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सोमवार, 13 जुलाई 2020

आलेख "डिप्रेशन क्यों होता है?" (गरिमा पन्त)

डिप्रेशन क्यों होता है?
(गरिमा पन्त)
       डिप्रेशन क्यों होता हैयह बहुत ही विचारणीय प्रश्न है। जब कोई दुखों में डूब जाता है, सारी दुनिया उसे काली लगने लगती है, तब व्यक्ति को कुछ भी अच्छा नहीं लगता है। अवसाद का अर्थ मनोभावों से सम्बन्धी दुःख से होता है। अधिकतर यह देखा गया की जो प्रेम में ज्यादा डूबा है, और उसे उसका प्रेम नहीं मिला है, तो वह अवसाद में डूब जाता है। अवसाद की अवस्था में व्यक्ति स्वयं को लाचार समझता है, प्रेम ही नहीं वरन आज की परिस्थियों को देखते हुए बहुत सारे कारण अवसाद के होते है। अवसाद के कारण नींद नहीं आती है। विश्व सवास्थ्य संगठन के अनुसार अवसाद बहुत सामान्य बीमारी है। इस बीमारी का समय ६-८ महीने रहता है, अगर आपके किसी बहुत प्रिय की मृत्यु हो जाये और आप दुखी है, तो यह स्वाभाविक प्रक्रिया है और उसके दुःख में आप बहुत भावुक रहते है तो आप अवसाद का शिकार होते है। अगर आप जीवन में खालीपन महसूस कर रहे है तो अवसाद में है एक सर्वे के अनुसार महिलाओ को जल्दी अक्साद होता है पुरुषो के अपेक्षा मानसिक रोग पागलपन नहीं है
         जब कोई अवसाद का शिकार हो तो उसे गाना सुनना चाहिए, मस्ती करनी चाहिए। जीवन के हर क्षण का मजा लेना चाहिए, उसे कभी अकेले नहीं रहना चाहिए। उसे प्रकृति से बात करनी चाहिए। जीवन के हर छण में आनद की अनुभूति करनी चाहिए। सामाजिक मेल-जोल जयादा बढ़ाना चाहिए नकारात्मक लोगो के पास नहीं रहना चाहिए, सुबह शाम धूप लेनी चाहिए।
         कसरत करने से भी अवसाद दूर होता है आप जितना मस्त रहेंगे, उतना ही अवसाद से दूर रहेंगे। संतुलित आहार में अगर आप विटामिन डी लेते है तो बहुत अच्छा रहता है शराब और ऐसी किसी वस्तु से दूर रहें जो हानि पहुँचाती हो। खुद को दोष न दें जिंदगी बहुत ख़ूबसूरत है और एक ही बार मिली है तो मस्त रहें और सबसे बड़ी बात अपने को व्यस्त रखें, जितना व्यस्त आप होंगे उतना ही कुछ सोच नहीं पायेंगे और ज्यादा से ज्यादा लोगो से मिलिए और हर समय सीखिए। दुनिया से जुड़िये, हर किसी से सकारत्मक बात करिए अपने जो करीबी उनसे बात करिये, बच्चों के साथ मस्ती करें, अपना बचपन याद करें, कभी कभी उनकी तरह हरकत करें। अवसाद बहुत दूर हो जायेगा।
      जिन्दगी बहुत कीमती है उसे खुशहाल रखें, दुनिया में कुछ नहीं रखा है और न ही आप धन दौलत अपने साथ ले जाने वाले है। जब शरीर आप साथ नहीं ले जा सकते तो बाकि क्या ले जा पायेंगे। जो कुछ आज है, अभी है। कल किसने देखा है। अतः दूसरों को ख़ुशी देने के बाद जो मन को संतुष्टि मिलती है वो बहुत सारी धन दौलत पाकर भी नहीं मिलती है।
     यदि आपने कभी कोई पुरस्कार पाया है तो उस लम्हे को याद करिये। आप अपने आत्मविश्वास को कभी कम मतआँकिये। सदैव यह सोचें की मुझसे अच्छा कोई नहीं है इस दुनिया में। आप अपने को पहचाने अपनी क़ाबलियत को पहचाने और धीरे-धीरे अपना काम दुबारा शरू करें। आप कभी अवसादग्रस्त नहीं होंगे।
गरिमा पन्त
लखनऊ

सोमवार, 29 जून 2020

कोरोना वारियर्स को समर्पित दोहे
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            सेवा-भावना
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कोरोना योद्धा सभी,भूल गए घर-द्वार।
ऐसे वीरों के लिए,शब्द कहूँ मैं चार।।

कोरोना के काल में,वीर बने चट्टान।
श्वेद-रक्त टीका लगा,रखें हथेली जान।।

लोगों से विनती करें,और दिखाते राह।
बिन कारण जो घूमते,होकर बेपरवाह।।

भूखे-प्यासों की करें,सेवा ये दिन रात
मानवता के धर्म की,यही अनोखी बात।।

कोई भोजन बाँटता ,कोई रखता ध्यान।
जाँच-पड़ताल में लगे,रखना इनका मान।।

अपनी सेहत भूलकर,सबका रखते ध्यान
देश प्रेम सबसे बड़ा,उसपर वारें जान।।

पुलिस चिकित्सक ये सभी,कोरोना के वीर।
संकट में खुद हैं पड़े,बाँटे सबकी पीर।।

जीवन रक्षक ये बने,इनका हो सम्मान।
चिकित्सक-सिपाही सदा,दाँव लगाते जान।।

कोरोना के बीच में,करते सभी प्रयोग
अपने हित को भूलकर,सेवा करते लोग।।

घर-घर कचरा संग्रहण,करते हैं ये वीर।
साफ-सफाई ये रखें,समझो इनकी पीर।।

सेवा करने उतर पड़े,दिल के सच्चे लोग।
भूखों को भोजन मिले,करते सभी प्रयोग।।


अभिलाषा चौहान'सुज्ञ'
स्वरचित मौलिक

      

शनिवार, 27 जून 2020

चन्द माहिया

चन्द माहिया 

1
क्यों फ़िक़्र-ए-क़यामत हो
हुस्न रहे ज़िन्दा
और इश्क़ सलामत हो

2
ऐसे तो नहीं थे तुम
ढूँढ रहा हूँ मैं
जाने न कहाँ हो ग़ुम ?

3
जो तुम से मिला होता
लुट कर भी मुझको
तुम से न गिला होता

4
उनको न पता शायद
याद में उनके हूँ
ख़ुद से ही जुदा शायद

5
आलिम है ,ज्ञानी है
पूछ रहा सब से
क्या इश्क़ के मानी है ?

-आनन्द.पाठक -

शुक्रवार, 5 जून 2020

एक ग़ज़ल : आइने आजकल ख़ौफ़ खाने लगे --

एक ग़ज़ल : आइने आजकल ख़ौफ़ ---

आइने आजकल ख़ौफ़ खाने लगे
पत्थरों से डरे , सर झुकाने लगे

रुख हवा की जिधर ,पीठ कर ली उधर
राग दरबारियों सा है गाने लगे

हादिसा हो गया ,इक धुआँ सा उठा
झूठ को सच बता कर दिखाने लगे

हम खड़े हैं इधर,वो खड़े सामने
अब मुखौटे नज़र साफ़ आने लगे

वो तो अन्धे नहीं थे मगर जाने क्यूँ
रोशनी को अँधेरा बताने लगे

जब भी मौसम चुनावों का आया इधर
दल बदल लोग करने कराने लगे

अब तो ’आनन’ न उनकी करो बात तुम
जो क़लम बेच कर मुस्कराने लगे

-आनन्द.पाठक-

सोमवार, 1 जून 2020

कुछ दोहे

घट में बसता जीव है,नदिया जीवन धार।
परम ज्योति का अंग हैं, कण-कण में विस्तार।

कान्हा आकर देख ले, मुरली तेरी मौन।
सूना सूना जग लगे, पीड़ा सुनता कौन।

भाव-भाव में भेद है,जैसी जिसकी चाह।
जैसी जिसकी भावना,वैसी उसकी राह।।

सूई करती काम जो,कर न सके तलवार।
भेद भले ही हो बड़ा,करती हैं उपकार।

कविता कवि की कल्पना,जन-मन की है आस।
समय भले ही हो बुरा,कविता  रहती खास।

सुरभित मंद पवन बही,पुष्पों से  ले गंध।
मन मयूर सा नाचता,कवि रचता है छंद।

मंथन मन का कीजिए,रखिए मन में आस।
प्रश्नों के उत्तर मिलें,हृदय शांति का वास।

भूख जलाती पेट को,जलता सब संसार।
रोटी के आगे सदा, नियमों की हो हार।

अँधियारे को चीरता,आता है आदित्य।
दुर्दिन से डरना नहीं,कर्म करो तुम नित्य।

नियमित यदि अभ्यास हो,मिले सफलता आर्य।
साहस धीरज से सदा,सधते सारे कार्य।।

अहंकार की आग में,सद्गुण होते नष्ट।
मानव दानव सम बने,देता सबको कष्ट।

हाला सबकी प्रिय बनी,भूले सब भगवान।
इस हाला के सामने,ज्ञानी खोए ज्ञान।

संकट में जब देश हो,सेवा की हो चाह।
तब-तब आए सामने,देखो भामाशाह।




अभिलाषा चौहान'सुज्ञ'
स्वरचित मौलिक

शुक्रवार, 22 मई 2020

एक ग़ज़ल : क़ातिल के हक़ में --

एक ग़ज़ल : क़ातिल के हक़ में ---

क़ातिल के हक़ में लोग रिहाई में आ गए
अंधे  भी   चश्मदीद   गवाही   में  आ गए

तिनका छुपा हुआ है जो  दाढ़ी  में आप के
पूछे बिना ही आप सफ़ाई  मे आ गए

कुर्सी का ये असर है कि जादूगरी कहें
जो राहज़न थे  राहनुमाई में  आ गए

अच्छे दिनों के ख़्वाब थे आँखों में पल रहे
आई वबा तो दौर-ए- तबाही में आ गए

मुट्ठी में इन्क़लाब था सीने में जोश था
वो सल्तनत की पुश्तपनाही में आ गए

बस्ती जला के सेंक सियासत की रोटियाँ
मरहम लिए वो रस्म निबाही में आ गए

ऐ राहबर ! क्या ख़ाक तेरी रहबरी रही
हम रोशनी में थे कि सियाही में आ गए

’आनन’ तू खुशनसीब है पगड़ी तो सर पे है
वरना तो लोग बेच कमाई में आ गए

-आनन्द.पाठक-

वबा = महामरी
पुश्तपनाही = पॄष्ठ-पोषण,हिमायत
सियाही में = अँधेरे में
मरहम     = मलहम

शनिवार, 9 मई 2020

एक गीत : तुम चाहे जितने पहरेदार ---

एक गीत

तुम चाहे जितने पहरेदार बिठा दो
दो नयन मिले तो भाव एक रहते हैं
  

  दो दिल ने कब माना है जग का बन्धन
  नव सपनों का करता  रहता आलिंगन
  जब युगल कल्पना मूर्त रूप  लेती हैं
  मन ऐसे महका करते  ,जैसे चन्दन

जब उच्छवासों में युगल प्राण घुल जाते
तब मन के अन्तर्भाव  एक रहते हैं

  यह प्रणय स्वयं में संस्कृति है ,इक दर्शन
  यह चीज़ नहीं कि करते रहें  प्रदर्शन
  अनुभूति और एहसास तले पलता है
  यह ’तन’ का नहीं है.’मन’ का है आकर्षण

जब मर्यादा की ’लक्ष्मण रेखा’ आती
दो कदम ठिठक ,ठहराव एक रहते हैं

  उड़ते बादल पर चित्र बनाते कल के
  जब बिखर गये तो फिर क्यूँ आंसू ढुलके
  जब भी यथार्थ की दुनिया से टकराए
  जो रंग भरे थे ,उतर गए सब धुल के

नि:शब्द और बेबस आँखें कहती हैं
दो हृदय टूटते ,घाव एक रहते हैं

तुम चाहे जितने पहरेदार बिठा दो,दो नयन मिले तो भाव एक रहते हैं

-आनन्द.पाठक-