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रविवार, 2 अगस्त 2020

राम जन्मभूमि के शिलान्यास के अवसर पर विनीता अग्निहोत्री की कविता

राम जन्मभूमि के शिलान्यास के 
अवसर पर
नभ से देव सुमन बरसायेंगे
तब हम सब खुशी मनायेंगे

अपने घर में भारवंशी दिये जलायेंगे
नभचर-जलचर गीत खुशी के गायेंगे

नर-नारी, नागर-वनचारी मंगल राग सुनायेंगे
अद्भुत दृश्य देखकर अपने राम-सिया मुस्कायेंगे

कोरोना के कारण नहीं अयोध्या जा पायेंगे
सब अपने घर पर ही रहकर जमकर जश्न मनायेंगे
- विनीता अग्निहोत्री


रविवार, 26 जुलाई 2020

ग़ज़ल (कोरोना का क्यों रोना है)

2*8

कोरोना का क्यों रोना है,
हाथों को रहते धोना है।

दो गज की दूरी रख कर के,
सुख की नींद हमें सोना है।

बीमारी है या दुनिया पर,
ये चीनी जादू टोना है।

यह संकट भी टल जायेगा,
धैर्य हमें न जरा खोना है।

तन मन का संयम बस रखना,
चाहे फिर हो जो होना है।

कोरोना की बंजर भू पर,
हिम्मत की फसलें बोना है।

चाल नमन गहरी ये जिससे,
पीड़ित जग का हर कोना है।

बासुदेव अग्रवाल 'नमन'
तिनसुकिया

गुरुवार, 23 जुलाई 2020

एक ग़ज़ल ; दीदार-ए-हक़ में ---

एक ग़ज़ल : दीदार-ए-हक़ में

दीदार-ए-हक़ में दिल को अभी ताबदार कर
दिल-नातवाँ को और ज़रा बेक़रार  कर

गुमराह हो रहा है भटक कर इधर उधर
इक राह-ए-इश्क़ भी है वही इख़्तियार कर

कब तक छुपा के दर्द रखेगा तू इस तरह
अब वक़्त आ गया है इसे आशकार  कर

कजरौ ! ये पैरहन भी इनायत किसी की है
हासिल हुआ है गर तुझे तो आबदार कर

हुस्न-ए-बुताँ की बन्दगी गर जुर्म है ,तो है
ऎ दिल ! हसीन  जुर्म  ये  तू बार बार कर

ऎ शेख ! सब्र कर तू , नसीहत न कर अभी
आता हूँ मैकदे से ज़रा इन्तिज़ार  कर

दुनिया हसीन है ,कभी तू देख तो सही
आनन’ न ख़ुद को हर घड़ी तू अश्कबार कर

-आनन्द.पाठक-

शब्दार्थ --

आशकार      = ज़ाहिर
कज रौ = ऎंठ कर चलनेवाला
पैरहन = लिबास
आबदार =चमकदार /पानीदार
हुस्न-ए-बुताँ की = हसीनों की
नासेह = नसीहत करने वाला
अश्कबार = आँसू बहाना

सोमवार, 13 जुलाई 2020

आलेख "डिप्रेशन क्यों होता है?" (गरिमा पन्त)

डिप्रेशन क्यों होता है?
(गरिमा पन्त)
       डिप्रेशन क्यों होता हैयह बहुत ही विचारणीय प्रश्न है। जब कोई दुखों में डूब जाता है, सारी दुनिया उसे काली लगने लगती है, तब व्यक्ति को कुछ भी अच्छा नहीं लगता है। अवसाद का अर्थ मनोभावों से सम्बन्धी दुःख से होता है। अधिकतर यह देखा गया की जो प्रेम में ज्यादा डूबा है, और उसे उसका प्रेम नहीं मिला है, तो वह अवसाद में डूब जाता है। अवसाद की अवस्था में व्यक्ति स्वयं को लाचार समझता है, प्रेम ही नहीं वरन आज की परिस्थियों को देखते हुए बहुत सारे कारण अवसाद के होते है। अवसाद के कारण नींद नहीं आती है। विश्व सवास्थ्य संगठन के अनुसार अवसाद बहुत सामान्य बीमारी है। इस बीमारी का समय ६-८ महीने रहता है, अगर आपके किसी बहुत प्रिय की मृत्यु हो जाये और आप दुखी है, तो यह स्वाभाविक प्रक्रिया है और उसके दुःख में आप बहुत भावुक रहते है तो आप अवसाद का शिकार होते है। अगर आप जीवन में खालीपन महसूस कर रहे है तो अवसाद में है एक सर्वे के अनुसार महिलाओ को जल्दी अक्साद होता है पुरुषो के अपेक्षा मानसिक रोग पागलपन नहीं है
         जब कोई अवसाद का शिकार हो तो उसे गाना सुनना चाहिए, मस्ती करनी चाहिए। जीवन के हर क्षण का मजा लेना चाहिए, उसे कभी अकेले नहीं रहना चाहिए। उसे प्रकृति से बात करनी चाहिए। जीवन के हर छण में आनद की अनुभूति करनी चाहिए। सामाजिक मेल-जोल जयादा बढ़ाना चाहिए नकारात्मक लोगो के पास नहीं रहना चाहिए, सुबह शाम धूप लेनी चाहिए।
         कसरत करने से भी अवसाद दूर होता है आप जितना मस्त रहेंगे, उतना ही अवसाद से दूर रहेंगे। संतुलित आहार में अगर आप विटामिन डी लेते है तो बहुत अच्छा रहता है शराब और ऐसी किसी वस्तु से दूर रहें जो हानि पहुँचाती हो। खुद को दोष न दें जिंदगी बहुत ख़ूबसूरत है और एक ही बार मिली है तो मस्त रहें और सबसे बड़ी बात अपने को व्यस्त रखें, जितना व्यस्त आप होंगे उतना ही कुछ सोच नहीं पायेंगे और ज्यादा से ज्यादा लोगो से मिलिए और हर समय सीखिए। दुनिया से जुड़िये, हर किसी से सकारत्मक बात करिए अपने जो करीबी उनसे बात करिये, बच्चों के साथ मस्ती करें, अपना बचपन याद करें, कभी कभी उनकी तरह हरकत करें। अवसाद बहुत दूर हो जायेगा।
      जिन्दगी बहुत कीमती है उसे खुशहाल रखें, दुनिया में कुछ नहीं रखा है और न ही आप धन दौलत अपने साथ ले जाने वाले है। जब शरीर आप साथ नहीं ले जा सकते तो बाकि क्या ले जा पायेंगे। जो कुछ आज है, अभी है। कल किसने देखा है। अतः दूसरों को ख़ुशी देने के बाद जो मन को संतुष्टि मिलती है वो बहुत सारी धन दौलत पाकर भी नहीं मिलती है।
     यदि आपने कभी कोई पुरस्कार पाया है तो उस लम्हे को याद करिये। आप अपने आत्मविश्वास को कभी कम मतआँकिये। सदैव यह सोचें की मुझसे अच्छा कोई नहीं है इस दुनिया में। आप अपने को पहचाने अपनी क़ाबलियत को पहचाने और धीरे-धीरे अपना काम दुबारा शरू करें। आप कभी अवसादग्रस्त नहीं होंगे।
गरिमा पन्त
लखनऊ

सोमवार, 29 जून 2020

कोरोना वारियर्स को समर्पित दोहे
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            सेवा-भावना
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कोरोना योद्धा सभी,भूल गए घर-द्वार।
ऐसे वीरों के लिए,शब्द कहूँ मैं चार।।

कोरोना के काल में,वीर बने चट्टान।
श्वेद-रक्त टीका लगा,रखें हथेली जान।।

लोगों से विनती करें,और दिखाते राह।
बिन कारण जो घूमते,होकर बेपरवाह।।

भूखे-प्यासों की करें,सेवा ये दिन रात
मानवता के धर्म की,यही अनोखी बात।।

कोई भोजन बाँटता ,कोई रखता ध्यान।
जाँच-पड़ताल में लगे,रखना इनका मान।।

अपनी सेहत भूलकर,सबका रखते ध्यान
देश प्रेम सबसे बड़ा,उसपर वारें जान।।

पुलिस चिकित्सक ये सभी,कोरोना के वीर।
संकट में खुद हैं पड़े,बाँटे सबकी पीर।।

जीवन रक्षक ये बने,इनका हो सम्मान।
चिकित्सक-सिपाही सदा,दाँव लगाते जान।।

कोरोना के बीच में,करते सभी प्रयोग
अपने हित को भूलकर,सेवा करते लोग।।

घर-घर कचरा संग्रहण,करते हैं ये वीर।
साफ-सफाई ये रखें,समझो इनकी पीर।।

सेवा करने उतर पड़े,दिल के सच्चे लोग।
भूखों को भोजन मिले,करते सभी प्रयोग।।


अभिलाषा चौहान'सुज्ञ'
स्वरचित मौलिक

      

शनिवार, 27 जून 2020

चन्द माहिया

चन्द माहिया 

1
क्यों फ़िक़्र-ए-क़यामत हो
हुस्न रहे ज़िन्दा
और इश्क़ सलामत हो

2
ऐसे तो नहीं थे तुम
ढूँढ रहा हूँ मैं
जाने न कहाँ हो ग़ुम ?

3
जो तुम से मिला होता
लुट कर भी मुझको
तुम से न गिला होता

4
उनको न पता शायद
याद में उनके हूँ
ख़ुद से ही जुदा शायद

5
आलिम है ,ज्ञानी है
पूछ रहा सब से
क्या इश्क़ के मानी है ?

-आनन्द.पाठक -

शुक्रवार, 5 जून 2020

एक ग़ज़ल : आइने आजकल ख़ौफ़ खाने लगे --

एक ग़ज़ल : आइने आजकल ख़ौफ़ ---

आइने आजकल ख़ौफ़ खाने लगे
पत्थरों से डरे , सर झुकाने लगे

रुख हवा की जिधर ,पीठ कर ली उधर
राग दरबारियों सा है गाने लगे

हादिसा हो गया ,इक धुआँ सा उठा
झूठ को सच बता कर दिखाने लगे

हम खड़े हैं इधर,वो खड़े सामने
अब मुखौटे नज़र साफ़ आने लगे

वो तो अन्धे नहीं थे मगर जाने क्यूँ
रोशनी को अँधेरा बताने लगे

जब भी मौसम चुनावों का आया इधर
दल बदल लोग करने कराने लगे

अब तो ’आनन’ न उनकी करो बात तुम
जो क़लम बेच कर मुस्कराने लगे

-आनन्द.पाठक-

सोमवार, 1 जून 2020

कुछ दोहे

घट में बसता जीव है,नदिया जीवन धार।
परम ज्योति का अंग हैं, कण-कण में विस्तार।

कान्हा आकर देख ले, मुरली तेरी मौन।
सूना सूना जग लगे, पीड़ा सुनता कौन।

भाव-भाव में भेद है,जैसी जिसकी चाह।
जैसी जिसकी भावना,वैसी उसकी राह।।

सूई करती काम जो,कर न सके तलवार।
भेद भले ही हो बड़ा,करती हैं उपकार।

कविता कवि की कल्पना,जन-मन की है आस।
समय भले ही हो बुरा,कविता  रहती खास।

सुरभित मंद पवन बही,पुष्पों से  ले गंध।
मन मयूर सा नाचता,कवि रचता है छंद।

मंथन मन का कीजिए,रखिए मन में आस।
प्रश्नों के उत्तर मिलें,हृदय शांति का वास।

भूख जलाती पेट को,जलता सब संसार।
रोटी के आगे सदा, नियमों की हो हार।

अँधियारे को चीरता,आता है आदित्य।
दुर्दिन से डरना नहीं,कर्म करो तुम नित्य।

नियमित यदि अभ्यास हो,मिले सफलता आर्य।
साहस धीरज से सदा,सधते सारे कार्य।।

अहंकार की आग में,सद्गुण होते नष्ट।
मानव दानव सम बने,देता सबको कष्ट।

हाला सबकी प्रिय बनी,भूले सब भगवान।
इस हाला के सामने,ज्ञानी खोए ज्ञान।

संकट में जब देश हो,सेवा की हो चाह।
तब-तब आए सामने,देखो भामाशाह।




अभिलाषा चौहान'सुज्ञ'
स्वरचित मौलिक

शुक्रवार, 22 मई 2020

एक ग़ज़ल : क़ातिल के हक़ में --

एक ग़ज़ल : क़ातिल के हक़ में ---

क़ातिल के हक़ में लोग रिहाई में आ गए
अंधे  भी   चश्मदीद   गवाही   में  आ गए

तिनका छुपा हुआ है जो  दाढ़ी  में आप के
पूछे बिना ही आप सफ़ाई  मे आ गए

कुर्सी का ये असर है कि जादूगरी कहें
जो राहज़न थे  राहनुमाई में  आ गए

अच्छे दिनों के ख़्वाब थे आँखों में पल रहे
आई वबा तो दौर-ए- तबाही में आ गए

मुट्ठी में इन्क़लाब था सीने में जोश था
वो सल्तनत की पुश्तपनाही में आ गए

बस्ती जला के सेंक सियासत की रोटियाँ
मरहम लिए वो रस्म निबाही में आ गए

ऐ राहबर ! क्या ख़ाक तेरी रहबरी रही
हम रोशनी में थे कि सियाही में आ गए

’आनन’ तू खुशनसीब है पगड़ी तो सर पे है
वरना तो लोग बेच कमाई में आ गए

-आनन्द.पाठक-

वबा = महामरी
पुश्तपनाही = पॄष्ठ-पोषण,हिमायत
सियाही में = अँधेरे में
मरहम     = मलहम

शनिवार, 9 मई 2020

एक गीत : तुम चाहे जितने पहरेदार ---

एक गीत

तुम चाहे जितने पहरेदार बिठा दो
दो नयन मिले तो भाव एक रहते हैं
  

  दो दिल ने कब माना है जग का बन्धन
  नव सपनों का करता  रहता आलिंगन
  जब युगल कल्पना मूर्त रूप  लेती हैं
  मन ऐसे महका करते  ,जैसे चन्दन

जब उच्छवासों में युगल प्राण घुल जाते
तब मन के अन्तर्भाव  एक रहते हैं

  यह प्रणय स्वयं में संस्कृति है ,इक दर्शन
  यह चीज़ नहीं कि करते रहें  प्रदर्शन
  अनुभूति और एहसास तले पलता है
  यह ’तन’ का नहीं है.’मन’ का है आकर्षण

जब मर्यादा की ’लक्ष्मण रेखा’ आती
दो कदम ठिठक ,ठहराव एक रहते हैं

  उड़ते बादल पर चित्र बनाते कल के
  जब बिखर गये तो फिर क्यूँ आंसू ढुलके
  जब भी यथार्थ की दुनिया से टकराए
  जो रंग भरे थे ,उतर गए सब धुल के

नि:शब्द और बेबस आँखें कहती हैं
दो हृदय टूटते ,घाव एक रहते हैं

तुम चाहे जितने पहरेदार बिठा दो,दो नयन मिले तो भाव एक रहते हैं

-आनन्द.पाठक-

"हे! गुलमोहर" (कृष्ण आधुनिक)

प्रिय गुलमोहर,
निस्संदेह तुम फल न देते हो
किन्तु,जब ग्रीष्म ऋतु में
सूर्य की तपिश से
मौत रूपी अग्नि बरसती है
तब तुम हरे भरे हो
जीवन जीने का संकेत देते हो
और जो तुम विशालकाय हो
तो तुम्हारी पत्तियां
नन्हीं नन्हीं ही तो हैं
तुम्हारे पुष्प जो असुगंधित हैं
भले ही हैं
कोई तोड़ता रोंदता तो नहीं है
हे गुलमोहर वृक्ष,
तुम्हारी नन्हीं नन्हीं
करीने से सजी पत्तियां
बहुत सुन्दर लगती हैं
और टहनियों में जड़े सुंदर पुष्प
और उनका रंग
बहुत भाते हैं
भाती है तुम्हारी छाया भी
ग्रीष्म ऋतु में।

--
कृष्ण आधुनिक

शुक्रवार, 8 मई 2020

चांद को इश्क़ है - एक गीत


चांद को इश्क़ है 
धूप से क्यूं भला ?
रातों के  ....
चांद का ....
दिन की धूप से 
ये सिलसिला 
क्योंकर चला 
कहो तो ज़रा....


चांद के कांधे पे 
काला सा कोई तिल है कहीं 
अटकी है धूप की 
शोख़ नज़रे   दिल भी वहीं 
स्याह से  दाग में
धूप की गर्मियों को 
नर्म सा एक साया मिला 
क्योंकर भला ...


धूप की देह में 
बिखरे हुए है रंग कई
बज उठे नेह के 
 ढोल  सितार  मृदंग कई 
 पानी की बूंद से 
 धूप धनक साया मिला 
क्यों कर भला 









शुक्रवार, 1 मई 2020

एक ग़ज़ल :: मेरे जानां---

एक ग़ज़ल : मेरे जानाँ --

मेरे जानाँ ! न आजमा  मुझको
जुर्म किसने किया ,सज़ा मुझको

जिन्दगी तू ख़फ़ा ख़फ़ा क्यूँ है ?
क्या है मेरी ख़ता ,बता  मुझको

यूँ तो कोई नज़र नहीं  आता
कौन फिर दे रहा सदा मुझको

नासबूरी की इंतिहा क्या  है
ज़िन्दगी तू ही अब बता मुझको

होश फिर उम्र भर  नहीं आए
जल्वाअपना  कभी दिखा मुझको

मैं निगाहें  मिला सकूँ उनसे
इतनी तौफ़ीक़ दे ख़ुदा मुझको

उनका होना भी है बहुत ’आनन’
देता जीने का हौसला मुझको

-आनन्द.पाठक-

शब्दार्थ

नासबूरी =अधीरता ,ना सब्री

तौफ़ीक़ =शक्ति,सामर्थ्य

सोमवार, 27 अप्रैल 2020

शब्द संपदा-कुछ दोहे

गीता

पार्थ उठाओ शस्त्र तुम,करो अधर्म का अंत।
रणभूमि में कृष्ण कहे,गीता ज्ञान अनंत।।

कर्मयोग के ज्ञान का,अनुपम दे संदेश।
गीता जीवन सार है,जिससे कटते क्लेश।।

पतवार

साहस की पतवार हो,संकल्पों को थाम।
पाना अपने लक्ष्य को,करना अपना नाम।।

अक्षर

अक्षर अच्युत अजर हैं, कण-कण में विस्तार।
वही अनादि अनंत हैं,इस जीवन का सार।।

भीषण

भीषण गर्मी जब पड़े, तन-मन लगती आग।
लू बैरी बन कर बहे,व्यर्थ लगे सब राग।‌।

उपवन

उपवन सूने से लगें,पक्षी हो गए मौन।
उजड़े नीड़ों की व्यथा,समझेगा अब कौन।

गंगा-यमुना

गंगा जीवनदायिनी, यमुना तारणहार।
भारत भू पर शोभती,जैसे हीरक हार।।

निर्मल-पावन नीर से, सिंचित करती प्राण।
पतितों का करती सदा, गंगा-यमुना त्राण।।

रोग

सन साँसत में पड़ा,करता काबू रोग।
जाँचों की क्षमता बढ़ी,आयुष का उपयोग।।

नियमों का पालन करो,रहो रोग से मुक्त।
अपने-अपनों के लिए,मार्ग यही उपयुक्त।।

अभिलाषा चौहान'सुज्ञ'

शुक्रवार, 24 अप्रैल 2020

एक व्यंग्य : हुनर सीख लो---

एक व्यंग्य :: हुनर सीख लो ---


-’मेम सा’ब-आज मैं काम पर आने को नी ।महीने भर को गाँव जा री हूं। मेरा हिसाब कर के ’चेक’ गाँव भिजवा देना-’- कामवाली बाई ने अपनी अक्टिवा स्कूटर पर बैठे बैठे ही मोबाईल से फोन किया ।
मेम साहब के पैरों तले ज़मीन खिसक गई -अरे सुन तो ! तू है किधर अभी?’
’मेम साहब ! मैं आप के फ्लैट के नीचे से बोल रही हूँ ।
जब तक श्रीमती जी दौड़ कर बालकनी से देखने आती कि बाई ने अपना स्कूटर स्टार्ट किया और हवा हो गई ।
------

’कामवाली गई-लो पकड़ो झाड़ू-पोंछा "- श्रीमती जी ने नीला पीला होते हुए पोंछे की बाल्टी हमें थमा दी।

मैं बाल्टी पकड़े पकड़े सोचने लगा कि एक चाय वाला कैसे प्रधानमन्त्री बन जाता होगा है और एक IIT-रूड़की वाला भारत सरकार का प्रथम श्रेणी का राजपत्रित अधिकारी चीफ़ इंजीनियर कैसे पोंछा लगाता होगा ? स्मृति इरानी जी को स्मरण किया ...अपनी डीग्रियाँ अपना सर्टिफ़िकेट याद किया कि अचानक श्रीमती जी चीखी-’अरे अभी तक यहीं खड़े हो ? शुरू नहीं किया ?सुना नहीं प्रधानमन्त्री जी ने क्या कहा है । डीग्री सर्टिफ़िकेट काम नहीं आयेगा -हुनर काम आयेगा ,हुनर !

झाड़ू-पोंचा करने का हुनर सीख लो ..रिटायर्मेन्ट के बाद काम आयेगा...इस हुनर से कुछ ज़्यादा ही कमा लोगे ।व्यंग्य लेखन... कलम घिसाई से कुछ नहीं होने वाला ...।.

’मम्मी । पापा के आफ़िस का ड्राईवर आ गया’- छोटे बेटे ने आ कर खबर दी ।

’जा ,बोल दे .’वेट’ करे ।सा’ब पोछा लगाने के बाद आफ़िस जायेगा"

’अरे भाग्यवान ! ऐसा मत कहना ,वरना कल वो भी अपनी गाड़ी का चाबी मुझे थमा देगा और बोलेगा –’ड्राईवरी सीख लो साहब -हुनर है हुनर ।बाद में काम आयेगा ।”

-काश मैं भी उस कामवाली बाई के साथ भाग गया होता-

अस्तु

[नोट- वही ’हुनर’ अब ’लाक-डाउन ’ में काम आ रहा है ]

-आनन्द.पाठक-

उगती सभ्यताएं

बूढ़े पहाड़ अक्सर
जाड़ों में
पीली सुनहरी
धूप सेंकते
सुनाते है
नदियों को
कितनी  ही कहानियां

हर नदी
अपने बूढ़े बाबा की
कहानी लिए
सुनाती चलती  है
शहर शहर
नगर नगर

 वे छोड़ जाती है
कहानी के अवशेष
और
इन्हीं अवशेषों से
उग आती है 
सभ्यताएं कई 
और 
वो बूढ़ा पर्वत 
मुस्कुराता है कहीं 

गुरुवार, 23 अप्रैल 2020

भोर का तारा

सुनो
मैंने देखा है कि
तुम खुद से कितना
कतराते हो
स्याह से खुद के
अंधेरों में
छुप जाते हो

पाया है कि
टूटे हो तुम
हर सफर में,
'उस ' से हो
खुद तक पहुंचने की
हर एक कोशिश में
सच है कि
तुम्हारे आसमां में
अब नहीं कोई
चांद न सूरज न तारा

सुनो
मेरी तय नहीं धुरी
तथापि
मैं भोर का तारा हूं

मंगलवार, 21 अप्रैल 2020

शब्द गोखरू

अब जब 
पलट कर देखती हूं 
तो पाती हूं 
आवाज़ बेहद
 मीठी मिली थी मुझे 
मगर मेरे  शब्द 
गोखरू से रहे हमेशा 

बींधते रहे
लहूलुहान करते गए 
उस  प्राण और 
देह को,
जो मेरे प्रेम में 
लिप्त था 

और फिर
नादान बन
मैं उन्हीं प्रेम की 
विथियों में 
मृत प्रेम को
पुचकार के सतत 
पुकारती रही

मैं और समय

जब जब समय
मेरे साथ चौसर पे
खेल खेलता है
मुझे मोहरा बना
मुझे ही पीट देता है
तब तब
मैं आवेश में
चौसर और मोहरा
दोनो ही लेकर
खुद के भीतर 
अपने बुने अंधेरों में
छुप जाती हूं
औे सोचती हूं
आंखे मूंद लेने से
सूरज ढल जाता है
और आंख खोलने पे
दिन निकल आयेगा
समय दूर खड़ा खड़ा
हंसता है मुझपे

शनिवार, 11 अप्रैल 2020

चन्द माहिया

चन्द माहिया

1
ये रात ,ये  तनहाई
सोने कब देती
वो तेरी अंगड़ाई

2
जो तू ने कहा, माना
तेरी निगाहों में
फिर भी हूँ अनजाना

3
कुछ दर्द-ए-ज़माना है
और ग़म-ए-जानां
जीने का बहाना  है

4
कूचे जो गए तेरे
सजदे से पहले
याद आए गुनह मेरे

5
इक वो भी ज़माना था
हँस कर रूठी तुम 
मुझको ही मनाना था

-आनन्द.पाठक-

शुक्रवार, 10 अप्रैल 2020

प्रेम - एक शाश्वत सत्य !

जल  को
मछलीयों बतखों से
था प्रेम
तथापि पाल रखे थे उसने
शार्क व्हेल और घड़ियाल

वायु को 
विविध गंधो  और
सुगंधों से
था प्रेम
तथापि पाल रखे थे उसने
दुर्गंधों के जाल


आकाश को
 सैकड़ों सूर्यों से
 उल्का पिंडों से
 था प्रेम
तथापि
उसमें पल रहे  है अगणित
 सौर्य मंडलों  की माल

और
परम  ब्रह्म  को
अग्नि जल
वायु पृथ्वी और
आकाश से था  अगाध प्रेम
क्योंकि
उससे उद्भव हुए थे
शक्ति और महाकाल !!

जैसा कि होना था,
पृथ्वी  को
तमाम पशुओं  से
पंछियों से
था  अगाध प्यार
यद्यपि पालना पड़ा  उसे भी
मनुष्य सा इक काल !

शुक्रवार, 3 अप्रैल 2020

एक ग़ज़ल : रोशनी मद्धम नहीं करना---

एक ग़ज़ल : रोशनी मद्धम नहीं करना---

रोशनी मद्धम नहीं करना अभी संभावना है
कुछ अभी बाक़ी सफ़र है तीरगी से सामना है

यह चराग़-ए-इश्क़ मेरा कब डरा हैंआँधियों से
रोशनी के जब मुक़ाबिल धुंध का बादल घना है

लौट कर आएँ परिन्दे शाम तक इन डालियों पर
इक थके बूढ़े शजर की आखिरी यह कामना है

हो गए वो दिन हवा जब इश्क़ थी शक्ल-ए-इबादत
कौन होता अब यहाँ राह-ए-मुहब्बत में फ़ना है

जाग कर भी सो रहे हैं लोग ख़ुद से बेख़बर भी
है जगाना लाज़िमी ,आवाज देना कब मना है

आदमी से जल गया है ,भुन गया है आदमी जो
आदमी का आदमी ही हमसुखन है ,आशना है

दस्तकें देते रहो तुम हर मकां के दर पे’आनन’
आदमी में आदमीयत जग उठे संभावना है


-आनन्द.पाठक-

बुधवार, 1 अप्रैल 2020

चाय - एक अफ़ीम इश्क़


चाय?

कितनी किस्में
जानती हूं मैं चाय की ?

तो सुनो - 
नहीं मुझे 
चाय का क्लासिफिकेशन  !
मुझे ये भी नहीं पता 
कि चाय का 
सइटिफिक नाम  क्या है ?
चाय की फॅमिली 
किंगडम और रैंक क्या है ?

- क्यों ???
- क्यूंकि 
चाय मेरा पहला 
और कदाचित 
आखरी इश्क़ है !


मगर हाँ  
ये कहूँगी कि  
भांति भांति की 
चाय  भांति भांति के
 लोगो के साथ 
पी  है मैंने !!


 वो लारी वाली चाय !
और 
वो बस  स्टैंड पे 
श्री भोले भंडारी के स्टाल 
 की कटिंग  वाली चाय !

बचपन में 
भूटान  की 
फिर बरसो पहले 
जापान की
नमक और मक्खन
वाली चाय!


बड़े  लोगो  संग
पांच सितारा 
होटलों में 
कंही फीकी तो 
कभी काली चाय ?

वो कमांडर साहब के घर की 
लेमनग्रास वाली चाय
और वो मंत्री साहब के 
पी ए  के घर की 
दार्जलिंग की खास
लाख रुपए की  चाय ! 

मगर
 सच कहूं
जाने क्यों  
तेरे संग संग पी जो  
उस चाय में 
अलग ही मज़ा  है 
 तेरे  होंठो से जूठी 
ठंडी चाय में भी  
तेरे इश्क़ का 
अफीमी अफीमी 
नशा है !

सोमवार, 30 मार्च 2020

एक ग़ज़ल : गर्द दिल से अगर--

एक ग़ज़ल : गर्द दिल से अगर--

गर्द दिल से अगर उतर जाए
ज़िन्दगी और भी  निखर जाए

कोई दिखता नहीं  सिवा तेरे
दूर तक जब मेरी नज़र जाए

तुम पुकारो अगर मुहब्बत से
दिल का क्या है ,वहीं ठहर जाए

डूब जाऊँ तेरी निगाहों में
यह भी चाहत कहीं न मर जाए

एक हसरत तमाम उम्र रही
मेरी तुहमत न उसके सर जाए

ज़िन्दगी भर हमारे साथ रहा
आख़िरी वक़्त ग़म किधर जाए

वो मिलेगा तुझे ज़रूर ’आनन’
एक ही राह से अगर जाए

-आनन्द.पाठक-

शुक्रवार, 27 मार्च 2020

दोहे "विश्व रंगमंच दिवस-रंग-मंच है जिन्दगी" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

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रंग-मंच है जिन्दगी, अभिनय करते लोग।
नाटक के इस खेल में, है संयोग-वियोग।।
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विद्यालय में पढ़ रहे, सभी तरह के छात्र।
विद्या के होते नहीं, अधिकारी सब पात्र।।
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आपाधापी हर जगह, सभी जगह सरपञ्च।।
रंग-मंच के क्षेत्र में, भी है खूब प्रपञ्च।।
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रंग-मंच भी बन गया, जीवन का जंजाल।
भोली चिड़ियों के लिए, जहाँ बिछे हैं जाल।।
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रंग-मंच का आजकल, मिटने लगा रिवाज।
मोबाइल से जाल पर, उलझा हुआ समाज।।
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कहीं नहीं अब तो रहे, सुथरे-सज्जित मञ्च।
सभी जगह बैठे हुए, गिद्ध बने सरपञ्च।।
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नहीं रहे अब गीत वो, नहीं रहा संगीत।
रंग-मंच के दिवस की, मना रहे हम रीत।।
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