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गुरुवार, 9 फ़रवरी 2017

एक व्यंग्य : वैलेन्टाईन डे : उर्फ़ प्याज पकौड़ी चाय

     वैलेन्टाईन डे :उर्फ़  प्याज-पकौड़ी चाय 

जाड़े की गुनगुनी धूप। धूप सेंकता मै।।रेडियो पर बजता गाना .....

दो सितारों का ज़मीं पर है मिलन आज की रात 
मुस्कराता है उमीदो का चमन  आज की रात --

गाने के सुर में अपना सुर मिलाया ही था

रंग लाइ है मेरे दिल की लगन की आज की रात 
सारी दुनिया नज़र आती है दुलहन आज की रात

कि अचानक
"अच्छा ---बड़ी रिहर्सल चल रही है वैलेन्टाईन डे की। इतनी तैयारी पढ़ने में की होती तो आज ये कलम न घिसते ।शरम नहीं आती -उमर ढल गई रिटायर हो गए । गुलाटी मारना नहीं गया ।जब जब वैलेन्टाईन डे आता है मियाँ को गाने याद आते है ।रंगीन सपने आते हैं। सब समझती हूँ -संस्कारी लड़की हूँ। गाय बछिया नहीं हूँ""--मुड़ कर देखा तो श्रीमती जी हैं ।गनीमत थी कि  बेलन हाथ में नहीं था।
"बेगम ! तुम अब लड़की  नहीं -अम्मा बन गई हो अम्मा दो लड़की की अम्मा "
"हाँ हाँ मै तो अम्मा बन गई -और तुम कौन से छोकड़े रहे , बाल रंग -रंग के बछड़ा बन गए हो"
 सुधी पाठक गण अब  समझ गये होंगे कि रिटायर होने के बाद घर में मेरा गाना भी गुनाह और शक की नज़र से देखा जाने लगा  है ।
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जब जब वैलेन्टाईन डे आता है तो मैं श्रीमती जी के ’सर्विलिएन्स कैमरे ’ की जद में आ जाता हूँ वैसे ही जैसे जेटली साहब की जद में नोट बन्दी के दिनों में जनधन खाता आ जाता था। श्रीमती जी को लगता है कि वैलेन्टाइन डे पर मैं किसी डेड "जन धन  खाता" में पैसे डालने की तैयारी कर रहा हूँ -हफ़्ते भर से हर वक़्त कड़ी नज़र रखती हैं मुझ पर  किसी इनकम टैक्स वालों की तरह -क्या गा रहा  हूँ ....क्या शायरी कर रहा हूँ..... कैसा  गीत लिख रहा हूँ..... कितनी बार बाल सँवार रहा हूँ ....कितनी बार माँग निकाल रहा हूँ.... कितनी बार कपड़े पर परफ़्यूम छिड़क रहा हूँ....कितनी बार मूछें तराश रहा हूँ....वग़ैरह वग़ैरह।
कल ’अरूज [उर्दू ग़ज़ल का छन्द शास्त्र]” पर एक निबन्ध लिख रहा था  फ़ाइलातुन--फ़ाइलातुन --फ़ाइलुन-----
श्रीमती जी पीछे से उच्चारती है--अच्छा  ! ! ......... फ़ाइलातुन--फ़ाइलातुन ..फ़ाइलातुन करने से ’अफ़लातुन’ नहीं बन जाओगे वैलेन्टाइन डे के दिन । दो बच्चों के बाप हो गए हो ...घर में रहों --गीता पढ़ो ..रामायण पढ़ो ..माला फेरो..राम राम जपो ...सनी लिओनी ...सनी लियोनी     मत रटो ....  ..वैलेन्टाइन डे तुम्हारे लिए नहीं है ---तुम्हारे लिए शास्त्रों में ’एकादशी व्रत’ ,,,.... शिव-रात्रि  का प्रावधान है

मेरे एक कवि-मित्र है। हम उम्र है ।नाम बताना उचित नहीं ,क्योंकि भाभी जी से उनको सुरक्षित रखना मेरी जिम्मेदारी  है ।वैलेन्टाइन डे पर बड़ी प्रेमभरी कविता लिखते है उसे सुनाने के लिए । कई कवि लिखते है ,कुछ बताते हैं कुछ छुपाते हैं ।हम कवि गण ’अर्थहीन [कविता अर्थहीन  भले हो  जेब से ’अर्थहीन ही होते हैं }  होते हैं।  महँगे गिफ़्ट तो क्या दे पाते हैं  अपनी वैलेन्टाइन को ,  सो  कविता में  ही आसमां से तारा ला कर देते है ... सितारे ला कर देते है  जमीन देते हैं आसमान देते हैं  बहुत खुश हो गए तो आरा-बलिया-छ्परा -भी हिला हिला कर दे देते है ...कौन अपने बाप का जाता है ....उसी को दे देते हैं  और फिर दूसरे दिन गरीब  बन झोला लटकाए सड़क पर गाते फिरते रहते है अगले साल तक--हम ने ज़फ़ा न की थी --उस को  वफ़ा न आई---पत्थर से दिल लगाया और दिल पे चोट खाई -- -- । यही कारण है कि कवियों की.. शायरों की कोई परमानेन्ट वैलेन्टाइन नहीं होती ।मेरी भी नहीं है ।अगर किसी की होगी भी तो बतायेगा नहीं। तो भाई साहब ने बड़ा ही सुमधुर  गीत लिखा था .........  गा कर जाँचा -परखा .... एक एक शब्द को सजाया ... सँवारा .  ..आवाज़ में लोच पैदा कर  सुनाया  .....  कविता में जो जो मिर्च मसाला डालना था डाला  इस उमीद से कि उनकी वैलेन्टाइन  प्रभावित होगी ।
"भाई साहब ! बात हो गई उस से ?"
"किस से?"
"अरे उसी से जिसके लिए आप ने यह गीत लिखा है । वैलेन्टाइन डे  परसों है न !!
"ही ही ही’! ’-बत्तीसी निकलते निकलते रह गई }-हे हे हे  ! क्या पाठक जी-- अब कहाँ मैं ....कहाँ वैलेन्टाइन --- ये कविता तो बस वसन्त पर लिखी "वसन्ती" पर लिखी ...-प्रकॄति पर लिखी है प्रकॄति देवी पर लिखी है विराट  में सूक्ष्म देखता हूं निराकार में आकार देखता हूँ..जड़ में चेतन देखता हूँ .....
"और मैं चोर की दाढ़ी में तिनका देखता हूँ , कोई बात नही प्रभुवर ! मैं भी वैलेन्टाइन के दिनों में  ऐसी ही कविता  लिखता हूँ प्रकॄति पर लिखता हूँ । मगर श्रीमती जी मानती ही नही ।"
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पिछली बार भी ऐसी ही एक कविता सुनाई थी अपनी वैलेन्टाइन को ।

इक जनम भी सनम होगा काफ़ी नहीं 
इतनी बातें हैं कितनी सुनाऊँ  तुम्हें
यह मिलन की घड़ी उम्र बन जाए तो
एक दो गीत कहो तो सुना दूँ तुम्हें 
इतना सुन लिया  बहुत था  -बहादुर लड़की थी

 नतीज़ा यह हुआ कि कविता सुनने के बाद वो आज तक लौटी ही नहीं --न जाने किस हाल में होगी बेचारी ? वफ़ा-बेवफ़ा की तो बात छोड़िए।आज तक याद में दिवाना बने गाता फिरता हूँ

धीरे धीरे दूर हो गई ऐसी भी थी क्या मज़बूरी
पहले ऐसा कभी नहीं था हम दोनों में दिल की दूरी
काल चक्र पर किस का वश है अविरल गति से चलता रहता
अगर लिखा था नियति यही है प्रणय कथा कब होगी पूरी---जाने क्यूँ ऐसा लगता है
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पिछली बार भी वैलेन्टाइन डे मनाया था मगर ये शिव-सेना और  बजरंग दल वालों ने अपनी ’संस्कॄति लबादा ’ से ऐसी संस्कृति लागू किया मुझ पर कि बस शहीद होते होते बचा वरना ह खाकसार -वैलेन्टाइन संस्करण-2 हो जाता।  1-2 हड्डी सीधी बची भी तो बाद में पुलिसवालों ने सीधा कर दिया } सत्यानाश हो इन दुश्मनों का।
वैलेन्टाइन डे  हर साल आता है और मुआ  दिल हर बार हड्डियाँ तुड़वा कर सीधा खड़ा हो जाता है ।आखिर जवानी भी कोई चीज़ होती है } मैं नहीं तो क्या दिल तो जवान है } 2-4 डंडे 2-4 बेलन तो खा ही सकता है ।  तौबा कर के फिर रिन्द के रिन्द हो जाता है और वैलेन्टाइन डे आते आते  ख़ुमार बाराबंकी साहब का शे’र गुनगुनाने लगता है

न हारा है इश्क़ और न दुनिया थकी है
दिया जल रहा है  हवा चल रही है 

और जब पुरवा हवा चलती है तो हड्डियों का एक एक जोड़ .पिछली वेलेन्टाइन डे की गवाही देता है।
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रिहर्सल चल रहा है तैयारी चल रही है लड़के ग्रीटिंग कार्ड खरीद रहे हैं लड़किया ड्रेस बनवा रही है -नीतू ये देख  कैसी रहेगी ? -- पिछली बार तो उसने घास ही नही डाला था खुसट था साला ---रिया ये देख तो ये ’इयर-रिंग’ कैसी लगेगी ?---अन्तरा इधर आ न देख न...तेरा वाला तो ठरकी था लास्ट इयर .....ये..मैचिंग कैसी लगेगी...? सब यारी तैयारी में लग गए।
इधर मैं अपनी तैयारी में लग गया
इस बार ऐसा गीत सुनाऊँगा ,,वो बहर-ए-तवील गाऊँगा  कि अपनी वैलेन्टाइन तो क्या उसकी 2-4 सहेलियाँ भी खीची चली  आयेगी .... ’एम डी एच ’ मसाले’ की तरह ....जहां कोई  हो... खीचा चला आए
गीत गुनगुना रहा था --गीत बना रहा था ....अन्तरा नहीं बन पा रहा था ....मीठी मीठे शब्द खोज खोज कर ला रहा था }जेब का खाली कवि बस शब्दों से ही मन बहलाता है -अपनी वैलेन्टाइन को , और वैलेन्टाइन मात्र शब्दो से  नहीं बहलती [ सच्ची वैलेन्टाइन -श्रीमती जी की बात और है शायद उनके  पास  कोई दूसरा ’आप्शन न हो]

एक मन दो बदन की घनी छाँव में
इक क़दम तुम चलो इक क़दम मैं चलूं

 आगे की लाईन सोच ही रहा था कि
 ’वाह वाह वाह वाह ’-  तालियां बजी-- मुड़ कर देखा श्रीमती जी खड़ी-हैं -" घुटने का दर्द ठीक हुआ नहीं... आपरेशन कराने के पैसे  नहीं ......,चलने के क़ाबिल नहीं.... - और चले हैं ’वैलेन्टाइन से कदम-ताल करने"  जाइए जाइए अपने वैलेन्टाइन के पास ....घर की खाँड़ खुरदरी लागे ,बाहर का गुड़ मीठा  ।शिवसेना  --बजरंग दल वाले जब मरम्मत करेंगे तो ’रिपेयरिंग’ कराने यहीं लौट कर आइयेगा
अरे ! अब कहां जाना इस उमर में ,पगली ।

जीवन भर का साथ है ,भला बुरा जो हाल
 मेरी ’वेलेन्टिन यहाँ ? जीणौ कित्तै साल ?  

फिर क्या ! बालकनी में ही बैठ कर वैलेन्टाइन डे मना रहे थे  श्रीमती जी के साथ --प्याज पकौड़ी चाय के साथ
"अच्छा सुन पगली  --प्यार जताते हुआ सुनाया --"’अभी हमने जी भर के देखा नहीं है
अच्छा तो तुम भी सुन लो -श्रीमती जी ने सुनाया --" अभी हमने  तुमको फ़ेंका नही है 

क्या नहले पे दहला मारा ...क्या तुकबन्दी भिड़ाई ...क्या ’डुयेट ’ गाया आखिर बेगम किस की हो ।रेडियो पर गाना बज रहा है ---दो सितारो का "यहीं" पर है मिलन आज की रात ...दो सितारों का,,,,
अब तो बालकनी   ही  मेरा ’पार्क’ .....घरवाली ही मेरी वैलेन्टाईन.......प्याज पकौड़ी चाय ही मेरी ’गिफ़्ट’

दुनिया जले जलती रहे.........
अस्तु

-आनन्द.पाठक-
08800927181

2 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल रविवार (12-02-2017) को
    "हँसते हुए पलों को रक्खो सँभाल कर" (चर्चा अंक-2592)
    पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
    जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक

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