम्हें मालूम नहीं कि आज से ’हिन्दी पखवारा" शुरू हो रहा है ।
मालूम नहीं कि सरकारी विभाग में हिन्दी पखवारा का क्या महत्व है ? मरने की फ़ुरसत नहीं होती "---मिश्रा जी ने अपना तात्कालिक और सामयिक महत्व बताया।
’अरे ’मार ’कौन रहा है तुम्हें ?-’ बदले में मै ने सहानुभूति जताई ।
इसी बीच मिश्रा जी की हिंदी चेतना जग गई-" मरने" की बात कर रहा हूँ ’डाईंग’--’डाईंग- । ’मारने’ ’बीटिंग’ बीटिंग’ की बात नहीं कर रहा हूँ ।’मरना’ अकर्मक क्रिया है --’मारना’ सकर्मक क्रिया है । मालूम भी है तुम्हें कुछ । मालूम भी कैसे होगा? "फ़ेसबुकिया" हिंदी से फ़ुरसत मिलेगी तब न ।
’अरे जाओ न महराज ,मरो’--मै ने अपना पीछा छुड़ाते हुए ,वहाँ से खिसकना ही उचित समझा।
मेरे पुराने पाठक ,मिश्रा जी से अवश्य परिचित होंगे। जो नए पाठक हैं ,उन्हें मिश्रा जी के बारे में संक्षेप में बता दूँ । मेरा सम्बन्ध मिश्रा जी से वही है जो कभी राजनारायण जी का चौधरी चरण सिंह से था , के0पी0 सक्सेना जी का किसी ’मिर्ज़ा’ से था या अमित शाह जी का मोदी जी से है। मिश्रा जी अतिउत्साह में जब कहीं ’लंका-दहन’ कर के आते हैं तब मुझे ही ’लप्पो-चप्पो’ कर के स्थिति सँभालनी पड़ती है।
मिश्रा ने सही तो कहा । मैं आत्म-चिन्तन में डूब गया । सरकारी विभाग में हिंदी-पखवारा के दौरान हिन्दी -अधिकारी का काम कितना बढ़ जाता है ।कितनी भाग दौड़ करनी पड़ती है ।जाके पैर न फटी विवाई ,सो क्या जाने पीर पराई ।
अब मिश्रा जी ने चिन्तन शुरू कर दिया -आसान काम है क्या एक ’हिंदी-अधिकारी ’ का काम ।बड़े साहब का हिंदी में संबोधन-सन्देश लिखना ,स्वागत-भाषण लिखना, धन्यवाद प्रस्ताव लिखना, हिन्दी की क्या महत्ता है -पर आलेख लिखना । उदघाटन के लिए मुख्य-अतिथि चुनना ,पकड़ना और पकड़ के लाना ।और मुख्य-अतिथि चुनना भी आसान काम है क्या? बड़े-बड़े साहित्यकार तो पहले से ही बुक हो जाते है । शादी के मौसम में बाजा वालों को समय से ’बुक’ न करो तो बजाने वाले भी नहीं मिलते। नखरे ऊपर से।
मुख्य अतिथि पकड़ने-धकड़ने में पिछली बार कितनी परेशानी हुई थी ,।एक ठलुआ निठ्ठल्लुआ साहित्यकार के पास गया था। बैठ कर मख्खी मार रहा था मगर ’किसी हिंदी कविता कहानी ग्रुप का ’फ़ेसबुकिया एड्मिनिस्ट्रेटर’ था । हिंदी-ग्रुप का फ़ेसबुकिया संचालक भी अपने आपको हिंदी का "मूर्धन्य साहित्यकार’ मानता है । और जो उसे नहीं मानता ,वह उसे ’लतिया’ देता है अपने ग्रुप से । वह अपने नाम के आगे ’कवि अलानवी ’ वरिष्ठ लेखक , कथाकार ढेकानवी ..शायर फ़लानवी लिख लेता है । ख़ुद ही मोर पंख लगा लेता है।
ऎसे ही एक महानुभाव के पास .हिंदी-दिवस के लिए निमन्त्रित करने गया ।
"भई मेरे पास तो टैम नहीं है ’मुख्य अतिथि’ बनने का । दसियों जगह से निमन्त्रण आए हैं ।आप ही बताएँ कहाँ कहाँ जाऊँ। आप मेरे ’रेगुलर क्लाईन्ट’ है तो कुछ न कुछ करना ही पड़ेगा ।डायरी देख कर बताता हूँ।भाई साहब ने अपनी डायरी देखी,माथे पर कुछ चिन्ता की लकीरें उभारी, कुछ मुँह बनाया,कुछ ओठ बिचकाया ,कभी चश्मा उतरा ,कभी चश्मा चढ़ाया और अन्त में प्रस्फुटित हुए--" मुश्किल है भाई साहब । किसी प्रकार एक-घंटा निकाल सकता हूँ आप के लिए।भई मेरे पास गाड़ी तो नहीं है आप को ही ले जाना पड़ेगा और वापस छोड़ना पड़ेगा। बच्चों के लिए कुछ उपहार होना चाहिए -’पत्रम-पुष्पम’ वाला लिफाफा ज़रा वज़नदार होना चाहिए-----"
"सर ! यह कुछ ज़्यादा नहीं है ? इतना बजट नहीं है ,सर अपना "-मैने अपनी ’दंत -चियारी ’ करते हुए सरकारी असमर्थता जताई ।
" तो आज ही उदघाटन करा लो,फीता कटवा लो । सस्ते में कर दूँगा’---उन्होने हिंदी सेवा का अपना व्यापारिक रूप दिखाया
’सर !’हिंदी दिवस’ आज नहीं है न ,वरना आज ही बजवा लेता मतलब फीता कटवा लेता।
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पितॄ-पक्ष में कौए पूजे जाते हैं । अच्छे-अच्छे पकवान खिलाये जाते है। इस उमीद से कि पुरखे तर जाएंगे ।हिंदी-पखवारा में न जाने क्यों हिन्दी साहित्यकार ही बुलाए जाते हैं।इस उमीद से कि हिंदी तर जायेगी । मान्यता है बस।

कोई मिला नहीं तो थक हार कर उन्हीं महोदय को मोल भाव कर के लाया । पखवारा का अन्तिम दिन था सस्ते में --गाड़ी से ले आने-ले जाने की शर्त पर मान गए ।
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हिंदी पखवारा का आख़िरी दिन । 14-सितम्बर।
सभागार भरा हुआ है । सरकारी अधिकारी मंच पर बैठ गए।माला फूल हार पहना दिए गए। सरस्वती-वंदना हो गई । दीप-प्रज्ज्वलित हो गया । उदघाटन हो गया-। मुख्य अतिथि महोदय माइक पर आए और भाषण शुरु किया।
"-- पहले मैं आप सभी का धन्यवाद ज्ञापन कर दूँ कि आप ने इस पावन अवसर पर इस अकिंचन को याद किया ---आप सब जानते हैं -आज ही के दिन हिंदी हमारी ---गाँधी जी ने कहा था अगर देश को एक सूत्र में कोई पिरो सकता है तो वह है हिंदी---नेहरू जी ने कहा था-----हिन्दी एक भावना है ---जो भरा नहीं है भावों से ,जिसमें बहती रसधार नहीं , वो हृदय नहीं है पत्थर है-- ।हिंदी भारत माँ की बिंदी है------
"बात यहीं से शुरु करते हैं --हिन्दी पखवारा--’ उन्होने पीछे मुड़ कर दीवार पर टँगे हुए बैनर को देखते हुए कहा--" हिंदी-पखवारा। कभी आप ने ध्यान दिया कि यह शब्द कैसे बना? नहीं दिया न ? आज मैं बताता हूँ-- ’पखवारा ’- पक्षवार से बना है ।जैसे ’ईक्ष’ को "ईख’ को बोलते हैं । यानी’क्ष’ को ’ख’ बोलते है । पक्ष यानी 15-दिन का एक पक्ष--कॄष्ण पक्ष--शुक्ल पक्ष। अब तो लोग ’हिंदी-सप्ताह’ को भी लोग हिंदी पखवारा बोलने लग गए। कहीं कहीं कुछ लोग ’हिंदी-पखवाड़ा’ भी बोलते है ।कुछ जगह तो लोग -’ड़’- को -’र’ भी बोलते है जैसे "घोरा सरक पर पराक पराक दौर रहा है ’ ।यह किस प्रदेश की भाषा है यह न पूछियेगा । आप इस चक्कर में न पड़े कि पखवारा है कि पखवाड़ा-है । मगर --बैनर हमेशा वक्ता के पिछवाड़ा ही टँगा रहता है
--तालियाँ बजने लगी । क्या ज्ञान की बात कर रहा है बन्दा ।वाह वाह ।उन्होने अपना भाषण जारी रखा।
"अन्त में । हिंदी सबसे ज़्यादा बोली जाने वाली भाषा है---मैं पिछली बार जब अमेरिका गया था-तो लोगों का हिंदी प्रेम देख कर मन अभिभूत हो गया --अगर आप कभी ’ऎडीसन’ गए हों --’ऎडीसन’ न्यूजर्सी की एक काउन्टी है -तो आप को लगेगा कि आप फिर भारत में आ गए जैसे कि आप यू0पी0 में हैं बिहार में हैं -- उस से पहले मैं रूस गया था तो वहाँ भी हिंदी बोली जाती है--आवारा हूँ [मैं नहीं] -मेरा जूता है जापानी --मेरा दिल है हिन्दुस्तानी ---हिंदी सुन कर मेरा सर श्रद्धा भाव से झुक गया हिन्दी के अगाध प्रेम के प्रति। जापान की बात तो खैर और है -। एक बार जापान भी गया था ।वहाँ के विश्वविद्यालय में आमन्त्रित था---
"अन्त में --. हमें हिंदी को आगे बढ़ाना है ।आप लोग सरकारी अधिकारी हैं ,कर्मचारी है ।देश के कई भाग से आए होंगे --कोई .तमिल’ से आया होगा --कोई आन्ध्रा से -कोई केरला से -।हिंदी बहुत ही सरल भाषा है । जिन भाइयों को हिंदी नही आती --घबराने की कोई बात नहीं --आप आफ़िस की नोटिंग में कठिन अंगरेजी शब्दों को देवनागरी में लिख दें --बस हो गई हिंदी--
"अन्त में -----
अन्त में --अन्त में कह्ते कहते 1 घन्टे के बाद अन्तियाए और सभा समाप्त हो गई ।हिन्दी दिवस मना ली गई एक सरकारी कार्यालय में ,और मुख्यालय को रिपोर्ट भेज दी गई ।
------------
बड़े साहब-- ’ मिश्रा ! इस मुए को कहाँ से पकड़ के लाया था। इस से अच्छी हिन्दी तो मैं ही बोल सकता था।
मिश्रा जी -----’सर ! आप विभाग के ’मुख्य महा प्रबन्धक’ हैं ,आप ’मुख्य अतिथि ’कैसे हो सकते थे। यह आदमी निठ्ठला खड़ा था आज के दिन ’लेबर चौक’ पर, सो पकड़ लाया। ’सस्ते’ में ’अच्छा’ भाषण दिया।
’या ,या ’-कह कर बड़े साहब ने अपने घर की राह ली।
-------------------
बाद में मालूम हुआ कि वह वक्ता भाई साहब जो ”दसियों निमन्त्रण’ की बात कर रहे थे वो अपना भाव बढ़ाने के लिए कर रहे थे और जो डायरी देख कर बताने की बात कर रहे थे उस में वह रोज नामचा लिखते हैं।वह इदेश-विदेश कहीं नहीं आते-जाते ।साल में एक बार अपने गाँव चले जाते है और उसी को ’विदेश-यात्रा " कह कर उल्लेख करते रहते हैं ।यह रहस्य उनके एक दूसरे प्रतिद्वन्दी हिंदी सेवक भाई ने बताई।
’------
मुख्य अतिथि महोदय के ’अंगरेजी के कठिन शब्दों को देवनागरी में लिखने वाले ’प्रवचन’ का कितना प्रभाव-- तमिल --कन्नड़ -मलयालाम भाषी भाइयों पर पड़ा होगा ,मालूम नहीं ।मगर मिश्रा जी पर काफी गहरा प्रभाव पड़ा ।
अगले दिन उन्होने ’हिंदी वर्जन विल फ़ालो" वाले एक अंगेरेजी सर्कुलर का हिन्दी अनुवाद कर अधीनस्थ कार्यालयों को यूँ भेंज दिया
" टू द मैनेजर
प्लीज रेफ़र दिस आफिस लास्ट लेटर डेटेड----
आइ एम डाइरेक्टेड टू स्टेट दैट-------
नान कम्प्लाएन्स आफ़ द इनस्टरक्शन विल भी ट्रीटेड सीवीर्ली--

हिंदी आफ़िसर
फ़लाना आफ़िस

अस्तु
-आनन्द पाठक-



गुरुवार, 5 सितंबर 2019

घर


तुमने देखा तो होगा 
मेरा घर 
मैं मेरे घर में 
अपनों के बीच 
अपनेपन से 
रहती हूँ ..


‘मेरे ’  घर में 
तीन बेडरूम एक हॉल 
और किचन के अलावा 
एक स्टोररूम और 
पूजा का एक कोना है ..

और हाँ
अपनी हैसियत के 
हिसाब से 
सजा रखा है 
मैंने  घर अपना ..

हर रोज़ 
बाई आती है
मेरे  घर 
जो झाड़ू पोछा 
कर जाती है ..
और 
जहाँ तहाँ जमी धूल,
और उग आए 
मकड़ी के जालों को 
साफ़ कर जाती है ..

गर कोई 
जानता नहीं है 
तो ये कि मैं ..
ख़ुद अपने ही भीतर 
एक आलीशान से 
कई कमरों वाले 
घर में 
न जाने कितने ‘मैं’ 
के साथ 
रहती हूँ  !!

कौन सी ‘मैं’
और कितनी ‘मैं ‘
किस कमरे में 
रहती है,
ये ख़ुद मैं  भी 
नहीं जानती !!

कितनी ही अलमारियाँ
और कितने ही खाने 
उगा रखे है मैंने 
अपने भीतर  ...
जिनमे कई कई 
‘मैं ’ और मेरी 
अच्छी बुरी यादें ...
बातें दफ़न है !!


मेरे भीतर 
पनपते और फैलते हुए 
इस घर में 
जो जमी हुई 
अहं की  धूल ...
मोह, द्वेष,काम ,
और क्रोध के मकड़जाल है,
उन्हें साफ़ करने के लिए 
कोई कामवाली 
नहीं मिलती मुझे !


कितने ही अंधेरे 
फैले है 
मेरे दिलो दिमाग़ के 
अंधे कुएँ में ...
और 
उम्र के तहखानों में !!
डरती हूँ मैं 
इन डरावने कोनों और 
भयावह कमरों में 
झाँकते हुए !!

हाँ ...
कुछ एक 
सुकून भरे 
एकांत है 
मेरे भीतर ...
जिनमें में 
प्रायः छुप जाती हूँ मैं 
कितनी ही 
अनचाही परिस्थितियों में ...

पिछली दफ़ा 
जब किन्ही 
मुश्किलातों से 
दो चार हुई थी 
तब ..
अपने ही भीतर 
किसी कोने में 
छुप गई थी मैं 
... 
...
...
खो गई  हूँ 
तब से ही
ख़ुद की बनी 
ख़ुद की बुनी 
इस भूलभुलैया में ....

सुनो ..
गर प्रेम में हो मेरे 
तो यक़ीनन 
मुझमे समाहित हो तुम 
गर मुझ में विचरते  हुए 
कदाचित 
कहीं मिल जाऊँ कभी 
बुला लेना 
मिला देना 
मुझे मुझसे 
कि अरसा हुआ है 
मुझे मैं हुए हुए ...

#मैं_ज़िंदगी