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बुधवार, 24 सितंबर 2014

ईशोपनिषद के प्रथम मन्त्र के द्वितीय भाग ..”तेन त्यक्तेन भुंजीथा..." का काव्य-भावानुवाद...... डा श्याम गुप्त.....



ईशोपनिषद के प्रथम मन्त्र  के द्वितीय भाग ..”तेन त्यक्तेन भुंजीथा..." का काव्य-भावानुवाद...... 

सब कुछ ईश्वर की ही माया, 
तेरा मेरा कुछ भी नहीं है |
जग को अपना समझ न रे नर !
तू तेरा सब कुछ वह ही है |

पर है कर्म-भाव आवश्यक,
कर्म बिना कब रह पाया नर |
यह जग बना भोग हित तेरे,
जीव अंश तू, तू ही ईश्वर |

उसे त्याग के भाव से भोगें,
कर्मों में आसक्ति न रख कर|
बिना स्वार्थ, बिन फल की इच्छा,
जो जैसा मिल जाए पाकर |

कर्मयोग है यही, बनाता -
जीवनमार्ग सहज, शुचि, रुचिकर |
जग में रहकर भी नहिं जग में,
होता लिप्त कर्मयोगी नर |

पंक मध्य ज्यों रहे जलज दल,
पंक प्रभाव न होता उस पर |
सब कुछ भोग-कर्म भी करता,
पर योगी कहलाये वह नर ||








रविवार, 27 जुलाई 2014

तुम सुंदर हो


तुम सुंदर, तुम से जग सुंदर
इस जग की सब बाते सुंदर
पशु ,पक्षी, जंगल सुंदर
धरती, नदिया ,बादल, सुंदर

सागर, बालू, सीपीं सुंदर
लहराती फसलें सुंदर
इस धरती की ममता सुंदर
और अस्मानी छाता सुंदर

हरलो मानव मन की कालिख
तो, बन जाये वह भी सुंदर
मैं भी सुंदर, वह भी सुंदर
तेरा प्रकाश सब के अंदर

हर रूप मे हो मानव सुंदर
बाहर से हो या फिर हो अंदर

क्यू कि तुम सुंदर हो।






सोमवार, 30 सितंबर 2013

मिलता तुझको वही सदा जो तू बोता है...ग़ज़ल ..डा श्याम गुप्त ...

सकल सृष्टि का सर्वश्रेष्ठ प्राणी होता है |
बीज नित्य नव आशाओं के मानव बोता है |

जाने कितनी नयी नयी सुख -सुविधा भोगीं ,
कष्ट पड़े फिर भला आज तू क्यों रोता है |

सुख साधन के हेतु उचित-अनुचित सब भूला,
जो भी जग को दिया वही तो अब ढोता  है |

उचित व अनुचित मानव तभी समझ पाता  है,
जब उसको अनुभव कष्टों का भी होता है |

ईश्वर की है देन,  कष्ट से क्या घबराना,
खरा वही है जो न कष्ट में,  धीरज खोता है |

ईश्वर का कर धन्यवाद,  दुखों के कारण,
इस असार जग का सत-ज्ञान तुझे होता है |

कष्ट पड़ें,  चिंता क्या, आने-जाने हैं,
कष्टों से प्रभु पापकर्म तेरे धोता है |

सब कुछ ईश्वर के ही ऊपर छोड़ श्याम तू,
मिलता तुझको वही सदा जो तू बोता है ||