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शुक्रवार, 13 सितंबर 2019

लक्ष्मीरंगम - Laxmirangam: ऐसे सिखाएँ हिंदी

लक्ष्मीरंगम - Laxmirangam: ऐसे सिखाएँ हिंदी: कृपया टिप्पणियाँ ब्लॉग पर करें. G+ की टिप्पणियाँ अस्वीकार्य कर दी गई हैं. ऐसे सिखाएँ हिंदी मैं, मेरे हिंदी की शिक्षिका के सा...


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ऐसे
सिखाएँ हिंदी
किसी भी भाषा को
सीखने  का पहला चरण होता है बोलना। और
बोलना  सीखने के लिए उस भाषा का अक्षरज्ञान
जरूरी नहीं होता। किसी को बोलते हुए देखकर सुनकर
, वैसे
उच्चारण का प्रयास कर किसी भी भाषा को बोलना सीखा जा सकता है। बहुत से लोग तो
विभिन्न भाषाओं के सिनेमा देखकर ध्वनि व चित्र के समागम से ही शब्द का उच्चारण और
अर्थ सीख लेते हैं। दोस्तों व परिवारजनों के साथ बात करते करते नए शब्दों को सीखना
और उनका सही उच्चारण करना आसान हो जाता है। इस तरह समाज में रहकर समाज की भाषा
बोलना सीखना एक बहुत ही आसान जरिया है। पर ऐसे में इस बोली में कुछ गलतियों का
समावेश सहजता से हो जाता है।
अगला कदम होता है
लिखना – पढ़ना, जो बोलने के साथ - साथ भी सीखा जा सकता है। वैसे केवल पढ़ना भी कुछ
अतिरिक्त मेहनत करके सीखा जा सकता है। इसी दौरान बोलने की प्रक्रिया के उच्चारण
दोष सही किए जा सकते हैं। अन्यथा ये हमेशा - हमेशा के लिए घर कर जाते हैं। इसलिए
शिक्षकों को चाहिए कि लिखने - पढ़ने की प्रक्रिया के दौरान शिक्षार्थियों के
उच्चारण पर विशेष ध्यान देकर उनमें आवश्यक सुधार करना चाहिए। गलत उच्चारण के कारण ही
लेखन में वर्तनी की गलतियाँ होती हैं और भाषा में अशुद्धता आ जाती है।
अक्षर
और मात्राओँ को सिखाने - सीखने के दौरान शिक्षकों 
को निम्न विषयों पर ध्यान देना चाहिए –

1.     
म और भ  में शिरोरेखा (मस्तक रेखा) की गलती से भ्रम हो
जाता है किंतु इस पर ध्यान नहीं जाता कि म और भ में एक घुंडी का भी फर्क है। इस
घुंडी का ख्याल करने से शिरोरेखा की गलती का कोई असर नहीं होगा।
2.     
घ और ध में भी शिरोरेखा
(मस्तक रेखा) की गलती से भ्रम हो जाता है किंतु इस पर ध्यान नहीं जाता कि घ और ध
में भी एक घुंडी का भी फर्क है। इस घुंडी का ख्याल करने से शिरोरेखा की गलती का
कोई असर नहीं होगा।
3.     
क और फ में भी समानता
होते हुए भी फर्क है। यदि क की गोलाई शिरोरेखा से जुड़ जाए तो फर्क मिट जाता है।
इसलिए क की गोलाई को शिरोरेखा को बचाकर ही लिखा जाना चाहिए।
4.     
प, य और थ – प की गोलाई
में थोड़ी सी वक्रता से वह य का आकार ले लेता है। इस पर ध्यान दिया जाना चाहिए। उस
पर य में घुंडी मात्र के फर्क से यह थ का रूप ले लेता है।
इसी तरह ङ और ड़
में नुक्ता की स्थिति पर गौर करना जरूरी है।
शिक्षकों को
चाहिए कि वे शिक्षार्थियों को इन फर्कों से अवगत कराएँ एवं सुनिश्चित करें कि वे
इन गलतियों को करने से बचें।
इसी तरह मात्राओं
ए (के) और  ऐ (कै) में फर्क भलीभाँति
समझाया जाए। आज भी बच्चे एक में ए पर मात्रा लगाते पाए जाते हैं। उन्हें शायद इस
बात का ज्ञान नहीं होता कि ए में ही मात्रा निहित है, इसके बदले ही मात्रा लगाई
जाती है। ऐ में एक मात्रा अक्षर की है और दूसरी लगाई गई है। किसी अन्य वर्ण में ए
के लिए एक मात्रा और ऐ के लिए दो मात्राएँ लगती हैं ( जैसे के और कै)।
इनके अलावा
मात्राओँ के प्रयोग में विशेषकर सिखाया जाना चाहिए कि निम्न वर्णों में मात्राएँ
सामान्य वर्णों से भिन्न तरीके से लगाई जाती है। यह वर्ण विशेष रूप में लिखे जाते
हैं।
जैसे रु, रू, हृ।
साधारणतः उ और ऊ  की मात्राएँ वर्ण के नीचे
लगाई जाती है, पर र में यह पीठ पर लगती है। वैसे ही ऋ की मात्रा साधारणतः पैरों पर
लगती है, पर ह वर्ण में कमर पर लगाई जाती है। ह वर्ण के साथ जुड़ने वाला हर वर्ण
कमर पर ही जुड़ता है. जैसे आह्लाद, आह्वान, असह्य , चिह्न, अल्हड़, दूल्हा,
कान्हा, और उन्होंने। आप चाहें तो इन्हें अपवाद कह सकते हैं और इसीलिए इन पर विशेष
ध्यान देना जरूरी है। रु और रू पर विशेष ध्यान देना इसलिए भी जरूरी है कि र पर ऊ
की मात्रा पीठ से सटी नहीं होती, बीच में एक छोटी लकीर होती है जिसे अक्सर नजरंदाज
किया जाता है। वैसे ही श पर र की टँगड़ी लगने पर उसका रूप बदल कर श्र हो जाता है।
मात्राओँ में एक
और मात्रा है जिस पर विशेष ध्यानाकर्षण की आवश्यकता है। वह है र की मात्रा। निम्न
शब्दों पर गौर करें।
प्रथम,  पर्यटन, ट्रक।
क्रम, कर्म,
ट्रेन।
अब इनके विस्तार
देखिए –
प्रथम – प्
++ +    - (र पूरा है)
पर्यटन – प
+ र् + + + - ( र आधा है)
ट्रक -  ट् +
+   - (र पूरा है)
क्रम
– क्

+ +   - (र पूरा है)
कर्म – क
+ र् +   - ( र आधा है)
ट्रेन – ट्
+ रे +       - (र पूरा है)
इनमें आप देखेँगे
कि सभी शब्दों में र आधा नहीं है, जैसे कि आभास होता है।
जहाँ र की मात्रा
पैरों पर है वहाँ अक्षर आधा है, पर र पूरा है।
इसे (क्र) र की
टँगड़ी कहते हैं, जो गोलाकार वर्णों में ट्र जैसी हो जाती है।
र की जो मात्रा
सर पर टोपी जैसे लिखी जाती है उसे र का रेफ कहा जाता है और उसमें र आधी होती है।
ध्यान
दीजिए कि अन्य भारतीय भाषाओं की तरह हिंदी में भी मस्तक पर लगने वाली व्यंजन
मात्रा का (शिरोमात्रा) उच्चारण अक्षर से पहले होता है और पैरों पर लगने वाली
मात्राओं का (पदमात्रा) उच्चारण अक्षर के बाद होता है।
पर इसमें एक
अपवाद भी है – अनुस्वार।
देखिए शब्द चंदन
को – अनुस्वार को हटाकर लिखें तो पंचमाक्षर नियमानुसार चन्दन लिखा जाना चाहिए।
यानी अनुस्वार को हटाकर उसकी जगह अगले वर्ण वर्ग के पंचमाक्षर स्थित अनुस्वार वर्ण
का प्रयोग करना चाहिए। इस तरह देखा जा सकता है कि अनुस्वार मस्तक पर लगते हुए भी
अक्षर के बाद उच्चरित होता है। इसी तरह कंगन (कङ्गन), मुंडन (मुण्डन), बंधन (बन्धन),
चंबल (चम्बल) लिखे जाते हैं। ऐसा देखा गया है कि हिंदी में स्नात्तकोत्तर
विद्यार्थी भी पंचांग शब्द को बिना अनुस्वार के लिखने से कतराते हैं । इसे सही में
पञ्चाङ्ग लिखा जाना चाहिए। यहाँ एक बात ध्यान देने योग्य है कि वैयाकरणों ने
पंचमाक्षर नियम बनाकर वर्गों के अनुस्वार की समस्या तो हल कर दिया, पर वर्गेतर
वर्णों की समस्या तो जस की तस है। हिमाँशु या हिमांशु - इसे अनुस्वार बिना कैसे
लिखें हिमान्शु या हिमाम्शु तय नहीं है। सारा दारोमदार निर्भर करता है कि आप शब्द
को कैसे उच्चरित करते है। अब यह तो वैयक्तिक समस्या हो गई न कि व्याकरणिक। इसीलिए
शायद वर्गेतर वर्ण वाले शब्दों  में
अनुस्वार को पंचमाक्षर से विस्थापित करने का प्रावधान नहीं है।
¶ÆÉÞगार

अब कुछ वर्तनी की
ओर –
1.      आधा श –
गोलाकार वर्णों के साथ आधा श – विश्व सा लिखा जाता है, पर कोनों वाले वर्णों के
साथ काश्मीर सा लिखा जाता है। कुछ शब्द हैं जिनमें दोनों तरह की लिपि मानी जा रही
है - जैसे पश्चात, आश्वासन, कश्ती इत्यादि।

2.      ऐसा ही
एक शब्द है  -  (
¶ÆÉÞगार )  शृंगार , यहाँ आधे श पर ऋ की मात्रा लगाई जा
रही है, जो अपवाद है (ऐसा कहा जाता है कि मात्रा लगने पर हर वर्ण व्यंजन का रूप ले
लेता है। इस अर्थ में शृ में भी श आधा ही है)। लेकिन अक्सर लोग इसे श्रृंगार लिखते
हैं, जो एकदम ही गलत है। शृंगार मे श पर ऋ की मात्रा है, जबकि श्रृंगार में श के
साथ आधा र भी जुड़ा है और उस पर ऋ की मात्रा है।

कुछ दक्षिण
भारतीय  भाषाओं के वर्ग में दो ही अत्क्षर
होते हैं. जौसे क और ङ।  इसलिए उन्हें ख,
घ, छ झ के उच्चारण में तकलीफ होती है. संभव है कि वे
खाना खाया और गाना गाया का उच्चारण काना काया की
तरह ही करें। इसी तरह वर्ग का तीसरा अक्षर न होने के कारण वे ग, ज,ब,द का भी सही
उच्चारण नहीं कर पाते। वे गजेंद्रन को कजेंद्रन कहेंगे। कमला व गमला की वर्तनी एक
सा लिखेंगे, फिर पढ़ने में अदला
- बदली हो जाएगी। ऐसी
जटिलताओँ पर शिक्षकों का ध्यानाकर्षण आवश्यक है ताकि वे समय पर विद्यार्थी के उच्चारण
में सुधार कर सकें। शिक्षकों को चाहिए कि इस तरह की त्रुटियों को बालपन में सुधार
दिया जाए। उम्र के बढ़ने पर सुधार में बहुत कठिनाई होती है। उच्चारण की गलतियाँ
अक्सर वर्तनी में देखी जाती हैं। शब्द विद्यार्थी में द और य का मिश्रण है और
संयुक्ताक्षर द्य बना है. अक्सर लोग ध्य को द्य समझने की गलती करते हैं। इस पर विशेष
ध्यान दिया जाना चाहिए। पता नहीं क्यों भाषाविदों ने श्र को तो संयुक्ताक्षर माना
पर द्य को नहीं। इसी तरह दिल्ली व उत्तरी राज्यों में राजेंद्र को राजेंदर उच्चरित
किया जाता है क्योंकि गुरुमुखी लिपि में अक्षरों को आधा करने का प्रावधान नहीं है,
पर द्वयत्व का प्रावधान है। शिक्षकों को इस पर विशेष गौर करते हुए उचित सलाह देकर
त्रुटियों का निवारण करना चाहिए।
अब आईए अनुनासिक
व अनुस्वार के प्रयोग पर। वैसे वर्तनी के आद्यतन नियमों के अनुसार तो जहाँ शब्दों
या तात्पर्यों का हेर - फेर न हो, वहाँ अनुनासिक की जगह अनुस्वार का प्रयोग हो
सकता है। पर जिसे पता होगा वह गलती करेगा ही क्यों
? सबसे उत्कृष्ट उदाहरण
हैं -  हँस (हँसने की क्रिया) और हंस ( एक
जलचर पक्षी)। अब सवाल आता है कि किसका कहाँ प्रयोग उचित है। एक  नियम जो जानने में आया है वह यह कि जहाँ
अनुस्वार या अनुनासिक वाले शब्द को वर्ग के अंतिम अनुस्वार के साथ लिखा जा सकता है,
वहाँ अनुस्वार लगेगा, वर्ना अनुनासिक। जैसे मंगल ( मङ्गल), चाँद ( इसे चान्द लिखने
से उच्चारण बदल जाता है, अतः यहाँ अनुनासिक ही लगेगा)।
जब किसी शब्द में
वर्ग के पंचमाक्षर का ही द्वयत्व हो, या पंचमाक्षरों का ही समन्वय है तो उसे
अनुस्वार से विस्थापित नहीं किया जा सकता । 
उसे आधे अक्षर के साथ ही लिखा जाना चाहिए। जैसे हिम्मत, उन्नति, जन्म,
कण्णन इत्यादि। इनको हिंमत, उंनति, जंम, कंणन नहीं लिखा जा सकता।
अनुनासिक का
प्रयोग अक्सर वहाँ होता है जहाँ मात्राएँ शिरोरेखा पर न लगी हों – जैसे बाँध,
फँसना, गूँज इत्यादि। जहाँ शिरोरेखा पर मात्राएँ हों तो वहाँ अनुनासिक की  जगह अनुस्वार का ही प्रयोग होता है। जैसे में, मैं,
चोंच, भौंकना इत्यादि। याद रहे कि पहले में और मैं में भी अनुनासिक लगाया जाता था।
अब आते है कुछ
शब्दों के विशिष्ट उच्चारण पर –
 ब्राम्हण
उच्चरित होता है पर लिखा जाता है
ब्राह्मण।वैसे ही आल्हाद कहा जाता है पर आह्लाद लिखा जाता है.
वैसे ही आर्द्र,
सौहार्द्र इत्यादि । शिक्षकों को चाहिए कि ऐसे विशेष शब्दों के उच्चारण व वर्तनी
पर विशेष ध्यान देते हुए विद्यार्थियों को लभान्वित करें।
इन सबसे हटकर एक
और समस्या जो मुख्य तौर पर देखी गई है कि प्रादेशिक भाषा का उच्चारण - जो
विद्यार्थियों के हिंदी उच्चारण में आ जाता है. शिक्षकों को चाहिए कि वे बालपन से
ही इस त्रुटि का निवारण करने का प्रयत्न करें। सही उच्चारण से लिपि में वर्तनी की
शुद्धता बढ़ती है।
आशा है कि शिक्षक
गण, इसमें से जो भी स्वीकार्य हो, उससे बच्चों को लाभान्वित करेंगे।




एक ग़ज़ल : मैं अपना ग़म सुनाता हूँ--

एक ग़ज़ल

मैं अपना ग़म सुनाता हूँ ,वो सुन कर मुस्कराते हैं
वो मेरी दास्तान-ए-ग़म को ही नाक़िस बताते हैं

बड़े मासूम नादाँ हैं  ,खुदा कुछ अक़्ल दे उनको
किसी ने कह दिया "लव यू" ,उसी पर जाँ लुटाते हैं

ख़ुशी अपनी जताते हैं ,हमें किन किन अदाओं से
हमारी ही ग़ज़ल खुद की बता, हमको सुनाते हैं

तुम्हारे सामने हूँ मैं , हटा लो यह निक़ाब-ए-रुख
कि ऐसे प्यार के मौसम कहाँ हर रोज़ आते हैं

गिला करते भला किस से ,तुम्हारी बेनियाज़ी का
यहाँ पर कौन सुनता है ,सभी अपनी सुनाते हैं

तसव्वुर में हमेशा ही तेरी तस्वीर रहती है
हज़ारों रंग भरते हैं, बनाते हैं , सजाते हैं

दिल-ए-सदचाक पर मेरे सितम कुछ और कर लेते
समझ जाते वफ़ा क्या चीज है , कैसे निभाते हैं

मुहब्बत का दिया रख दर पे उनके आ गया ’आनन’
कि अब यह देखना है वो बचाते  या बुझाते हैं

-आनन्द.पाठक--

शब्दार्थ
नाक़िस = बेकार ,व्यर्थ
दिल-ए-सद चाक = विदीर्ण हृदय

मंगलवार, 10 सितंबर 2019

एक व्यंग्य : हिंदी पखवारा और मुख्य अतिथि

14-सितम्बर , हिंदी दिवस के अवसर पर विशेष-----]

एक व्यंग्य : हिंदी पखवारा और मुख्य अतिथि

"अरे भाई मिश्रा जी ! कहाँ भागे जा रहे हो ? " ---आफिस की सीढ़ियों पर मिश्रा जी टकरा गए
’भई पाठक ! तुम में यही बुरी आदत है है । प्रथमग्रासे मच्छिका पात:। तुम्हें मालूम नहीं कि आज से ’हिन्दी पखवारा" शुरू हो रहा है ।
मालूम नहीं कि सरकारी विभाग में हिन्दी पखवारा का क्या महत्व है ? मरने की फ़ुरसत नहीं होती "---मिश्रा जी ने अपना तात्कालिक और सामयिक महत्व बताया।
’अरे ’मार ’कौन रहा है तुम्हें ?-’ बदले में मै ने सहानुभूति जताई ।
इसी बीच मिश्रा जी की हिंदी चेतना जग गई-" मरने" की बात कर रहा हूँ ’डाईंग’--’डाईंग- । ’मारने’ ’बीटिंग’ बीटिंग’ की बात नहीं कर रहा हूँ ।’मरना’ अकर्मक क्रिया है --’मारना’ सकर्मक क्रिया है । मालूम भी है तुम्हें कुछ । मालूम भी कैसे होगा? "फ़ेसबुकिया" हिंदी से फ़ुरसत मिलेगी तब न ।
’अरे जाओ न महराज ,मरो’--मै ने अपना पीछा छुड़ाते हुए ,वहाँ से खिसकना ही उचित समझा।
मेरे पुराने पाठक ,मिश्रा जी से अवश्य परिचित होंगे। जो नए पाठक हैं ,उन्हें मिश्रा जी के बारे में संक्षेप में बता दूँ । मेरा सम्बन्ध मिश्रा जी से वही है जो कभी राजनारायण जी का चौधरी चरण सिंह से था , के0पी0 सक्सेना जी का किसी ’मिर्ज़ा’ से था या अमित शाह जी का मोदी जी से है। मिश्रा जी अतिउत्साह में जब कहीं ’लंका-दहन’ कर के आते हैं तब मुझे ही ’लप्पो-चप्पो’ कर के स्थिति सँभालनी पड़ती है।
मिश्रा ने सही तो कहा । मैं आत्म-चिन्तन में डूब गया । सरकारी विभाग में हिंदी-पखवारा के दौरान हिन्दी -अधिकारी का काम कितना बढ़ जाता है ।कितनी भाग दौड़ करनी पड़ती है ।जाके पैर न फटी विवाई ,सो क्या जाने पीर पराई ।
अब मिश्रा जी ने चिन्तन शुरू कर दिया -आसान काम है क्या एक ’हिंदी-अधिकारी ’ का काम ।बड़े साहब का हिंदी में संबोधन-सन्देश लिखना ,स्वागत-भाषण लिखना, धन्यवाद प्रस्ताव लिखना, हिन्दी की क्या महत्ता है -पर आलेख लिखना । उदघाटन के लिए मुख्य-अतिथि चुनना ,पकड़ना और पकड़ के लाना ।और मुख्य-अतिथि चुनना भी आसान काम है क्या? बड़े-बड़े साहित्यकार तो पहले से ही बुक हो जाते है । शादी के मौसम में बाजा वालों को समय से ’बुक’ न करो तो बजाने वाले भी नहीं मिलते। नखरे ऊपर से।
मुख्य अतिथि पकड़ने-धकड़ने में पिछली बार कितनी परेशानी हुई थी ,।एक ठलुआ निठ्ठल्लुआ साहित्यकार के पास गया था। बैठ कर मख्खी मार रहा था मगर ’किसी हिंदी कविता कहानी ग्रुप का ’फ़ेसबुकिया एड्मिनिस्ट्रेटर’ था । हिंदी-ग्रुप का फ़ेसबुकिया संचालक भी अपने आपको हिंदी का "मूर्धन्य साहित्यकार’ मानता है । और जो उसे नहीं मानता ,वह उसे ’लतिया’ देता है अपने ग्रुप से । वह अपने नाम के आगे ’कवि अलानवी ’ वरिष्ठ लेखक , कथाकार ढेकानवी ..शायर फ़लानवी लिख लेता है । ख़ुद ही मोर पंख लगा लेता है।
ऎसे ही एक महानुभाव के पास .हिंदी-दिवस के लिए निमन्त्रित करने गया ।
"भई मेरे पास तो टैम नहीं है ’मुख्य अतिथि’ बनने का । दसियों जगह से निमन्त्रण आए हैं ।आप ही बताएँ कहाँ कहाँ जाऊँ। आप मेरे ’रेगुलर क्लाईन्ट’ है तो कुछ न कुछ करना ही पड़ेगा ।डायरी देख कर बताता हूँ।भाई साहब ने अपनी डायरी देखी,माथे पर कुछ चिन्ता की लकीरें उभारी, कुछ मुँह बनाया,कुछ ओठ बिचकाया ,कभी चश्मा उतरा ,कभी चश्मा चढ़ाया और अन्त में प्रस्फुटित हुए--" मुश्किल है भाई साहब । किसी प्रकार एक-घंटा निकाल सकता हूँ आप के लिए।भई मेरे पास गाड़ी तो नहीं है आप को ही ले जाना पड़ेगा और वापस छोड़ना पड़ेगा। बच्चों के लिए कुछ उपहार होना चाहिए -’पत्रम-पुष्पम’ वाला लिफाफा ज़रा वज़नदार होना चाहिए-----"
"सर ! यह कुछ ज़्यादा नहीं है ? इतना बजट नहीं है ,सर अपना "-मैने अपनी ’दंत -चियारी ’ करते हुए सरकारी असमर्थता जताई ।
" तो आज ही उदघाटन करा लो,फीता कटवा लो । सस्ते में कर दूँगा’---उन्होने हिंदी सेवा का अपना व्यापारिक रूप दिखाया
’सर !’हिंदी दिवस’ आज नहीं है न ,वरना आज ही बजवा लेता मतलब फीता कटवा लेता।
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पितॄ-पक्ष में कौए पूजे जाते हैं । अच्छे-अच्छे पकवान खिलाये जाते है। इस उमीद से कि पुरखे तर जाएंगे ।हिंदी-पखवारा में न जाने क्यों हिन्दी साहित्यकार ही बुलाए जाते हैं।इस उमीद से कि हिंदी तर जायेगी । मान्यता है बस।

कोई मिला नहीं तो थक हार कर उन्हीं महोदय को मोल भाव कर के लाया । पखवारा का अन्तिम दिन था सस्ते में --गाड़ी से ले आने-ले जाने की शर्त पर मान गए ।
-----
हिंदी पखवारा का आख़िरी दिन । 14-सितम्बर।
सभागार भरा हुआ है । सरकारी अधिकारी मंच पर बैठ गए।माला फूल हार पहना दिए गए। सरस्वती-वंदना हो गई । दीप-प्रज्ज्वलित हो गया । उदघाटन हो गया-। मुख्य अतिथि महोदय माइक पर आए और भाषण शुरु किया।
"-- पहले मैं आप सभी का धन्यवाद ज्ञापन कर दूँ कि आप ने इस पावन अवसर पर इस अकिंचन को याद किया ---आप सब जानते हैं -आज ही के दिन हिंदी हमारी ---गाँधी जी ने कहा था अगर देश को एक सूत्र में कोई पिरो सकता है तो वह है हिंदी---नेहरू जी ने कहा था-----हिन्दी एक भावना है ---जो भरा नहीं है भावों से ,जिसमें बहती रसधार नहीं , वो हृदय नहीं है पत्थर है-- ।हिंदी भारत माँ की बिंदी है------
"बात यहीं से शुरु करते हैं --हिन्दी पखवारा--’ उन्होने पीछे मुड़ कर दीवार पर टँगे हुए बैनर को देखते हुए कहा--" हिंदी-पखवारा। कभी आप ने ध्यान दिया कि यह शब्द कैसे बना? नहीं दिया न ? आज मैं बताता हूँ-- ’पखवारा ’- पक्षवार से बना है ।जैसे ’ईक्ष’ को "ईख’ को बोलते हैं । यानी’क्ष’ को ’ख’ बोलते है । पक्ष यानी 15-दिन का एक पक्ष--कॄष्ण पक्ष--शुक्ल पक्ष। अब तो लोग ’हिंदी-सप्ताह’ को भी लोग हिंदी पखवारा बोलने लग गए। कहीं कहीं कुछ लोग ’हिंदी-पखवाड़ा’ भी बोलते है ।कुछ जगह तो लोग -’ड़’- को -’र’ भी बोलते है जैसे "घोरा सरक पर पराक पराक दौर रहा है ’ ।यह किस प्रदेश की भाषा है यह न पूछियेगा । आप इस चक्कर में न पड़े कि पखवारा है कि पखवाड़ा-है । मगर --बैनर हमेशा वक्ता के पिछवाड़ा ही टँगा रहता है
--तालियाँ बजने लगी । क्या ज्ञान की बात कर रहा है बन्दा ।वाह वाह ।उन्होने अपना भाषण जारी रखा।
"अन्त में । हिंदी सबसे ज़्यादा बोली जाने वाली भाषा है---मैं पिछली बार जब अमेरिका गया था-तो लोगों का हिंदी प्रेम देख कर मन अभिभूत हो गया --अगर आप कभी ’ऎडीसन’ गए हों --’ऎडीसन’ न्यूजर्सी की एक काउन्टी है -तो आप को लगेगा कि आप फिर भारत में आ गए जैसे कि आप यू0पी0 में हैं बिहार में हैं -- उस से पहले मैं रूस गया था तो वहाँ भी हिंदी बोली जाती है--आवारा हूँ [मैं नहीं] -मेरा जूता है जापानी --मेरा दिल है हिन्दुस्तानी ---हिंदी सुन कर मेरा सर श्रद्धा भाव से झुक गया हिन्दी के अगाध प्रेम के प्रति। जापान की बात तो खैर और है -। एक बार जापान भी गया था ।वहाँ के विश्वविद्यालय में आमन्त्रित था---
"अन्त में --. हमें हिंदी को आगे बढ़ाना है ।आप लोग सरकारी अधिकारी हैं ,कर्मचारी है ।देश के कई भाग से आए होंगे --कोई .तमिल’ से आया होगा --कोई आन्ध्रा से -कोई केरला से -।हिंदी बहुत ही सरल भाषा है । जिन भाइयों को हिंदी नही आती --घबराने की कोई बात नहीं --आप आफ़िस की नोटिंग में कठिन अंगरेजी शब्दों को देवनागरी में लिख दें --बस हो गई हिंदी--
"अन्त में -----
अन्त में --अन्त में कह्ते कहते 1 घन्टे के बाद अन्तियाए और सभा समाप्त हो गई ।हिन्दी दिवस मना ली गई एक सरकारी कार्यालय में ,और मुख्यालय को रिपोर्ट भेज दी गई ।
------------
बड़े साहब-- ’ मिश्रा ! इस मुए को कहाँ से पकड़ के लाया था। इस से अच्छी हिन्दी तो मैं ही बोल सकता था।
मिश्रा जी -----’सर ! आप विभाग के ’मुख्य महा प्रबन्धक’ हैं ,आप ’मुख्य अतिथि ’कैसे हो सकते थे। यह आदमी निठ्ठला खड़ा था आज के दिन ’लेबर चौक’ पर, सो पकड़ लाया। ’सस्ते’ में ’अच्छा’ भाषण दिया।
’या ,या ’-कह कर बड़े साहब ने अपने घर की राह ली।
-------------------
बाद में मालूम हुआ कि वह वक्ता भाई साहब जो ”दसियों निमन्त्रण’ की बात कर रहे थे वो अपना भाव बढ़ाने के लिए कर रहे थे और जो डायरी देख कर बताने की बात कर रहे थे उस में वह रोज नामचा लिखते हैं।वह इदेश-विदेश कहीं नहीं आते-जाते ।साल में एक बार अपने गाँव चले जाते है और उसी को ’विदेश-यात्रा " कह कर उल्लेख करते रहते हैं ।यह रहस्य उनके एक दूसरे प्रतिद्वन्दी हिंदी सेवक भाई ने बताई।
’------
मुख्य अतिथि महोदय के ’अंगरेजी के कठिन शब्दों को देवनागरी में लिखने वाले ’प्रवचन’ का कितना प्रभाव-- तमिल --कन्नड़ -मलयालाम भाषी भाइयों पर पड़ा होगा ,मालूम नहीं ।मगर मिश्रा जी पर काफी गहरा प्रभाव पड़ा ।
अगले दिन उन्होने ’हिंदी वर्जन विल फ़ालो" वाले एक अंगेरेजी सर्कुलर का हिन्दी अनुवाद कर अधीनस्थ कार्यालयों को यूँ भेंज दिया
" टू द मैनेजर
प्लीज रेफ़र दिस आफिस लास्ट लेटर डेटेड----
आइ एम डाइरेक्टेड टू स्टेट दैट-------
नान कम्प्लाएन्स आफ़ द इनस्टरक्शन विल भी ट्रीटेड सीवीर्ली--

हिंदी आफ़िसर
फ़लाना आफ़िस

अस्तु
-आनन्द पाठक-



गुरुवार, 5 सितंबर 2019

घर


तुमने देखा तो होगा 
मेरा घर 
मैं मेरे घर में 
अपनों के बीच 
अपनेपन से 
रहती हूँ ..


‘मेरे ’  घर में 
तीन बेडरूम एक हॉल 
और किचन के अलावा 
एक स्टोररूम और 
पूजा का एक कोना है ..

और हाँ
अपनी हैसियत के 
हिसाब से 
सजा रखा है 
मैंने  घर अपना ..

हर रोज़ 
बाई आती है
मेरे  घर 
जो झाड़ू पोछा 
कर जाती है ..
और 
जहाँ तहाँ जमी धूल,
और उग आए 
मकड़ी के जालों को 
साफ़ कर जाती है ..

गर कोई 
जानता नहीं है 
तो ये कि मैं ..
ख़ुद अपने ही भीतर 
एक आलीशान से 
कई कमरों वाले 
घर में 
न जाने कितने ‘मैं’ 
के साथ 
रहती हूँ  !!

कौन सी ‘मैं’
और कितनी ‘मैं ‘
किस कमरे में 
रहती है,
ये ख़ुद मैं  भी 
नहीं जानती !!

कितनी ही अलमारियाँ
और कितने ही खाने 
उगा रखे है मैंने 
अपने भीतर  ...
जिनमे कई कई 
‘मैं ’ और मेरी 
अच्छी बुरी यादें ...
बातें दफ़न है !!


मेरे भीतर 
पनपते और फैलते हुए 
इस घर में 
जो जमी हुई 
अहं की  धूल ...
मोह, द्वेष,काम ,
और क्रोध के मकड़जाल है,
उन्हें साफ़ करने के लिए 
कोई कामवाली 
नहीं मिलती मुझे !


कितने ही अंधेरे 
फैले है 
मेरे दिलो दिमाग़ के 
अंधे कुएँ में ...
और 
उम्र के तहखानों में !!
डरती हूँ मैं 
इन डरावने कोनों और 
भयावह कमरों में 
झाँकते हुए !!

हाँ ...
कुछ एक 
सुकून भरे 
एकांत है 
मेरे भीतर ...
जिनमें में 
प्रायः छुप जाती हूँ मैं 
कितनी ही 
अनचाही परिस्थितियों में ...

पिछली दफ़ा 
जब किन्ही 
मुश्किलातों से 
दो चार हुई थी 
तब ..
अपने ही भीतर 
किसी कोने में 
छुप गई थी मैं 
... 
...
...
खो गई  हूँ 
तब से ही
ख़ुद की बनी 
ख़ुद की बुनी 
इस भूलभुलैया में ....

सुनो ..
गर प्रेम में हो मेरे 
तो यक़ीनन 
मुझमे समाहित हो तुम 
गर मुझ में विचरते  हुए 
कदाचित 
कहीं मिल जाऊँ कभी 
बुला लेना 
मिला देना 
मुझे मुझसे 
कि अरसा हुआ है 
मुझे मैं हुए हुए ...

#मैं_ज़िंदगी 

शनिवार, 10 अगस्त 2019

लिखती हूँ - लिखती रहूँगी

“मत लिखो !”‬
-चार्ल्ज़ बुकोवस्की ने कहा था,
तब तक कि
जब तक लिखने की
हवस नहीं होती -
यही कहा था उन्होंने !!
और भी बहुत कुछ !
कहा था कि
होते है करोड़ों लेखक
मुझ से जो ख़यालों में
स्वमैथुन करते है
और बन जाते है
सवघोषित लेखक !

मगर चार्ल्ज़,
मैं क्या करूँ ?
जब लार से
टपकने लगते है ये शब्द,
क़लम के मुँह से ,
जब भी कुछ अच्छा पढ़ा
जब भी कुछ अच्छा दिखा !
और तो और
काग़ज़ भी तो संयम
खोने लगता है !
कसमसाने लगता है !
और
सम्पूर्ण महसूस करता है
स्वयं को !
जब शब्द के वीर्य पड़ते है,
उसकी कोरी कोख में !
और
उद्भवती है एक
रचना ...

वो कविता
जो कई दफे
अपंग होती है,
मानसिक तौर पे
अस्वस्थ भी ,
अंधी लूली लँगड़ी रचना
जिसे रचनाकार
या आलोचक फ़ेक देते है
रद्दी में, या फाड़ देते है
अथवा जला देते है ...

मगर
कोई नहीं सुनता
उन मरगिल्ली, अस्वस्थ
अपंग रचनाओं की
ख़ामोश चीख़ों को,
जिनमे लेखक /रचनाकार की
अंतिम हिचकियों की आवाज़
सुनाई देती है !
मैं उन चीख़ों को
रोज़ रोज़ जीती हूँ
अपनी रचनाओं में
जागती सोती हूँ !

सुनो .. चार्ल्स बुकोवस्की!
मैं महज़ लेखिका नहीं हूँ !
जन्मदात्री हूँ !!
शब्दों के काग़ज़ के साथ
प्रणय में उद्भवे
अनगिनत कविताओं की
मैं माँ हूँ !!
मैं भ्रूण हत्या नहीं करती !
मैं अपने
अपंग कुपोषित
मानसिक रूप से कमज़ोर
रचना की हत्या नहीं करूँगी !!


मत मानो मुझे लेखिका
मगर
अपनी रचनाओं की मैं
रचियता रहूँगी
मैं उन गौण क्षुद्र कविताओं की
लेखिका ही रहूँगी !
मैं लिखती हूँ और
मैं लिखती ही रहूँगी

शनिवार, 3 अगस्त 2019

लड़कियाँ अनाज सी होती है

लड़कियाँ 
अनाज के आटे 
सी होती है ..

गाँव की लड़की 
बाजरा मक्का या जवार
होती है 

शहरी लड़कियाँ 
मैदे या गेहूँ सा 
ग़ुबार होती है ...

बेली ही जाती है सब 
रोटी पराँठा 
लिट्टी क़ुल्चे सी 
और 
खाई जाती है 
बस भूख (!) 
मिटाने के लिए ..

वाइरस

तुम्हें खोजते हुए
पहुँच जाना मेरा 
हर बार 
उस क्षितिज पे
जहाँ कदाचित
आदम हौवा 
पहली दफ़े  मिले थे ...

अथक  प्रयास करना मेरा 
हम दोनों के अस्तित्व के 
jigsaw puzzle से 
ख़यालों के 
और रूह के  टुकड़े 
जो कदाचित 
एक दूसरे में 
फ़िट बैठने के 
लिए बने थे 

मगर ये तुम्हारे मेरे 
ख़्यालों के टुकड़े
मायावी से है, जो 
हर बार बदल लेते है 
स्वरूप अपना 
किसी वाइरस की तरह ...

बदल लेते है ये 
अपना आकार 
प्रकार और विचार 
और फिर 
हम दोनो 
फ़िट नहीं बैठ पाते 
उस सामाजिक ढर्रे में ...

टूट जाते है 
दोनो शैने शैने 
और सोचते है 
ये वाइरस कौन था ...
वहम या  अहम !!