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रविवार, 25 अक्तूबर 2020

एक व्यंग्य व्यथा : रावण का पुतला

 सभी सुधी पाठकों को,मित्रों को ’विजय दशमी" पर्व पर हार्दिक शुभकामनाएँ--।

विजय --’असत्य’ पर ’सत्य ’ की--”पाप’ पर ’पुण्य’ की --’अधर्म ’ पर ’धर्म ’ की "रावणत्व" पर "रामत्व की । परन्तु आज ---?
[ डायरी के पन्नों से---]
एक व्यंग्य व्यथा : ----रावण का पुतला
---- आज रावण-वध है ।
आज 40 फुट का पुतला जलाया जायेगा । विगत वर्ष 30 फुट का जलाया गया था। इस साल रावण का कद बढ़ गया है । पिछ्ले साल से इस साल बलात्कार अत्याचार ,अपहरण ,हत्या की घटनायें बढ़ गई तो ’रावण’ का कद भी बढ गया।रामलीला की तैयारियाँ पूरी हो चुकी हैं। मैदान में भीड़ इकठ्ठी हो रही है । बाल बच्चे, महिलायें , वॄद्ध, नौजवान धीरे धीरे आ रहे हैं ।आज रावण वध देखना है । मंच सजाया रहा है । इस साल मंच भी कुछ बड़ा बनाया जा रहा है । इस साल वी0आई0पी0 -लोग ज़्यादा आयेंगे। सरकार में कई पार्टियों का योगदान है अभी - सभी पार्टियों के नेताओं को जगह देना है मंच पर । पिछली साल ’अमुक’ पार्टी के नेता जी बिफ़र गये थे मंच पर ही -धमकी देकर गए थे---’हिन्दुत्व ’ पर ,आप का ही खाली ’कापी -राइट’ नही है है ? --हमारा भी है। इसी लिए तो ’काँग्रेस’ छोड़ कर इधर आये वरना हम उधर क्या बुरे थे? इस बार कोई दूसरा नेता न बिदक जाये -इस लिए मंच को बड़ा रखना ज़रूरी है ।सबको जगह देना है॥सबका साथ -सबका विकास। ’राम-सीता-लक्षमण-हनुमान जी ’ के लिए मंच पर जगह कम पड़ गई -तो क्या हुआ ?-} उन्हें जगह की क्या ज़रूरत ।वो तो सबके दिल में है, परन्तु वी0आई0पी0 लोगो को मंच पर जगह कम न पड़ जाये-सब कई दल के हैं ।
रावण वध देखने नेता आयेंगे,अधिकारी गण आयेंगे। । मंच पर वो भी आयेंगे जिन पर ’बलात्कार’ का आरोप है ।वो भी आयेंगे जिनपर ’घोटाला’ का आरोप है।वो भी आयेंगे जो ’बाहुबली’ है जिन्होने आम जनता के ’ खून’ का बूँद बूँद इकट्ठा कर अपना अपना ’घट’ भरा है । रावण ने भी भरा था। वो भी आयेंगे जो कई ’लड़कियों’ का अपहरण कर चुके है -वो भी आयेंगे जिन पर ’रिश्वत’ का आरोप है ।’भारत तेरे टुकड़े होंगे’’ टुकड़े होंगे’- वाले भी आयेंगे ।कहते है_ आरोप से क्या होता है ? सिद्ध भी तो होना चाहिये। सब भगवान को माला पहनायेंगे। मंच के कोने में सिमटे ’भगवान’ जी सब सुन रहे हैं। उन्हे ’रावण वध’ करना है --इधर वाले का नहीं --सामनेवाले का --पुतले का।
उधर रावण का पुतला खड़ा किया जा रहा है -भारी है । अपने पापों से भारी हो गया है ।सेठ जी बड़ा चन्दा दे कर खड़ा करवा रहे है। कमेटी वालों ने येन केन प्रकारेण ’पुतला’ खड़ा कर के सीना चौड़ा किया और चैन की साँस ली । पुतला खड़ा हो गया मैदान में उपस्थित सभी लोगों ने तालियाँ बजाई । सब की नज़र में आ गया रावण का पुतला --उसका पाप --उसका ’अहंकार’ --उसका ’लोभ--उसका रूप ’ । यही तो देखने आए हैं इस मेला में। ऐसे पापियों का नाश अवश्य होना चाहिए। वध में अभी विलम्ब है। राम- लक्ष्मण जी अपना तीर धनुष लेकर पहुँच चुके हैं मगर रावण को अभी नहीं मार सकते ।भगवान को इन्तज़ार करना पड़ेगा। मुख्य अतिथि महोदय अभी नहीं पहुँचे हैं।
क्या करें तब तक। मैदान में लोग आपस में बातचीत कर रहे हैं --समय काटना है।
कान्वेन्ट के एक बच्चे ने रावण के पुतले को देख कर अपनी जिज्ञासा ज़ाहिर किया-"मम्मा हू इस दैट अंकल"?
"बेटा ! ही इस ’रावना’ --लाइक योर डैडू । रामा विल किल ’रावना’-थोड़ी देर में
बच्चे को -’डैडू’ वाली बात तो समझ में नहीं आई ,पर ’रामा’ किल ’रावना’ वाली समझ में आ गई
उधर "हरहुआ’ अपने काका को बता रहा था --’काका ! ई अब की बार का पुतला न बड़ा जानदार बनाया है। महँगा होगा?
काका ने अपने अर्थ शास्त्र का ज्ञान बताया--- हाँ ! रे ! बड़े आदमी का पुतला भी मँहगा होता है । हम गरीबन का थोड़े ही है कि एक मुठ्टी घास लिया और फूंक दिया ---
रमनथवा की बीबी अपने मरद ने कान में कुछ कहती है -"सुनते हो जी ! हमें तो आजकल महेन्दरा की नीयत ठीक नहीं लगती---बोली-ठोली करता रहता है ।--हमें तो उसकी नज़र में खोट नज़र आ रहा है-।--"
’अच्छा ! स्साले को ठीक करना पड़ेगा"-रामनाथ ने बोला--"बहुत चर्बी चढ़ गई है ।उसे छोड़ , तू इधर का रावण देख---"
उधर शर्मा जी ने माथुर साहब से कहा -" या पुतला इस वेरी नाइस ! --बट इट लैक्स ए ’टाई’
माथुर साहब ने हामी भरी ---यस सर ! हम लोग ’टाई ’ में कितना ’नाइस" लगता है न--बेटर दैन ’रावना’
भीड़ बेचैन हो रही थी । मुख्य अतिथि महोदय अभी तक पहुँचे नही ।मोबाईल से खबर ले रहे हैं --अरे कितनी भीड़ पहुँची है मैदान में अभी ?---नेता जी के चेला-चापड़ खबर दे रहे हैं कि बस सर आधा घंटा और ।पहुँचिए रहें हैं लोग । नेता जी तो भीड़ से ही जीते हैं ---रावण को क्या मारना ...?जल्दी क्या है ?---रावण तो हर साल मरता है । चुनाव तो इस साल है। राम जी उधर अपना डायलाग’ याद कर रहे हैं।
--अब रावण भी बेचैन होने लगा। एक तो मरना और उस पर खड़ा होने की सज़ा ।पता नहीं ये मुख्य अतिथि का बच्चा कब आयेगा उसका धैर्य अब जवाब देने लगा ।
अन्त में बोल उठा---"हा ! हा ! हा! हा! मैं ’रावण’ हूं
भीड़ उस की तरफ़ मुड़ गई । ये कौन बोला ?--रावण कहां है ?--ये तो पुतला है । सभी एक दूसरे को आश्चर्य भरी दॄष्टि से देखने लगे- ये पुतला कहाँ से बोल रहा है?
"हा ! हा! हा! हा!’ -पुतले से पुन: आवाज़ आई-- मैं पुतला नहीं ,रावण बोल रहा हूँ ,! अरे भीड़ के हिस्सों ! मूढ़ों ! तुम लोग क्या समझते हो कि तुम लोग मुझे मार दोगे? वाल्मीकि से लेकर तुलसी तक सभी ने मुझे मारा । क्या मैं मरा? हर साल तुम ने मुझे मारा । क्या मैं मरा? तुम कहते हो कि मैने ’सीता का अपहरण किया ? क्या मेरे मरने के बाद सीता का अपहरण बन्द हो गया । क्या तुम्हारे ’बाहुबली’ लोग अब सीता का ’अपहरण’ नही करते?--उन्हें ’फ़ाइव स्टार’ होटेल में क़ैद कर नहीं रखते? मैने छल किया --क्या तुम लोग छल नहीं करते ?
हा हा ! हा! हा! ------मैं मरता नही अपितु ज़िन्दा हो जाता हूँ हर साल -----तुम्हारे अन्दर --- लोभ बन कर ,,,,हवस बन कर,,,, , छल बन कर ...अहंकार बन कर ---ईर्ष्या बन कर--परमाणु बम्ब बन कर --हाईड्रोजन बम्ब बन कर ।हर देश में ..हर काल में मैं ज़िन्दा रहा हूँ मैं । कभी---- हर युद्ध में -- हर मार काट में --कभी सीरिया में ----कभी लेबनान मे--- । तुम विभीषण’ को पालते हो क्यों कि वह तुम्हे ’सूट’ करता है ----तुमने कभी अपने अन्दर झांक कर नही देखा ---तुम झाँक भी नहीं सकते --देख भी नही सकते -तुम देखना चाहते भी नही -तुम्हे मात्र मुझ पर पत्थर फ़ेकना आता है --क्यों कि तुम्हे यह आसान लगता है --तुम अपने आप पर ’पत्थर नहीं फ़ेंक सकते----- - मुझे जलाना तुम्हे आसान लगता है -तुम अपने अन्दर का लोभ नहीं जला सकते -मुझे मारना तुम्हे आसान लगता है ---तुम अपने आप का ’अहंकार नही मार सकते । - मेरा अहंकार स्वरूप दिखता है ---।तुम्हें मेरे नाम से नफ़रत है---कोई अपने बेटे का नाम ’रावण’ नही रखना चाहता ----सब ’राम’ का ही नाम रखना चाहते हैं परन्तु ’राम के नाम की आड़ में क्या खेल नहीं चलता---ऐसा ही चलता रहा तो भविष्य में लोग ’राम’ का नाम भी रखने में 2-बार सोचेंगे । मैने तो राम के नाम का सहारा नहीं लिया -। रावण एक प्रवॄत्ति है--उसे कोई नही मार सकता--अगर कोई मार सकता है बस--तुम्हारे दिल के अन्दर का ’रामत्व’ ही मुझे मार सकता है --और तुम राम नही ----अपने अन्दर ’रामत्व’ जगाऒ ---क्षमा जगाओ----करुणा जगाओ--प्यार जगाओ -- मैं खुद ही मर जाऊँगा----
’या ही इज टाकिंग समथिंग नाइस’-- शर्मा जी ने कहा
माथुर साहब ने हुंकारी भरी--’ जब मौत सामने दिखाई देती है तो ज्ञान निकलता है सर --दैट इज व्हाट एक्ज़ैक्टली ही इज टाकिंग’ सर !
--- माइक से उद्घोषणा हुई --- भाइयो और बहनो ! आप के प्यारे दुलारे चहेते मुख्य अतिथि महोदय अब हमारे बीच पधार चुके है ---जोरदार तालियों से उनका स्वागत कीजिए। थोड़ी देर में ’रावण वध’ का आयोजन किया जायेगा
सब ने अपने अपने हाथ में पत्थर उठा लिए।
अस्तु

-आनन्द.पाठक-

बुधवार, 21 अक्तूबर 2020

चन्द माहिए---

 चन्द माहिए

1
टूटा जो खिलौना है
ये तो होना था
किस बात का रोना है ?
2
नाशाद है खिल कर भी
प्यासी है नदिया
सागर से मिल कर भी
3
कुछ दर्द दबा रखना
मोती-से आँसू
पलकों में छुपा रखना
4
इतना तो बता देते
क्या थी ख़ता मेरी ?
फिर चाहे सज़ा देते
5
बस हाथ मिलाते हो
रस्मी लगता है
रिश्ता न निभाते हो

-आनन्द.पाठक-

बुधवार, 14 अक्तूबर 2020

एक ग़ज़ल

 ग़ज़ल  : बात दिल पे लगा के--


बात दिल पे लगा के बैठे हैं ,

हाय ! वो ख़ार खा के बैठे हैं।


ज़ख़्म-ए-दिल हम दिखा रहें हैं इधर

वो उधर मुँह फ़ुला के बैठे है।


ग़ैर को आप का करम हासिल ,

सोज़-ए-दिल हम दबा के बैठे है।


देखते हैं कि क्या असर उन पर ?

हाल-ए-दिल हम सुना के बैठे है।


रुख़ से पर्दा ज़रा हटा उनका,

होश हम तो गँवा के बैठे हैं।


राह-ए-दिल से कभी वो गुज़रेंगे,

हम इधर सर झुका के बैठे हैं।


इश्क़ में होश ही कहाँ ’आनन’,

खुद ही ख़ुद को भुला के बैठे हैं।   


-आनन्द,पाठक---


शब्दार्थ

सोज़-ए-दिल = दिल मे प्रेम की आग

          = प्रेमाग्नि

बुधवार, 30 सितंबर 2020

चन्द माहिए

 चन्द माहिए ...


1

सौ बुत में नज़र आया

सब में दिखा वो ही

जब दिल में उतर आया


2

जाना है तेरे दर तक

ढूँढ रहा हूँ मैं

इक राह तेरे घर तक


3

पंछी ने कब माना

मन्दिर-मस्जिद का 

होता है अलग दाना 


किस मोड़ पे आज खड़े ?

क़त्ल हुआ इन्सां

मज़हब, मज़हब से लड़े 


5

इक दो अंगारों से 

समझोगे क्या ग़म 

दरिया का, किनारों से?


-आनन्द  पाठक-


शुक्रवार, 25 सितंबर 2020

एक युगल गीत

 एक  युगल   गीत 


कैसे कह दूँ कि अब तुम बदल सी गई
वरना क्या  मैं समझता नहीं  बात क्या !

एक पल का मिलन ,उम्र भर का सपन
रंग भरने का  करने  लगा  था जतन
कोई धूनी रमा , छोड़ कर चल गया
लकड़ियाँ कुछ हैं गीली बची कुछ अगन

कोई चाहत  बची  ही नहीं दिल में  अब
अब बिछड़ना भी  क्या ,फिर मुलाक़ात क्या !
वरना क्या मैं समझता----

यूँ जो नज़रें चुरा कर गुज़र जाते हों
सामने आने से तुम जो कतराते हो
’फ़ेसबुक’ पर की ’चैटिंग’ सुबह-शाम की
’आफ़-लाइन’- मुझे देख हो जाते हो

क्यूँ न कह दूँ कि तुम भी बदल से गए
वरना क्या मैं समझती नहीं राज़ क्या !

ये सुबह की हवा खुशबुओं से भरी
जो इधर आ गई याद आई तेरी
वो समय जाने कैसे कहाँ खो गया
नीली आंखों की तेरी वो जादूगरी

उम्र बढ़ती गई दिल वहीं रह गया
ज़िन्दगी से करूँ अब सवालात क्या !
वरना क्या मैं समझता नहीं-------

ये सही है कि होती हैं मज़बूरियाँ
मन में दूरी न हो तो नहीं  दूरियाँ
यूँ निगाहें अगर फेर लेते न तुम
कुछ तो मुझ में भी दिखती तुम्हें ख़ूबियाँ

तुमने समझा  मुझे ही नहीं आजतक
ना ही समझोगे होती है जज्बात क्या !

वरना क्या मैं समझती नहीं--------

-आनन्द.पाठक-

सोमवार, 21 सितंबर 2020

एक व्यंग्य : आमन्त्रण लिंक

 एक हास्य- व्यंग्य : आमन्त्रण-लिंक

मिश्रा जी ने आते ही आते अपनी उँगलियाँ दबानी शुरू कर दी।
,यह उनकी आदतों में शुमार है । वह तब तक ऐसा कुछ न कुछ करते रहेंगे
जब तक कि आप उन से पूछ न लें कि मिश्रा जी ! क्या हुआ ?
इससे पहले कि वह कुछ कहते,मैने ही पूछ लिया -’ मिश्रा जी ! क्या हुआ ?
’भई पाठक ! सुबह से सबको "आमन्त्रण-लिंक" भेजते भेजते उँगलिया दर्द करने लगी ,वही दबा रहा हूँ।
"आमन्त्रण -लिंक? कैसा? किसलिए? छोटे की शादी तय कर दी क्या ? निमन्त्रण-पत्र ही छपवा लेते’
-हा हा हा ! -मिश्रा जी अचानक हँस पड़े और सोफ़ा में धँस पड़े और मुखर हो पड़े-" शास्त्रों में लिखा है कि कुएँ के मेढक को कभी कभी कुएँ से बाहर भी निकलना चाहिए।"
-"क्या मतलब"?
"मतलब यह कि दुनिया कहाँ से कहाँ चली गई और तुम हो कि कलम-घिसाई में लगे हो।भइए ! कभी ’फ़ेसबुक’पर आओ ,कभी "व्हाट्स अप’ पर जाओ तो पता चले कि धूप कहाँ से कहाँ चढ़ चुकी है कविता-ग़ज़ल कहाँ से कहाँ पहुँच गई है ।क्या क्या ऊँचाइयाँ छू रही हैं। 25-30 मंच से जुड़ा हूँ। हर जगह से बुलावा आता है-- मिश्रा जी मेरे ’फ़ेसबुक’ पर लाइव आइए--कविता पाठ कीजिए--यहाँ आइए- इधर आइए --उधर मत जाइए - हम ’ज़ूम’ से प्रसारण कराते है -ओरिजिनल वर्जन पेड वर्जन से----मेरे यहाँ वाच पार्टी में आइए--ग़ज़ल सुनाइए
एकल काव्य पाठ कीजिए--समूह में कीजिए ---वाह वाह पाइए तालियाँ मुफ़्त में -मेरी काव्य-गोष्ठी में आइए --मालूम भी है तुम्हे कुछ?
कितनी माँग चल रही है मेरी --मेरी कविताओं की --मेरी गज़लों की ।-बेताब हैं लोग सुनने के लिए।कभी इस फ़ेसबुक पर कभी उस फ़ेसबुक पर । कभी यहाँ, कभी वहाँ ।उसी प्रोग्राम का सबको लिंक भेज रहा था सुबह से -लगा हुआ था कि उँगलियाँ थक गईं
-" तो लिंक के नीचे यह भी लिख दिया होता - मैने सुझाव दिया।
भेज रहा हूँ नेह निमन्त्रण ,प्रियवर तुम्हे बुलाने को
हे मानस के राजहंस तुम भूल न जाना आने को
-’मगर मिश्रा जी मैने आप को कभी कुछ लिखते हुए तो देखा नहीं ?
-"-तो पढ़ते हुए देख लो ।-मिश्रा जी ने एक कुटिल मुस्कान उड़ेली ।- इसीलिए तो कह रहा हूँ कि कुएँ के बाहर
भी एक दुनिया होती है । 4 बजे शाम को आलाना साइट पे मुझे सुनो--5 बजे फ़लाना मंच से सुनो--6 बजे ढकाना महफ़िल में देखो
--7-बजे विश्व हिंदी मंच से मेरा एकल काव्य पाठ सुन कर आशीर्वाद दो--8-बजे अन्तर्राष्ट्रीय मंच से-आन लाइन-9 बजे अन्तरराष्ट्रीय मंच से--आन लाइन--।-भाई साहब साँस लेने की फ़ुरसत नहीं--नन्ही सी जान है, कितने काम है !-
-मिश्रा जी ने सीना चौड़ा करते हुए यह बात कही
-" हाँ ! फ़ुरसत कहाँ मिलती होगी कुछ नया लिखने पढ़ने की ?
शायद मिश्रा जी इस वाक्य का निहित अर्थ नहीं समझ सके। और समझते भी कैसे ? अभी तो वह ’खुद को दिखाने" में व्यस्त हैं
’तुम कभी "आन लाइन लाइव’ हुए हो ?-मिश्रा जी ने पूछा”
"नहीं । मगर ऐसे निमन्त्रण/आमन्त्रण रोज़ आते हैं मेरे .’इन-बाक्स’ में ।हाँ ,एक बार एक ’लिन्क’ पर क्लिक किया था--खुला नहीं ।
फोन कर के पूछा--तो उन्होने बताया कि शाम 8-बजे खुलेगा भाई।
तब मालूम हुआ कि कुछ लोग शाम 8-बजे के बाद ही ’खुलते" हैं -- मखना चखना के साथ ।
"हाँ, गया था"-अब मैने सीना चौड़ा कर के कहा। जाने के पहले चार बार दरपन देखा, चालिस बार कंघी किया,बाल सँवारा। "अर्ध गंजे सर" से
माँग निकालना आसान होता है क्या !
गया था एक लिंक पर ।-एक घंटा तो "प्र्नाम-पाती ’ होता रहा ।-कोई सज्जन आत्म मुग्ध हो कर एकल कविता पाठ कर रहे थे।कभी बाल सँवार रहे थे।कभी हाथ जोड़ रहे थे,कभी सर झुका रहे थे ।कभी आँख मूँद रहे थे। एक लाइन सुनाते थे फिर पता नहीं झाँक झाँक कर क्या देख रहे थे? बीच बीच में कहते जा रहे थे -
-अहा दद्दा आ आ गए--सादर प्रनाम -शर्मा जी आ गए -अहा धन्य हो गया मैं ----स्वागत है--भाई वर्मा जी --किधर रह गए थे महोदय -
-। हाँ तो अगली लाइन सुने --अच्छा लगे तो अपने इस बेटे को आशीर्वाद ज़रूर दीजियेगा--हर 1-2 लाइन गाने के बाद -किसी न किसी का स्वागत ही कर रहे थे ।
-कुसुम दीदी आ गईं --स्वागत है--मीरा बहन का बहुत --अहा ’प्रिया आंटी- भी आ गई ? आंटी शब्द सुनते ही प्रिया जी बिना रुके ही चली गईं।
आई भी और गई भी । रिया भाभी --धन्यवाद --पधार कर मुझे कॄतार्थ कर दिया --हा तो-अगली लाइन सुनें-। अगली लाइन गाने के लिए जैसे ही उन्होने
अपनी आँखें बन्द की कि किसी आने वाले पर नज़र पर पड़ गई --और जैसे ही स्वागत के लिए मुँह खोला की नेट -आफ़ हो गया--।
पाँच मिनट की कविता में आधा घंटा लगा दिया ।
फ़ेसबुक वालों यू -ट्यूब वालों ने क्या इन्तज़ाम कर दिया कि अब हर आदमी गीत सुना रहा है--ग़ज़ल सुना रहा है -माहिया गा रहा है--लगता है हर लिंक पे गीतकार बहुत हैं -- ग़ज़लकार बहुत है --अदाकार बहुत हैं ।
एक और लिंक पर गया था । --देखा कोई देवी जी मुखरित थीं । बड़े लय से तरन्नुम में अपनी कोई गीत गा रही थी।बीच बीच में अपना आँचल भी सँभाल रही थी । यहाँ भी वही स्वागत --स्वागतम-- कार्यक्रम-चल रहा था --गीता दीदी का स्वागत-- नीता दीदी स्वागतम कमेन्ट बाक्स में धड़ाधड़ कमेन्ट दिए जा रहे थे--वाह वाह--बहुत मधुर आवाज-- कोकिल कंठी है---क्या आवाज़ पाई है
खुदा की देन है --वाह बहुत खूब-- क्या गीत गा रही है मोहतरमा --अभूतपूर्व --कभी सुना नही ऐसा --क्या दर्द समेटा है -अपने दिल में ,--- कलेजा मुँह को आ जावे है ।क्या सूरत पाई -वल्लाह -क्या सीरत पाई-या खुदा- क्या जल्वा नुमाई--यारब। खुदा जब हुस्न देता है---।
सैकड़ो --वाह वाह-- के बाद आधे घंटे का कार्यक्रम एक घंटे में सम्पन्न हुआ ।
लोग अपने अपने घर गए। जो घर पे सोए रह गए -उन्हें कार्यक्रम की " विडीयो रिकार्डींग ’ भेज दिया गया --इस संदेश के साथ कि जब आप सो रहे थे तो मैने गीत ग़ज़ल को कहाँ से कहाँ पहुँचा दिया ---आप भी इस विडियो को देखें ,अपने दोस्तों रिश्तेदारों को भेजे ,अपने मंच के सदस्यों को आगे पहुँचाए---पुण्य मिलेगा--लाभ होगा ।आप पर लक्ष्मी की कृपा बरसेगी।
हम पर लक्ष्मी की कृपा बरसे न बरसे मगर विडियो के हर अग्रेषण पर फ़ेसबुक वालों पर कृपा ज़रूर बरसेगी ।
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--- ख़ैर ।
कुछ दिनों बाद वह देवी जी टकरा गई और टकराते ही वाह वाह की प्र्त्याशा में उन्होने मुझसे पूछ लिया -’उस दिन मेरी कविता कैसी लगी आप को ?"
"कविता ? कौन सी ? मैं तो बस आप को ही देखता रहा । क्या साड़ी पहनी थी वाह वाह आप -वाह बहुत सुन्दर लग रही थी । क्या करीने से ’प्लेट’ लगाई थी आप ने ! बनारसी थी? मेक अप भी कमाल का ।कौन सा पार्लर था ?
हाँ आप के गले का चेन बहुत वज़नी लग रहा था 7-8 तोले से कम तो क्या रहा होगा?
-अरे महराज ! मैं कविता के बारे में पूछ रही हूँ-कविता कैसी लगी ?कविता के बारे में ?
कौन सी कविता ? क्या कहने ! वाह वाह ! आप का रंग रूप देख कर ही कविता की सुन्दरता का अन्दाज़ा लगा लिया था। मैं ’कवर’ देख पुस्तक पढ़ने का आदी हूँ
। क्या सुना ?मैं क्या बताऊँ? बस इतना ही समझ लीजै
- -गिरा अनयन ,नयन बिनु बानी--
कॄष्ण बिहारी ’नूर’-साहब से भी पूछती तो वह भी यही कहते
हो किस तरह से बयाँ तेरे हुस्न का आलम
जुबां नज़र तो नहीं है ,नज़र ज़ुबाँ तो नहीं
तारीफ़ उस ख़ुदा की जिसने तुझे बनाया--
-॑॑"हट मुए" - कह कर वह जो गईं सो गईं ।बाद में मुझे "ब्लाक" भी कर दिया।
------
यारमिश्रा ! उन्होने मुझे "ब्लाक" क्यों कर दिया ? -
मिश्रा ने रहस्य बताया ,अनुभवी आदमी था -- वह अपनी कविता पर ’वाह’ वाह सुनना चाहती थी -तुम-भगवान की रचना पर वाह वाह करने लगे ।--
वह अपनी रचना के सौन्दर्य के बारे में पूछ रही थी । तुम भगवान की रचना के सौन्दर्य का वाह वाह करने लगे ।
-और -"मुए"- क्यों बोला ?-
-इसलिए कि "जा मर" और भगवान की रचना का वाह वाह भगवान के पास जा के कर।
एक बात और बता दूँ- तुम्हारी इसी हरकत के कारण सब महिला कवयित्रियॊं ने तुम्हें "ब्लाक" कर रखा है।
अस्तु
-आनन्द.पाठक-

रविवार, 20 सितंबर 2020

मेरी बर्बादी में कल तुम भी तो शामिल थे

 

मेरी बर्बादी में कल तुम भी तो शामिल थे

दुश्मनों की आबादी में कल तुम भी तो शामिल थे

 

वाह तुम गवाह हो गए उस मजलूम की तलाक पे

कल इनके ही शादी में तुम भी तो शामिल थे

 

देख लोग फिर खूं पीने लगे है दूजे का शहर में

इस खूंखार आॅधी में तुम भी तो शामिल थे

 

सियासत तुमने धरती को लाल लाल कर दिया है

इस नफरतों की वादी में तुम भी तो शामिल थे

 

कल हमने तुम्हे देखा था गलियों में मत माॅगते

हाॅ लिबास-ए- खदी में तुम भी तो शामिल थे

 

एक नया युग एक नया मुल्क बनाना था तुम्हे

कल विकास की मुनादी में तुम भी तो शामिल थे

 



 sanjay kumar maurya