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सोमवार, 22 जून 2015

आलेख "मैं और मेरी लाईब्रेरी" (अमन 'चाँदपुरी')

      मेरी एक छोटी सी लाईब्रेरी, जिसमें मुश्किल से पैंतिस-चालिस पुस्तकें ही होगीं और सभी एक से बढ़कर एक। कुछ तो हिन्दी साहित्य की अमूल्य धरोहर और कालजई पुस्तकों में गिनी जाती हैं, एक पुस्तक तो नोबेल पुरस्कार से भी सम्मानित है, और एक साहित्य अकादमी। कई पुस्तकें अमर कथाकार प्रेमचंद साहब की भी हैं।
     अपने छोटे से कमरे मे प्रवेश करते हुये जैसे ही मेरी नजर उन पुस्तकों की तरफ जाती हैं मन प्रफुल्लित हो उठता हैं और ललचिया सा जाता हैं। मैं कल्पना करने लगता हूँ, सोचता हूँ। काश इनमें से दस प्रतिशत रचनाएँ भी मेरी कलम से निकली होती तो क्या बात होती।
       साये में धूप, गबन, प्रतिज्ञा, राग दरबारी, गीतांजलि और कुछ कहानियाँ जैसे पोस्टमास्टर, पड़ोसिन, ईदगाह, बूढी काकी, नमक का दरोगा और कुछ नज्में भी जैसे ताजमहल, औरत, आवारा, मकाँ की उपरी मंजिल आदि। बस इतनी ही रचनाएँ ज्यादा लालच नहीं, बमुश्किल से बारह-तेरह सौ पन्नों का मेरा सम्पूर्ण साहित्य, दो मोटी-मोटी पुस्तकें, बस।
    फिर कोई न टिक पाता मेरे सामने न दुष्यंत, न कैफी और न ही शुक्ल। मैं अक्सर सोचता हूँ मेरे दिमाग में एक प्रश्न बार-बार कौधता रहता हैं कि ऐसी क्लासिकल रचनाएँ एक ही रचनाकार क्यों नहीं कर सकता। क्या जरूरी हैं, दुष्यंत, प्रेमचंद, टैगोर, शुक्ल, साहिर, कैफी, मजाज, गुलज़ार सब एकसाथ जुटे तभी ऐसा साहित्य आ सकता हैं।
   अबतक भारत को एक ही साहित्य का नोबेल पुरस्कार मिला हैं, गीतांजलि पर रवींद्रनाथ टैगोर को। क्या उपरोक्त में से एक भी कृति या कृतिकार उसके काबिल नहीं हैं? है, मगर उस विश्वस्तरीय सम्मान से दूर हैं, क्यों?
      मैनें लिखना अभी शुरू ही किया हैं सब कुछ एक में समाहित करने की कोशिश कर रहा हूँ। हिन्दी साहित्य की तमाम विधाओं पर लिख रहा हूँ। हाशिम साहब कहते हैं 'अभी तुमसे गज़ल नहीं हो पा रही है' मगर कविता और हाइकु पर बहुत से कवियों ने साबसी दी है। और इधर कुछ अच्छी कविताएँ भी मेरी कलम से निकली हैं जैसे - बदलता वक्त, मेरी आवाज, सदीं का ठहराव, मन की पीड़ा, तुममें भी ये सारी शक्तियाँ हैं, बरसात मेरी मेहबूबा, आदि अनेकों कविताएँ प्रसंसित हुई हैं मगर वो बात अभी तक नहीं बन पा रही, जो इन महानतम रचनाकारों की रचनाओ में हैं।
       मैं अगर कोई कविता, कहानी या फिर किसी और विधा पर लिखना शुरू करता हूँ तो तुरन्त ही उसे पूरा करने के लिए पूरा ताकत झोंक देता हूँ क्योंकि अगर वो अधूरी छूट जाती हैं तो पहले तो बर्फ की भाँति मेरी मुठ्ठी में रहती हैं। मगर समय के साथ आहिस्ता-आहिस्ता पिघलकर मेरे हाथों से निकल जाती हैं और फिर मैं पछतावे के सिवाय, कुछ भी नहीं कर सकता। ऐसी कई कहानियाँ, एक-दो लघु नाटक और एक मेरे दिल के बेहद करीब कविता 'पांचाली के प्रश्न' आदि आजतक अधूरी ही है जिन्हें मैनें अपने शुरूआती दिनों में लिखने का प्रयत्न किया था 2012 में। मगर अबतक अधूरी हैं और मेरे हाथ से लगभग निकल चुकी हैं।
       मेरी दिली इच्छा हैं कि मेरे मरने से पूर्व कुछ ऐसा साहित्य मेरी भी कलम से निकले, जो मेरे बाद आने वाली पीढियों के साहित्यकारों को ललचियायें और हिन्दी साहित्य में मेरी सशक्त उपस्थिति दर्ज करायें। 

शनिवार, 20 जून 2015

अकविता 'बदलता वक्त' (अमन 'चाँदपुरी')

'बदलता वक्त'
परिवर्तित होता जा रहा 
आज मौसम
जाड़ा, गर्मी और बरसात
हाय रे ! तीनों भयानक,
तीनों निर्मम
सह नहीं पाता मेरा बदन
एक के गुजरने पर दूसरा
बिन बताये शुरू कर देता अपनी चुभन
कैसा है ये परिवर्तन
क्यों होता है ये परिवर्तन
समय बदलता रहता है
काल का पहिया चलता रहता है
जमाने पर भी इसका असर है
बदला-बदला सा हर मंजर है
यहाँ नये रंग-रूप नित्य खिलते हैं
अजीबो-गरीब मुसाफिर
जीवन सफर में मिलते हैं
पहले छोटे बच्चे सा मैं दिखता था
हरेक को बहुत अच्छा लगता था
वही कवि कहकर
मुझे आज चिढा रहे हैं
अपने छोटे से उस मासूम बच्चे को
भूलते जा रहे हैं
सच
कितना असहाय हो गया मैं
कितना बूढा हो गया तुम्हारा अमन
जमाने से कितना पिछड गया हूँ
अकेलेपन के सपने से मैं डर गया हूँ
बदलते वक्त के अनुरूप
मैं भी ढल जाऊगाँ  
पुराने खोटे सिक्के की तरह
एक बार फिर चल जाऊगाँ। 

गुरुवार, 18 जून 2015

दोहे "बीजक की हर पंक्ति में, जीवित हुआ कबीर" (अमन 'चाँदपुरी')

मेरे कुछ दोहे
तुलसी ने मानस रचा, दिखी राम की पीर।
बीजक की हर पंक्ति में, जीवित हुआ कबीर।1।
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माँ के छोटे शब्द का, अर्थ बड़ा अनमोल।
कौन चुका पाया भला, ममता का है मोल।2।
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भक्ति,नीति अरु रीति, की विमल त्रिवेणी होय।
कालजयी मानस सरिख , ग्रंथ न दूजा कोय।3।
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जिनको निज अपराध का, कभी न हो आभास।
उनका होता जगत में , पग-पग पर उपहास।4।
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जंगल-जंगल फिर रहे, साधू-संत महान।
ईश्वर के दरबार के, मालिक क्यों शैतान।5।
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हे विधना तूने किया, ये कैसा इंसाफ।
निर्दोषों को सजा है, पापी होते माफ।6।
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जब से परदेशी हुए, दिखे न फिर इक बार।
होली-ईद वहीं मनी, वहीं बसा घर द्वार।7।
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कैसे देखें बेटियाँ बाहर का परिवेश।
घर में रहते हुए भी, हुआ पराया देश।8।

बुधवार, 17 जून 2015

अमन 'चाँदपुरी' की लघुकथा-'वाह रे हरिश्चन्द्र' (प्रस्तोता-डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

मित्रों आज मुझे अमन 'चाँदपुरी' द्वारा भेजी गयी 
एक लघुकथा प्राप्त हुई।
अमन 'चाँदपुरी' एक नवोदित हस्ताक्षर हैं।
जिनका परिचय निम्नवत् है-
नाम- अमन सिहं 
जन्मतिथि- 25 नवम्बर 1997 ई. 
पता- ग्राम व पोस्ट- चाँदपुर 
तहसील- टांडा 
जिला- अम्बेडकर नगर 
(उ.प्र.)-224230
संपर्क : 09721869421
ई-मेल : kaviamanchandpuri@gmail.com
लघुकथा-'वाह रे हरिश्चन्द्र'
        विश्वविद्यालय की लाइब्रेरी के सामने से मैं अपने कुछ मित्रों के साथ कुलपति महोदय से कुछ काम के सिलसिले से मिलने जा रहा था, तभी पीछे से किसी ने आवाज लगायी- 'रुकिये !' हम लोग रुके, मुड़कर देखा तो पुलिस की वर्दी सा कपड़ा पहने चपरासी (प्यून) खड़ा था। उसी ने हमें आवाज लगायी थी।
    तभी चपरासी (प्यून) पास आकर बड़ी विनम्रता से बोला - 'लीजिए आपका पर्स अभी गिर गया था।' 
   मैंने अचम्भित होकर कहा - 'मेरा तो कोई पर्स नहीं गिरा, मेरा पर्स मेरे पास ही है। ये किसी दूसरे का होगा।' 
   चपरासी (प्यून) भी अचम्भित होकर बोला - 'आपका नहीं है।' 
   मैंने कहा - 'हाँ ! मेरा नहीं है।' 
   इतना कहते ही मैं फिर से मुड़कर लम्बे-लम्बे कदमों से अपनी मंजिल की ओर चल पड़ा।    
   तभी एक मित्र ने कहा - 'यार तूने पर्स क्यों नहीं लिया। उसमें चार लाल-लाल हजारे की, कुछ पीली-पीली इसके अतिरिक्त भी कई नोटें दिखाई दे रही 
थी। पूरा कम से कम सात हजार तो था ही।'
     मेरा उत्तर था - 'वह ईमानदारी के साथ पर्स मुझे दे रहा था। उसके हिसाब से वो पर्स मेरा था। अगर चाहता तो पर्स अपने पास भी रख सकता था। उसे हल्ला मचाने की क्या जरूरत थी कि मैंने पर्स पाया है। मगर उसने ऐसा नहीं किया क्योंकि वह ईमानदार था, फिर मैं उस पर्स को लेकर बेइमान क्यों बनूँ।
   सभी मित्र मेरा उत्तर सुनकर खिल खिलाकर हँस पड़े। और एक मित्र ने मजाकिया भाव से कहा - 
'वाह रे मेरे हरिश्चन्द्र !'
- अमन चाँदपुरी, 
रचनाकाल - 2012