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शुक्रवार, 15 मार्च 2019


चीन का हाथ अज़हर मसूद के साथ
जैसी की अपेक्षा थी चीन फिर एक बार अज़हर मसूद की ढाल बना. सिक्यूरिटी कौंसिल में वह अकेला ऐसा सदस्य था जिसने उस आतंकवादी का साथ दिया.
देश में कई लोग चीन के इस व्यवहार से क्रोधित हैं, कुछ प्रसन्न भी हैं. पर हर कोई इस बात की अनदेखी कर रहा हैं कि चीन के लिए सबसे महत्वपूर्ण उसके अपने हित है. अपने हितों को ख्याल रखना हर स्वाभिमानी देश के नागरिकों और नेताओं का सर्वोच्च कर्तव्य होता है.  चीन के लोग बहुत ही स्वाभिमानी हैं. वह अपने को बहुत ही श्रेष्ठ समझते हैं. देश हित उनके लिए सर्वोपरि होता है. इस बार भी उन्होंने वही निर्णय लिया जो उनकी समझ में उनके हित में था.
अगर हम लोग अपने परिवार, अपनी पार्टी, अपनी जाति, अपने प्रदेश, अपने धर्म को देश के हितों से ऊपर (बहुत ऊपर) रखते हैं, तो यह हमारी समस्या है. अगर हम समझते हैं कि कोई और हमारी मुसीबतों से हमें छुटकारा दिला देगा तो यह हमारी ना-समझी है.
ध्यान देने योग्य बात तो यह है कि जब हम लोग ही अपने हितों की अनदेखी कर रहे हैं तो दूसरे को क्या पड़ी है कि वह अपने हितों को भूल कर हमारी समस्याएं सुलझाने लगे.
जब आतंकवाद को लेकर हम स्वयं ही एक आवाज़ में नहीं बोल रहे, तो चीन हमारे साथ क्यों युगलबंदी करे?
जब हम सब सरकार के साथ नहीं खड़े हैं, तो चीन हमारी सरकार के साथ क्यों खड़ा हो?
अगर हम में से कई विद्वान् टुकड़े-टुकड़े गैंग को लेकर असमंजस में हैं और कई समझदार राजनेता और बुद्धिजीवी खुल कर उनके समर्थन में खड़े हैं , तो चीन उनकी पीठ पर अपना हाथ क्यों न रखे?
अगर चालीस वर्षों में हम  आतंकवाद को लेकर कोई ठोस नीति नहीं बना पाए, तो चीन हमारी सहायता क्यों करे?
अगर हम बार-बार आतंकवादियों के सामने घुटने टेक देते हैं, तो चीन हमारा सम्मान क्यों करे?
हमें यह बात समझ लेनी होगी कि जो देश हमारे साथ खड़े हैं, वह अपने हित साधने के लिए खड़े हैं. और जो साथ नहीं हैं, उनका हित उसी में हैं. ऐसा उन सब का अपना विश्लेष्ण हैं.
अगर हम एक शक्तिशाली देश बनना चाहते हैं तो हमें आत्म-निर्भर और स्वाभिमानी बनना होगा. अन्यथा आतंकी हमले होते रहेंगे और हम ट्विटर और सोशल मीडिया पर अपना रोना-धोना करते रहेंगे.
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अनुलेख – हम में से जो लोग आज क्रोधित हैं उनमें से कितने लोग चीन और चीनी वस्तुयों का बहिष्कार करने को तैयार हैं?

बुधवार, 13 मार्च 2019


मसूद अज़हर  जी.......”
कांग्रेस का जिहादियों के साथ अनोखा संबंध है. दिग्विजय सिंह हमेशा ओसामा का नाम बड़े सम्मान के साथ लेते हैं. एक अन्य नेता के लिए अफज़ल गुरु “जी” थे. शिंदे साहिब के लिए हाफिज़ “श्री” थे. अब राहुल गांधी के लिए भी मसूद अज़हर “जी” हो गये हैं.
अब पार्टी अध्यक्ष ने कहा तो कार्यकर्ताओं का कर्तव्य है कि उनकी बात को उचित सिद्ध करें, तो ब्यानबाज़ी  शुरू हो गयी है.
सेना अध्यक्ष इनके लिए गली के गुंडे समान है. सेना के अधिकारियों के वक्तव्यों पर इनका विश्वास नहीं हैं. इन्हें सेना से हर बात का सबूत चाहिये. इनमें कुछ अनुभवी लोग अवश्य जानते होंगे कि किसी भी देश में सेना अपनी कार्यवाही के ऐसे सबूत सार्वजनिक नहीं करती और न ही वहां का कोई नागरिक अपनी सेना पर अविश्वास करता है. पर यह भारत है यहाँ सब कुछ संभव है.
वैसे भारत के मुख्य न्यायाधीश पर भी कांग्रेस ने अभियोग चलाने का प्रयास किया था. कांग्रेस के नेताओं को उन पर विश्वास नहीं था. उन्हें सीएजी पर विश्वास नहीं है, इवीएम  पर विश्वास नहीं है.
जिस तरह की भाषा यह प्रधान मंत्री के लिए प्रयोग करते आयें हैं, वह अकसर अभद्र होती है. पर उसे नज़रंदाज़ किया जा सकता है, क्योंकि बीजेपी और खासकर मोदीजी के साथ कांग्रेस,  और खासकर गांधी परिवार के सदस्य, एक राजनीतिक लड़ाई लड़ रहे हैं. पिछड़ी जाति और गरीब परिवार का एक व्यक्ति, उनकी अनुकंपा के बिना, प्रधान मंत्री के पद पर पहुँच जाए,  यह बात उनके लिए स्वीकार थोड़ा मुश्किल है. तो उनका कुंठित होना स्वाभाविक है.
पर इस कुंठा के चलते वह जिहादियों से प्रेम करने लगें यह समझ के परे है. चालीस वर्षों से पाकिस्तान एक परोक्ष युद्ध कर रहा है. आतंकी हमलों में हज़ारों लोगों की  मृत्यु हुई या  घायल हुए. पर इस देश की किसी सरकार ने (अटल सरकार ने भी) जिहादियों को उनके घर में घुस कर मारने का साहस नहीं किया. अब इस सरकार ने थोड़ा साहस दिखाया है, तो कांग्रेस की कुंठा और बढ़ गयी है. उन्हें लगता है कि मोदी जी के इस निर्णय से उनकी प्रतिष्ठा थोड़ी घट गयी है.
तो कांग्रेस के पास उपाय क्या है? उनके पास एक ही उपाय है; वह उपाय है इन सर्जिकल स्ट्राइक्स को अविश्वास और संदेह के घेरे में ले आएँ. इस कार्य को सफलता पूर्वक करने में राहुल गाँधी जी-जान से प्रयास कर रहे है. आज लगभग सारा विपक्ष इस मुद्दे पर एक साथ है. सब का कहना है कि सर्जिकल स्ट्राइक्स राजनीति से प्रेरित थीं और उनकी सफलता संदेहास्पद है. और संयोग से यही बात पाकिस्तान भी कह रहा है.
राहुल गांधी यह आरोप लगा रहे थे कि “मसूद अज़हर जी” को पिछली बीजेपी सरकार ने छोड़ा था.
निश्चय ही यह निर्णय उस सरकार की बड़ी भूल थी. अटल जी को उस भयंकर आतंकवादी को कभी नहीं छोड़ना चाहिए था और जहाज़ के लगभग डेढ़ सौ यात्रियों का बलिदान दे देना चाहिये था.
पर क्या यह बलिदान देने के लिए लोग तैयार थे?
राहुल गांधी उस समय बहुत छोटे थे, शायद उन्होंने उन दिनों टीवी रिपोर्ट्स नहीं देखी होंगी.  लेकिन अगर आप को उस समय के टीवी रिपोर्ट्स याद हैं तो आप एक पल में इस प्रश्न का उत्तर जान जायेंगे. मसूद अज़हर की रिहाई के लिए जितनी सरकार दोषी थी, उतना ही विपक्ष, मीडिया और आम लोग दोषी थे. 


शुक्रवार, 8 मार्च 2019


क्या सरकार को हवाई स्ट्राइक के सबूत सार्वजनिक करने चाहियें?

पिछले कुछ दिनों से हवाई स्ट्राइक को लेकर आश्चर्यजनक ब्यानबाज़ी हो रही है. ऐसी-ऐसी बातें कही जा रही हैं जिन्हें सुन कर मुझ जैसा आम आदमी तो चकरा गया है.
ऐसा लगता है कि सरकार पर विपक्ष और मीडिया के कुछ लोग भरपूर दबाव डाल रहें ताकि अपनी और सेना की साख बचाने के लिए सरकार स्ट्राइक के कुछ प्रमाण सार्वजनिक कर दे.
क्या इस दबाव के पीछे सिर्फ राजनीति है या किसी का कोई अप्रत्यक्ष एजेंडा भी है?
शायद आम लोगों को इस बात की जानकारी नहीं होगी कि सेना का हर मिशन बहुत ही गुप्त होता है. हर मिशन की जानकारी गिने-चुने अधिकारियों और सैनिकों को होती है. मिशन कब होगा, कैसे किया जाएगा, किस प्रकार के हथियार इस्तेमाल होंगे अर्थात मिशन की हर छोटी या बड़ी बात पूरी तरह गुप्त रखी जाती है और सिर्फ उन्हीं लोगों के पास होती जिनका मिशन से सीधा संबंध होता है .  
मिशन पूरा होने के बाद ‘डी-ब्रीफिंग’ होती. मिशन सफल हुआ हो या असफल, मिशन से जुड़े लोगों से जानकारी ली जाती. भविष्य में बनने वाली योजनाओं में उन जानकारियों से लाभ उठाया जाता है. ट्रेनिंग में भी उस जानकारियों का उपयोग किया जाता  है.
ऐसी गुप्त जानकारियों को प्राप्त करने के लिए शत्रु हमेशा बेताब रहता है. क्योंकि वह आपकी क्षमता और आपकी कमजोरियों को समझना चाहता है. हर देश की मिलिट्री इंटेलिजेंस अपने शत्रु सेना के बारे में ऐसी जानकारी प्राप्त करने के लिए कई हथकंडे उपयोग में लाती है और इस काम को बड़ी चालाकी से पूरा करती है.
हवाई स्ट्राइक का हर प्रमाण हमारी वायु सेना की क्षमता और कमजोरियों का कुछ न कुछ संकेत शत्रु को अवश्य देगा. चाहे वह कितना ही मामूली क्यों न हो, पर ऐसा हर संकेत शत्रु की जानकारी में कुछ न कुछ  वृद्धि तो करेगा.
हो सकता है कि हमारे देश का कोई भी नागरिक शत्रु के लिए काम न कर रहे हो, पर फिर भी इस समय किसी दबाव में आकर सरकार को ऐसा कोई प्रमाण सार्वजनिक नहीं करना चाहिये जो हमारी सेनाओं को किसी भी रूप में कमज़ोर करे या शत्रु की जानकारी में किसी प्रकार की वृद्धि करे.
प्रमाण कब सार्वजनिक करने हैं यह निर्णय एक सोची-समझी रणनीति के अनुसार ही होना चाहिये.

अकेली नहाती लड़की

भीषण ग्रीष्म
धरती छूकर जलते पैर
बड़ी कठीनाई से पहुचता था
बिना चप्पलों के
तालाब के किनारे
उस पेड़ के नीचे ।
एक गौरैया गर्मी से बेहाल
किनारे पानी में
हो रही थी लोटपोट।
फिर पानी से बाहर रही थी फूदक ।
फरफरा रही थी पंख
झाड़ रही थी पांखों की बूंदें
अल्हड़ता के साथ
आसपास से अनभिग
व स्वयं में तल्लीन।
स्मरण हो आया वो अरसा अचानक
चक्र उस घटनाओ का
देखकर सहसा
तालाब में
अकेली नहाती लड़की
व झटक कर झाड़ती बालों से बूंदे ।

कुछ और नहीं हमी की तरह है

कुछ और नहीं हमी की तरह है
ये जिंदगी जिंदगी की तरह है
यो न झुका सर हर चैखटों पर
ये आदत बंदगी की तरह है
क्यूं जां लेके घूमता है हथेली पे
ये जूर्रत आशिकी की तरह है
रात ख्वाबों में उससे मुलाकात हुई
उसकी हर बात मौसिकी की तरह है
ळो अब ख्याल गजल बनने ळगे
हर खुशी गम, गम खुशी की तरह है
यूॅ तो चमकते सितारे खूब हैं पर
चाॅद बिन फ़लक में कुछ कमी की तरह है
फिर मयस्सर हुआ मुदृतों बाद मुझको
ये माॅं का आँचल बिल्कुल जमीं की तरह है
मुझे शहर छोड़ अब घर जाना ही होगा
माॅ से मिलने की चाहत बेखुदी की तरह है


गुरुवार, 7 मार्च 2019

गुरुवासरीय काव्य गोष्ठी संपन्न --डा श्याम गुप्त

गुरुवासरीय गोष्ठी संपन्न 
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प्रत्येक माह के प्रथम गुरूवार को होने वाली गुरुवासरीय काव्यगोष्ठी दिनांक ७ मार्च २०१९ गुरूवार को डा श्यामगुप्त के आवास सुश्यानिदी, के-३४८, आशियाना , लखनऊ पर संपन्न हुई |
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डा श्यामगुप्त ने माँ सरस्वती वन्दना प्रस्तुत करते हुए पढ़ा---

हे मातु ! विद्या बुद्धि ज्ञान प्रीति गुण प्रदायकं|
अज्ञान अन्धकार त्रिविधि ताप शान्ति दायकं |
हों कथ्य तथ्य सत्य मातु असत भाव नाशकं |
स्वर हों समाज राष्ट्र हित, भजाम्यहं भजाम्यहं ||
------एवं शहीदों को नमन गीत भी प्रस्तुत किया---
हैं नमन भारत देश को है शौर्य जिसकी हवाओं में,
नमन है उन सैनिकों को देश का सम्मान रख्खा |
आज अपने शौर्य से सारे जगत में छागये,
चालीस के बदले चार सौ मार कर जो आगये ||
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-----प्रथम सत्र में साहित्यकारों का सम्मान भी किया गया | लखनऊ पुस्तक-मेला संयोजक श्री देवराज अरोड़ा को भी सम्मानित किया गया |
----- अनिल किशोर शुक्ल ने अपनी रचना में कहा---
सोच समझ कर हर दम बोलो,
शब्द ब्रह्म है इसको तोलो |
------उमेश चन्द्र श्रीवास्तव ने भोले शंकर की महिमा में गायन किया एवं श्रीमती पुष्पा गुप्ता ने दर्पण में अपनी परछाईं से बात करते हुए कहा—
अस्फुट निगाहें दर्पण से झांकीं
परछाईं हमारी हम से यूं पूछ बैठी |
------श्री रामप्रकाश राम ने सुन्दर छंदों में श्रीकृष्ण की छवि को प्रस्तुत किया प्रस्तुत किया—
अंग अंग भूषण विराजें साजे वनमाल,
कमल नयन कमनीय तन श्याम हैं |
-------श्रीमती विजय लक्ष्मी महक ने महिला-दिवस का झंडा उठाते हुए कहा—
महिला दिवस है यह महिला दिवस है |
न मर्जी से खा सकती न मर्जी से पी सकती<
क्योंकि महिला दिवस है महिला दिवस है |
------ श्री बिनोद कुमार सिन्हा जी ने मधुत्सव प्रस्तुत करते हुए कहा ---
हुआ आगाज प्रिय वसंत का,
पुलकित वसुंधरा हुई मगन,
कुसुमित पल्लवित वन उपवन |
----- श्रीमती मधु दीक्षित जी ने एक सुन्दर गीत रचना प्रस्तुत की----
विकल आँखों में कटी रजनी के आँचल को उठाकर,
जागते जो नव अरुण से, कौन हो तुम !
------ कविवर अखिलेश जी ने एक गीत प्रस्तुत किया---
जाने कितनी देर लगा दी तुमने आने में |
अब तो स्वांस स्वांस का चलना ख़तम खजाने में |
------- श्रीमती सुषमा गुप्ता ने महिला सशक्तीकरण गीत प्रस्तुत करते हुए गाया---
तुम पुरुष अहं के हो सुमेरु
मैं नारी आन की प्रतिमा हूँ |
तुम पुरुष दंभ के परिचायक,
मैं सहज मान की गरिमा हूँ |
------- साहित्यभूषण डा रंगनाथ मिश्र सत्य ने एक श्रृंगार गीत प्रस्तुत करते एक पत्नी की इच्छा को बताया—
अबकी चुनाव लड़ि जाव मोरे संइयाँ,
अबकी विधायक बनि जाव मोरे संइयाँ |
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संक्षिप्त जलपान एवं धन्यवाद ज्ञापन के उपरांत सभा को स्थगित किया गया |

बुधवार, 6 मार्च 2019


विपक्ष की बालाकोट सर्जिकल स्ट्राइक
आजकल विपक्ष का हर नेता और कई मीडिया वाले  बालाकोट पर हुए सर्जिकल स्ट्राइक का प्रमाण मांग रहा है, मोदी जी से चीख-चीख कर पूछ रहा है कि बताओ ‘कितने आदमी थे’, कितने आदमी मारे गये हवाई सर्जिकल स्ट्राइक में.
ध्यान देने योग्य है कि कोई यह नहीं पूछ रहा कि कितने ‘आतंकवादी’ थे बालाकोट में. अर्थात इन लोगों की समझ में यह लोग आतंकवादी नहीं थे.
अब मान लीजिये मोदी जी कुछ भी संख्या बताते हैं तो क्या विपक्ष इससे संतुष्ट हो जायेगा या फिर उस संख्या को पुष्टि करने के लिये मोदी जी से उन लोगों के (जो बालाकोट में मारे गये) ‘डेथ सर्टिफिकेट’ और ‘पोस्ट-मार्टम रिपोर्ट’ मांगेगा, अन्यथा या कैसे साबित होगा की वह लोग हवाई हमले में ही मरे थे, केंसर या दिल के दौरे से नहीं.
यह सारा बयानबाज़ी एक सोची-समझी योजना लगती है. भारत पिछले चालीस वर्षों से पाकिस्तान द्वारा चलाये जा रहे अघोषित युद्ध का सामना कर रहा है. इसमें कितने लोग मारे गये हैं मैं नहीं जानता. इन्टरनेट पर देखने पर भी कोई सही आंकड़े नहीं  मिले. किसी टीवी चैनल पर कोई विशेषज्ञ दावा कर रहा था कि  अस्सी हज़ार से अधिक लोग मारे गये हैं. पर इतना तो सत्य है कि इन चालीस वर्षों में पाक द्वारा चलाये गये आतंकवाद के कारण पंजाब में, जम्मू व् कश्मीर में, दिल्ली और देश के अन्य भागों में बड़ी संख्या में लोग मारे जा चुके हैं.
आजतक हमारी प्रतिक्रिया क्या रही है?
या तो हम बातचीत करते रहे हैं या फिर वागाह बॉर्डर पर मोमबत्तियां जलाते रहे हैं. लेकिन  न बातचीत से कुछ हुआ और न मोमबत्तियां जलाने से.
लोग वर्षों से चाह रहे थे कि सरकार को कोई सख्त कदम उठाने चाहियें. लेकिन पाकिस्तान पर उल्ट वार करने का साहस किसी सरकार ने नहीं दिखाया.  जो लोग इस आतंकवाद की मार सहते आ रहे हैं,  वह अब इस ज़ुल्म को और सहन करने को तैयार नहीं हैं.
जिस समय लोगों का गुस्सा भड़का हुआ था उसी समय मोदी सरकार ने हमला करने का निर्णय लिया. यह बात लोगों को अच्छी लगी. ध्यान देने योग्य है कि कोई आम नागरिक यह नहीं पूछ  रहा कि ‘कितने आदमी थे’. वह उत्साहित है और इस बात से प्रभावित हैं कि आखिरकार किसी सरकार ने आतंकवादियों को उनके घर में घुस कर चोट पहुंचाने का साहस तो किया.
बालाकोट में एक आतंकवादी मरा या तीन सौ, महत्वपूर्ण नहीं हैं, क्योंकि पाकिस्तान में आतंक के कई कारखाने काम कर रहे हैं. महत्वपूर्ण यह है कि अब सरकार ने बता दिया है कि पाकिस्तान के भीतर जाकर भी  आतंकवादियों पर हमला करने को सेना तैयार है.  
एक आम आदमी भली-भांति जानता है कि एक गुंडा तब तक ही आप को डरता है जब तक आप उससे डरते हैं. जिस दिन आप थोड़ा साहस कर, उसका मुकाबला करते हैं वह बिदक जाता है. वह शायद फिर आपको परेशान करे, पर उसे उल्ट वार के लिये तैयार रहना पड़ता है.
अब विपक्ष को यह बात हजम नहीं हो रही है कि मोदी सरकार के निर्णय से लोग उत्साहित हैं. उन्हें लगा कि लोगों का ध्यान किसी और मुद्दे पर ले जाना अनिवार्य हो गया था. तो सोची-समझी योजना के तहत सब एक साथ एक आवाज़ में पूछने लगे कि बताओ, ‘कितने आदमी थे’. किसी ने तो यह तक कहा है कि पुलवामा आतंकी हमला बी जे पी ने कर वाया था.
विपक्ष और मीडिया को इस बात की रत्ती भर भी परवाह नहीं कि इस बयानबाज़ी से भारत की प्रतिष्ठा को चोट पहुँच रही है,  शत्रु हमारी कमज़ोर कड़ियों को पहचान कर अपनी पकड़ में ले सकता है, सेना का मनोबल घट सकता है (आखिर क्यों कोई सैनिक ऐसे लोगों के लिए अपनी जान दांव पर लगाना चाहेगा जो लोग उसका मान नहीं करते या उस पर अभिमान नहीं करते).
विपक्ष को तो बस सरकार की साख को गिरानी है, और इसके लिए वह किसी हद तक जाने को तैयार हैं.
लेकिन आम लोगों को एक बात ध्यान में रखनी होगी. जब अफगानिस्तान से अमरीका के सेना लौट जायेगी, स्थिति और बिगड़ेगी, क्योंकि वहां पर सक्रीय पाकिस्तान के पाले हुए आतंकवादी भारत की ओर चल पड़ेंगे.