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शुक्रवार, 24 जनवरी 2020

चन्द माहिया---

चन्द माहिया

:1:
दीदार न हो जब तक
यूँ ही रहे चढ़ता
उतरे न नशा तब तक

:2:
ये इश्क़ सदाकत है
खेल नहीं , साहिब !
इक तर्ज़-ए-इबादत है

:3:
बस एक झलक पाना
मा’नी होता है
इक उम्र गुज़र जाना

:4:
अपनी पहचान नहीं
ढूँढ रहा बाहर
भीतर का ध्यान नहीं

:5:
जब तक मैं हूँ ,तुम हो
कैसे कह दूँ मैं
तुम मुझ में ही गुम हो

-आनन्द.पाठक---

शनिवार, 11 जनवरी 2020

एक ग़ज़ल : आदमी का कोई अब---



आदमी का कोई अब भरोसा नहीं
वह कहाँ तक गिरेगा ये सोचा नहीं

’रामनामी’ भले ओढ़ कर घूमता
कौन कहता है देगा वो धोखा नहीं

प्यार की रोशनी से वो महरूम है
खोलता अपना दर या दरीचा नहीं

उनके वादें है कुछ और उस्लूब कुछ
यह सियासी शगल है अनोखा नहीं

या तो सर दे झुका या तो सर ले कटा
उनका फ़रमान शाही सुना या नहीं ?

मुठ्ठियाँ इन्क़लाबी उठीं जब कभी
ताज सबके मिले ख़ाक में क्या नहीं ?

जुल्म पर आज ’आनन’ अगर चुप रहा
फिर तेरे हक़ में कोई उठेगा नहीं

-आनन्द.पाठक--
उस्लूब = तर्ज-ए-अमल, आचरण

रविवार, 5 जनवरी 2020

एक ग़ज़ल ; नहीं जानता हूँ कौन हूँ

एक ग़ज़ल : नहीं जानता हूँ कौन हूँ--


नहीं जानता कौन हूँ ,मैं कहाँ हूँ
उन्हें ढूँढता मैं यहाँ से वहाँ हूँ

तुम्हारी ही तख़्लीक़ का आइना बन
अदम से हूँ निकला वो नाम-ओ-निशाँ हूँ

बहुत कुछ था कहना ,नहीं कह सका था
उसी बेज़ुबानी का तर्ज़-ए-बयाँ हूँ

तुम्हीं ने बनाया , तुम्हीं ने मिटाया
जो कुछ भी हूँ बस मैं इसी दरमियाँ हूँ

मेरा दर्द-ओ-ग़म क्यों सुनेगा ज़माना
अधूरी मुहब्बत की मैं दास्ताँ हूँ

न देखा ,न जाना ,सुना ही सुना है
उधर वो निहां है ,इधर मैं अयाँ हूँ

ये मेरा तुम्हारा वो रिश्ता है ’आनन’
अगर तुम ज़मीं हो तो मैं आसमाँ हूँ

आनन्द.पाठक-
शब्दार्थ
तुम्हारी ही तख़्लीक़ = तुम्हारी ही सॄष्टि / रचना
अदम से = स्वर्ग से
निहाँ है = अदॄश्य है /छुपा है
अयाँ हूँ = ज़ाहिर हूँ /प्रगट हूँ/सामने हूँ