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रविवार, 2 मार्च 2014

टीवी सेजुड़ी है बच्चों के मोटापे की नव्ज़


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जिस प्रकार नन्ने मुन्नों को डायपर बाँधना मम्मियों की  सुविधा है नौनिहालों की नहीं वैसे ही बालकों को टेलेविज़न आन करके खाना खिलाना भी है।

डायपर कालान्तर में डायपर रेशीज़ की ओर ले जाता है टी वी मोटापे की।  

भले बच्चे बुद्धू बक्से से चिपके बिना ना नुकर के जो दिया जाता है उसे खा लेते हैं खाने में समय भी कम लगाते हैं लेकिन कालान्तर में इन्हें भूख का ऑटो सिग्नल आना बंद हो जाता है ऐसे में बच्चे को कब भूख लगी इसका एहसास ही नहीं हो पाता। अलावा इसके बच्चे सेल्युलॉइड स्क्रीन से चिपके ज़रुरत से ज्यादा भी खा जाते हैं। नतीज़ा होता है मोटापा ,बालकों का ओवर वेट होते चले जाना। 


बच्चे खाने का रंग रूप देखे बिना ही खाते हैं टी वी के सामने। ऐसे में न पर्याप्त एन्ज़ाइम बन पाते हैं न अन्य पाचक रस। आप जानते हैं खाने की प्रक्रिया खाने के रूप रंग गंध के साथ ही शुरू हो जाती है इसलिए गोलगप्पे पानी पूरी देखकर आपके मुंह में पानी आ जाता है। 


डाइनिंग टेबिल पे करीने से सजी सलाद की प्लेट भी आपको बरबस खाने के लिए उकसाती है। जबकि बच्चे सिर्फ मुंह खोल देते हैं एक सम्मोहन उन्हें टी वी स्क्रीन से जकड़े जोड़े रहता है। इसी विषय पर पढ़िए एक विस्तृत सर्वेक्षण। 


बेहद ज़रूरी है आप जो खाएं वही बच्चे को भी खिलाएं। भोजन में पर्याप्त प्रोटीन हो सूक्ष्मपोषक तत्व (खनिज लवण ,विटामिन आदि ),कार्बोहाइड्रेट और चिकनाई का सही अनुपात हो। भोजन में विविधता रहे रोज़ ब रोज़ बच्चे को सिर्फ  मख्खन पराठा ,घी रोटी ,आलू रोटी ,यकसां एक सा खाद्य खिलाने से हरचंद बचें।  


टीवी से जुड़ी  है बच्चों के मोटापे की नव्ज़ 


80% moms glue kids to TV before feeding them: Survey

Indian mothers have hit upon a novel-if unhealthy-way to counter their children's food-related tantrums: Just turn on the television.

A survey among roughly 7,000 mothers across the four cities of Mumbai, Pune, Ahmedabad and Bangalore showed that 80% of them fed their children in front of the TV.

While the mothers felt their children ate faster and didn't throw tantrums about the contents on their plate while watching TV, doctors and nutritionists warned the habit could lead to obesity. "Eating in front of the TV is a well-established cause for obesity in the West," said Dr Ramen Goel who heads the Metabolic Surgery Association of India that commissioned the survey.

The problem with idiot-box-assisted eating is that the child tends to overeat, thereby gaining weight. Nutritionist Shilpa Joshi said children who are force-fed-either in front of the TV or not-fail to develop an "auto signal" for hunger. "They never realize when they are actually hungry," she said.

The survey was conducted by the Early Childhood Association across its own schools and some private and government balwadis in the four cities, between September and December 2013. "When we discussed the survey results with mothers, they were stunned to realize how wrong they were," said Swati Popat-Vats of the Early Childhood Association.

Vats said only 23% of the mothers said their children ate all vegetables while nearly half confessed their kids only ate potatoes and lady's fingers. Around 45% of the mothers said they didn't give fruits to children and some felt tetrapack fruit juices were a substitute for fruits.

"Nine out of 10 patients tell me they cannot cook without potatoes. As potato was historically the only concentrated form of calories known to Indians, it found its way in every preparation," said Joshi. But Indians are changing-urban Indians are sedentary, bound to their desk or sofas who don't need such calorie-dense foods.

In fact, obesity is emerging as a major public health problem in India as it's a leading cause for diabetes and heart diseases. The problem is already apparent among children: Around 2.5 million children in India are either overweight or obese.

"Between 30% and 35% of our schoolchildren in urban areas are overweight. Eating only potatoes and bhindis or eating in front of the TV will only worsen the epidemic," said Dr Goel, who commissioned the survey after an Assocham survey showed that 85% of parents with children aged under five served fast food around seven times a month.

He said the number of children opting for bariatric surgery-a method to cut down the size of the stomach so that the person eats less and becomes fitter-has been rising in India. "They may need bariatric surgery on an individual level, but it cannot be an option for all children," added Dr Goel.

Experts said as a child is dependent on parents for fo-od selection, it's important they inculcate healthy eating habits themselves. "A child should eat what the rest of the family does. The minute child-specific dishes are prepared, it degenerates to potatoes," said Joshi. "Cut down on maida and white rice, add fibre by insisting at least one snack should be a fruit or one bhaji at every meal."
प्रस्तुतकर्ता virendra sharma पर 2:09 pm कोई टिप्पणी नहीं:
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किस दर्द से—पथिकअनजाना—503




किस दर्द से—पथिकअनजाना—503
खुदाई कयानात को मानवीय शरीर में रची
शकुनी बिसात को मात्र खिलौना न समझें
भलाई यही खुद को छोडें  लहरों के सहारे
इनके इरादे क्या हैं व होंगे इंसा न समझे
लहरों को साहिल की ओर नही मोड सकते
इंसा क्या देवों के हाथ नही मोहरे चलना
फैंक के कंकड क्षणिक वृत बना सकते हो
अपनी चालों से क्षणिक सुख पा सकते हो
कहानी की अदायें संवाद नही मिटा सकते
चाहो अगली कथा इच्छानुसार बना सकते
विचारें क्यों नही हैं मोहरों के कदम थमते
तेरी हर चाल पर नजर रखता हैं वो खुदा

किस दर्द से जुडते व किस से होगे तुम जुदा
http://pathic64.blogspot.com
प्रस्तुतकर्ता बेनामी पर 12:27 pm कोई टिप्पणी नहीं:
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लेबल: किस दर्द से—पथिकअनजाना—503

शनिवार, 1 मार्च 2014

हिन्दी (छप्पय छंद)

हिन्दी अपने देश, बने अब जन जन भाषा ।
टूटे सीमा रेख, हमारी हो अभिलाषा ।।
कंठ मधुर हो गीत, जयतु जय जय जय हिन्दी ।
निज भाषा के साथ, खिले अब माथे बिन्दी ।।
भाषा बोली भिन्न है, भले हमारे प्रांत में ।
हिन्दी हम को जोड़ती, भाषा भाषा भ्रांत में ।।
प्रस्तुतकर्ता Ramesh kumar chauhan पर 10:18 pm कोई टिप्पणी नहीं:
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नवगीत

नवगीत
1.   
मंदिर मस्जिद द्वार
बैठे कितने लोग
लिये कटोरा हाथ

शूल चुभाते अपने बदन
घाव दिखाते आते जाते
पैदा करते एक सिहरन
दया धर्म के दुहाई देते
देव प्रतिमा पूर्व दर्शन

मन के यक्ष प्रश्‍न
मिटे ना मन लोभ
कौन देते साथ

कितनी मजबूरी कितना यथार्थ
जरूरी कितना यह परिताप
है यह मानव सहयातार्थ
मिटे कैसे यह संताप
द्वार पहुॅचे निज हितार्थ

मांग तो वो भी रहा
पहुचा जो द्वार
टेक रहा है माथ

कौन भेजा उसे यहां पर
पैदा कैसे हुये ये हालात
भक्त सारे जन वहां पर
कोई देता दोष ईश्‍वर
वाह रे मानव करामात

अपने नाते
अपना परिवार
मिले दिल से साथ
2.   
बासंती बयार
होले होले
बह रही है

तड़प रहा मन
दिल पर
लिये एक गहरा घाव
यादो का झरोखा
खोल रही किवाड़
आवरण से ढकी भाव

इस वक्त पर
उस वक्त को
तौल रही है

नयन तले काजल
लबो पर लाली
हाथ कंगन
कानो पर बाली

तेरे बाहो पर
मेरी बदन
झूल रही है

ईश्‍वर की क्रूर नियति
सड़क पर बाजार
कराहते रहे तुम
अंतिम मिलन हमारा
हाथ छुड़ा कर
चले गये तुम

तन पर लिपटी
सफेद साड़ी
हिल रही है
प्रस्तुतकर्ता Ramesh kumar chauhan पर 10:07 pm कोई टिप्पणी नहीं:
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कह मुकरियां


1.  
श्‍याम, रंग मुझे है लुभाये ।
रखू नैन मे उसे छुपाये ।
नयनन पर छाये जस बादल ।
क्या सखि साजन ? ना सखि काजल ।
2.  
मेरे सिर पर हाथ पसारे
प्रेम दिखा वह बाल सवारे ।
कभी करे ना वह तो पंगा ।
क्या सखि साजन ? ना सखि कंघा
3.  
उनके वादे सारे झूठे ।
बोल बोलते कितने मीठे ।
इसी बल पर बनते विजेता ।
क्या सखि साजन ? ना सखि नेता ।।
4.  
बाहर से सदा रूखा दिखता ।
भीतर मुलायम हृदय रखता ।।
ईश्‍वर भी हो जाये कायल ।
क्या सखि साजन ? न सखि नारियल ।।
5.  
हमेशा मेरे साथ रहते ।
बात सदा करने को कहते ।
उनसे बाते कर करू स्माइल ।
क्या सखि साजन ? ना मोबाइल ।।
प्रस्तुतकर्ता Ramesh kumar chauhan पर 10:03 pm कोई टिप्पणी नहीं:
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ख्याल चिन्ता व चिता—पथिक अनजाना-501 वी.पोस्ट




   ख्याल चिन्ता व चिता—पथिक अनजाना-501 वी.पोस्ट
 चिन्ता अढाई अक्षर का यह शब्द बहुत ही जालिम हैं
इंसानी दिलोदिमाग पर हर घडी रहे इसका तो पहरा है
कदमों आगे चले इसकी दीदी जो कि ख्याल कहलाती हैं
जहाँ रूके जहाँ से गुजरे ये राह चिन्ता की बना जाती है
घातक आकर्षक  वस्त्र अनेक पहन कई रूपों में आती है
होती हावी जिस पर दोनों चित्ता की ओर कदम बढाती हैं
पर न मिलता सकून कभी चिता न कब्र में दफन होकर
पूर्वजन्म लेने की चिन्ता इंसानी आत्मा को बन आती हैं
चक्र यू ही चलता रहेगा जग में ख्याल चिन्ता व चिता
इन तीनों कोणों से जो टकराती आत्मा वह राह न पाती है
लाख कोशिशें करें लाख जपतप कर मुक्ति नही हो पाती है

पथिक अनजाना
http://pathic64.blogspot.com
प्रस्तुतकर्ता बेनामी पर 7:16 pm कोई टिप्पणी नहीं:
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लेबल: ख्याल चिन्ता व चिता—पथिक अनजाना-501 वी.पोस्ट

खून में घुली चर्बी (Cholesterol )को कम करने के लिए अनाजों में बाजरा अच्छा है क्योंकि इसमें मौज़ूद रहता है फाइटिक अम्ल (phytic acid )तथा नियासिन (niacin ).

सेहतनामा 

(१) दिल के लिए अच्छी है डार्क चॉकलेट क्योंकि यह धमनियों को न सिर्फ अंदर से खुरदरी होने से रोकती हैं उनकी इलास्टिसिटी (लचीलापन )को भी बनाये रखने में मददगार है अलावा इसके यह वाइट बल्ड सेल्स को रक्तवाहिनियों की दीवार से चस्पां होने से रोकती है नतीज़न आथिरोस्क्लेरोसिस (atherosclerosis)से बचाव के मौके बढ़ जाते है। 

What Is Atherosclerosis?क्या है धमनी काठिन्य धमनियों की दीवार का अंदरसे 

संकरा और खुरदरा होजाना जो अंततया धमनी अवरोध का कारण बनता है ?


Atherosclerosis -- hardening and narrowing of the arteries -- gets a lot of bad press, with good reason. This progressive process silently and slowly blocks arteries, putting blood flow at risk.

Atherosclerosis is the usual cause of heart attacks, strokes, and peripheral vascular disease -- what together are called "cardiovascular disease." Cardiovascular disease is the No. 1 killer in America, with more than 800,000 deaths in 2005.



(२)खून में घुली चर्बी (Cholesterol )को कम करने के लिए अनाजों 

में बाजरा अच्छा है 

क्योंकि इसमें मौज़ूद रहता है फाइटिक अम्ल (phytic acid )तथा 

नियासिन (niacin ).



(३ )हरी तरकारियों में पालक (spinach )विटामिन K का एक अव्वल 

स्रोत है 

(उच्च मात्रा में मौज़ूद रहता है पालक में यह विटामिन )

) एक तरफ यह खून के गाढ़ेपन को नियंत्रित  करता है दूसरी 

तरफ 

चोट लगने पर शरीर को खून में थक्के बनाने के लिए एड़ लगाता है प्रेरित


करता  है, वरना शरीर के क्षतिग्रस्त होने पर बे -तहाशा खून बहता रहे। 


(४)Stethoscopes major cause of spread of 

infections

 Although healthcare workers' hands are the main source of bacterial transmission in hospitals, physician's stethoscopes have now been found to actually play a major role in spreading deadly infections. Researchers at the University of Geneva hospitals assessed the level of bacterial contamination on physician's hands and stethoscopes following a single physical examination. 

"Considering that stethoscopes are used repeatedly over the course of a day, come directly into contact with patient's skin and may harbour several thousands of bacteria (including MRSA) or drug resistant ones collected during a previous physical examination, we consider them as potentially significant vectors of transmission," said lead investigator Didier Pittet. "From infection control and patient safety perspectives, the stethoscope should be regarded as an extension of the physician's hands and be disinfected after every patient contact.'' Researchers examined 71 patients who were checked by one of three physicians using sterile gloves and a sterile stethoscope.

After they completed the examination, two parts of the stethoscope (the tube and diaphragm) and four regions of the physician's hands (back, fingertips, and thenar and hypothenar eminences) were measured for the total number of bacteria present. The stethoscope's diaphragm was more contaminated than all regions of the physician's hand except the fingertips. Further, the tube of the stethoscope was more heavily contaminated than the back of the physician's hand. Similar results were observed when contamination was due to methicillin-resistant Saureus (MRSA) after examining MRSA-colonized patients. "This work is the first to compare directly the level of contamination of physician's hands and stethoscopes. Stethoscope contamination is not trivial and is comparable to the contamination of healthcare worker's fingertips," the research said.

(५) US study bares truth about killer parents

 Over the last three decades American parents have committed filicide — the killing of one's child— about 3,000 times every year. The horrifying instances are often poorly understood, but a recent study provides the first comprehensive statistical overview of the tragic phenomenon. 

A paper in the March edition of the journal Forensic Science International provides the first comprehensive statistical analysis of filicide in the US, drawing on 32 years of data on over 94,000 arrests. The data in the study comes from FBI's Supplementary Homicide Reports database. 

Dr Timothy Mariano and co-author Heng Choon Chan from Alpert Medical School of Brown University looked at 632,017 arrests between 1976 and 2007, finding that 94,146 cases (14.9%) were filicides. 

Male children were more likely to be killed (58.3%) than female children. About 11% of victims were stepchildren, which is on the low end of the estimated proportion of US children (10-20%) who live with a stepparent. 

Among offenders, while fathers were about equally likely to kill an infant, they were more likely to be the alleged murderer of children older than a year, especially when the children were adults (fathers were the offenders in 78.3% of those cases). 

Overall, fathers were the accused murderer 57.4% of the time. The data allowed the researchers to determine the most common filicide scenarios. A father killing a son was the most likely (29.5% of cases), a mother killing a son (22.1%) follows. 

A mother was slightly more likely to kill a daughter (19.7% of cases) than a father was (18.1%). The rarest instances were stepmothers killing either a stepson (0.5%) or a stepdaughter (0.3%). 

The researchers found that the most common method of killing was with "personal weapons," such as by the beating, choking, or drowning of victims. Parents used these means in 69% of murders of infants. 

As victims aged, firearms were more common, becoming the weapon used in 72.3% of the cases in which the victim was an adult. Men were much more likely to use guns than women.

(६) A pill that can prevent aging closer to reality 

A new pill that prevents aging and keeps people healthier for 

longer may be a step closer ,scientists say .Activating a 

protein called sirtuin 1 extends lifespan,delays onset of age -

related metabolic diseases and improves general health in 

mice ,a study has found .


Sirutin 1 is known to play a key role in maintaining 

metabolic balance in multiple tissues and studies have 

shown that activating the protein can lead to health benefits 

.Also ,drugs that increase SIRT1 activity have been found to 

slow the onset of aging and delay age -associated diseases .


(7)One in three strippers 'are students paying for their education'


One in three strippers 'are students paying for their education'

Some started stripping even before starting their courses to help pay for the 'high cost of education'


Nearly a third of women working in strip clubs are students, often from middle-class families, says a new study.

And some started stripping even before starting their courses to help pay for the “high cost of education”, according to the study published in the British Journal of Sociology of Education.

“The core reasons for entry into stripping by students were the high cost of higher education, the lack of availability of loans and support for vocational courses and the ability to combine stripping work with the demands of educational courses, due to the flexibility it offered,” the study said.
“Even before beginning university, some dancers prepared for the high cost of higher education by starting dancing beforehand.
“Students often started dancing with friends as a joint venture, drawn in by the initial excitement of engaging in a transgressive world, and the prospect of earning cash in hand on the night was considered a bonus.”
Academics at Leeds University interviewed nearly 200 dancers working in the UK and 29 per cent of them were in some form of education.
Students had become a “core supply group” for strip club dancers and one city with two universities had 12 strip clubs.

There was “definite tension between the 'old school' dancers who were there to earn good money and the new, inexperienced younger women who had a range of motives for entering stripping“, the study added.
Sociologist Teela Sanders told the Times Higher Education magazine that some saw themselves as “dancers, not sex workers” because “selling striptease had become more palatable and socially acceptable.”
He added that the students' motivation for finding work as strip club dancers was not always financial. “Many of these dancers are from middle-class backgrounds - they are not coming from families where money is a big issue,” he said.


(८)लोक स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ बंद करें चिकित्सक

दवा व्यवसाय की आपसी प्रतिस्पर्धा का कुप्रभाव भले ही स्वास्थ्य  मंत्रालय भारत सरकार को दिखायी न दे लेकिन यह सच है कि मरीजों के स्वास्थ्य पर इसका गलत असर पड़ रहा है। सरकार की नयी आर्थिक नीतियों के तहत अंतर्राष्ट्रीय दवा कंपनियों की भी भारत में पूंजीनिवेश तथा यहां उनके संयत्र स्थापित करने के लिये दी गयी छूट के कारण नित्य नयी कंपनियां आने लगी हैं। हो सकता है कि देश की अर्थव्यवस्था तथा जरूरतों के लिये यह एक अच्छी बात हो लेकिन लोक स्वास्थ्य पर इसका क्या प्रभाव पड़ रहा है, यह प्रश्न भी विचाणीय होना चाहिये। यह यक्ष प्रश्न इसलिये भी विचारणीय है क्योंकि सभी बड़ी अंतर्राष्ट्रीय कंपनियों के लिये भारत एक बहुत बड़े बाजार के सिवाय और कुछ नहीं है। दवा कंपनियां यह भी जानती हैं कि भारत का दवा बाजार एक ऐसा खुला क्षेत्र है जहां थोड़े से कमीशन पर अधिक से अधिक मुनाफा कमाया जा सकता है। ये लोग यह भी जानते हैं कि स्वास्थ्य के प्रति भारत के लोग अमेरिका की तरह जागरुक भी नहीं है और न ही पाश्चात्य देशों की तरह दवा जगत में मार्केटिंग के लिये नियम कानून इतने कड़े हैं कि जिसके लिये विशेष प्रयोग और प्रमाण पत्र की जरूरत पड़े लिहाजा कैसा भी माल यहां आसानी से खपाया जा सकता है। सभी देशी विदेशी दवा कंपनियों की इसी घातक मनोवृत्ति का कुप्रभाव इन दिनों मरीजों के स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। लगभग सभी चिकित्सक अपने अनुभवों को ताक पर रखकर दवा प्रतिनिधियों के कहे अनुसार मरीजों को केवल वही दवा लेने के लिये कह रहे हैं जिसमें चिकित्सकों का कमीशन ज्यादा है। इस कमीशनखोरी के चक्कर में चिकित्सक जहां मालामाल होते जा रहे हैं, वहीं मरीज रोगमुक्त होने के बदले विभिन्न अन्य बीमारियों से ग्रसित होता जा रहा है। यह बात आप सभी जानते हैं कि एलोपैथिक दवाइयां साइड  इफेक्ट से पूरी तरह से मुक्त नहीं होती, फिर मरीजों को ऐसी दवाइयां देने का क्या मतलब होता है जिससे उसे अन्य बीमारियां हो जायें ? बात बिल्कुल साफ है कि आज अधिकांश चिकित्सकों को इस बात से कोई लेना-देना ही नहीं है कि दवा का किस मरीज पर किस तरह का कुप्रभाव पड़ रहा है। मरीज को जल्द ठीक करने के चक्कर में चिकित्सक ऐसे हाइ डोज की दवा लिखकर दे रहे हैं जिसमें मरीज स्वस्थ होने के बदले और बीमार हो रहा है इसे आधुनिक चिकित्सा पध्दति की खामियाँ  कहें  या फिर चिकित्सकों की कमजोरी कि दवा देने से पहले यह भी नहीं देखा जा रहा है कि मरीज किस उम्र का है और उसमें कितने एमजी, दवा सहने की ताकत शेष है। कहने का तात्पर्य यह है कि किसी उच्च शक्ति सम्पन्न एंटीबायटिक दवा का मरीज पर कुप्रभाव पड़ते देखते ही चिकित्सक आनन फानन में उस दवा को बदल कर दूसरी दवाइयां लिखकर दे देते हैं। इस तरह से चिकित्सक अपने अनुभव और ज्ञान के बदले मरीज के शरीर को ही अपना प्रयोगशाला बनाने पर तुले हुए है जबकि ऐसा नहीं होना चाहिये। मरीज के शरीर पर विभिन्न किस्म के दवाओं के प्रयोग का खामियाजा आखिर मरीज को ही भुगतना पड़ता है। आज चिकित्सा विज्ञान इतना उन्नत हो चुका है और इतनी तरह की जांच सुविधाएं मौजूद हैं कि यदि चिकित्सा दवा कंपनियों के लालच में न आये और अपने अनुभवों का सदुपयोग करें तो उन्हें इस तरह के प्रयोग की जरूरत ही नहीं है। यह बात सभी चिकित्सकों को पता है किस तरह की बीमारियों के लिये किस तरह की दवा कितनी मात्रा में देने की जरूरत है। यदि दवा का कारोबार करने वालों को लोक स्वास्थ्य से कोई मतलब नहीं है तो चिकित्सकों को तो होना ही चाहिये क्योंकि मरीजों के लिये वही भगवान समान है।



  

  1. US study bares truth about killer parents - Worldnews.com

    article.wn.com/view/2014/.../US_study_bares_truth_about_killer_parents...‎

    7 hours ago - LONDON: Over the last three decades American parents have committed filicide — the killing of one's child— about 3000 times every year.



News for stethoscopes major cause of spread of ...



NPR (blog)

  1. Stethoscopes major cause of spread of infections

    Times of India ‎- by Kounteya Sinha ‎- 7 hours ago
    LONDON: Although healthcare workers' hands are the main sourceof bacterial transmission in hospitals, physician's stethoscopeshave now ...



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