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सोमवार, 22 जून 2015
आलेख "मैं और मेरी लाईब्रेरी" (अमन 'चाँदपुरी')
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अमन 'चाँदपुरी',
आलेख,
मैं और मेरी लाईब्रेरी
कवि, लेखक, सम्पादक और फ़ोटोग्राफर। 'दोहा सम्राट' एवं 'कुंडलियां शिरोमणि' की मानद उपाधियों सहित दर्जनों पुरस्कार एवं सम्मान से अलंकृत। 'दोहा दर्पण' पुस्तक का सम्पादन।
शनिवार, 20 जून 2015
अकविता 'बदलता वक्त' (अमन 'चाँदपुरी')
'बदलता वक्त'
आज मौसम
जाड़ा, गर्मी
और बरसात
हाय रे ! तीनों भयानक,
तीनों निर्मम
सह नहीं पाता मेरा बदन
एक के गुजरने पर दूसरा
बिन बताये शुरू
कर देता अपनी चुभन
कैसा है ये परिवर्तन
क्यों होता है ये परिवर्तन
समय बदलता रहता है
काल का पहिया चलता रहता है
जमाने पर भी इसका असर है
बदला-बदला सा हर मंजर है
यहाँ नये रंग-रूप नित्य खिलते हैं
अजीबो-गरीब मुसाफिर
जीवन सफर में मिलते हैं
पहले छोटे बच्चे सा मैं दिखता था
हरेक को बहुत अच्छा लगता था
वही कवि कहकर
मुझे आज चिढा रहे हैं
अपने छोटे से उस मासूम बच्चे को
भूलते जा रहे हैं
सच
कितना असहाय हो गया मैं
कितना बूढा हो गया तुम्हारा अमन
जमाने से कितना पिछड गया हूँ
अकेलेपन के सपने से मैं डर गया हूँ
बदलते वक्त के अनुरूप
मैं भी ढल जाऊगाँ
पुराने खोटे सिक्के की तरह
एक बार फिर चल जाऊगाँ।
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'बदलता वक्त',
अकविता,
अमन 'चाँदपुरी'
कवि, लेखक, सम्पादक और फ़ोटोग्राफर। 'दोहा सम्राट' एवं 'कुंडलियां शिरोमणि' की मानद उपाधियों सहित दर्जनों पुरस्कार एवं सम्मान से अलंकृत। 'दोहा दर्पण' पुस्तक का सम्पादन।
गुरुवार, 18 जून 2015
दोहे "बीजक की हर पंक्ति में, जीवित हुआ कबीर" (अमन 'चाँदपुरी')
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मेरे कुछ दोहे
![]()
तुलसी ने मानस रचा, दिखी राम की पीर।
बीजक की हर पंक्ति में,
जीवित
हुआ कबीर।1।
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माँ के छोटे शब्द का, अर्थ बड़ा अनमोल।
कौन चुका पाया भला,
ममता
का है मोल।2।
--
भक्ति,नीति अरु रीति, की विमल त्रिवेणी होय।
कालजयी मानस सरिख ,
ग्रंथ
न दूजा कोय।3।
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जिनको निज अपराध का, कभी न हो आभास।
उनका होता जगत में ,
पग-पग
पर उपहास।4।
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जंगल-जंगल फिर रहे, साधू-संत महान।
ईश्वर के दरबार के,
मालिक
क्यों शैतान।5।
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हे विधना तूने किया, ये कैसा इंसाफ।
निर्दोषों को सजा है,
पापी
होते माफ।6।
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जब से परदेशी हुए, दिखे न फिर इक बार।
होली-ईद वहीं मनी,
वहीं
बसा घर द्वार।7।
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कैसे देखें बेटियाँ बाहर का परिवेश।
घर में रहते हुए भी,
हुआ
पराया देश।8।
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अमन 'चाँदपुरी',
कुछ दोहे,
जीवित हुआ कबीर
कवि, लेखक, सम्पादक और फ़ोटोग्राफर। 'दोहा सम्राट' एवं 'कुंडलियां शिरोमणि' की मानद उपाधियों सहित दर्जनों पुरस्कार एवं सम्मान से अलंकृत। 'दोहा दर्पण' पुस्तक का सम्पादन।
बुधवार, 17 जून 2015
अमन 'चाँदपुरी' की लघुकथा-'वाह रे हरिश्चन्द्र' (प्रस्तोता-डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')
मित्रों आज मुझे अमन 'चाँदपुरी' द्वारा भेजी गयी
एक लघुकथा प्राप्त हुई।
अमन 'चाँदपुरी' एक नवोदित हस्ताक्षर हैं।
जिनका परिचय निम्नवत् है-
![]()
नाम- अमन सिहं
जन्मतिथि- 25 नवम्बर 1997 ई.
पता- ग्राम व पोस्ट- चाँदपुर
तहसील- टांडा
जिला- अम्बेडकर नगर
(उ.प्र.)-224230
संपर्क : 09721869421
ई-मेल : kaviamanchandpuri@gmail.com
लघुकथा-'वाह रे हरिश्चन्द्र'
विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी के सामने
से मैं अपने कुछ मित्रों के साथ कुलपति महोदय से कुछ काम के सिलसिले से मिलने जा
रहा था, तभी पीछे से किसी ने आवाज लगायी- 'रुकिये !'
हम
लोग रुके, मुड़कर देखा तो पुलिस की वर्दी सा कपड़ा पहने चपरासी (प्यून) खड़ा था। उसी ने हमें आवाज लगायी थी।
तभी चपरासी (प्यून) पास आकर बड़ी विनम्रता से बोला - 'लीजिए आपका पर्स अभी गिर गया था।'
मैंने अचम्भित होकर कहा - 'मेरा तो कोई पर्स नहीं गिरा, मेरा पर्स मेरे पास ही है। ये किसी दूसरे का होगा।'
चपरासी (प्यून) भी अचम्भित होकर बोला - 'आपका नहीं है।'
मैंने कहा - 'हाँ ! मेरा नहीं है।'
इतना कहते ही मैं फिर से मुड़कर लम्बे-लम्बे कदमों से अपनी मंजिल की ओर चल पड़ा।
तभी एक मित्र ने कहा - 'यार तूने पर्स क्यों नहीं लिया। उसमें चार लाल-लाल हजारे की, कुछ पीली-पीली इसके अतिरिक्त भी कई नोटें दिखाई दे रही
थी। पूरा कम से कम सात हजार तो था ही।'
मेरा उत्तर था - 'वह ईमानदारी के साथ पर्स मुझे दे रहा था। उसके हिसाब से वो पर्स मेरा था। अगर चाहता तो पर्स अपने पास भी रख सकता था। उसे हल्ला मचाने की क्या जरूरत थी कि मैंने पर्स पाया है। मगर उसने ऐसा नहीं किया क्योंकि वह ईमानदार था, फिर मैं उस पर्स को लेकर बेइमान क्यों बनूँ।
सभी मित्र मेरा उत्तर सुनकर खिल खिलाकर हँस पड़े। और एक मित्र ने मजाकिया भाव से कहा -
'वाह रे मेरे हरिश्चन्द्र !'
- अमन चाँदपुरी,
रचनाकाल - 2012
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