मित्रों!

आप सबके लिए “आपका ब्लॉग” तैयार है। यहाँ आप अपनी किसी भी विधा की कृति (जैसे- अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कर सकते हैं।

बस आपको मुझे मेरे ई-मेल roopchandrashastri@gmail.com पर एक मेल करना होगा। मैं आपको “आपका ब्लॉग” पर लेखक के रूप में आमन्त्रित कर दूँगा। आप मेल स्वीकार कीजिए और अपनी अकविता, संस्मरण, मुक्तक, छन्दबद्धरचना, गीत, ग़ज़ल, शालीनचित्र, यात्रासंस्मरण आदि प्रकाशित कीजिए।


समर्थक

रविवार, 12 अगस्त 2018

चन्द माहिया [सावन पे] : क़िस्त 52

चन्द माहिया  [सावन पे ] : क़िस्त 52


[नोट : मित्रो ! विगत सप्ताह सावन पे चन्द माहिए [क़िस्त 51] प्रस्तुत किया था
उसी क्रम में -दूसरी और आखिरी कड़ी प्रस्तुत कर रहा हूँ--]

:1:
जब प्यार भरे बादल
सावन में बरसे
भींगे तन-मन आँचल

:2:
प्यासी आँखें तरसी
उमड़ी तो बदली
जाने न कहाँ बरसी

:3:
उन पर न गिरे ,बिजली
डरता रहता मन
जब जब चमकी पगली

:4:
इक बूँद की आस रही
बुझ न सकी अबतक
चातक की प्यास वही

:5:
कितने बदलाव जिए
सोच रहा हूँ मैं
कागज की नाव लिए


-आनन्द.पाठक-

बुधवार, 8 अगस्त 2018

चन्द माहिया सावन पे : क़िस्त 51

चन्द माहिया  [सावन पे ] : क़िस्त 51

:1:
सावन की घटा काली
याद दिलाती है
वो शाम जो मतवाली

:2:
सावन के वो झूले
झूले थे हम तुम
कैसे कोई भूले

:3:
सावन की फुहारों से
जलता है तन-मन
जैसे अंगारों से

;4:
आएगी कब गोरी ?
पूछ रही मुझ से
मन्दिर की बँधी डोरी

:5:
क्या जानू किस कारन ?
सावन भी बीता
आए न अभी साजन

-आनन्द.पाठक-

शनिवार, 4 अगस्त 2018

एक ग़ज़ल : ये आँधी,ये तूफ़ाँ--

एक ग़ज़ल : ये आँधी ,ये तूफ़ाँ--

ये आँधी ,ये तूफ़ाँ ,मुख़ालिफ़ हवाएँ
भरोसा रखें, ख़ुद में हिम्मत जगायें

कहाँ तक चलेंगे लकीरों पे कब तक
अलग राह ख़ुद की चलो हम बनाएँ

बहुत दूर तक आ गए साथ चल कर
ये मुमकिन नहीं अब कि हम लौट जाएँ

अँधेरों को हम चीर कर आ रहे हैं
अँधेरों से ,साहब ! न हम को डराएँ

अगर आप को शौक़ है रहबरी का
ज़रा आईना भी कहीं देख आएँ

अभी  कारवाँ मीर ले कर है निकला
अभी से तो उस पर न उँगली उठाएँ

यहाँ आदमी की कमी तो नहीं है
चलो ’आदमीयत’ ज़रा ढूँढ  लाएँ

न मन्दिर, न मस्जिद, कलीसा न ’आनन’
नया पुल मुहब्बत का फिर से बनाएँ

-आनन्द.पाठक-

मंगलवार, 31 जुलाई 2018

चन्द माहिया : क़िस्त 50

चन्द माहिया : क़िस्त 50

1

पल जो भी गुज़र जाता
छोड़ के कुछ यादें
फिर लौट के कब आता ?

2
होता भी अयाँ कैसे
दिल तो ज़ख़्मी है
कहती भी ज़ुबाँ कैसे ?

3
 तुम ने मुँह फेरा है
टूट गए सपने
दिन में ही अँधेरा है

4
शोलों को भड़काना
ये भी सज़ा कैसी
भड़का के चले जाना

5
इक नन्हीं सी चिड़िया
खेल रही जैसे
मेरे आँगन गुड़िया


-आनन्द.पाठक-

सोमवार, 30 जुलाई 2018

Laxmirangam: बात कहनी है...

Laxmirangam: बात कहनी है...: बा त कहनी  है. तुमसे अब बात यही कहनी है  कि तुमसे बात नहीं करनी है. जुबां से मैं भी तुमसे कुछ न कहूँ न मुख से तुम भी मुझस...

Free counters!

रविवार, 22 जुलाई 2018

कविता: उपदेशों की गंगा

कविता: उपदेशों की गंगा
सारांश:

हींग      लगे  ना    फिटकरी,
            रंग       आ     जावे,     चोखा।
उपदेश  दे     कर   जग    में,
            ठग  भी   दे    जावे,     धोखा।

बस उपदेशों के ऊपर प्रस्तुत है मेरी ये
रचना:
राजेन्द्र प्रसाद गुप्ता
404/13, मोहित नगर
देहरादून
*******************************
उपदेशों की गंगा

गाँव      था   एक  बहुत  ही,     न्यारा।
जब       भी   उस   गाँव   में,
            मरता              था, 
            किसी    का    कोई,     प्यारा।
------------------------------------------------
रोना      धोना   तब  उसके,
            परिवार   में     मच,  जाता था।
फिर      उसकी  अर्थी   को,
            अच्छे  से  सजाया,  जाता था।
------------------------------------------------
4          कन्धों पर उसे तब,
            शमशान  ले  जाया, जाता था।
राम    नाम  सत्य  है,
सत्य बोलो   गत   है, 
            ऐसा      भी  बोला,  जाता था।

बिछुड़   गया          राजेन्द्र,
            जिन  अपनों से वो,
            उनका  रो  रो  कर,
            हाल      बुरा     हो,  जाता था।
------------------------------------------------
ठीक     उसी           समय,  
            वहाँ   एक  सनकी,    
            ना                जाने,  
            कहाँ    से        आ,  जाता था।
हँस       हँस  कर ढोल पीट,
            शव यात्रा के साथ,
            चलते  हुवे  राजेन्द्र,  
            वो ऐसा  भी कहता, जाता था।
------------------------------------------------
अरे       क्यों     रोते      हो ?
            मृत्यु   तो  है   एक,     बहाना।
अज़र    अमर आत्मा ने तो,
            बदल  लिया आज़,
            बस   अपना चोला,     पुराना।

फिर      काहे     का  इतना,        रोना।
------------------------------------------------
रोने       की     नहीं राजेन्द्र,
            जश्न की घड़ी है ये,    तुम्हारी।
गीता     में    तो   ऐसा    ही,
            कह     गए    कृष्ण,     मुरारी।
------------------------------------------------
तभी      अचानक  एक दिन,
            वक़्त  के थपेड़ों की,
            उसे      पड़    गयी,        मार।
एक्सी   डेन्ट  से जब उसके,
            इकलौते   बेटे     से,
            जिन्दगी         गयी,        हार।
------------------------------------------------
बिछुड़ने से   अपने  बेटे   के,
            वो  तब  दहाड़ें मार,
            राजेन्द्र,  रोने    लग,  गया था।
दूसरों    को      बोले     हुवे,
            गीता के उपदेश को,
            वो बिल्कुल ही भूल,  गया था।
------------------------------------------------
तभी      किसी ने बोला उसे,
            क्यों  रोते  हो  भाई ?
            मृत्यु   तो  है   एक,     बहाना।
अज़र    अमर आत्मा  ने तो,
            बदल  लिया  आज़,
            बस   अपना  चोला,    पुराना।
------------------------------------------------
तब       वो    संभला   और,
            तुरंत  ही  ये  बोला,
            क्षमा    करो    मुझे,       भाई।
आज़     समझ गया मैं,  क़ि,    
            बुरा वक़्त आने पर,
            जग में सारे उपदेश,
            भूल   जाता  इंसान,    
            ये   ही   है   कड़वी,   सच्चाई।
********************************
अंत      में  अब राजेन्द्र  की,
            सुन  लो  एक  बात,  हैरत की।
सोने      जैसी शुद्ध खरी  है,
            ये      बात,      24,  कैरेट की।
------------------------------------------------
एक       ने  दुसरे   से  पूछा,
            जग  में कौन  सा है,
            सब     से  आसान, लेना देना।
दुसरे ने  तब पहले  से कहा,
            किसी   से   सलाह,       लेना। 

और      किसी  को  उपदेश,        देना।
------------------------------------------------
हींग      लगे  ना    फिटकरी,
            रंग       आ     जावे,     चोखा।
उपदेश  दे     कर   जग    में,
            ठग  भी   दे    जावे,     धोखा।
------------------------------------------------
धर्म       का  मुखौटा   पहने,
            बड़े  बड़े पंडालों में,
            कुछ ठग भी  आज़,
            उपदेशों  की   गंगा,   बहाते हैं।
पकड़े    जाने  पर  जेल  की,
            हवा      भी       वो,    खाते हैं।
------------------------------------------------
उपदेशों की   गंगा   जग   में, 
            बस दूसरों  के लिए,
            ही                बहाई,  जाती है।

जब       अपनी           बारी,  आती है।
वो         गंगा  तब  ना जाने,
            कहाँ              सूख,   जाती है।
------------------------------------------------
नहीं      रहती वो  किसी भी,  काम की।
प्रेम       से   बोलो,   जै   श्री,   राम की।
********************************
कविता: राजेन्द्र प्रसाद गुप्ता
404/13, मोहित नगर
देहरादून

शनिवार, 21 जुलाई 2018

चन्द माहिया :क़िस्त 49

चन्द माहिया : क़िस्त 49

:1:
ये इश्क़ है जान-ए-जां
तुम ने क्या समझा
ये राह बड़ी आसां ?

:2:
ख़ामोश निगाहें भी
कहती रहती हैं
कुछ मन की व्यथायें भी

:3:
कुछ ग़म की सौगातें
जब से गए हो तुम
आँखों में कटी रातें


:4:
वो जाने  किधर रहता
एक वही तो है
जो सब की खबर रखता

:5:
माया को सच माना
मद में है प्राणी
 है कितना अनजाना

-आनन्द.पाठक-