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शुक्रवार, 26 मार्च 2021

एक ग़ज़ल होली पर

 


एक ग़ज़ल होली पर

 

 

न उतरे ज़िन्दगी भर जो, लगा दो रंग होली में,

हँसीं दुनिया नज़र आए , पिला दो भंग होली में ।         

 

न उतरी  है न उतरेगी, तुम्हारे प्यार की रंगत,

वही इक रंग सच्चा है, न हो बदरंग  होली में ।--          

 

कहीं ’राधा’ छुपी  फिरती, कहीं हैं गोपियाँ हँसतीं,

चली कान्हा कि जब टोली, करे हुड़दंग होली में ।      

 

’परे हट जा’-कहें राधा-’कन्हैया छोड़ दे रस्ता’

“न कर मुझसे यूँ बरज़ोरी, नहीं कर तंग होली में” ।    

 

गुलालों के उड़ें बादल, जहाँ रंगों की बरसातें,

वहीं अल्हड़ जवानी के फड़कते अंग होली में ।         

 

थिरकती है कहीं गोरी, मचलता है किसी का दिल

बजे डफली मजीरा हैं, बजाते चंग होली में ।             

 

सजा कर अल्पना देखूँ, तुम्हारी राह मैं ’आनन’

चले आओ, मैं नाचूँगी, तुम्हारे संग होली  में ।            

 

-आनन्द,पाठक-

 

8 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (28-03-2021) को   "देख तमाशा होली का"   (चर्चा अंक-4019)    पर भी होगी। 
    -- 
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है। 
    --  
    रंगों के महापर्व होली और विश्व रंग मंच दिवस की
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ-    
    --
    सादर...! 
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 
    --

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